‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ श्रृंखला किसी को दुख देने के लिये नहीं लिखी गयी थी

कुछ समय पहले मैंने  ‘नाई की दाढ़ी को कौन बनाता हैनामक चिट्ठी लिखी। इसमें संस्कृत का एक श्लोक भी लिखा था। मैं जानना चाहता था कि वह कहां से है। कई चिट्ठाकार बन्धुवों ने मदद की। इस पर अरविन्द जी ने   ‘मेरे ही बुकशेल्फ में छुपा था उन्मुक्त जी के प्रश्न का जवाब!‘ नामक चिट्ठी लिखी। इस पर   हिमान्शू मोहन जी, ने टिप्पणी की,

‘… एक बात और यहाँ साथ ही कहता चलूँ – जो मैंने उन्मुक्त की पोस्ट पर भी कही थी – कि बिना पूरी तरह जाने किसी विषय को, उस के बारे में अच्छी या बुरी धारणा बना लेना – पूर्वाग्रह है। सतर्क और जिज्ञासु – ज्ञान-पिपासु को इससे बचना चाहिए।’

राशियां - चित्र विकिपीडिया के सौजन्यसे

मैंने भी वहीं टिप्प्णी कर कहा था कि मैं जल्द ही अपनी बात रखूंगा। यह रहा मेरे जवाब का पहला भाग।

मेरी श्रृंखला ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ (पहली एवं अन्तिम चिट्ठी) के बारे में कुछ गलतफहमी है। इसके कारण मेरी अक्सर टांग खिंचायी और निन्दा होती है। उस चिट्ठी पर, अक्सर ऐसी टिप्पणियां आती हैं जो शालीनता के परे होती हैं। अक्सर लोग पूरी श्रृंखला नहीं पढ़ते हैं।

यह श्रृंखला लिखते समय, कड़ियों में लिखने का कारण स्पष्ट था पर संकलित कर रखते समय शायद यह स्पष्ट न रह सका कि मैंने वह श्रृंखला क्यों लिखी। मैं अपनी बात बात ज्योतिष प्रेमियों को समझाना चाहता हूं।

यह सच है कि मैं या मेरा परिवार ज्योतिष, या हस्तरेखा या अंकविद्या में विश्वास नहीं करता हूं। हम पूजा पाठ में भी विश्वास नहीं करते। मैंने अपनी मां का  एक किस्सा ‘करो वही, जिस पर विश्वास हो‘ लिखा था। आपातकाल के समय, मेरे पिता जेल में थे। एक शुभचिन्तक ने, मेरी मां से कहा कि वे शिवपूजा करें तो मेरे पिता छूट सकेंगे। इसके लिये मां ने यह कह कर मना कर दिया। उन्हें इसमें विश्वास नहीं है।

हम सब भाई बहन की शादी के समय न तो जन्मकुंडली मिलवायी गयी न ही ज्योतिष के हिसाब से तिथि का ध्यान रखा गया। गृह निर्माण या प्रवेश में भी ज्योतिष का ध्यान नहीं रखा गया। हम सब अपने जीवन में खुश हैं।

कुछ समय पहले, मैंने दिल्ली के उपनगर में मकान बनवाया। उस बिल्डर ने नक्शा बनवाते समय पूछा कि क्या मकान वास्तु के हिसाब नहीं बनेगा। मैंने जवाब था,

‘मकान, वास्तु के हिसाब से नहीं बनेगा।’

उसका कहना था,

‘आप फिर से सोच लें। आजकल बिना वास्तु के कोई मकान नहीं बनवाता। आप पहले व्यक्ति मिले जो कह रहे हैं कि वास्तु के हिसाब से नहीं बनवायेंगे।’

मैंने कहा आप मकान का नक्शा सूरज की रोशनी और हवा की आने जाने की सुविधा से बनवाइये, न कि वास्तु के हिसाब से।

मेरे विचार में ‘ज्योतिष कूड़े का भार है‘। मैं कार्ल सेगन का प्रशंसक हूं। मेरे विचार उनके विचारों जैसे ही हैं। आप खुद इस विडियो में सुनिये।

उन्मुक्त चिट्ठे पर लिखी श्रृंखला को संपादित कर, लेख चिट्ठे पर लिखी चिट्ठी ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके‘, मेरी सबसे ज्यादा पढ़ी चिट्ठी है। इस श्रृंखला की चिट्ठियां, अन्तरजाल में कई जगह पूरी या इसके कुछ अंश – संदर्भ देते हुऐ या फिर बिना संदर्भ देते हुऐ – प्रकाशित हैं। यह मेरे ‘लेख’ चिट्ठे पर ही लगभग ५०,००० बार पढ़ी गयी है। यह सबसे विवादास्पद भी है।

इस पर तरह तरह की टिप्पणियां आती हैं। कुछ इसे सही मानते हैं, कुछ गलत। अधिकतर लोग मुझसे अपना भविष्य पूछते हैं। भविष्य पूछने वाली चिट्ठियों में से मैंने एक को प्रकाशित कर वहीं उसका जवाब लिख दिया पर उसके बाद में की टिप्पणियों को प्रकाशित नहीं करता हूं। टिप्पणी करने वालों को यह टिप्पणी और उसका जवाब पढ़ना चाहिये।

मेरी बातों को गलत कहने वालों में कुछ अपनी बात शालीनता से कहते हैं लेकिन अधिकतर लोग शालीनता के परे जवाब देते हैं। जो टिप्पणियां शालीनता के परे होती हैं, मैं उन्हें प्रकाशित नहीं करता – जबरदस्ती का विवाद होगा। लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि जो इस चिट्ठी को गलत बताते हैं – चाहे वह शालीनता से, चाहे शालीनता के परे – वे इसमें लिखे तर्क को नहीं काट पाते हैं। वे क्या कहते हैं यह तो आप वहीं जा कर देख सकते हैं। कुछ उदाहरण देखिये,

  • you are like a frog who jump around the well and like a pigeon who feel that if he close his eyes the cat back away. तुम उस मेढ़क की तरह हो जो कि कुऐं में कूदता रहता है और उस कबूतर की तरह जो कि सोचता है कि वह अपनी आंख बन्द कर लेगा तो बिल्ली चल जायगी;
  • APKA CHITHHA PAD KAR MUJE TO ESA LAGA JAISE KI AAPNE KISI BOOK MEI SE YAAD KARKE VAISE KA VAISA APNE CHHITHE MEI LIKH DIYA. आपका चिट्ठा पढ़ कर मुझे लगा जैसे कि आपने किसी बुक में से याद करके वैसा का वैसा अपने चिट्ठे में लिख दिया है;
  • sorry you are completely wrong … I think you didn’t meet from real astrologer if you meet, then you know that what is astrology … अफसोस तुम एकदम गलत हो  तुम आज तक किसी सही ज्योतिषाचार्य से नहीं मिले, यदि तुम मिलोगे तब तुम्हारी समझ में आयेगा कि ज्योतिष क्या चीज़ है ;
  • mere mitra bhi mere sath hai kah rahe hai aap jaise logo ne hi bhrat ki lutiaa duboi hai.. to kripya aapse koi sambad na karu… मेरे मित्र भी मेरे साथ कह रहें हैं आप जैसे लोग ही भारत की लुटिया डुबोऐ हैं तो कृप्या आपसे कोई संबन्ध न करूं ;
  • bhagwan ki banai koi shastra galat nahi ho sakti phir jyotish to shastron ki janani hai jarurat hai भगवान की बनाई कोई शास्त्र गलत नहीं हो सकती फिर ज्योतिष तो शास्त्रों की जननी है जरूरत है;
  • अगर ज्योतिष को व्यर्थ सिद्ध करना है तो भी, पहले कुछ ज्योतिष अध्ययन आवश्यक है।

मैंने ज्योतिष, हस्तरेखा, और अंकविद्या के बारे में पढ़ा, अध्यन किया फिर लेख लिखा। यह कहना सही नहीं है कि मैंने बिना पढ़े ही वह श्रृंखला लिखी। यदि किसी को इस विषय का बेहतर ज्ञान हो, वह ही इन बातों को तर्क से समाप्त करे, इस बारे में लिखे।

क्या इस तरह की टिप्पणियां लेख गलत साबित होता है। क्या इनसे पता चलता कि ज्योतिष अन्धविश्वास नहीं है। मुझे यह टिप्पणियां दुखी करती हैं। इसीलिये मैंने आप सही हैं … मैं बदलाव कर रहा हूं नामक चिट्ठी लिखी।

यदि यह आस्था की बात है तब मुझे कुछ नहीं कहना क्योंकि आस्था को तर्क या ज्ञान से नहीं परखा जा सकता। वह इनके परे है।

मैं आज तक किसी भी हिन्दी चिट्ठकार से नहीं मिला। मैं उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में नहीं जानता। लेकिन मुझे वास्तविक में लोगों से मिलने उन्हें जानने का अवसर मिला है। अधिकतर लोग, कुछ न कुछ ज्योतिष, हस्तरेखा, अंक विद्या, या  पूजा पाठ पर विश्वास करते मिले। मुझे ऐसे लोगों से कोई शिकवा या आपत्ति नहीं है। इनमें से बहुत, न केवल मेरे अच्छे मित्र हैं पर मुझसे कहीं गुणी और विद्वान भी हैं। वे और हम, एक दूसरे का आदर करते हैं।

मैंने ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ श्रृंखला (पहली एवं अन्तिम चिट्ठी) ज्योतिष पर विश्वास करने वालों का मजाक बनाने के लिये या किसी की आस्था या विश्वास पर चोट पहुंचाने के लिये नहीं लिखी थी।

‘उन्मुक्त जी, यदि यह श्रंखला किसी का मजाक बनाने के लिये नहीं थी तब आपने यह क्यों लिखी।’

यह सच है कि मैं यह तर्क द्वारा बताना चाह रहा था कि क्यों ज्योतिष, हस्तरेखा या अंकविद्या सही नहीं है पर इस श्रृंखला को लिखने का कारण कुछ और ही था। यह  अगली बार इसी चिट्ठे पर।

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उन्मुक्त चिट्ठे पर लिखी श्रृंखला ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ को यदि आप कड़ियों में पढ़ना चाहें तो नीचे लिखी लिंक पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।

भूमिका।। तारे और ग्रही।। प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र।। यूरोप में खगोल शास्त्र।।  हेर संगीत नाटक।। पृथ्वी की गतियां।। राशियां।। विषुव अयन: हेयर संगीत नाटक के शीर्ष गीत का अर्थ।। ज्योतिष या अन्धविश्वास।। राशिफल का मेष राशि से शुरु और ज्योतिष का अपने तर्क पर गलत होना।। अंक विद्या, डैमियन – शैतान का बच्चा।। अंक लिखने का इतिहास।। हस्तरेखा विद्या और निष्कर्ष।।

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Astrology is wrong;

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मिस्टर व्हाई – यह कौन हैं
'कोर्ट गर्डल, महानतम तर्क शास्त्री माने जाते हैं। इस चिट्ठी में,  उनकी जीवनी और उस पर लिखी दो पुस्तकों की चर्चा है। 
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
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देखें।

कोर्ट गर्डल पर बहुत सी पुस्तकें लिखी गयी हैं। इनमें से मैंने निम्न चार पुस्तकें पढ़ी हैं:
  1. Gödel: A life of Logic by John L Casti (गर्डल: ए लाइफ ऑफ लॉज़िक लेखक जॉन एल कास्टी)
  2. A world Without Time: The forgotten legacy of Gödel and Einstein by Polle Yourgrau (ए वर्ल्ड विथआउट टाइम: द फॉरगॉटन लेगसी ऑफ गर्डल एंड आइंस्टाइन लेखक पॉले योरग्रॉ)
  3. Gödel, Escher, Bach: An Eternal Golden Braid by Douglas R. Hofstadter (गर्डल, ऍशर, बाख: एन ईटर्नल गोल्डेन ब्रेड लेखक डगलस आर हॉफस्टैडर)
  4. The Emperor's New Mind: Concerning Computers, Minds and The Laws of Physics (द एमपररस् न्यू माइंड: कंसर्निग कंप्यूटरस्‌, माइंडस् एण्ड द लॉज़ ऑफ फिज़िक्स  लेखक रॉजर पेनरोज)
आज हम पहली दो पुस्तकों के बारे में बात करेंगे।

गर्डल जिज्ञासू थे और वह मिस्टर व्हाई (Mr. Why) के नाम से जाने जाते थे। वे असामान्य प्रतिभा के धनी थे। वे एक शर्मीले युवक से एक ऎसे व्यक्ति बन गये जिनके साथ अधिकतर लोग रहना पसंद करते थे। लेकिन जीवन के अन्त में वे फिर अकेलेपन में डूब गये।

गर्डल ने ऍडेले (Adele) नामक एक तलाकशुदा महिला से शादी की। वह उनसे ६ साल की बड़ी थी और  कैबरे  (Cabaret) नृत्य करती थी। यह शादी उनके माता पिता को पसंद नहीं थी इसलिए गर्डल को शादी के लिए १० साल इन्तजार करना पड़ा। उनके कोई सन्तान नहीं हुई।

कोर्ट गर्डल और अर्लबट आइंस्टाइन पिछले शताब्दी के दो महानतम वैज्ञानिक थे। जीवन के अंतिम दिनो में, वे दोनो ही   इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ (Institute of Advance Studies Princeton) चले गये थे। दोनो का स्वभाव एक दूसरे के विपरीत था। गर्डल थोड़ा निराशवादी और परेशान दार्शनिक  और  आइंस्टाइन मुक्त भावुक व्यक्ति थे।  लेकिन उन दोनों को एक दूसरे से शान्ति मिलती थी।  आइंस्टाइन  का कहना था कि,

'इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ में सबसे अच्छी बात यह है कि, इंस्टिच्यूट से वापस घर जाते समय, गर्डल और मेरा साथ रहता है।'
फ्रीमैन डाइसन जाने माने भौतिक शास्त्री हैं। वे इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ के स्दस्य हैं। उनका कहना है कि,
'Gödel was … the only one of our colleagues who walked and talked on equal terms with Einstein.'
हमारे साथ के लोगों में, केवल गर्डल ही था जो आइंस्टाइन के साथ चल सकता था और उनसे बराबरी पर बात कर सकता था।

गर्डल कुछ अजीब किस्म के व्यक्ति थे। उन्होंने अन्त में आत्महत्या कर ली। उनका आत्महत्या का तरीका भी एकदम अलग अपने अपूर्णनता सिद्धान्त की तरह। उनकी मृत्यु malnutrition के कारण हो गयी। वे जीवन के अन्त में अस्पताल में unitary tract की समस्या के लिये भरती थे। उन्होंने महीने भर खाना नहीं खाया। उनका कहना था कि डाक्टर उन्हें जहर दे कर मारना चाहते हैं।

इन दोनो पुस्तकों में गर्डल के बारे पर्याप्त सूचना है।  दूसरी पुस्तक में आइंस्टाइन के संबन्ध में भी कुछ सूचना है।

पहली पुस्तक में कुछ अध्याय, कृत्रिम बुद्धि (Artificial intelligence), सोचने वाली मशीन (Thinking machines), और जटिलता (complexity) के बारे में है। इसे उन लोगों के लिए समझना मुश्किल है जो विषय पर रूचि नही रखते है या जिनको इस क्षेत्र में कोई ज्ञान नहीं है। इसलिए यदि आप चाहें तो इन अध्याय को छोड़ सकते है पर यदि आपको तर्कशास्त्र या कम्पयूटर विज्ञान में रूचि है तब इन अध्यायों को अवश्य पढ़ें। बाकी अध्याय आसान हैं व आसानी से समझे जा सकते है।

दूसरी पुस्तक में, कुछ अध्याय गर्डल द्वारा समय के ऊपर किये गये काम के बारे में है। यह वास्तव में  मुश्किल है और पढ़ते समय यदि आप चाहें तो इनको छोड़ भी सकते है।

गर्डल ने एक बार कहा

'We live in the World in which ninety-nine per cent of all beautiful things are destroyed in the bud.'
हम ऐसे संसार में रहते हैं जहां ९९ प्रतिश्त सुन्दर वस्तुएं शुरुवात में ही समाप्त हो जाती हैं।

मालुम नहीं क्यों मुझे लगता है कि यह हिन्दी चिट्टाजगत पर सही बैठता है। हम अच्छे लेख लिखने के बजाय, व्यर्थ की बात पर विवाद करते रहते हैं। 

गर्डल के अपूर्णनता सिद्धान्त के बारे में कुछ अन्य पुस्तकों की चर्चा - इस श्रंखला की अगली कड़ी में।

तू डाल डाल, मैं पात पात
भूमिका।। नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है।। नाई, महिला है।। मिस्टर व्हाई - यह कौन हैं।। गणित, चित्रकारी, संगीत - क्या कोई संबन्ध है।।





About this post in Hindi-Roman and Englishyeh chitthi cyber apradh ki shrakhlaa kee kari hai. is chitthi mein Gödel  kee jeevani aut us per do pustkon kee charcha hai. yeh chitthi {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is part of series on Cyber crimes. It talks about Gödel life and two books on him. It talks about whether Epimenides' or liar's paradox was sorted out in Pricipia Mathematica or not. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
Hindi, पॉडकास्ट, podcast,
सुनते तो हो नहीं, जो करना हो सो करो
रोहतांग पाइंट के रास्ते में पैराग्लाइडिंग होती है। इस चिट्ठी में उसी की चर्चा है।

रोहतागं पॉइंट के रास्ते में पैरा-ग्लाईडिंग भी होती है। रोहतागं पॉइंट से वापस आते समय, हमें रास्ते में कुछ लोग पैरा-ग्लाईडिंग करते हुए मिले। एक जगह कुछ लड़के, खड़े हुए थे। वहीं से पैरा-ग्लाईडिंग हो रही थी। मैंने ड्राइवर से कहा कि गाड़ी उनके पास ले चलो। शुभा को यह बात बिल्कुल पसंद नही थी कि मै पैरा-ग्लाईडिंग करूं। वह कहने लगी कि हमें सीधे चलना चाहिए। मैंने कहा कि कम से कम बात तो करने दो। मैं जब उनके पास पहुंचा, तो उन्होंने बताया,
'हमारे पास दो विकल्प है। छोटी उड़ान और बड़ी उड़ान। छोटी उड़ान में आप मरहीं तक जा सकते है। लम्बी उड़ान, सोलंग वैली तक जाती है। छोटी उड़ान के लिए दो हजार रूपया और सोलंग वैली के लिए ३५००/-रूपये लगते हैं।'
अब तो विश्वास हुआ न कि मैंने पैराग्लाइडिंग की
मरहीं पर हम लोगों ने आते समय नाश्ता किया था और वापस लौटते समय वहीं खाना खाने की बात थी। इसलिए मैं छोटी उड़ान लेना चाहता था। मैंने पूछा कि क्या पैसा सही है। उसने हामी भरी। हांलाकि मुझे लगा कि यह पैसा कुछ ज्यादा है। शुभा बिलकुल नहीं चाहती थी कि मैं पैरा ग्लाईडिंग करूं। लेकिन मैं पैरा ग्लाईडिंग करना चाहता था।  मैंने उसे समझाया।
'गोवा में पैरा-सेलिंग के समय मैं अकेला था। लेकिन यहां पर पैराग्लाइडिंग करते समय मेरे साथ एक ट्रेनर भी रहेगा इसलिए मुश्किल की कोई बात नहीं है तुम मुझे पैसे दे दो।'
इस पर वह गुस्से से बोली।,
'तुम किसी की बात नहीं सुनते हो। जो करना हो सो करो।'
मैंने उससे चित्र खीचने को कहा। उसने कहा,
'चित्र खींचना तो दूर, मैं तो यह सब देख भी नहीं सकती।'
लेकिन उसने २००० रूपये  दे दिये पर मुंह दूसरी तरफ कर लिया।  

पैरा ग्लाइडिंग करते समय मैं आगे था और ट्रेनर पीछे की ओर। सारे कंन्ट्रोल उसी के पास थे। वह डोरी की सहायता से दायें बायें या ऊपर नीचे करता था। गोवा में पैरागलाइडिंग करते समय अकेला था तो कुछ डर लगा था। लेकिन यहां पर ट्रेनर साथ था। इसलिए मुझे कोई डर नहीं लगा और बहुत मज़ा आया। हम सात मिनट में नीचे आये। मेरी पत्नी गाड़ी में थी और उसको यह दूरी तय करने में लगभग चालीस मिनट लगे।

नीचे आते समय देखा कि कुछ लोग वीडियो और कुछ लोग साधारण कैमरे से फोटो ले रहे हैं। नीचे उतरने पर उन्होंने मुझे चित्र और वीडियो दिखाया और पूछा,
'क्या आप वीडियो या चित्र लेना चाहते हैं। सीडी में देने के लिये २०० रूपया लगेगा। चार चित्रो को प्रिंट करके देने में सौ रूपया लगेगा। यदि आप चित्र सीडी में चाहते है तो लगभग दस चित्र के १५०/-रूपये लगेंगे।'
मैंने कहा कि मैं लूंगा। बगल में तम्बू लगे थे। जिसमे कंप्यूटर रखे  थे और वहीं उस कंप्यूटर में सीडी पर लिखने या चित्र प्रिंट करने की सुविधा थी। सारे कंप्यूटर विंडोज़ पर थे।
मैंने पूछा,

'क्या आप लोग लाइनेक्स पर काम नहीं करते?'
उन्होंने कहा,
'लाइनेक्स, क्या बला है?'
ट्रेनर राजाराम
मैंने, उनको थोड़ा बहुत लाइनेक्स के बारे में बताया। उनका कहना था हम लोग कोशिश करेगें। हो सकता है कि आप जायें तो उन्हें  लाइनेक्स पर काम करते देखें।

मैंने कुछ देर पैरा-ग्लाईडिंग में साथ आये ट्रेनर से बात की। उसने बताया,
'मेरा नाम राजाराम है। मैं केवल इण्टरमीडिएट तक पढ़ा हूं। मैंने यह पैराशूट यूरोप से मंगाया है। यह दो लाख रूपये का पड़ा है। यह पैसा मेरे परिवार वालों ने दिया है। मैं अपनी जीविका इसी से चलाता हूं। इससे अच्छा पैसा मिल जाता है और दो साल के अन्दर दो लाख रूपये की भरपाई हो जाती है। '
वहां पर वह अकेले नहीं था। उसके साथ उसके ३-४ सहयोगी भी थे।  २-३ अन्य ट्रेनर भी थे। वहां पर बहुत से लोग खड़े थे लेकिन कोई हिम्मत नही कर रहा था। लेकिन मुझे देखा-देखी और लोग भी आ गये। बाद में और लोगो ने बताया कि वह इस काम के लिए कुछ ने पन्द्रह सौ रूपये और कुछ ने बारह सौ रूपये दिए है। मुझे लगा कि मैं भी मोल भाव करता, तो वह पैसा कम कर सकता था। लेकिन यह मेरे स्वभाव में नहीं है। मेरी मां भी इसी तरह की थीं। वे दूसरे पूरे तरह से विश्वास करती थीं। यह मुझे उन्हीं से मिला है। 

मुझे पैरा-ग्लाइडिंग वालों की यह बात अच्छी नहीं लगी, कुछ दुख हुआ। मेरे कारण वहां पर ५-६ लोगों में  पैरागलाइडिंग की। सच बात तो यह है कि उसे मुझसे कम पैसा लेना चाहिए था बल्कि यहां पर तो उल्टा ही हुआ। मुझे यह भी सबक मिला कि वहां मोल भाव करना चाहिये था पर मुझे पैसा वापस मांगना ठीक नहीं लगा।

लगभग चालीस मिनट बाद मेरी पत्नी और अन्य लोग आये। हम लोगों ने वहीं खाना खाया फिर सोलंग घाटी गये। 

अगली बार सोलंग घाटी के बारे में।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी।। जहां हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे की बात हुई हो, वहां मीटिंग नहीं करेंगे।। बात करनी होगी और चित्र खिंचवाना होगा - अजीब शर्त है।। हनुमान जी ने दी मजाक बनाने की सजा।। छोटे बांध बनाना, बड़े बांध बनाने से ज्यादा अच्छा है।। लगता है कि विंडोज़ पर काम करना सीख ही लूं।। गाड़ी से आंटा लेते आना, रोटी बनानी है।। बच्चों का दिमाग, कितनी ऊर्जा, कितनी सोचने की शक्ति।। यह माईक की सबसे बडी भूल थी।। भारत में आधारभूत संरचना है ही नहीं।। सुनते तो हो नहीं, जो करना हो सो करो।। हमने भगवान शिव को याद किया और आप मिल गये।। आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते।।

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One can do paragliding on the road to the Rohtang point. This post talks about the same. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
। Rohtang point, paragliding,  
Himachal Pradesh, Manali,
Travel, Travel, travel and places, Travel journal, Travel literature, travel, travelogue, सैर सपाटा, सैर-सपाटा, यात्रा वृत्तांत, यात्रा-विवरण, यात्रा विवरण, यात्रा विवरण, यात्रा संस्मरण, मस्ती, जी भर कर जियो,  मौज मस्ती,
Hindi, हिन्दी,
भारत में आधारभूत संरचना है ही नहीं
इस चिट्ठी में, मनाली से रोहतंग पाइंट जाने की यात्रा और वहां मिले लोगों की चर्चा है।

रोहतांग पांइट जाने के लिए, हम लोग सुबह साढ़े सात बजे मनाली से निकले। रास्ते का नज़ारा बहुत सुन्दर था। दिखने वाली चोटियां बर्फ से ढ़की थीं, धूप  तेज निकली थी लेकिन गाड़ी में ठंड लगने लगी। पिछले दिनो गर्मी थी।  पूरी आस्तीन की शर्ट पहनने में पसीना निकल रहा था। इसी सोच में, मैंने  ऊनी पैंट नहीं पहनी। लेकिन यह भूल थी। मुझे दुख हुआ कि मैं ऊनी पैंट लाने के बाद उसे क्यों नही पहना। रास्ते में  पर्यटक जगह-जगह रूक कर गरम कपड़े और स्नो बूट ले रहे थे। यह वहां पर किराये पर मिल रहे थे।

रोहतागं पाइट पर मेरी मुलाकात सुरेश से हुयी। वे अपनी पत्नी के साथ बंगलौर से आये थे। इन्होंने एक बहुत ही रूमानी अंदाज में चित्र खिचवाया। वे बंगलौर से थे। वहां वे माइसेस नाम की आइटी कंपनी में काम करते हैं। यह बैकिंग सॉफ्टवेयर को टेस्ट करती हैं। मैंने जानना चाहा कि यह जो बैकिंग सॉफ्टवेयर है वह ओपेन सोर्स में है या मालिकाना लेकिन वे इसे स्पष्ट नहीं कर पाये। शायद मालिकाना है।

यहां पर मेरी मुलाकात एक अन्य दम्पत्ति से हुई। मुझे बहुत खुशी हुई कि वह ओपेन सोर्स में काम करते है और यूनिक्स (UNIX) एडमिनीस्ट्रेटर है। वे पुणे से आये थे। उन्होंने बताया, मैं पहले रेडहैट में काम करता था। अब संग्राम नामक कम्पनी में काम करते हैं। मैं उनके साथ कुछ और समय व्यतीत करता लेकिन उनके साथ जो घोड़े वाले थे। वे जल्दबाजी कर रहे थे। इसलिए उनसे विस्तार में बात नहीं हो पायी।

वहां पर मेरी मुलाकात जापानी युवती से हुई। वह नीपो एक्सप्रेस नामक कम्पनी में काम करती थी। उसके साथ दो अन्य महिलायें उसके बॉस की पत्नी और उनकी सास थीं। 

नीपो कंपनी लॉजिस्टिक कम्पनी है। इस तरह की कम्पानियां बहुत तेजी से बढ़ रही है पर हिन्दुस्तान में इतनी तेजी से नहीं बढ़ रही है। जापानी युवती का कहना था,
'भारत में आधारभूत संरचना (Infrastructure) है ही नहीं, इस तरह की कंपनी बढ़ेंगी कैसे?'

हमारे पास आधारभूत संरचना तो है, नयी बनती भी हैं लेकिन उससे कहीं तेजी से हमारी जन संख्या बड़ रही है जो उसे नगण्य कर देती है। काश सरकार, यह हम इसे समझ पाते और इसे रोकने का तुरन्त उपाय करते। इसकी प्राथमिकता प्रथम है पर सरकार वोट से बनती है उसे इसकी क्या चिन्ता।
रोहतांग पॉइंट पर हिम

 इस श्रृंखला की अगली कड़ी में, पैरा ग्लाइडिंग का आनन्द लेंगे। 

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी।। जहां हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे की बात हुई हो, वहां मीटिंग नहीं करेंगे।। बात करनी होगी और चित्र खिंचवाना होगा - अजीब शर्त है।। हनुमान जी ने दी मजाक बनाने की सजा।। छोटे बांध बनाना, बड़े बांध बनाने से ज्यादा अच्छा है।। लगता है कि विंडोज़ पर काम करना सीख ही लूं।। गाड़ी से आंटा लेते आना, रोटी बनानी है।। बच्चों का दिमाग, कितनी ऊर्जा, कितनी सोचने की शक्ति।। यह माईक की सबसे बडी भूल थी।। भारत में आधारभूत संरचना है ही नहीं।।    हमने भगवान शिव को याद किया और आप मिल गये।। आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते।।

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This post talks about Rohtang point and people that I met there. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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नाई, महिला है
इस चिट्ठी में, 'नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है' सवाल का जवाब और गर्डल के गणित की अपूर्णनता सिद्धान्त की चर्चा है। 
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
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देखें।

मैंने पिछली बार बताया था कि बट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) ने ऍपीमेनेडीज़ या लाएरस् विरोधाभास को नयी तरह से रखा। उन्होंने कहा,
'एक गांव में केवल एक ही नाई था। उसका कहना था कि वह उन लोगों की दाढ़ी बनाता है जो स्वयं अपनी दाढ़ी नहीं बनाते हैं।'
सवाल यह था कि
'नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है?'

रसेल और व्हाइटहैड (Whitehad) के मुताबिक उन्होंने इस विराधाभास का हल,  प्रिंसिपिया मैथमैटिका (Principia Mathematica) (१९१३) में निकाल लिया था। उनका हल, कुछ इस तरह से समझा जा सकता है  कि नाई महिला है। इस दशा में तो उसे दाढ़ी बनाने की आवश्यकता नहीं है।

इस हल में वे पुरूषों के स्तर से ऊपर निकल कर व्यक्तियों के स्तर में चले जाते हैं जिसमें पुरूष और महिलायें दोनों रह सकती है।  लेकिन वे भूल गये कि व्यक्तियों के स्तर में अलग तरह  का विरोधाभास  है। जिस पर उन्होंने विचार नहीं किया।

टाइम पत्रिक का शताब्दी अंक

२०वीं शताब्दी के समाप्त होते समय, टाइम पत्रिका ने एक विशेष अंक निकाला था। इसमें उन्होंने बीसवीं शताब्दी के सौ महानतम  लोगों के बारे में लिखा था। इन सौ लोगों में एक ऑस्ट्रियन गणितज्ञ कोर्ट  गर्डल  भी थे।  उन्हें आज तक का सबसे महानतम तर्क शास्त्री माना जाता है। 

गर्डल ने १९३१ में एक पेपर जर्मन भाषा में लिखा। इसके शीर्षिक का अंग्रेजी में अनुवाद है,
'On formally Undecidable Proposition of Principia Mathematica and Related Systems. 
इसमें  उन्होंने सिद्व किया, 
'Proof of arithmetic consistency is not possible―every mathematical system is incomplete'.
आप किसी भी मूलभूत सिद्वान्तों को लेकर चलें, उनमें कुछ इस तरह के कथन अवश्य निकल आयेगें  जो न कि सही साबित किये जा सकते है न गलत। सुसंगत गणित सम्भव नहीं है ... प्रत्येक व्यवस्था अपूर्ण है।
गर्डल ने हिलर्ब्ट के द्वारा १९०० और १९२८ की आईसीएम में रखे गये प्रश्न का जवाब ढूंढ  लिया। लेकिन यह वह जवाब नहीं था जो डेविड हिल्बर्ट चाहते थे। वे तो चाहते थे कि गणितीय तर्क का ऐसा संसार हो, जहां सारे कथन सही अथवा गलत सिद्घ किये जा सकें। गर्डल ने इसका उल्टा ही सिद्ध कर दिया। इससे हिल्बर्ट को परेशान हुई। लेकिन वे कुछ कर न सके - गर्डल के शोद्ध पत्र में आजतक कोई गलती नहीं निकाली जा सकी है। वे मन मनोस कर रह गये।

अगली बार हम लोग गर्डल और उसके अपूर्णता सिद्धान्त के बारे में लिखी कुछ  रोचक पुस्तकों के बारे में चर्चा करेंगे। 

कुछ समय पहले बीबीसी ने डेंजरस् नॉलेज (Dangerous Knowledge) नामक श्रृंखला प्रसारित की थी। यह श्रृंखला चार विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति, जिसमें तीन गणितज्ञ - जॉर्ज कैंटर (Georg Cantor), कोर्ट गर्डल (Kurt Gödel) और ऐलन ट्यूरिंग (Alan Turing) - और एक भौतिक शास्त्री लुडविंग बॉल्टज़मैन (Ludwig Boltzmann) पर थी। यह बेहतरीन श्रृंखला है और यदि इसे आपने नहीं देखा है तो यूट्यूब में देख सकते हैं। हांलाकि इस श्रृंंखला में, इनकी जीवनी के बारे में कुछ सूचनायें सही नहीं हैं। इसमें गर्डल के जीवन के शुरू का भाग यहां देखिये।



  तू डाल डाल, मैं पात पात
भूमिका।। नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है।। नाई, महिला है।। गर्डल और अपूर्णता सिद्धान्त पर  पुस्तकें।।








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This post is part of series on Cyber crimes. It talks about whether Epimenides' or liar's paradox was sorted out in Pricipia Mathematica or not. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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यह माईक की सबसे बडी भूल थी
इस चिट्ठी में, मनाली में इस्रायली खाना, और वहां पर गोवा में क्रिकेट की कोचिंग करते ऑस्ट्रेलिया दम्पत्ति से मुलाकात की चर्चा है।

हम लोग जब कस्बे से, मनाली के लिये चले थे तब एक मित्र ने कहा था,
'मनाली में ड्रैगन गेस्ट हाउस हैं। वहां ईस्रायली खाना मिलता है। उसे जरूर खा कर आना।'
मनु के मन्दिर से वापस आते समय, हम लोग डैग्रन गेस्ट हाउस को ढूढ़ने लगे। उसे ढूढ़ंते समय, हमारी मुलाकात एक विदेशी दम्पत्ति से हुई। हमने उन्हीं से इसका पता पूछा। वे लोग वहीं ठहरे थे। उन्होंने हमें रास्ता बताया और कहा,
'हम लोग वहीं ठहरे है। क्या आप भी वहीं ठहरने जा रहे है?
हमने बताया कि हम लोग वहां पर इस्रायली खाना खाने के लिए जा रहे है। कुछ देर इनसे बात हुई। इनका नाम माईक और पैटी था। मैंने माईक और पैटी से कहा कि वे भी हमारे साथ क्यों नहीं खाना खाते हैं। कुछ देर, सोचने के बाद, वे हमारे साथ खाना खाने आ गये।

माइक और पैटी अस्ट्रेलिया के हैं। वे बहुत सालों से, गोवा में रह रहे हैं। माइक वहां क्रिकेट की कोचिंग करते हैं। माईक न्यू-साउथ वेल्स की तरफ से खेला करते थे। वे १९८२ में, इंग्लैण्ड में काउंट्री क्रिकेट खेल रहे थे तभी हिन्दुस्तान आ गये। जब माइक बता रहा था तब पैटी ने कहा, 

'यह माईक के जीवन की सबसे बडी भूल थी। क्योंकि तभी उसके पास वह अस्ट्रेलिया की तरफ से खेलने के लिए तार आया था। लेकिन, किसी को नहीं मालूम था कि माईक कहां पर हैं। इसलिए न उससे बात हो पायी, न ही वह आस्ट्रेलिया के लिए  खेल पाया।'
माइक मुख्यत: लेग स्पिनर हैं। उसने कहा,
'पिछली बार आइपीएल में, मेरे द्वारा कोच किया गया एक लडके का चयन बंगलोर की तरफ से खेलने के लिए हो गया था। लेकिन प्रैक्टिस करते समय उसके अंगूठे में चोट लग गयी थी। जिसके कारण वह आइपीएल में नहीं खेल सका।'
शायद दुर्भाग्य अभी तक उसका साथ नहीं छोड़ रहा है। भगवान करे कि उसका कोच किया हुआ लड़का, भारत की तरफ से खेले। 

हम लोगों ने उन्हें बताया कि हम लोग शाकाहारी भोजन करेगे। इस पर उन्होंने  शाकाहारी व्यंजन शुशुका, ग्रिल्ड वेजीटेबल हम्मस (Grilled Vegetable Hummus),  पीटा ब्रेड के साथ खाने की सलाह दी। हम लोगों ने उन्हीं के सुझाव पर,इसे खाने के लिए ऑर्डर किया।

  • शुशुका, चना और अंडे के साथ बना हुआ एक व्यंजन है।
  • ग्रिल्ड वेज़ीटेबिल हम्मस,  चने  लहसुन के साथ पीसकर बनाया गया व्यंजन है। मुझे यह पसंद आया।
  • पीटा ब्रेड,  तंदूरी रोटी की तरह,  पर उससे पतली थी।
मनाली में शराब आसानी से मिलती है। अधिकतर रेस्तरां रेस्तरां बार भी है। मैं शराब नहीं पीता हूं। लेकिन मैंने माइक और पैटी से पूछा कि क्या वह वाइन या अन्य किस्म की शराब लेना पसन्द करेगें। इस पर माइक ने कहा,
'मैं खिलाड़ी हूं। शराब का सेवन नहीं करता। हम लोग इसे न लेगे।'
खाना खाने के बाद माइक ने पैसा देने की बात की। मैने कहा,
'हमने आपको आमंत्रित किया है। इसलिए पैसा हम ही देगें।'
काफी देर तक बहस के बाद,  उन्होनें  हमें पैसा देने दिया।

इस श्रृंखला की अगली कड़ी में हम लोग रोहतांग पांइट चलेंगे। वहां अन्य लोगों के साथ, जापानी महिलाओं से बात करेंगे कि वे क्या हमारे देश के बारे में क्या सोचती हैं और हो सका तब लौटते समय पैरा-ग्लाइडिंग का आनन्द लेगें।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी।। जहां हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे की बात हुई हो, वहां मीटिंग नहीं करेंगे।। बात करनी होगी और चित्र खिंचवाना होगा - अजीब शर्त है।। हनुमान जी ने दी मजाक बनाने की सजा।। छोटे बांध बनाना, बड़े बांध बनाने से ज्यादा अच्छा है।। लगता है कि विंडोज़ पर काम करना सीख ही लूं।। गाड़ी से आंटा लेते आना, रोटी बनानी है।। बच्चों का दिमाग, कितनी ऊर्जा, कितनी सोचने की शक्ति।। यह माईक की सबसे बडी भूल थी।।  हमने भगवान शिव को याद किया और आप मिल गये।। आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते।।

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This post talks about Israilee food in Manali and our meeting with Australian cricket coach in Goa. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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बच्चों का दिमाग, कितनी ऊर्जा, कितनी सोचने की शक्ति
मनाली में, सबसे पहले, हम मंदिरों को देखने के लिए, पुरानी मनाली गये। इस चिट्ठी में हिडिम्बा और मनु मन्दिर की चर्चा है।

हिडिम्बा मन्दिर
मनाली में हिडिम्बा का मंदिर है।  कहा जाता है कि यहीं पर भीम की मुलाकात हिडिम्बा से हुई थी। हिडिम्बा को काली का अवतार का अवतार कहा गया है। इसी कारण इस मंदिर के अन्दर दुर्गा की मूर्ति भी है। इस मंदिर में, हिडिम्बा के पैर के ही निशान हैं जो कि एक गुफा के अन्दर हैं।

इसके चारो तरफ मंदिर बना हुआ है। इस  हिस्से को राजा बहादुर सिंह ने १५५३ बनवाया था। हिडिम्बा के मंदिर में, बाहर की तरफ बहुत सारी सींगें लगी थीं। मैंने इसका कारण पूछा तब बताया गया कि यहां पर जानवरों की बलि दी जाती है और उसके बाद उनकी सींग यहीं पर टांग दी जाती है।
मनु मन्दिर

कहा जाता है कि मनाली में, महर्षि मनु ने तपस्या की थी। इसी लिये, इस जगह को पहले मनुआलय कहा गया। बाद में, यह मनाली हो गया। जिस जगह मनु ने तपस्या की थी वहीं पर उनका मन्दिर बना दिया गया। हिडिम्बा के मन्दिर देखने के बाद, हम लोग मनु के मन्दिर को भी देखने गये।

रास्ते में लोग, ताश खेल रहे थे। उन्होने बताया,
'सीज़न के समय पर्यटको के कारण, दम मारने की फुरसत नहीं रहती लेकिन जब सीज़न न हो, तब समय ही समय रहता है। इस समय हम लोग ताश खेलकर अपना मनोरंजन करते हैं।'

वे लोग टिल्ली नामक खेल खेल रहे थे । जब उन्होने विस्तार से इस खेल के बारे में  बताया तब मुझे लगा कि यह रमी की तरह का ही खेल है। एक बार जीतने पर ५ प्वाइंट मिलते  हैं। २१ प्वाइंट जीत जाने पर जितने पैसे की शर्त हो वह जीत लेता है। वे लोग ५०/-रूपये शर्त के साथ खेल रहे थे।

मनु के मंदिर में, बहुत सारे बच्चे थे। वे कुछ अजीब सा खेल खेल रहे थे। मैंने पूछा कि यह कौन सा खेल है उन्होंने बताया कि वे घोड़ा-घोड़ा खेल रहें है। इसमें दीवाल के सहारे, झुक एक लड़का खड़ा हो जाता था। उसके बाद उसके पीछे से एक लड़का दौड़ता हुआ आता था और उसकी पीठ पर चढ़ जाता था। उसके बाद घोड़े बने लड़के को, दूसरे को गिराना होता है। यदि पीठ पर चढ़ा लड़का, गिर जाता था तब वह घोडा बनता था। इनमें से एक लड़का बड़ा था। मैंने उससे कहा कि तुम तो बहुत बड़े हो। उसने बताया,
'इसीलिए मै अकेले हूं और बाकी तीन लड़के एक साथ खेल रहे हैं।'
मैंने न यह खेल कभी अपने बचपन में खेला, न इसके पहले कभी सुना था। मनाली मैदान नहीं हैं। इसीलिये बच्चों ने यह खेल निकाल लिया। बच्चों के दिमाग में कितनी ऊर्जा और सोचने की शक्ति होती है। वे मनोरंजन के लिए कैसे तरह, तरह के खेल निकाल लेते हैं।

इस श्रृंखला की अगली चिट्ठी में, मनाली में इस्रायली खाना और वहां पर गोवा में क्रिकेट की कोचिंग करते ऑस्ट्रेलिया दम्पत्ति से मुलाकात की चर्चा होगी।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी।। जहां हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे की बात हुई हो, वहां मीटिंग नहीं करेंगे।। बात करनी होगी और चित्र खिंचवाना होगा - अजीब शर्त है।। हनुमान जी ने दी मजाक बनाने की सजा।। छोटे बांध बनाना, बड़े बांध बनाने से ज्यादा अच्छा है।। लगता है कि विंडोज़ पर काम करना सीख ही लूं।। गाड़ी से आंटा लेते आना, रोटी बनानी है।। बच्चों का दिमाग, कितनी ऊर्जा, कितनी सोचने की शक्ति।। यह माईक की सबसे बडी भूल थी।।  हमने भगवान शिव को याद किया और आप मिल गये।। आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते।।

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This posts talks about Hidimba and Manu temple in Manali. This post describes the same. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है
कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, गणित के तर्क शास्त्र पर चलता है। कंप्यूटर वायरस, इसकी कमियों का फायदा उठाते हैं। इसलिये साइबर अपराध की श्रृंखला में, साइबर अपराधों के बारे में बात करने से पहले, कुछ बातें  गणित के प्रसिद्ध २३ सवालों, और तर्क शास्त्र के क्षेत्र से, स्वयं को संदर्भित करने वाले विरोधाभास के बारे में। 
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अक्सर समझा जाता है कि गणित अपने में सम्पूर्ण विषय है। लेकिन यह सच नहीं है। १९वीं शताब्दी के समाप्त होते होते गणितज्ञों को अपने विषय के बुनियादी सिद्वान्तों के बारे में शक होने लगा। वे गणित के अलग अलग क्षेत्रों के मूलभूत सिद्वान्तों के सबूत ढूंढने लगे।

गणित के बारे में सबसे महत्वपूर्ण सम्मेलन इंटरनेशनल काँग्रेस ऑफ मैथमैटीशियनस् (आईसीएम) (International Congress of Mathematicians) है। इसका आयोजन इंटरनेशनल मैथमैटकल यूनियन (आईएमयू) (International Mathematical Union) करती है। यह सम्मेलन चार साल में एक बार होता है। इसमें पिछले चार साल में गणित का लेखा जोखा देखा जाता है और भविष्य में गणित की राह।

इस बार आईसीएम, १९-२७ अगस्त २०१० के दौरान, हैदराबाद में हो रहा है। यह एक महत्वपूर्ण सम्मेलन है और ऐशिया में तीसरी बार हो रहा है। इसकी वेबसाइट में इस सम्मेलन के पोस्टर हैं। उसका एक पोस्टर आप दाहिने तरफ देख रहे हैं और दूसरे पोस्टर से यह संस्कृत का श्लोक आपके लिये।
यह चित्र आईसीएम २०१० की वेबसाइट के सौजन्य से
यथा शिखा मयूराणां नागानां मण्यो यथा।
तथा वेदाङ्गशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्।।
जिस तरह से,
मोरों के सिर पर कलगी,
सापों के सिर में मणियां,
उसी तरह विज्ञान का सिरमौर गणित।।

शायद आराधना जी जो कि संस्कृत विदुषी हैं या कोई अन्य संस्कृत ज्ञानी बता सके कि यह श्लोक कहां से है और क्या इसका अनुवाद सही है?

गणित में नोबल पुरस्कार नहीं मिलता है। इसका कारण स्पष्ट नहीं है। नोबल ने शादी नहीं की थी। लेकिन कई कहते हैं कि वे साइने लिंडफोर्स (Signe Lindfors) से प्रेम करते थे। उसने उनका प्रेम न स्वीकार कर, गणितज्ञ गोस्टा मिटंग लेफर {Magnus Gustaf (Gösta) Mittag-Leffler}  से शादी कर ली। इससे क्रोधित होकर, उन्होंने गणित में नोबल पुरुस्कार नहीं रखा। शायद यह सच नहीं है। नोबल ने शायद गणित का महत्व ही नहीं समझा।
चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से

गणित में सबसे महत्वपूर्ण पुरस्कार फील्डस् मेडल (Field's Medal) है। यह पुरस्कार इसी आईसीएम में दिया जाता है। चूकिं यह चार साल में एक बार होती है इसलिये यह अधिक से अधिक चार लोगों को दिया जाता है। इसमें अधिकतम आयु सीमा ४० वर्ष की है।


आईसीएम में, आईएमयू स्कॉलर एवार्ड (IMU Scholar Award) भी दिया जाता है। यह पुरुस्कार नवोदित (३५ सालसे कम उम्र) गणितज्ञों को दिया जाता है। बहुत साल पहले शुभा को इसमें जाने का मौका मिला था। उसे आईएमयू स्कॉलर पुरस्कार मिल चुका है। मैं उसके पीछे पड़ा हूं कि वह इस सम्मेलन के बारे में अपने चिट्ठे पर लिखे। देखिये वह कब लिखती है। पत्नियां कब पतियों की बात मनाती हैं :-( वह जब लिखेगी तब देखा जायगा, हम लोग उसके लिये क्यों रुकें, चलिये आगे चलते हैं।

डेविड हिल्बर्ट का चित्र विकिपीडिया से

वर्ष १९०० की आईसीएम पेरिस में हुई थी। इसमें डेविड हिल्बर्ट ने २३ प्रश्नों को रखा था उसका कहना था कि इन मुश्किलों का हल ही गणित को नयी ऊँचाइयों तक ले जा सकता है। इसमें कुछ का हल तो निकाला जा सका है पर कईयों का नहीं।

इन प्रश्नों के, दूसरे प्रश्नों में सिद्घ करना कि,

'Mathematical reasoning is reliable, it should not lead to contradictory results'
गणित का तर्क विश्वसनीय है। यह विरोधाभास को जन्म नहीं दे सकता।

वर्ष १९२८ की आईसीएम बोलोन्या इटली (Bologna, Italy) में हुई। यहां पर हिल्बर्ट ने पुन: विचार किया,
'If it was possible to prove every true mathematical statement or can there be truly formal logical system for mathematics, where every statement could either be proved or disproved.
क्या यह संभव है कि प्रत्येक गणित के कथन को सिद्घ किया जा सके। दूसरे शब्दों में क्या गणितीय तर्क का ऐसा संसार हो सकता है जहां सही अथवा गलत कथन सिद्घ किये जा सके।

यह प्रश्न गणित के तर्क शास्त्र के क्षेत्र का है। इसमें सबसे मुश्किल स्वयं को संदर्भित करते हुए विरोधाभास (self referencing paradoxes) की है।

ऍपीमेनेडीज़ का चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से

स्वयं को संदर्भित करते विरोधाभास में सबसे प्रसिद्घ विरोधाभास ऍपीमेनेडीज़ या लाएरस् विरोधाभास (Epimenides' or liar's paradox) है। ऍपीमेनेडीज़ एक ग्रीक दार्शनिक थे और ईसा के ६०० साल पहले क्रीट में रहते थे। उन्होंने एक महत्वपूर्ण कथन किया,
'The Cretans are always liars.'
सारे क्रीटवासी हमेशा झूठ बोलते हैं।
यदि आप इनको सच माने तो यह झूठ बन जाती है और इसे झूठ माने तो यह सच हो जाती है। यही इसका विरोधाभास है।

बट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) न केवल एक प्रसिद्व दार्शनिक थे बल्कि वह एक गणितज्ञ भी थे। उन्होंने सौ साल पहले इस विरोधाभास को नयी तरह से रखा। जिसको रसेल विरोधाभास या नाई का विरोधाभास (Russell's or Barber's paradox) भी कहा जाता है। यह कुछ इस प्रकार है,
'एक गांव में केवल एक ही नाई था। उसने कहा कि वह उन लोगों की दाढ़ी बनाता है जो स्वयं अपनी दाढ़ी न बनाते हो।'
इस कथन में कोई भी मुश्किल नहीं है जब तक आप यह सवाल न पूछें कि,
'नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है?'
यदि नाई अपनी दाढ़ी स्वयं बनाता है तो उसके कथनानुसार उसे अपनी दाढ़ी नहीं  बनानी चाहिए। यदि वह अपनी दाढ़ी नहीं बनाता है तो उसके कथनानुसार अपनी दाढ़ी बनानी चाहिए।

रसेल और व्हाइटहैड (Whitehad) ने इस तरह के विरोधाभास को समाप्त करने के लिए वर्ष १९१३ में अंकगणित की एक प्रसिद्घ पुस्तक प्रिंसिपिया मैथमैटिका (Principia Mathematica) नाम से प्रकाशित की।  उनके विचार से उन्होंने इसका हल निकाल लिया था।  क्या यह सच था - यह इस श्रृंखला की अगली कड़ी में। 

लाऍरस् विरोधाभास का एक रूप और भी देखिये। शायद यह बेहतर समझ में आये :-)

पुनः (१) मैंने कुछ समय पहले मार्टिन गार्डनर को श्रद्धांजलि देते समय सुझाव दिया था कि क्या अच्छा हो कि कोई विश्वविद्यालय उनके सम्मान में कोई कॉंफरेन्स या सम्मेलन करे। आईसीएम २०१० के आयोजकों को भी मैंने यह सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि यह मुश्किल है क्योंकि सब पहले से तय हो गया है पर वे प्रयत्न करेंगे। देखिये यह हो पाता है कि नहीं।

(२)  १९२८ की आईसीएम Bologna, Italy में हुई थी। मैंने शहर का नाम बोलगाना लिखा था। राम चन्द्र मिश्र जी इटली में शोद्ध करते हैं। उन्होंने टिप्पणी करके बताया कि इसे बोलोन्या कहते हैं। उनको मेरा धन्यवाद।

(३) मैथली गुप्त जू बलॉगवाणी के संचालक हैं। उन्होंने टिप्पणी कर के बताया कि यह श्लोक सुधाकर द्विवेदी जी द्वारा लिखित ज्योतिष ग्रंथ याजुष ज्योतिष (Yajush Jyotish) के इस पन्ने से लिया गया है। मेरा उनको धन्यवाद। मुझे अच्छा लगेगा यदि कोई चिट्टाकार बन्धु इस ग्रंथ एवं इस श्लोक के संदर्भ की व्याख्या कर उसे प्रकाशित करे। 

(४) प्रेत विनाशक जी ने टिप्पणी कर बताया कि उपरोक्त श्लोक मूल रूप से लगध ऋषि द्वारा रचित ’वेदांग ज्योतिष’ नामक ग्रंथ से लिया गया है। लगध ऋषि का काल १३५० ई. पूर्व का माना जाता है। वे भारतीय ज्ञान परम्परा में प्राचीनतम विद्वानों में से हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि सुधाकर द्विवेदी जी ने अपनी पुस्तक में इस श्लोक को मात्र संदर्भित किया है। वे इसके लिये इस पेज को भी देखने को कहते है। यह तो अब बहुत ही रोचक होता जा रहा है।  क्या कोई चिट्ठाकार बन्धु, विस्तार से प्राचीन भारत में गणित के योगदान के बारे में लिख सकेगा।

  तू डाल डाल, मैं पात पात
भूमिका।। नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है।।









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This post is part of 'Cyber Crime' series. Computer software are created with the help of mathematical logic. Computer virus take advantage of their shortcoming. In this post we talk about 23 most famous problems of Mathematics and about self referencing paradoxes. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
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अरे, यह तो मेरे ध्यान में था ही नहीं

मैंने इसी साल अपने चिट्ठे पर ‘बुलबुल मारने पर दोष लगता है’ श्रृंखला लिखी है। यह श्रृंखला , ‘To Kill A Mockingbird’ उपन्यास के बारे में थी। इसे हार्पर ली (Harper Lee) ने लिखा है। यह उपन्यास  २०वीं शताब्दी के उत्कृष्ट अमेरिकन साहित्य में गिना जाता है। बाद में, इस पर इसी नाम से एक फिल्म भी बनी है। यह मेरी प्रिय पुस्तकों में है। इस पर बनी फिल्म भी, मैंने १९६० के दशक में देखी थी।

इस श्रृंखला में चर्चा थी कि यह उपन्यास क्यों लिखा गया , इसकी क्या कहानी थी, इसकी क्या शिक्षा है।

इस श्रंखला के लिखने के कई कारण थे। जिसके बारे में मैंने श्रंखला में जिक्र किया है। लेकिन यह साल इस श्रृंखला के लिये उसी तरह से महत्वपूर्ण है जैसे कि पिछला साल डार्विन की श्रृंखला के लिये महत्वपूर्ण था। लेकिन यह श्रृंखला लिखते समय, एक बात का ध्यान नहीं था।


हार्पर ली का चित्र - दाना मिक्सर द्वारा - न्यू यॉर्क टाइमस् के लिये

‘अरे, उन्मुक्त जी आप तो विस्तार से चर्चा करते हैं। फिर आपसे क्या छूट गया?’

मुझे मालुम था कि यह पुस्तक १९६० में लिखी गयी थी। यह साल इसके प्रकाशन की पच्चासिवीं वर्षगांठ है। बस यह बात ध्यान में नहीं रही। कुछ दिन पहले न्यू यॉर्क टाइमस् में यह लेख पढ़ा तब पता चला कि इसी कारण इस साल, गर्मियों के बाद अमेरिका में जगह जगह समारोह हो रहें हैं।

‘उन्मुक्त जी, यह पुस्तक भारत में भी पढ़ी जाती है।  तो क्या इसके प्रकाशक (हार्पर एण्ड कॉलिंस्) भारत में भी कोई समारोह करेंगे?’

मेरे बचपन में यह काफी पढ़ी जाती थी। इसी कारण मैंने पढ़ी थी और फिल्म देखी थी। मुझे नयी पीढ़ी के लोगों से बात करना अच्छा लगता है। मैं अक्सर विद्यालयों,  विश्विद्यालयोंं में जाता हूं। वहां विद्यार्थियों से बात करता हूं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह पुस्तक अब पढ़ी जाती है। हांलाकि किताबों की दुकानों में दिखायी पड़ती है। इसलिये मुझे नहीं लगता कि इस तरह का कोई समारोह होगा।

‘उन्मुक्त जी, आपको क्या लगता है कि क्या किसी हिन्दी की पुस्तक के लिये ऐसा कभी होगा? क्या इस तरह के सम्मान के लिये हिन्दी साहित्य में कोई पुस्तक है?’

मुझे नहीं मालुम। कम से कम मैंने नहीं पढ़ी या प्रेमचन्द की लिखी कोई पुस्तक हो। हां, शायद भारतीय भाषा साहित्य में शायद कुछ इस तरह की पुस्तकें हों।

  • शरद साहित्य, या
  • प्रथम प्रतिश्रुति, या
  • शायद कोई और

लेकिन मुझे तो लगता है कि अपने देश में इस तरह से समारोह मनाने का कोई रिवाज़ नहीं है। बस इसलिये यह नहीं होता है। हम सब सरकार की तरफ देखते रहते हैं कि वह कुछ करे। और सरकार के अपने सिद्धान्त हैं ,नियम हैं।

हम हर कार्य के लिये सरकार की तरफ क्यों देखते हैं। खुद क्यों नहीं पहल करते। यह बदलना चाहिये। क्या कभी कुछ बदलेगा?

अरे, आप इस श्रंखला को तो पढ़ना चाहेंगे। इसमें कोई मुश्किल नहीं। बस नीचे लिखी कड़ियों में चटका लगा कर आसानी से पढ़ सकते हैं। यदि सुनना चाहें तो ► पर चटका लगा कर सुन सकते हैं। ख्याल रहे ऑडियो क्लिप ऑग मानक में है। इसे कैसे सुनते हैं यह तो मालुम हैं न। नहीं तो दाहिने तरफ का विज़िट ‘बकबक पर पॉडकास्ट कैसे सुने‘ देखें।

इस फिल्म में से कुछ भावपूर्ण दृश्य

लेकिन मैं अभी तक नहीं समझ पाया कि मुझे इसी साल क्यों यह श्रृंखला लिखने की प्रेणना मिली।

इस चिट्ठी के दोनो चित्र न्यू यॉर्क टाइमस् के सौजन्य से

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गाड़ी से आंटा लेते आना, रोटी बनानी है
स्टर्लिंग रिज़ॉर्ट कुछ अलग तरह के रुकने की जगहें हैं।
इस चिट्ठी में मनाली में स्टर्लिंग रिज़ॉर्ट की चर्चा है।


हम लोगों का आरक्षण स्टर्लिंग रिज़ॉर्ट में था। इनके बहुत से रिज़ॉर्ट भारत वर्ष में हैं। यह अच्छे होटल हैं पर कुछ अलग तरह के हैं। इनके कमरों में ही छोटा सा किचन होता है जिसमें आप खाना भी बना सकते हैं।

मनाली के स्टर्लिंग रिज़ॉर्ट में दो ब्लॉक थे। एक ब्लॉक में किचन था पर दूसरे में नहीं। किचन में, हर तरह के बर्तन थे। हम लोग किचन वाले ब्लॉक में थे। मैं नहीं जानता की यह विचार कहां से लिया गया। मुझे यह व्यवहारिक नहीं लगता था क्योंकि मेरे विचार में लोग अक्सर घूमने के लिए जाते है और खाना बनाने में व्यस्त नहीं रहना चाहते है पर मैं गलत था। शुरू में, उलझन भी लगी पर धीरे धीरे मज़ा आने लगा।

इसमे मुझे कुछ कमियां लगीं। आजकल तो मामूली होटल में भी बिजली की केतली, चाय, चीनी, दूध पैकेट रखे रहते है। सारे होटलों में, स्वयं चाय बनाने की बात रहती है लेकिन यहां पर बर्तनो में न तो बिजली की केटली थी, न चाय, दूध चीनी के पैकेट थे। वहां पर बिजली का एक हीटर था। चाय हीटर में गर्म करके बनानी होती थी। इसमें ज्यादा बर्तन गन्दे होते हैं फिर उन्हें धोना भी पड़ता है। जितने कम बर्तनों का प्रयोग हो, उतना ही अच्छा होता है।

स्टर्लिंग का इसी तरह का रिज़ॉर्ट ऊटी में भी है। हम लोग वहां दस साल पहले ठहरे थे। लेकिन ऊटी में सबसे अच्छी बात यह थी कि वहां पर रिज़ॉर्ट के अंदर ही एक छोटी से दुकान थी जिसके यहां आप सब चीजें खरीद सकते थे। यहां पर सामान खरीदने के लिए होटल के बाहर जाना पड़ता था। लेकिन रोड़ पार करते ही, एक दुकान थी जहां पर सारी चीजें मिल जाती थीं।

मैंने स्वागत कक्ष पर रखी शिकायत पुस्तक में इस बात को लिखा कि वे इन कमरों में बिजली की केटली, टी बैग, मिल्क वगैरह की सुविधा दें। इसका पैसा वे चाहें तो अलग से ले लें। हो सकता है कि जब आप वहां कभी जायें, तो यह सुविधा मिले। तब मुझे धन्यवाद देना न भूलियेगा।


बिजली की केटली न होने कारण शुरू में उलझन लगी। लेकिन मुझे कभी, कभी पीठ में दर्द होता है इसलिये हम बिजली की केटली भी साथ रखते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर पानी गरम कर, गर्म पानी की बोतल से पीठ सेकी जा सके। हम इस बार भी बिजली की केटली साथ ले गये थे। इसलिये चाय बनाने में उलझन नहीं हुई।
सफाई करने की भी जिम्मेवारी मेरी थी।

हम लोग सुबह जाकर डबल रोटी, ब्रेड, अंडे, प्याज, रिफाइन तेल का छोटा पैकेट दूध, १०० ग्राम चीनी और कुरकुरे खरीद लाये। मैं अपने लिए आमलेट बनाता था। टोस्ट को हम रिफाइन आयल में फ्राई करते थे। अमूल दूध का एक पैकेट भी खरीद लिया था। मेरी पत्नी आमलेट की जगह उबला अंडा पसन्द करती थी। नाश्ता बनाने की जिम्मेदारी मेरी रहती थी। इस काम में आनन्द आने लगा।

हम लोग रात का खाना नहीं बनाते थे। लगता है बहुत से लोग रात का खाना बनाते है क्योंकि पहले दिन हम लोग रात का खाना खाने जा रहे थे। ऊपर से एक महिला की आवाज सुनायी पड़ी। वह अपने पति से कह रही थी।

'गाड़ी में आटा रखा है, लेते आना, रोटी बनानी है'।
मैने स्वागत कक्ष में पूछा कि कितने लोग स्वयं अपना खाना भी बनाते हैं। स्वागत कक्ष पर युवक ने बताया,
'उसमें सुबह की चाय सब अपने आप बनाते हैं। ५० प्रतिशत लोग नाश्ता भी स्वयं बनाते है। २० प्रतिशत लोग नाश्ते के साथ रात का खाना भी स्वयं बनाते है। क्योंकि घर का बना हुआ खाना उबला हुआ, बिना मसाले का होता है जो कि होटल के खाने से कहीं बेहतर है। रोज़ रोज़  बाहर का खाना खाते खाते आदमी ऊब जाता है। दोपहर का खाना लोग बाहर खाते हैं।'

यानि कि, हम ५० प्रतिशत लोग जैसे थे जो सुबह का नाश्ता स्वयं बनाते थे। यह भी, छुट्टियों का आनन्द लेने का अलग तरह से तरीका है। जो कि शायद समान्य तरह के होटल में रहकर पूरा नहीं हो सकता है। यह भी सच है कि रोज़  बाहर का खाना भी नहीं खाया जा सकता है।

स्टर्लिंग रिज़ॉर्ट में, प्रत्येक शाम को कुछ न कुछ गतिविधि होती रहती थी - कभी बुझौवल, तो कभी ज्ञान विज्ञान, प्रतियोगिता कभी कविताओं की तो कभी गानों की शाम। एक व्यक्ति हम लोगों को रोज उसमें भाग लेने के लिये फोन करता था। लेकिन हम इतने थके रहते थे कि वहां नहीं जा पाते थे।

एक रात को खाना खा कर लौट रहे थे, एक हॉल से गाने की आवाज आ रही थी। उस दिन शाम को वही गतिविधि थी। हम लोग वहां रुके अच्छा लगा। ईश्वर ने बहुत कुछ मुझे दिया पर संगीत, नृत्य चित्रकारी, कविता जैसी बेहतरीन विधाओं को से दूर रखा। ऐसी जगह जा कर लगता है कि मैंने क्यों नहीं बचपन में इनमें रुचि ली। यदि लेता तो शायद आज बात अलग होती है।


स्टर्निंग रिज़ॉर्ट  में मुझे एक बात अजीब लगी। एक दिन जब रात्रि में खाना खाकर वापस आये तो हमारे कमरे में सिगरेट की बदबू आ रही थी। हमारी समझ में नहीं आया कि यह कैसे हो गया क्योंकि, हमारे कमरे में कोई नहीं आया था। बाद में इसका कारण, हमारी समझ में आया।

रिज़ॉर्ट की लॉबी में स्मोकिंग करना मना था। लेकिन कमरों में स्मोकिंग करना मना नहीं था। यानी कि आप अपने कमरे में सिगरेट पी सकते थे। हर कमरे के बाथरूम में एक्ज़ॉस्ट फैन लगा हुआ था। एक तल के कमरों में एक्ज़ॉस्ट, एक पाइप में हवा फेंकते थे और वह होटल के बाहर निकलती थी। लगता है कि बगल के कमरे से किसी ने सिगरेट पीते समय अपना एक्ज़ॉस्ट चल रखा था। हम  कमरे में नही थे। इसलिए हमारे कमरे का एक्ज़ॉस्ट नही चल रहा था। इस कारण पाइप से सिगरेट का धुंआ हमारे कमरे में आ गया। अगली बार जब हम कमरे से बाहर गये तो एक्ज़ॉस्ट चला कर गये ताकि किसी अन्य कमरे से सिगरेट का धुआं हमारे कमरे में न आ सके और ऐसा ही रहा। फिर हमारे कमरे में सिग्रेट का धुआं नहीं आया।


मेरे विचार से  कमरों  में भी सिगरेट पीने की मनाही होनी चाहिये। मैं जर्मनी और साउथ अफ्रीका में होटल में ठहरा था। वहां न केवल लॉबी में पर कमरों में भी सिगरेट पीना मना था। हलांकि कुछ खास कमरे थे। केवल उनमें ही सिगरेट पी जा सकती थी। यहां भी ऐसा ही होना चाहिए। मैंने इसके बारे में भी स्वागत कक्ष में कहा भी। लेकिन मुझे नहीं लगता कि अपने देश मे कमरों में सिगरेट पीने में, कभी मनाही हो सकेगी।

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