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बसेरे से दूर

Posted on June 18, 2008 in Full Articles | by

‘बसेरे से दूर’, बच्चन जी की आत्म कथा का तीसरा भाग है। इसमें उस समय की बात है जब वे इलाहाबाद से दूर रहे।

इस भाग में लिखी घटनाओं के बारे में विवाद है। मेरे कई मित्र इलाहाबाद के पुराने बाशिन्दे रहे हैं। उनके पिताओं से कभी कभी  मुलाकात होती है। एक बार जब मैंने इस भाग कि कुछ घटनाओं (जैसे, तेजी जी के साथ घटित घटना, या फिर कैम्ब्रिज़ से लौटते समय मिस्र में भारतीय राजदूत की चर्चा) की बात की तो उनका कहना था कि यह घटनायें सही तरह से वर्णित नहीं हैं और वास्तविकता इसके विपरीत है। मैं नहीं जानता कि क्या सच है पर लगा कि इस  बारे में विवाद अवश्य है।

इस भाग में बच्चन जी के इलाहाबाद से जुड़े खट्टे मीठे अनुभव हैं – ज्यादातर तो खट्टे ही हैं। यदि आप इलाहाबाद प्रेमी हैं, तो शायद यह भाग आपको न अच्छा लगे, पर एक जगह बच्चन जी इलाहाबाद के बारे में यह भी कहते हैं।

‘इलाहाबाद भी क्या अजीबोगरीब शहर है। यह इसी शहर में सम्भव था कि एक तरु तो यहां ऐसी नई कविता लिखी जाय जिस पर योरोप और अमरीका को रश्क हो और दूसरी तरु यहां से एक ऐसी पत्रिका प्रकाशित हो जिसका  आधुनिकता से कोई संबंध न हो – संपादकीय को छोडकर। पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी “सरस्वती” को द्विवेदी युग से भी पीछे ले जाकर जिलाए जा रहे  थे, आश्चर्य इस पर था।‘

तो दूसरी जगह यह भी कहते हैं,

‘इलाहाबाद की मिटटी में एक खसूसियत  है – बाहर से आकर उस पर जमने वालों के लिये वह बहुत अनुकूल पडती है। इलाहाबाद में जितने जाने-माने, नामी-गिरामी लोग हैं, उनमें से ९९% आपको ऐसे मिलेंगे जो बाहर से आकर इलाहाबाद में बस गए, खासकर उसकी सिविल लाइन में – स्यूडो इलाहाबादी। और हां, एक बात और गौर करने के काबिल है कि  इलाहाबाद का पौधा तभी पलुहाता है, जब वह इलाहाबाद छोड दे।‘

इसमें कुछ तो सच है। नेहरू, सप्रू, काटजू, बैनर्जी वगैरह तो इलाहाबाद में बाहर से आये और फूले फले।  नेहरू की सन्तानें और आगे तब बढ़ी जब वे इलाहाबाद से बाहर गयीं। यह बात हरिवंश राय बच्चन के पुत्र  अमिताभ बच्चन पर भी लागू होती है – वे तभी फूले फले जब पहुंचे बॉलीवुड पर यह बात बच्चन जी के लिये सही नहीं है।

मेरे इलाहाबादी मित्र कहते हैं कि,

‘इलाहाबाद शहर अपने मैं अनूठा है – न ही किसी शहर ने देश को इतने प्रधान मन्त्री दिये, न ही साहित्यकार, न ही इतने सरकारी अफसर, न ही इतने वैज्ञनिक, और न ही न्यायविद। इससे सम्बन्धित  लोग दुनिया में फैले हैं।’

वे लोग यह भी कहते हैं कि,

‘जहां तक साहित्यकारों की बात है जब तक वे इलाहाबाद में रहे सरस्वती उनके साथ रहीं, जब  उन्होंने इलाहाबाद छोड़ा लक्ष्मी तो मिली, पर सरस्वती ने साथ छोड़ दिया। उन्हें प्रसिद्धि उस काम के लिये मिली जो  उन्होंने  इलाहाबाद में किया – चाहें वे  हरिवंश राय बच्चन हों या  धर्मवीर भारती। सुमित्रा नन्दन पन्त, या महादेवी वर्मा, या राम कुमार वर्मा इस लिये लिख पाये क्योंकि वे इलाहाबाद में ही रहे।
हरिवंश राय बच्चन माने या न माने उन्होने अपनी सबसे अच्छी कृति (मधुशाला) उनके इलाहाबाद  रहने के दौरान लिखी गयी। उन्हें जो भी प्रसिद्धि मिली वह उन कृतियों के लिये मिली, जो उन्होने इलाहाबाद में लिखी।’

मैं साहित्य का ज्ञाता नहीं हूं। मैं नहीं कह सकता  कि यह सच है कि नहीं और न ही कुछ टिप्पणी करने का सार्मथ्य रखता हूं।

क्या इलाहाबाद की मिट्टी कुछ अलग है?  क्या इलाहाबाद वासी अपने शहर के लिये एहसान फरामोश हैं: मालुम नहीं – इलाहाबाद वासी ही जाने।

इलाहाबाद के बारे में सदियों से लिखा जा रहा है – शायद इतना जितना किसी और शहर के बारे में नहीं।  अरविन्द कृष्ण मेहरोत्रा ने   ‘द लास्ट बंगलो’ (The Last Bunglow: writings on Allahabad) नामक पुस्तक में इन सारे लेखों को संकलित किया है।


ह्स्युआन त्संग (Hsiuan Tsang) सातवीं शताब्दी में भारत आये थे। उन्होंने  उस समय इलाहाबाद के कुंभ मेले के बारे में लिखा। इस पुस्तक में, इलाहाबाद के बारे में लिखने वाले  अन्य प्रमुख लोग हैं गालिब (Ghalib), रुडयार्ड किपलिंग (Rudyard Kipling), मार्क ट्वैन (Mark Twain), जवाहर लाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru), अमर नाथ झा (Amar Nath Jha), राजेश्वर दयाल (Rajeshwar Dayal), सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (Suryakant  Tripathi ‘Nirala’, नयनतारा सहगल (Nayantara Sehgal), सईद ज़ाफरी (Saeed Jafrey), वेद मेहता (Ved Mehta), पंकज  मिश्रा (Pankaj Misra), और कई अन्य। इन सब के लेख इसी पुस्तक में संकलित हैं। इन लोगों ने कुछ न कुछ समय इलाहाबाद में बिताया है। यदि आपका इलाहाबाद से कोई संबन्ध है, या इन लोगो से – तो ‘द लास्ट बंगलो’ पुस्तक को पढें। यह इलाहाबाद को उनके नज़रिये देखती है।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा निम्न चार भागों खन्डो में लिखी है

मैंने इनकी समीक्षा कुछ कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। यहां पर उन्हें संकलित कर चार चिट्ठियों में रख रहा हूं। प्रत्येक चिट्ठी पर उनकी जीवनी के एक भाग की समीक्षा रहेगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी किसी खास कारण से पढ़नी शुरू की। इस कारण के बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘हरिवंश राय बच्चन – विवाद‘ पर पढ़ सकते हैं। यह कॉपीराइट का उल्लघंन होगा कि नहीं – इस बारे में आप मेरी चिट्ठी, ‘मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों‘ पर पढ़ सकते हैं।

सांकेतिक चिन्ह

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