हिन्दी चिट्ठाकार उन्मुक्त की चिट्ठियाँ -

दूसरे ग्रहों पर जीवन, उन पर बसेरा – कल्पना आर्थर सी क्लार्क की

इस चिट्ठी में, ‘डिसकवरी साइंस’ (Discovery Science) चैनल पर आ रही ‘प्रॉफेटस् ऑफ साइंस फिक्शन’ (Prophets of Science Fiction) श्रृंखला की आर्थर सी क्लार्क पर कड़ी पर चर्चा है।

प्रॉफेटस् ऑफ साइंस फिक्शन की आर्थर सी कलार्क कड़ी से

आर्थर सी क्लार्क, पिछली शताब्दी के महानतम विज्ञान कहानी लेखकों में थे। उनका जन्म १६ दिसंबर १९१७ को हुआ था बाद में उन्हंने लंका को अपना घर मान लिया ता वहीं उनकी मृत्यु १९ मार्च २००८ में हो गयी।

क्लार्क ने, दूसरे महायुद्ध के बाद, भविष्यवाणी की थी किस तरह सैटेलाइट के द्वारा संवाद  संभव हो सकेगा। आज यह सब हो गया है और इसके बिना जीवन सोच पाना असंभव है।

आर्थर सी कलार्क - चित्र विकिपीडिया से

बाईबिल, खगोलशास्त्र, और विज्ञान कहानियां‘ श्रृंखला की कड़ी ‘विज्ञान कहानियां क्या होती हैं और उनका मूलभूत सिद्धान्त‘ लिखते समय मैंने उनके लेख ‘Hazards of Prophecy: The Failure of Imagination’ का हवाला देते हुऐ इसमें उनके द्वारा भविष्य के लिये प्रतिपपादित निम्न तीन सिद्धान्तों का जिक्र किया था।

  1. When a distinguished but elderly scientist states that something is possible, he is almost certainly right. When he states that something is impossible, he is very probably wrong. जब कोई प्रतिष्ठित वैज्ञानिक कहे कि कुछ संभव है तो वह निश्चित तौर पर सही होते हैं पर जब वे कहते हैं कि यह असंभव है तो सम्भावना यह है कि वे गलत हैं।
  2. The only way of discovering the limits of the possible is to venture a little way past them into the impossible. क्या संभव है जानने के लिये, केवल रास्ता है कि संभव से हटकर असंभव की तरफ देखें।
  3. Any sufficiently advanced technology is indistinguishable from magic. किसी भी पर्याप्त विकसित तकनीक और जादू में फर्क कर पाना नामुमकिन है।
हांलाकि बाद में, इसमें उन्होंने एक नियम और जोड़ा था।
विज्ञान कहानियां, उनके द्वारा प्रतिपादित,   तीसरे नियम का अनुकरण करती हैं और क्लार्क की विज्ञान कहानियां इस नियम से भरपूर हैं। उनकी विज्ञान कहानियों में दर्शन का भी पुट है। वे यह सवाल उठाती हैं कि हम कौन  हैं; हम यहां क्यों हैं; सृष्टि में हमारी क्या जगह है? वे अक्सर बात करती हैं कि क्या दूसरे ग्रह के प्राणियों से मिलेंगें तो क्या होगा; दूसरे ग्रहों मानव जीवन कैसा होगा; क्या दूसरे ग्रहों पर, मानव बसेरा बना सकेंगे?
यदि आप ‘बाईबिल, खगोलशास्त्र, और विज्ञान कहानियां‘ की अन्य कड़ियां पढ़ना चाहें तब नीचे लिखे लिंक पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।
भूमिका।। प्रभू ईसा का जन्म बेथलेहम में क्यों हुआ?।। क्रिस्मस को बड़ा दिन क्यों कहा जाता है।। क्या ईसा मसीह सिल्क रूट से भारत आये थे।। बेथलेहम का तारा क्या था।। बेथलेहम का तारा उल्कापिंड या ग्रहिका नहीं हो सकता।। पिंडों के पृथ्वी से टक्कर के कारण बने प्रसिद्ध गड्ढ़े।। विज्ञान कहानियां क्या होती हैं और उनका मूलभूत सिद्धान्त।। विज्ञान कहानियों पर पुरुस्कार।। उल्का, छुद्र ग्रह, पृथ्वी पर आधारित विज्ञान कहानियां और फिल्में।। धूमकेतु या पुच्छल तारा क्या होते हैं।। हैली धूमकेतु।। पुच्छल तारों पर लिखी विज्ञान कहानियां।। बेथलेहम का तारा – ग्रह पास आ गये थे।। ग्रहण पर आधारित कहानियां।। जब रात हुई।। तारे, उनका वर्गीकरण, और वे क्यों चमकते हैं।। तारों का अन्त कैसे होता है।। वह तारा।। निष्कर्ष: बेथलेहम के उपर चमकने वाला तारा क्या था।।

अन्य ग्रहों का रास्ता

मेरा स्कूली जीवन, और विश्विद्यालय का जीवन उनकी पुस्तकों को पढ़ते बीता। बाद में उन्होंने बहुत से उपन्यास जेन्टरी ली (Gentry Lee) के साथ लिखे। मैंने यह सब पढ़े। उनकी लिखी पुस्तकें पढ़ने योग्य हैं। यदि आपने या आपके मुन्ने, मुन्नी ने नहीं पढ़ा तो उन्हे अवश्य पढ़ने के लिये प्रोत्साहित करें। हांलाकि उनकी लिखे उपन्यासों में दर्शन का पुट होने के कारण, समझने कुछ मुश्किल होती है।

‘बाईबिल, खगोलशास्त्र, और विज्ञान कहानियां’ की श्रृंखला की कड़ी ‘विज्ञान कहानियों पर पुरुस्कार‘ में मैंने ह्यूगो पुरुस्कार की चर्चा की थी। क्लार्क को यह पुरुस्कार १९५८ में उनकी कहानी ‘द स्टार’ (The Star) के लिये मिला था। मैंने इस कहानी की चर्चा ‘वह तारा‘ नामक चिट्ठी में की है। इसको आप यहां सुन सकते हैं। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो ऊपर तरफ का विज़िट, बकबक’ पर पॉडकास्ट कैसे सुने देखें।

उनकी बेहतरीन पुस्तकों, उनकी स्टैनली क्यूबरिक  (Stanley Kubrick) के साथ ‘२००१ स्पेस ऑडेसी’ फिल्म के लिये पटकथा {यह उनकी कहानी ‘द सेन्टीनल’ (The Sentinel) को विस्तार कर लिखी गयी है}, और उनकी अन्य भविष्यवाणियों के बारे में जानने के लिये ‘प्रॉफेटस् ऑफ साइंस फिक्शन’ (Prophets of Science Fiction) टीवी श्रृंखला की आर्थर सी क्लार्क की कड़ी देखना न भूलें।
मेरे विचार से उनके लिखे उपन्यासों में सबसे रोचक द सिटी एण्ड द स्टारस् (The City and the Stars) है। लेकिन टीवी की इस कड़ी में उसका जिक्र नहीं है :-(
‘प्रॉफेटस् ऑफ साइंस फिक्शन’ (Prophets of Science Fiction) श्रृंखला पर मेरे द्वारा लिखी अन्य कड़ियां

उन्मुक्त चिट्ठे पर विज्ञान कहानियों पर लिखी गयीं चिट्ठियां

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सांकेतिक शब्द
Arthur C Clark, Gentry Lee, 2001 Space Odyssey, Stanley Kubrick,The Sentinel, The City and the Stars, Hugo award,
Discovery Science, Prophets of Science Fiction, Prophets of Science Fiction, Ridley Scott,
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महिलायें जमीन पर लोट रही थीं

इस चिट्ठी में, गोकुल-मथुरा में रमण रेती आश्रम  की चर्चा है। 
रमण रेती पर बालू का अनन्द लेते लोग - यह चित्र मेरा खींचा नही है पर इस वेबसाइट के सौजन्य से

रमण रेती अथार्त ऐसी रेत जिसके स्पर्श से आनन्द हो और रमण रेती आश्रम की रेत कुछ इसी तरह की है। इसी लिये, गोकुल-मथुरा में स्थित इस आश्रम में, कोई भी जूते, चप्पल पहन कर कोई नहीं जा सकता है। यहां नंगे पांव ही चलना पड़ता है। यहां यमुना की रेत है इसमें कोई भी कंकड नहीं है। इसी लिये यहां नंगे पाव चलने में कोई असुविधा नहीं होती और अच्छा लगता है।
 
वहां पर साधू एवं सन्तों के ठहरने के लिये कुटियाएं थी - अधिकतर में एयर कंडिशनर लगे थे। 

प्रसाद के रूप में, खाने को खिचड़ी मिली, जो स्वादिष्ट लगी।

गोकुल में, कालिया पर कन्हैया - चित्र विकिपीडिया से
एक छोटे मैदान में जगह-जगह पर लोग घेरा बनाकर बैठे हुए थे और बहुत सारी महिलाएं जमीन पर लोट रही थी। यह मुझे कुछ अजीब लगा। वहां के पुजारी ने बताया,
'लोगों का विचार है कि भगवान कृष्ण बचपन में यही पर घूमा करते थे और उनके पैर इसी बालू पर पड़े होगें। इसीलिए लोग यहां आकर लोटते हैं ताकि इस पवित्र मिट्टी से वे भी पवित्र हो सकें।'
सच है कि हम वही हवा, वही मिट्ठी,  वही पानी प्रयोग कर रहे हैं जो अरबों साल से है। प्रकृति मां, हमें इनका पुनः प्रयोग करने देती है। 

पृथ्वी, हमारे पास, वंशजों की धरोहर है।  हमें इसका इस प्रकार से उपयोग करना है कि हमारी आने वाली पीढ़ी भी उसी तरह इसका प्रयोग कर सके जैसे हम कर रहें हैं। यदि हम दुरुपयोग करेंगे या फिर दिन दूने, रात चौगने बढ़ते जायेंगे तो हो सकता है कि हमारी आने वाली पीढ़ी इसका उपयोग न कर सके। हमें इसके लिये सावधानी बरतनी है।

रमण रेती  आश्रम में एक भजन
 

मथुरा में एक दिन, पूरे बनारसी जीवन पर भारी - मथुरा यात्रा
रस्किन बॉन्ड।। कन्हैया के मुख में, मक्खन नहीं, ब्रह्माण्ड दिखा।। जहाँपनाह, मूर्ति-स्थल नापाक है - वहां मस्जिद न बनायें।। कृष्ण-जन्मभूमि मन्दिर को महमूद गजनवी ने लूटा।। गाय या भैंस के चमड़े को अन्दर नहीं ले जा सकते।। बांके बिहारी से कुछ न मांग सका।। देना है तो पशु वध बन्द करवा दें।। माई स्वीट लॉर्ड।। चित्रकला से आध्यात्म।। शायद भगवान कृष्ण यहीं होंगे।। महिलायें जमीन पर लोट रही थीं।।

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This post in Hindi (Devnagri script) talks about Raman Reti Ashram at Gokul-Mathura. You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
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Mathura, Krishna, Gokul
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सौ साल पहले…

इस चिट्ठी में, आज के दिन सौ साल पहले वीरता के कारनामे की चर्चा है।

Courtesy - The Folio Society

आज का दिन ऐतिहासिक है। आज ही के दिन सौ साल पहले, १७ जनवरी १९१२ को रॉर्बट फाल्कन स्कॉट (Robert Falcon Scott) ने दक्षिणी  ध्रुव पर कदम रखा था। लेकिन स्कॉट इस यात्रा से वापस नहीं आये। लौटते समय उनकी और उनके साथियों कि मृत्यु हो गयी लेकिन उनका नाम अमर हो गया।  इसका श्रेय उनकी डायरियों को जाता है।

स्कॉट की डायरियां कई लोगों ने सम्पादित कर Scott’s last Expedition के नाम से छापी हैं। इसमें,  इस यात्रा की कठिनाइयों और अपने साथियों के जीवन के अन्तिम क्षणों को लिखा है। यह सब इस पुस्तक में जीवन्त हो उठा है।

कुछ समय पहले मैंने ‘सैर सपाटा – विश्वसनीयता, उत्सुकता, और रोमांच’ नामक एक श्रृंखला में, यात्रा विवरण की यादगार पुस्तकों और उनके लेखकों के बारे में चर्चा की थी। इसकी ‘स्कॉट की आखिरी यात्रा – उसी की डायरी से’ नामक कड़ी में इन डायरियों एवं इस यात्रा की विस्तार से चर्चा की थी। आप चाहें तो यहां पढ़ सकते हैं और सुनना चाहें तो यहां चटका लगा कर सुन सकते हैं। यह ऑग फॉरमैट में है। सुनने में मुश्किल हो तो ‘बकबक’ पर पॉडकास्ट कैसे सुने देखें।

Courtesy - The Folio Society

पिछली शताब्दी के शुरू में (१९१०-१३) दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने की होड़ लगी थी। इस होड़ में स्कॉट के साथ रोएल्ड एमंस्डसेन (Roald Amundsen) भी शामिल थे। इस दौड़ में एमंस्डसेन  जीत गये। क्योंकि वे स्कॉट से एक महीने पहले ही, दक्षणी  ध्रुव पहुंच गये थे। भले ही इस दौड़ में स्कॉट, एमंस्डसेन से दूसरे नंबर पर रहें हों पर एक बात में वे सबसे पहले थे।

स्कॉट ने अपने आखरी अभियान के पहले भी, १९०१-०४ ईस्वी में डिस्करी जहाज पर अंटार्कटिक की यात्रा करने की कोशिश की थी पर वे सफल नहीं हुऐ। उन्होंने तभी से अंटार्कटिक महाद्वीप के बारे में  ‘साउथ पोलर टाइम्स्’ (South Polar Times) नामक पत्रिका शुरू की थी। इस तरह की पत्रिका शुरू करने वाले वे पहले व्यक्ति थे।

इस घटना के सौ साल पूरे होने पर फोलिओ सोसायटी (The Folio Society) ने इस पत्रिका के बारह अंकों की प्रतिकृति निकाली है।

यदि आप स्कॉट की डायरी पढ़ना चाहें तब अन्तरजाल पर यहां पढ़ सकते हैं। इसे लेकिन, इन्हें संपादित कर प्रकाशित की गयी पुस्तक को पढ़ने का मजा और रोमांच कुछ और ही है।

सैर सपाटा – विश्वसनीयता, उत्सुकता, और रोमांच श्रृंखला की अन्य कड़ियों को नीचे चटका लगा कर जा सकते हैं। इसकी एक कड़ी को आप सुन सकते हैं सुनने के लिये  ► पर चटका लगायें। यह ऑग फॉरमैट में है। सुनने में मुश्किल हो तो ‘बकबक’ पर पॉडकास्ट कैसे सुने देखें।

भूमिका।। विज्ञान कहानियों के जनक जुले वर्न ।। अस्सी दिन में दुनिया की सैर ।। पंकज मिश्रा ।। बटर चिकन इन लुधियाना ।। कॉन-टिकी अभियान के नायक – थूर हायरडॉह्ल ।। कॉन-टिकी अभियान ।। स्कॉट की आखिरी यात्रा – उसी की डायरी से ()।।

मैं जानता हूं कि आप यह शीर्षक देख कर कर रॉर्बट फाल्कन स्कॉट के बारे में पढ़ने नहीं आये हैं आप आये हैं १९६१ में बनी फिल्म  ‘जब प्यार किसी से होता है‘ का यह गाना सुनने के लिये। फिर बना सुने कैसे चले जाईयेगा

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हिन्दुस्तानी गुलाबी हीरे, ईरान की शान


इस चिट्ठी में, दरियाये नूर (Ocean of light) और नूर उल ऎन (the light of eye) नामक हीरों की चर्चा है।
ईरान की महारानी के मुकट में जड़ा नूर उल ऐन
 इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते हैं। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो ऊपर दाहिने तरफ का पृष्ट,
'बकबक' पर पॉडकास्ट कैसे सुने
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दरियाये नूर
दरियायी नूर, गोलकोण्ड की पारिताला कोलर खदान (आजकल आंध्रप्रदेश) में मिला था। यह हल्के गुलाबी रंग की हीरा है। इसका भार लगभग १८२ कैरेट (३६ ग्राम) है।

नूर उल ऎन भी हल्के गुलाबी रंग का हीरा है। और गोलकोण्डा की खदानों में मिला था इसका भार लगभग ६० कैरेट (१२ ग्राम) है।

यह दोनो हीरे मुगल राजाओं के पास थे। लेकिन १७३९ ई. में, ईरान के  नादिर शाह इन हीरों को, कोहिनूर हीरे के साथ, लूट कर ईरान ले गया। इस समय यह दोनो वहीं के राज रत्न हैं।

१९६५ में कैनाडा की एक टीम ने ईरान के राज रत्नों पर शोध किया था। उनका अनुमान है कि यह दोनो रत्नो उस गुलाबी हीरे के हिस्से हो सकते हैं जो कि शाहजहां के सिंहासन में जडा था। इसका जिक्र फ्रांसीसी जौहरी एवं यात्री जीन बैप्टिस्ट तावरनिअर (Jean Baptistist Tavernier) ने Diamanta Grade table' नाम से किया है।


गोलककोण्डा किला और विश्वप्रसिद्ध हीरे
भूमिका।। गड़ेरिया की पहाड़ी यानि गोलकोण्डा।।  कोहिनूर हीरा -पुरषों की लिये विपदा।। हिन्दुस्तानी गुलाबी हीरे, ईरान की शान।।

चिट्ठी के चित्र विकिपीडिया से।

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अनन्त के गुण हैं अजीब

इस चिट्ठी में अनन्त के अजीब गुणों को बताते एक रोचक विडियो की चर्चा है।

अनन्त का चिन्ह - विकिपीडिया के सौजन्य से

कुछ समय पहले मैने ‘अनन्तता समझो, ईश्वर के पास पहंचो‘ नामक चिट्ठी में, आमिर डी ऐक्ज़ल (Amir D Aczel) के द्वारा, लिखी पुस्तक ‘द मिस्ट्री ऑफ द एलेफ: मैथमेटिक्स, द केबालह, एन्ड द सर्च फॉर इंफिनिटी’ (The mystery of the Aleph: Mathematics, the Kabbalah, and the Search for Infinity) की समीक्षा है। यह पुस्तक गणितज्ञ जॉर्ज कैंटर (George Cantor) की जीवनी है।

कैंटर, सेट थ्योरी के पिता कहे जाते हैं। अनन्त (infinity) पर सबसे महत्वपूर्ण काम कैंटर ने किया है। इस पुस्तक में,  इसकी विस्तार से चर्चा है। इस पुस्तक के पहले कुछ अध्यायों में, कैंटर के पहले अनन्त पर किये गये कार्य और उन गणितज्ञयों की भी चर्चा है।

इस  चिट्ठी को, आप मेरी ‘बकबक’ पर यहां चटका लगा कर सुन सकते हैं। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो ऊपर दाहिने तरफ का पृष्ट, “‘बकबक’ पर पॉडकास्ट कैसे सुने” देखें।

अनन्त के बारे में, जॉर्ज गैमव (George Gamov) की लिखी पुस्तक  ‘वन टू थ्री…इंफिनिटी फैक्टस् एण्ड स्पेक्यूलेशन ऑफ साइंस’ (One Two Three…Infinity: Facts and Speculations of Science’  भी बेहतरीन पुस्तक है। इस पुस्तक के बारे में, ऍन्ट्रॉपी के सन्दर्भ मै, मैंने यहां चर्चा की है।

परिभाषा के अनुसार ईश्वर सर्वभौमी या सर्वव्यापी सेट (Universal set or set of all sets) है। लेकिन इसकी विवेचना करने पर पता चलता है कि इस तरह का सेट नहीं हो सकता है या दूसरे शब्दों में ईश्वर का आस्तित्व नहीं है। इसकी कुछ विस्तार से चर्चा और जीवन के विश्वविद्यालय का एक वाक्या की चर्चा यहां की है। हैं न अनन्त के गुण अजीब। इस  चिट्ठी को, आप मेरी ‘बकबक’ पर यहां चटका लगा कर सुन सकते हैं। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो ऊपर दाहिने तरफ का पृष्ट, “‘बकबक’ पर पॉडकास्ट कैसे सुने” देखें।

कुछ समय पहले, अनन्त के बारे में एक रोचक विडियो देखने को मिला। इसमें अनन्त के अजीब गुणों की चर्चा है। आप भी उसका आनन्द लें।

गणित की पुस्तकों पर मेरी अन्य चिट्ठियां

सांकेतिक शब्द

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शायद भगवान कृष्ण यहीं होंगे

इस चिट्ठी में, वृन्दावन में अक्षय पात्र फाउंडेशन संस्थान के मंदिर और केंद्रीकृत रसोईघर की चर्चा है।
अक्षय पात्र संस्थान का मथुरा में मंदिर

अक्षय पात्र संस्थान वर्ष २००० में शुरू हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य, स्कूलों में विद्यार्थियों को दोपहर का भोजन देना है। इस समय देश में, इनके ८ राज्यों में, १५ केंद्रीकृत और ३ विकेन्द्रीकृत रसोईघर चल रहे हैं। केंद्रीकृत रसोईघर में, एक जगह बड़े रसोई घर में खाना बनता है और विकेन्द्रीकृत रसोई घर में स्कूल के पास वहीं के स्थानीय लोगों की सहायता से खाना बनवाया जाता है।

इस संस्थान का एक केंद्रीकृत रसोईघर और उसी के साथ कृष्ण भगवान का मन्दिर वृन्दावन में है। मथुरा में एक जगह इनका विकेंद्रीकृत रसोईघर भी है। वृन्दावन में इस जगह से, वृन्दावन और मथुरा के सारे स्कूलों में (उस जगह को छोड़ कर जहां विकेंद्रीकृत रसोईघर है), दोपहर का खाना बनाकर भेजा जाता है। हम यहां भी गये। यह जगह मुझे सबसे अच्छी लगी।

इस मंदिर में आरती तो हो रही थी लेकिन पूरी जगह खाली थी। यहां पर बिल्कुल भीड़ नहीं थी। इस मंदिर के पुजारी का नाम अंगद था। वह एक ३० वर्षीय कंप्यूटर इंजीनियर है। अंगद ने बताया,
'रोज १,६८,००० बच्चों का खाना उनके यहां बनता है। खाना  रात के २ बजे बनना शुरू होता है। खाने में दाल, चावल, रोटी  और एक सब्जी रहती है।'
हम लोग इनका रसोईघर भी देखने गये। यह एकदम आधुनिक है। रोटी में घी भी, हाथ से नहीं लगाया जाता है। यह काम भी मशीन के द्वारा किया जाता है। 

बच्चों को यदि अच्छा भोजन मिलता है तब स्वस्थ रहेगें और स्कूल आयेंगे। वे हमारे देश का भविष्य हैं। हमारा भविष्य सुनहरा होगा। मुझे लगा कि मथुरा में जितने भी मंदिर और पवित्र स्थान हैं, यह स्थान उन सब में सबसे पवित्र है। यदि भगवान कृष्ण हैं तब वे इसी मन्दिर में निवास करते होंगे और वही काम करते होते जो कि यह संस्था कर रही है।

मन्दिर में उन्होने विडियो भी दिखाया जिससे से पता चला कि बहुत से बच्चों को घर में अच्छा भोजन नही मिल पाता है। उन्होंने स्कूल में इसलिए आना शुरू किया क्योंकि वहां अच्छा खाना मिलता है। 

मैं भी इनके लिए कुछ करना चाहता था।  मैंने सुझाव दिया कि जिन स्कूलों में भोजन बंटवाया जाता है उसमें स्कूल के जिन बच्चों की हाजिरी सबसे अधिक हो ऎसे एक लड़के एवं एक लड़की की एक साल की पढ़ायी का खर्चा उठाने की बात रखी। शायद आने वाले समय में ऎसा कुछ हो सके।


अक्षय पात्र संस्था के बारे में अन्तराजाल पर कुछ विवाद भी है। आप इसे यहां पढ़ सकते हैं। मैं नहीं कह सकता कि यह सही है अथवा नहीं।

अगली बार हम लोग  रमन रेती आश्रम चलेंगे।


वृन्दावन में अक्षय पात्र प्रोग्राम के बारे में विडियो


मथुरा में एक दिन, पूरे बनारसी जीवन पर भारी - मथुरा यात्रा
रस्किन बॉन्ड।। कन्हैया के मुख में, मक्खन नहीं, ब्रह्माण्ड दिखा।। जहाँपनाह, मूर्ति-स्थल नापाक है - वहां मस्जिद न बनायें।। कृष्ण-जन्मभूमि मन्दिर को महमूद गजनवी ने लूटा।। गाय या भैंस के चमड़े को अन्दर नहीं ले जा सकते।। बांके बिहारी से कुछ न मांग सका।। देना है तो पशु वध बन्द करवा दें।। माई स्वीट लॉर्ड।। चित्रकला से आध्यात्म।। शायद भगवान कृष्ण यहीं होंगे।।

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चित्रकला से आध्यात्म

राधा-कृष्ण कन्हाई चित्र
इस चिट्ठी में, मथुरा के कंहाई चित्रकला संग्रहालय  की चर्चा है।

कुछ समय पहले, मैंने  चित्रकला, गणित, और संगीत के संबन्धों को बताती एक पुस्तक 'गर्डल, ऍशर, बाख: ऍन ईटनल गोल्डेन ब्रेड' की चर्चा यहां की है। लेकिन क्या चित्रकलाऔर अध्यात्म में कोई संबन्ध है? क्या चित्रकला से  भी ईश्वर के पास पहुंचने का माध्यम हो सकता है? 

शायद इन सवालों का जवाब हां में है और इस बात को कन्हाई चित्रकार से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता। उन्होंने न केवल चित्रकला की नयी श्रेणी श्रेणी को जन्म दिया पर चित्रकला से आध्यात्म को भी समझा।

आपने अपना व्यवसायिक जीवन कला निदेशक के रूप में, गुरुदत्त के साथ बम्बई में शुरू किया। लेकिन बहुत शीघ्र लगा कि अपनी सृजनात्मकता भगवान कृष्ण को समर्पित करनी चाहिये। इसलिये वृन्दावन में बस गये भगवान कृष्ण की कलाओं पर चित्र बनाने लगे। 

मथुरा में आपका एक संग्रहालय भी है और यह देखने लायक है। इस संग्रहालय में भगवान कृष्ण से सम्बन्धित कलाओं की बेहतरीन चित्र है। यह चित्र मन को छूते हैं। इनके ऊपर सोने ठर कीमती पत्थरों से सजावट भी है। इसलिए यह चित्र लाखों रूपयों के हैं। 

आपको वर्ष  २००० में भारत सरकार के द्वारा, पद्मश्री के पुरुस्कार से नवाज़ा गया। 

आपके दो पुत्र कृष्ण कन्हाई, गोविन्द कन्हाई एवं पौत्र सिद्धार्थ कन्हाई भी चित्रकार हैं। इन दोनो को वर्ष १९९९ में अचीवर ऑफ मिलेनियम अवार्ड (Achiever of Millennium Award) मिल चुका है। 

कृष्ण कन्हाई को २००४ में पद्मश्री पुरुस्कार से नवाज़ा गया है। बच्चन पिता-पुत्र के अतिरिक्त केवल यह पिता-पुत्र को पद्मश्री मिला है।

गोविन्द कन्हाई को  २००६ यूपी रत्न से नवाज़ा गया है।  


इस समय आप सबने मिल कर चित्रकारी के अन्य दिशाओं में चित्रकारी शुरू की है। हेमा मालिनी का छाया चित्र और गांव जीवन के दृश्य का चित्र उसी क्रम में हैं।

मेरी पहले की कूछ चिट्ठियों में यहां और यहां कन्हाई चित्र हैं। 

मथुरा में एक दिन, पूरे बनारसी जीवन पर भारी - मथुरा यात्रा
रस्किन बॉन्ड।। कन्हैया के मुख में, मक्खन नहीं, ब्रह्माण्ड दिखा।। जहाँपनाह, मूर्ति-स्थल नापाक है - वहां मस्जिद न बनायें।। कृष्ण-जन्मभूमि मन्दिर को महमूद गजनवी ने लूटा।। गाय या भैंस के चमड़े को अन्दर नहीं ले जा सकते।। बांके बिहारी से कुछ न मांग सका।। देना है तो पशु वध बन्द करवा दें।। माई स्वीट लॉर्ड।। चित्रकला से आध्यात्म।।

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कोहिनूर हीरा -पुरषों की लिये विपदा

इस चिट्ठी में कोहिनूर हीरे की चर्चा है।
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देखें।
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इंगलैन्ड के राजमुकुट में जड़ा, कोहिनूर हीरा - चित्र फोटोबकेट से

काकातीया राजवंश के क्षेत्र में, गुंटूर क्षेत्र भी था। कृष्णा नदी के किनारे का यह क्षेत्र, अपनी हीरों की खदानों के लिए प्रसिद्व था। यहीं पर  कोहिनूर,  दरियायी नूर, और नूर उल ऎन हीरे जैसे विश्व प्रसिद्व हीरे मिले थे। इसी लिये गोलकोण्डा खदानों के हीरे, बेहतरीन हीरों के रूप में जाने जाते थे। १७३० ई. में ब्राजील में भी हीरे मिले, तब तक दुनिया में केवल यही जगह, हीरों के लिए प्रसिद्व थी।

कोहिनूर सफेद हीरा है और यह दुनिया का सबसे बड़ा हीरा था पर कटने के बाद यह १०५ कैरेट (२१.६ ग्राम) का हो गया। इस समय, यह इंग्लैंड की महारानी के मुकुट में जड़ा है।

कोहिनूर हीरा, काकातीया राजवंश के समय, कोला खदान में मिला था। इसलिये यह इनकी सम्पत्ति था। इन्होंने इसे देवी के आंख के रूप में मंदिर में स्थापित कर दिया। तुगलक शाह-१ जब दिल्ली का राजा बना तब उसने अपनी सेना को काकतीया राजवंश को हराने के लिए १३२३ ई. में भेजा। पहली बार, उसकी हार हुई पर दूसरी बार वह जीत गया। उसके बाद हुई लूटपाट में, कोहिनूर हीरा दिल्ली  पहुंचा। उसके बाद, इस हीरे ने, दिल्ली सल्तनत की शान बढ़ायी।

शाहजहां ने इसे अपने तख्ते-ताउस - सिंहासन (Peacock throne) पर जड़वाया। १७३९ ई. पर नादिर शाह ने आक्रमण किया और अपने साथ तख्ते ताउस और कोहिनूर हीरों को पर्शिया ले गया। उसने इस हीरे का नाम कोहिनूर रखा।

१७४७ ई. में नादिरशाह की हत्या हो गयी और कोहिनूर हीरा अफ़गानिस्तान शांहशाह के पास पहुंच गया। १८०९ ई. में मो. शाह ने उसको अपदस्त कर दिया। १८३० ई.  में, अफ़गानिस्तान के अपदस्त शांहशाह शाह शूजा कोहीनूर हीरे के साथ भाग कर लाहौर पहुंचा। उसने  कोहिनूर हीरे को पंजाब के राजा रंजीत सिंह को दिया एवं इसके एवज में राजा रंजीत सिंह ने,  शाह शूजा को  अफ़गानिस्तान का राज-सिंहासन वापस दिलवाया।

रंजीत सिंह ने कोहिनूर हीरे को जगन्नाथ मंदिर को वसीयत कर दिया। लेकिन अंग्रेज हकूमत ने उनकी वसीयत नहीं माना और लाहौर संधि के अन्दर, कोहिनूर हीरा इंग्लैंड की महारानी को दे दिया गया।

कहा जाता है कि कोहिनूर हीरे के साथ श्राप है। यह पुरूषों के लिये विपत्ति लाता है पर महिलाओं के लिए नहीं। यह जिन-जिन राजाओं के साथ रहा उन पर विपदायें ही आयीं। उनकी सल्तनत चली गयी। केवल महिलायें ही, इसके श्राप से बचीं हैं।

इस समय यह महरानी एलिजाबेथ के पास है उनके बाद तो शायद कोई पुरूष राजा बने।  तब पता चलेगा कि यह मिथक सच है अथवा नहीं।


विष्णु पुराण और भागवत में, स्यमन्तक मणि का उल्लेख मिलता है। इस मणि को सूर्यदेव ने, सत्राजित की तपस्या से प्रसन्न हो कर, उसे दिया था। बाद में,  भगवान कृष्ण पर, चौथ का चन्द्रमा देखने के कारण, इसकी चोरी का लांछन लगा था। कहा जाता है कि यह मणि, कालान्तर में कोहिनूर हीरे के रूप में जानी गयी। लेकिन यह मिथक ही है।

अगली बार हम लोग दरियाये नूर और नूर उल ऎन हीरे की चर्चा करेंगे।


गोलककोण्डा किला और विश्वप्रसिद्ध हीरे

भूमिका।। गड़ेरिया की पहाड़ी यानि गोलकोण्डा।।  कोहिनूर हीरा -पुरषों की लिये विपदा।।


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कौन सा मनका पहले पहुंचेगा और बड़ा निशान बनायेगा

इस चिट्ठी में न्यूयॉर्क के नम्बर प्ले की कड़ी से एक अन्य पहेली

यह चित्र उसी नम्बर प्ले की उसी चिट्ठी से है।

कुछ समय पहले मैंने बताया था कि न्यूयॉर्क टाईमस् का वर्डप्ले ब्लॉग ‘Wordplay – New York Times Blog‘ है। इसमें पहेलियों का जिक्र रहता है। इसकी एक कड़ी ‘Numberplay: Treat or Trick‘ हैं यह मुझे पसन्द आती है। कुछ समय पहले ‘किस गोले से चॉकलेट निकालूं‘ नामक पहेली प्रकाशित की थी। वहीं से एक अन्य पहेली यहां से ।

ऊपर का चित्र देखें। इसके दोनो मनके और तार एक समान हैं केवल तार में बीच के उभार के। दोनो मनकों का भार भी एक है। तार के अन्त में मोम का टुकड़ा है। मनके और तार के बीच का घर्षन (friction) शून्य है। यदि दोनो मनकों को ऊपर से एक साथ छोड़ा जाय तब,

  1. कौन सा मनका पहले पहुंचेगा; और
  2. कौन सा मनका मोम में गहरा गड्ढा या निशान बनायेगा।

केवल जवाब की बात नहीं है, जवाब का कारण, ज्यादा महत्वपूर्ण है।

फिलिप्स पॅटी फ्रांसीसी हैं। उन्हें तारो के ऊपर चलने में महारत हासिल है। ७ अगस्त १९७४ को वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर की टावर के बीच तार डाल कर उस पर चले थे। २००८ में, बीबीसी के द्वारा उस पर एक ‘मैन ऑन वायर’ (Man on Wire) नाम का छाया चित्र बनाया गया था। उसी का अधिकारिक झलकी देखिये।

गणित और पहेलियों से सम्बन्धित कुछ अन्य चिट्ठियां।
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माई स्वीट लॉर्ड

इस चिट्ठी में, मथुरा के स्कॉन अन्तराष्ट्रीय मंदिर की चर्चा है।
स्कॉन मन्दिर अन्दर से - चित्र विकिपीडिया से

International Society for Krishna Consciousness (ISKCON) (स्कॉन),  हरे कृष्ण आन्दोलन (Hare Krishna movement) के नाम से भी जाना है। इस आन्दोलन को, अभय चरणारविन्द भक्तिवेदान्त स्वामीप्रभुपाद के द्वारा, १९६६ में, न्यूयॉर्क शहर में शुरू किया गया। इनके दुनिया भर में मन्दिर हैं। इनका एक मन्दिर वृन्दावन में भी है। बांके बिहारी से लौटते समय हम लोग पहले स्कॉन अन्तराष्ट्रीय मंदिर गये।


वृन्दावन के स्कॉन मन्दिर में,  बहुत से विदेशी लोग थे। वहां पर वे एक भजन की धुन पर आरती कर रहे थे और उसी पर थिरक भी रहे थे। यह कुछ भजन खास है। इसके बारे में भी दो शब्द।


बीटेलस् दुनिया का सबसे प्रसिद्ध संगीत का ग्रुप रहा है। जॉर्ज हैरिसन इसके सदस्य थे। वे स्कॉन आन्दोलन से प्रभावित थे। १९७० में उन्होंने भ्गवान कृष्ण की स्तुति में एक भजन गाया था। यह मेरे विश्विद्यालय के दिनों में लोकप्रिय था। वहां पर यही भजन चल रहा था उसी पर लोग थिरक रहे थे।  

 जॉर्ज हैरिसन को यह कर्णप्रिय भजन गाते हुऐ देखिये और सुनिये। 

इस गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं।
हरे कृष्णा

माई स्वीट लॉर्ड
हुम्म्म  माई लॉर्ड
माई स्वीट लॉर्ड

आई रियेली वान्ट टु सी यू
रियेली वान्ट बी विथ यू
रियेली वान्ट सी यू लॉर्ड
बट इट टेक्स् सो लॉन्ग
आआ

पुनः पहला ...


आई रियेली वान्ट टु नो यू
रियेली वान्ट टु गो विथ यू
रियेली वान्ट शो यू लॉर्ड
थैट इट वोन्ट टेक लॉन्ग, माई लॉर्ड

पुनः पहला ...

माई स्वीट लॉर्ड - कन्हाई चित्र

आई रियेली वान्ट टु सी यू
आई रियेली वान्ट टु सी यू
आई रियेली वान्ट टु सी यू, लॉर्ड
रियेली वान्ट टु सी यू, लॉर्ड
बट इट टेक्स् सो लॉन्ग, माई लॉर्ड

पुनः पहला ...

आई रियेली वान्ट टु सी यू
आई रियेली वान्ट टुबी विथ यू
रियेली वान्ट सी यू लॉर्ड
बट थैट इट वोन्ट टेक लॉन्ग, माई लॉर्ड

पुनः पहला ...

हुम्म्म, माई लॉर्ड (हरे कृष्णा)
ओह हुम्म्म, माई स्वीट लॉर्ड (कृष्णा कृष्णा)
माई, माई, माई लॉर्ड (हरे कृष्णा)
ओह हम्म, माई स्वीट लॉर्ड (कृष्णा कृष्णा)
नाओ, आई रियेली वान्ट टु नो यू (हरे रामा)
रियेली वान्ट टु गो विथ यू (हरे रामा)
रियेली वान्ट टु शो यू लॉर्ड
बट इट टेकस् सो लॉन्ग, माई लॉर्ड

हुम्म्म, माई लॉर्ड
माई, माई, माई लॉर्ड (हरे कृष्णा)
माई स्वीट लॉर्ड (हरे कृष्णा)
माई स्वीट लॉर्ड (कृष्णा कृष्णा)
माई लॉर्ड (हरे हरे)
हुम्म्म, हुम्म्म
गुरूर ब्रम्हा, गुरूर विष्णु, गुरूर देवो, महेश्वरा
गुरूर साक्षात, परमब्रम्हा, तस्मत श्री, गुरूर नमः
माई स्वीट लॉर्ड (हरे राम)

अगली बार हम लोग कन्हाई चित्रकला संग्रहालय देखने चलेंगे।

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