Unmukt – उन्मुक्त

हिन्दी चिट्ठाकार उन्मुक्त की चिट्ठियाँ

July, 2009

समय की चाल – व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर

इस चिट्ठी में उष्मागति के दूसरे नियम की चर्चा जैव विज्ञान और विकासवाद के संदर्भ में की गयी है।


मेरी श्रंखला ‘डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े’ की चिट्ठी ‘विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है‘ पर कुछ टिप्पणियां सवाल पूछते हुए आयी हैं। इस चिट्ठी की सुविधानुसार, मैं उनका सम्पादन कर नीचे पेश कर रहा हूं। मूल रूप पर की गयी टिप्पणी को आप उसी चिट्ठी में पढ़ सकते हैं।

एंट्रॉपी के जनक – रुडोल्फ क्लॉसिअस (Rudolf Clausius) २.१.१८२२-२४.८.१८८8 – चित्र विकिपीडिया से

अनुनाद जी कहते हैं,

“सृजनवादियों का कहना है कि विकासवाद में प्राणि जगत जीवन के निचले भाग में ऊँचे भाग की तरफ (from lower life form to higher life form) जा रहा है। अर्थात एंट्रॉपी घट रही है।”

‘क्या प्राणिजगत का निचले स्तर से ऊंचे स्तर पर जाने का अर्थ यह है कि एण्ट्रापी बढ़ रही है?

यदि ऐसा है तो सब जगह एन्ट्रापी बढ़ रही है – मानव जब बच्चा होता है तो हर दृष्टि से सरल होता है; पहले के औजार सरल थे, अब जटिल औजार बनाये गये हैं; पहले की इन्टीग्रेटेड सर्किटों (आई सी) में कम ट्रान्जिस्टर हुआ करते थे; अब कई मिलियन ट्रान्जिस्टर होते हैं।’

अरविन्द जी का कहना है,

‘मुझे लगता है जैवीय मामलों में entropy का सिद्धांत लागू नहीं होता – बीज की संरचनात्मक जटिलता अधिक होती है मगर वह ज्यो ज्यों वृक्ष बनता जाता है सरलीकरण होता है। मगर मैं कुछ निश्चित तौर पर कुछ नहीं कह सकता।’

निशान्त जी कहते हैं,

‘इसे समझना सरल नहीं है। Entropy के बारे में मैंने हॉकिंग की किताब में पढ़ा है। यह परिकल्पना दुरूह है। इसे कुछ सरल रूप में प्रस्तुत करें।’

जीवन के निचले भाग में ऊँचे भाग की तरफ (from lower life form to higher life form) जाने से एंट्रॉपी घट रही है। अनुनाद जी, ने जो उदाहरण दिये हैं उनमें भी एंट्रॉपी घट रही है। लेकिन यह वातावरण या सूर्य से ऊर्जा के कारण हो रहा है। जिसके कारण वहां एंट्रॉपी बढ़ रही है और दोनो को जोड़ बढ़ रहा है।

अरविन्द जी, मेरे विचार से जैवीय मामलों में भी एंट्रॉपी का सिद्धांत लगता है।

निशान्त जी, यह सच है कि एंट्रॉपी एक मुश्किल विषय है। मैंने इस विषय को ४० साल से भी पहले पढ़ा था। उस समय भी यह विषय मुश्किल लगता था। फिर भी, मैं इसे बताने बताने का प्रयत्न करता हूं।

मैंने उसी समय जॉर्ज गैमव (George Gamov) की ‘वन, टू, थ्री … इन्फिनिटी’ (One, Two, Three …Infinity) और आइज़ेक एसीमोव (Isaac Asimov) की ‘एसिमोव ऑन फिज़िक्स’ (Asimov on Physics) पढ़ी थी। उसके बाद यह विषय कुछ समझ में आया था। यह दोनो बेहतरीन पुस्तकें हैं यदि आप विज्ञान में रुचि रखते हैं और आपने नहीं पढ़ी हैं तो अवश्य पढ़े। यदि आपके मुन्ने, मुन्नी विज्ञान में रुचि रखते हैं तो उन्हें उपहार में दें।

पिछली चिट्ठी लिखने के पहले मैंने इन्हें पुनः पढ़ा था। आइज़ेक एसीमोव की पुस्तक में एक अध्याय ‘ऑर्डर ऑर्डर!’ (Order Order!) नाम से है। इसमें वे लिखते हैं (इसे अनुनाद जी के प्रश्न के परिपेक्ष में देखें),

‘It is, of course, easy to cite cases of entropy decrease as long as we consider only parts of a system and not all of it. For instance, we see manking extract metals from ores and device engines of flendish complexity out of metal ingots. We see elevators moving upwards and automobiles driving uphill, and soldiers getting into marching formation and cards placed in order. All these and a very large number of other operations involve decrease in entropy brought about by the action of life. Consequently, the feeling arises that life can “reverse entropy”.
In fact, in considering entropy changes on earth, it is unfair to consider the earth alone, since our planet is gaining energy constantly from the sun. This influx of energy from the sun powers all those processes on earth that represent local decreases in entropy: the formation of coal and oil from plant life, the circulation of atmosphere and ocean, the raising of water in the form of vapor, and so on. It is for that reason we can continue to extract energy by burning oil and coal, by making use of power from wind, river currents, waterfalls, and so forth. It is all at the expense, indirectly, of the sun.


The entropy increase represented by the sun’s large-scale conversion of mass to energy simply swamps the comparatively tiny entropy decreases on earth. The net entropy change of the solar system as a whole is that of a continuing huge increase with time.’


जॉर्ज गैमव की पुस्तक में अध्याय ‘द लॉ ऑफ डिस्ऑर्डर’ (The Law of Disorder) है। इसमें वे लिखते हैं (इसे आप अरविन्द जी की टिप्पणी के परिपेक्ष में देखें),

‘One seeming contradiction to the law of increasing entropy is presented by living organisms. In fact, a growing plant takes in simple molecules of carbon dioxide (from the air) and water (form the ground) and builds them up into the complex organic molecules of which the plant is composed. Transformation from simple to complex molecules implies the decrease of entropy; in fact, the normal process in which entropy does increase is the burning of wood and decomposition of its molecules into carbon dioxide and water vapor. Do plants really contradict the law of increasing entropy, being aided in their growth by some mysterious vis vitalis (life force) advocated by old-time philosophers?

The analysis of this question indicates that no contradiction exists, since along with carbon dioxide, water, and certain salts, plants need for their growth abundant sunlight. Apart from energy, which is stored in the material of growing plants and may be liberated again when the plant burns, the rays of the sun carry with them the so-called “negative entropy”, (low-level entropy), which disappears when the light is absorbed by the green leaves. Thus the photosynthesis taking place in the leaves of plants involves two related processes:
  • Transformation of the light energy of the sun’s rays into chemical energy of complex organic molecules;
  • The use of low-level entropy of the sun’s rays for lowering the entropy associated with the building up of simple molecules into complex ones.
In term of “order versus disorder.” one may say that, when absorbed by green leaves, the sun’s radiation is robbed of the internal order with which it arrives on the earth, and this order is communicated to the molecules, permitting them to be built up into more complex, more orderly, configurations. Whereas plants build their bodies from inorganic compounds, getting their negative entropy (order) from the sun’s rays, animals have to eat plants (or each other) for the supply of that negative entropy, being, so to speak, second-hand users of it.’
समय की रफ्तार – व्यवस्था से
अव्यवस्था की तरफ
यह चित्र मेरा नहीं है। मैंने इसे यहां से लिये है।
वहां पर कुछ प्यारी सी लड़कियों ने एंट्रॉपी को सरल भाषा में समझाया है।

मैंने हॉकिंग (Stephen W. Hawking) की पुस्तक ‘अ ब्रीफ हिस्टरी ऑफ टाइम’ (A Brief History of Time: From Big Bang to Black Holes) बहुत पहले पढ़ी थी। मुझे यह पुस्तक दर्शन से संबन्धित ज्यादा लगती है और विज्ञान से कम। मेरे विचार से यह पुस्तक ज्यादा चर्चित है फिर भी निशांत जी की टिप्पणी के बाद मैंने इसे पढ़ा। इसमें एक अध्याय ‘द ऐरॉ ऑफ टाइम’ (The Arrow of Time) नाम से है। इसमें वे कहते हैं,

‘The progress of the human race in understanding the universe has established a small corner of order in an increasingly disordered universe. If you remember every word in this book, your memory will have recorded about two million pieces of information:the order in your brain will have increased by about two million units. However, while you have been reading the book, you will have converted at least a thousand calories of ordered energy, in the form of food, into disordered energy, in the form of heat that you lose to the air around by convection and sweat. This will increase the disorder of the universe by about twenty million million million million units – or about ten million million million times the increase in order in your brain – and that’s if you remember everything in this book.’



मेरे विचार से उष्मागति का दूसरा नियम विज्ञान का नियम है। यह प्रकृति में हर जगह, हर समय लगना चाहिये अन्यथा यह नियम सही नहीं होगा। लेकिन हॉकिंग अपनी पुस्तक के अध्याय ‘ब्लैक होलस् आंट सो ब्लैक’ (Black Holes Ain’t So Black) में लिखते हैं,

‘The second law of thermodynamics has a rather different status than that of other laws of science, such as Newton’s law of gravity, for example, because it does not hold always, just in the vast majority of cases.’

लेकिन वे अपनी पुस्तक में, यह बताते हुए कि यह कब नहीं लगेगा, लिखते हैं,

  • इस समय ब्रह्माण्ड फैल रहा है। जब वह सिकुड़ना शुरू करेगा (यदि ऐसा हुआ तो) तब यह नियम सत्य नहीं होगा। लेकिन उस समय प्रकृति के सारे नियम उलट जायेंगे।
  • हो सकता है कि ब्लैक होल के अन्दर यह नियम सच न हो।

लेकिन यह दोनो बातें संभावनायें ही हैं। क्या मालुम ठीक हों या न हों।


पिछली चिट्ठी के अन्त में कुछ लेखों का लिंक ‘Related articles by Zemanta’ करके बॉर्डर के अन्दर बताये थे। वे भी इसी विषय के बारे में हैं। वे लिंक हैं,

मैंने पिछली चिट्ठी लिखते समय इन सब को देखा था और इन पुस्तकों एवं उपर दिये लिंक का निचोड़ ही अपने शब्दों में पिछली चिट्ठी में लिखा था। शायद मेरे लिये, उससे सरल भाषा में लिखना संभव नहीं है।


अगली बार हम लोग मिलेंगे तब बात करेंगे सृजनवादियों की दूसरी और उनकी मुख्य आपत्ति पर – यानि कि पूर्वजों के बारे में क्या सबूत हैं? कहां है मिसिंग लिंक (missing link)?

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े

भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल – व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।।

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In this post second law of Thermodynamics entropy is explained in context of evolution. This post explains it. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है

सृजनवादियों के अनुसार, विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है। इस चिट्ठी इसी की चर्चा है।

इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,

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सृजनवाद सारे मज़हबों में है। शायद यह इसलिए कि पुराने समय में प्राणियों की उत्पत्ति समझाने के लिए यह सबसे आसान तरीका था। सृजनवाद के अनुसार मनुष्यों की उत्पत्ति किसी विकासवाद से नहीं, पर किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा सृजन किये जाने पर हुई है। लेकिन यदि डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत सही है तब इसमें ईश्वर की, अदृश्य शक्ति की जरूरत नहीं है। यही दोनो में मतभेद है, विरोध है।


डार्विन के सिद्धांत पर मज़हबी लोगों की दो आपत्तियां हैं

  • पहली, यह उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।
  • दूसरी, यदि किसी समय, बन्दर और मनुष्य के पूर्वज एक ही थे तब इस समय वह पूर्वज कहां है, उसके बारे में क्या सबूत है? यह उनकी मुख्य आपत्ति है।

चलिए पहले उनकी आसान यानि की पहली आपत्ति के बारे में बात करें। यह आपत्ति उष्मागति – विज्ञान के दूसरे नियम से संबन्धित है। यह नियम बताता है कि,

‘In any closed system, entropy always increases’
किसी भी बन्द सिस्टम में एंट्रॉपी (उत्क्रम माप) बढ़ती है।

इसका मोटे तौर पर अर्थ यह है;

‘In a closed system, things go from order to disorder’
कोई भी बन्द सिस्टम व्यवस्था से अव्यवस्था की तरफ बढ़ता है।

यह चित्र मेरा नहीं है। मैंने इसे यहां से लिया है।

सृजनवादियों का कहना है कि विकासवाद में प्राणि जगत जीवन के निचले भाग में ऊँचे भाग की तरफ (from lower life form to higher life form) जा रहा है। अर्थात एंट्रॉपी घट रही है। यह नहीं हो सकता है।


सच तो यह है कि यह आपत्ति इस नियम को न समझने की भूल करती है। यह नियम किसी बन्द सिस्टम में ही लागू होता है। यदि कहीं एंट्रोपी घट रही है तो उस सिस्टम में कहीं पर बढ़ रही होगी ताकि पूरे सिस्टम में दोनो का जोड़ बढ़े।

हम सब जानते हैं कि जीवन की उत्पत्ति, इसके विकासवाद, में सूरज के प्रकाश और उष्मा का खास महत्व है। यदि सूरज न होता तो यह जीवन भी नहीं होता। सूरज से प्रकाश और उष्मा, पदार्थ की संहति (mass) का ऊर्जा में बदलने के कारण हो रहा है। इस कारण, वहां एंट्रोपी बढ़ रही है। यह पृथ्वी पर एंट्रोपी में आयी कमी से कहीं अधिक है। इन दोनो का जोड़, उष्मागति के दूसरे सिद्धांत का किसी प्रकार उल्लंघन नहीं करता है।


यह कार्टून मेरा बनाया नहीं है। फ्लोरिडा सिटिज़न फॉर साइंस (Florida Citizen for Science) ने लोगों के बीच विज्ञान को लोकप्रिय बनाने, उसे आसानी से समझाने के लिये स्टिक साइंस कंटेस्ट (Stick Science Contest) किया। यह उसके बेहतरीन दस कार्टूनो में से एक है। मैंने यह वहीं से लिया है।




अगली बार मिलेंगे तब बात करेंगे सृजनवादियों की दूसरी और उनकी मुख्य आपत्ति पर।

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े

भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।।

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According to creationist, evolution violates the second law of Thermodynamics. This post explains it. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं

ताज गार्डन रिट्रीट कुमाराकॉम में मेरी मुलाकात कई लोगों से हुई। इस चिट्ठी में सिख और अंग्रेज दंपत्ति से मुलाकात और महिला सशक्तिकरण के एक दूसरे रुप की चर्चा है।



कुमाराकॉम में, हमारी मुलाकात एक सिख दंपत्ति से भी हुई। वे शिकागो में रहते हैं और अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि वे दादा-दादी बन गये हैं और  भारत घूमने के लिए आये हुए हैं। सिख महिला ने बताया,

‘हम एल्लपी से आये हैं। यह सफर हमने कल रात नाव पर किया।  रात में नाव, झील के बीचो बीच रूक गयी थी। अगले दिन  मैं तो सुबह पांच बजे ही उठ गयी थी लेकिन नाव को चलाने वाले ६:३७ पर उठे। इसलिये चलने में देर हो गयी।’

मैंने उससे पूछा,  

‘उस समय कितने सेकेंड हुए थे।‘

पहले तो उस महिला को मज़ाक समझ में नहीं आया कि मैं यह क्यों पूछ रहा हूं। फिर वह समझ गयी कि उसने ६:३७ मिनट कहा था। इसलिए उससे सेकेंड के बारे में पूछा जा रहा है। वह मुस्कुरा कर बोली,

‘उस वक्त ४२ सेकण्ड हुये थे।‘

हमें लगा कि रात को नाव से चलना ज्यादा रोमांचकारी होता पर हम तो यात्रा शुरू कर चुके थे और अब उसमें बदलाव संभव नहीं था। 

यहां हमारी मुलाकात एक अंग्रेज दंपत्ति से भी हुई। अंग्रेज महिला ने सलवार, कुर्ता पहन रखा था। मैंने उस महिला से कहा कि वे सलवार, कुर्ता में बहुत ही सुन्दर लग रही है। उसने मुस्कुरा कर कहा,

‘मैं १९७२ से लगातार भारत आ रही हूं। यहां  इसी वेषभूषा को पहनना  सुविधाजनक है। आप दूसरे से अलग नहीं लगते और आप इसे पहनकर किसी भी मंदिर में आसानी से जा सकते हैं।‘

मैंने कहा कि क्या लोग आपको देखकर नहीं पहचान पाते हैं क्योंकि आप देखने में भारतीय  नहीं लगती हैं। उसने कहा,

‘ऐसी बात नहीं है। एक बार मैंने साड़ी पहनी थी। लोग मुझे कश्मीरी समझ गये थे। लेकिन जब मैं  चलने लगी तब वह समझ गये कि मैं भारतीय नहीं हूँ क्योंकि मुझे साड़ी पहनकर चलना नहीं आता है।  मैं लम्बे-लम्बे कदम रख रही थी जब कि भारतीय महिलाएं साड़ी पहनकर  छोटे-छोटे कदम लेती हैं।‘



उसके पति ने मुझे बताया कि वह एक एरिक्सन कम्पनी में इंजीनियर थे। अब वे अवकाश प्राप्त हो गये हैं। उन्हें भारत से प्रेम हैं इसलिए वे हर साल यहां आते है। मैं, उनसे   जीएसएम, सीडीएमए तकनीक और मोबाइल फोन के बारे में के बारे में बात करने लगा। थोड़ी देर बाद उनकी पत्नी ने अपने हाथों की हथेली को अजीब तरह से  खोलना और बंद करना शुरू कर दिया मेरी समझ में नही आया कि वह ऐसा क्यों कर रही हैं। लेकिन, उसे  देखकर उनके पति चुप हो गये। महिला ने बताया  कि,

‘हम लोग एक मस्ती के लिए भारत आये हैं इस समय कोई व्यापार या काम की बात नहीं की जा सकती है। जब मेरे पति व्यापार या काम सम्बन्धी बातें करना शुरू कर देते है तो मै उनको इस तरह से इशारा से मना करती हूं। जब इसके बाद भी वह नहीं मानते तब मैं उन्हें पैर से ठोकर देती हूं। तब उनके  समझ में आ जाता है कि इस तरह की बाते नहीं करनी है।‘

 उनके पति ने इसका प्रतिवाद किया,

‘मैं  कोई भी व्यापार या काम की बात नहीं कर रहा था हम तो केवल तकनीक के बारे में सूचना साझा कर रहे थे।‘

 लेकिन उन्होनें इस विषय पर बात करना बंद कर दिया। महिला सशक्तिकरण का एक रूप यह भी है। 

इस श्रंखला की अगली कड़ी में जब हम मिलेंगे तब बात करेंगे ऑस्ट्रेलिया से आयी दो महिलाओं की और महिला सशक्तिकरण के एक और रूप की।

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा

क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे – महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।।

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यात्रा विवरण और महिला अधिकार पर लेख चिट्ठे पर अन्य चिट्ठियां


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We met a Sikh and an English couple at  Taj Garden Retreat at Kumarakom. This post talks about them and different shade of women empowerment. This post talks about one of them. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है

दुनिया की सबसे प्रसिद्ध बहस, विकासवाद के सिद्धान्त के कारण हुई। इस चिट्ठी इसी की चर्चा है।

इस चिट्ठी और इसकी पिछली चिट्ठी को आप एक साथ सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,

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विकासवाद के सिद्धांत ने दुनिया की सबसे प्रसिद्ध बहस को भी जन्म दिया। यह बहस ३० जून, १८६० को, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के संग्रहालय में थॉमस हक्सले और बिशप सैमुअल विलबफोर्स  के बीच हुई। बिशप सैमुअल, डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत के विरोधी  और हक्सले समर्थक थे। 

 बिशप सैमुअल विलबफोर्स


बिशप सैमुअल बहुत अच्छा बोलते थे।  वे सोचते थे कि यह बहुत अच्छा तरीका है कि जब डार्विन के विकासवाद को सिद्धांत हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है। इस बहस में क्या बोला गया इसका रिकार्ड तो उपलब्ध नहीं है पर कहा जाता है कि  बिशप ने  हक्सले से  प्रश्न पूछा,


‘आप अपने को अपनी माता की तरफ अथवा पिता की तरफ से बंदरो का वंशज कहलाना पसन्द करेंगे।’



हक्सले ने सोचा,  ईश्वर ने ही बिशप को मेरे हाथ में सौंप दिया है उसने जवाब दिया,

‘If..the question is put to me, would I rather have a miserable ape for a grandfather or a may highly endowed by nature and possessed of great means  of influence, and yet who employs these faculties and that influence for the mere purpose of introducing ridicule into a grave scientific discussion… I unhesitatingly affirm my preference for the ape.’


यदि मुझसे यह प्रश्न पूछा जाए कि क्या मैं बन्दरों से नाता जोड़ना चाहूँगा या ऐसे व्यक्ति से जो  शक्तिशाली है, महत्वपूर्ण है, और वह वैज्ञानिक तथ्यों को मज़ाक के रूप में लेना चाहता है तो ऐसे व्यक्ति की जगह, मैं बन्दरों से रिश्ता जोड़ना चाहूँगा।

 थॉमस हक्सले

प्रबुद्व लोगों के बीच यह बहस तभी समाप्त हो गयी जब हक्सले ने इसका उत्तर दिया। 

लेकिन कुछ लोग, सृजनवादी इसे मानने से इंकार करते हैं।  इन लोगों की विकासवाद पर क्या आपत्ति है? उसमें क्या कोई गुणवत्ता है? इस सब की चर्चा, इस श्रंखला की अगली कड़ी में।

डार्विन के जीवन में कुछ पड़ाव-एक नजर
१२ फरवरी, १८०९
श्रेस्बरी (Shresbury) में जन्म।
१८१७
आठ वर्ष की उम्र में, माँ की मृत्यु।
१८१७-१८२५
डार्विन ने विभिन्न स्कूलों में औसत श्रेणी के विद्यार्थी के रूप में अध्ययन किया।
१८२५
१६ वर्ष की उम्र में, चिकित्सा की पढ़ाई शुरू की।
१८२७
चिकित्सा की पढ़ाई रास न आने पर, पिता के सुझाव पर, डार्विन ने आध्यात्मविद्या (Theology) की पढ़ायी शुरू कर पादरी बनने की सोची। लेकिन उसकी रूचि प्राकृतिक इतिहास की ओर थी। उसने वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर जान हेंसलॉ (John Henslow) के आधीन कार्य किया।
१८३१- १८३६
एचएमएस बीगल में प्राकृतिक विशेषज्ञ के तौर पर समुद्र यात्रा की।
१८३७
डार्विन को रहस्यमयी बीमारी ने पकड़ लिया। इसने डार्विन को अगले चालीस वर्षों तक जकड़े रखा। इस कारण उसे महीनों पूर्ण रूप से आराम करना पड़ा।
१८३८
थामस मैलथुस (Thomus Malthus) की पुस्तक, ऎसे आन द प्रिंसिपल्स् आफ पॉप्युलेशन (Essay on the principals of population) पढ़ने के बाद डार्विन, के मन में प्राकृतिक चुनाव (Natural selection) के विचार को दृढ़ किया।
१८३९
ऎमा वेवुड (Emma Wedgwood) के साथ शादी।
१८३९
समुद्री यात्रा पर, उसकी पुस्तक द वॉयज ऑफ बीगल (The voyage of the Beagle) प्रकाशित हुई।
१८ जून, १८५८
अल्फ्रेड रसल वॉलेस का पत्र मिला, जिसमें प्राणियों की उत्पत्ति के बारे में वही सिद्वान्त लिखा था जैसा कि डार्विन सोचते थे।
१ जुलाई, १८५८
वॉलेस तथा डार्विन के संयुक्त नाम से, लन्दन की लीनियिन सोसायटी में पेपर प्रस्तुत किया गया।
२४ नवम्बर, १८५९
डार्विन की पुस्तक ऑन द ओरिजिन आफ स्पीशीज़ (On the Origin of Species) प्रकाशित हुई।
३० जून, १८६०
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के संग्रहालय में थॉमस हक्सले और बिशप सैमुअल विलबफोर्स के बीच बहस।
१८६८-१८७२
उनकी अन्य पुस्तकें प्रकाशित हुई।
१९ अप्रैल, १८८२
डार्विन की मृत्यु।
डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े

भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।।

इस चिट्ठी के सारे चित्र विकिपीडिया से हैं।

About this post in Hindi-Roman and English

vikasvaad ne duniyaa kee sabase prasidh bahas ko bhee janam diya. is chitthi mein usee kee  charchaa hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

Most famous debate in the World took place because of ‘The origin of Species’ This posts talks about the same. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक चिन्ह

Bishop Samuel Wilberforce, Thomas Huxley,

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पुरुष बच्चों को देखे – महिलाएं मौज मस्ती करें

ताज गार्डन रिट्रीट कुमाराकॉम में महिला सशक्तिकरण के कई रुप देखने को मिले। इस चिट्ठी में उनमें से एक रूप की चर्चा है।


सुबह के समय अप्रवाही जल से कुमाराकॉम का दृश्य
ताज गार्डन रिट्रीट होटल पहुंचते ही हमारा स्वागत नारियल की माला पहनाकर किया गया। एक ताजा नारियल, जल पीने के लिए दिया गया। उस समय वहां तीन युवतियां भी आयी। वे भी वहीं ठहरी हुई थीं। हमें देखकर उन्होंने कहा कि हमारा ऐसा स्वागत क्यों नहीं हुआ। स्वागत कक्ष में बैठी युवती कुछ परेशानी में पड़ गयी। मैने उसके बचाव में कहा,

‘हम दोपहर को आये हैं, गर्मी है- इसलिये हमारा इस तरह से स्वागत हुआ है।’

उसमें से एक युवती ने कहा,

‘हम भी कल दोपहर को आयें थे फिर भी हमारा इस तरह से स्वागत नहीं हुआ।’

मैंने बात टालने के लिये कहा,

‘अरे, मुझे यह मालूम होता तो कोई और बहाना बनाता।‘

वे मतलब समझ गयी। इस बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।


इन महिलाओं को जब पता चला कि हम उत्तर भारत से हैं तो उनमें से एक बोली,

‘क्या आप सक्सेना है। मेरे पति भी सक्सेना है, और वहीं से है। लगता है कि सक्सेना लोग वहीं पाये जाते हैं।‘

मैंने कहा,

‘सक्सेना, कायस्थ होते हैं और उत्तर भारत में शायद ज्यादा तादाद में हैं इसलिये आपको ऐसा लगता है पर मैं सक्सेना नहीं हूं।‘



यह तीनों अपने तीस के या फिर चालीस के दशक में थी। इनसे बात करने पर पता चला कि यह बम्बई से आयी हैं और विज्ञापन कम्पनी में काम करती हैं।

इन तीनों के साथ इनका परिवार नहीं था। वे अपने पतियों और परिवार को छोड़कर सहेलियों के साथ मस्ती मारने आयी थीं। मुझे यह बात कुछ अजीब लगी।

परिवार के बारे में पूछने पर बताया बच्चों के स्कूल हैं, पति काम पर हैं और बच्चों की देखभाल भी कर रहे हैं। इस कारण उनके परिवार उनके साथ नहीं आ सके।

यह महिलायें ज्यादा समय अपने कॉटेज़ में रहती थीं। मैं भी वहां की शान्ति और सुन्दरता में इतना व्यस्त रहा कि इनके चित्र नहीं खींच पाया। इसलिये पोस्ट नहीं कर पा रहा हूं।

होटेल में श्यनकक्ष के अन्दर


महिला सशक्तिकरण का यह रूप भी देखा – पुरुष काम के साथ बच्चों को देखे और महिलाएं अपनी सहेलियों के साथ मस्ती करें :-)

मैं आज तक, कभी भी अपने परिवार को छोड़कर, मौज मस्ती मारने नहीं गया। जब भी गया मेरा परिवार मेरे साथ रहा। ऐसे मौकों पर, जब तक मेरी मां जीवित रहीं, वे भी हमारे साथ रहती थीं। मेरे विचार से, ऐसे मौकों पर अगली पीढ़ी को साथ रखना चाहिये। इससे न केवल, वे बहुत कुछ सीखते हैं पर परिवार में संबन्ध भी प्रगाढ़ होते हैं।

लेकिन, यह भी सच है कि कभी-कभी, केवल मित्रों के साथ मस्ती मारने का अलग मज़ा है।

अगली बार मुलाकात करेंगे एक अंग्रेज दंपत्ति से और देखेंगे महिला सशक्तिकरण का एक दूसरा रूप।

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा

क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे – महिलाएं मौज मस्ती करें।

हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
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  • Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
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बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें।
यात्रा विवरण और महिला अधिकार पर लेख चिट्ठे पर अन्य चिट्ठियां


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hum log kumarakom mein taj garden retreat hotel mein tthahre the. vhan mahilasashktikarn ke kai roop dekhne ko mile. is chitthi mein, uske ek roop kee charcha hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.


We had stayed in Taj Garden Retreat at Kumarakom. We saw different shades of women empowerment. This post talks about one of them. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
Kumarakom, Taj Garden Retreat, कुमाराकॉम, कानून, सूचना , , ,

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मुझे फिर कभी ग़ुलामों के देश में न जाना पड़े

इस चिट्ठी में चर्चा का विषय है डार्विन का व्यक्तित्व और उसे १८ जून १८५८ को मिला पत्र।
इस चिट्ठी और इसकी अगली चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
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सुन सकते हैं। ऑडियो फाइल पर चटका लगायें। यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम लिखा है वहां चटका लगायें। इन्हें डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर ले।

डार्विन को १८ जून १८५८ को मिला पत्र, अल्फ्रेड रसल वॉलेस ने लिखा था। वॉलेस ने अपने पत्र में, प्राणियों की उत्पत्ति के बारे में उसी सिद्धांत को लिखा था जिस पर डार्विन स्वयं पहुँचे थे। लेकिन, वॉलेस के पास, इसके लिए तथ्य नहीं थे। इस सिद्धांत को विश्वसनीयता का जामा पहनाने के लिए, तथ्य डार्विन के ही पास थे। १ जुलाई १८५८ को, डार्विन और वॉलेस के संयुक्त नाम से, एक पेपर लंदन की लिनियन सोसाइटी में पढ़ा गया। इस पेपर में इस सिद्धांत की व्याख्या की गयी थी। मोटे तौर पर यह बताता है,

‘Evolution is result of chance mutation and natural selection, where survival of the fittest played crucial role.’
प्राणी जगत का विकास संयोगिक उत्तपरिर्वन, प्राकृतिक वरण, और योग्यतम की उत्तर जीविका पर आधारित है।


अल्फ्रेड रसल वॉलेस

डार्विन बेहतरीन व्यक्तित्व के भी मालिक थे डार्विन के लिए यह आसान था कि वह वॉलेस का पत्र छिपा जाते और तथ्यों के साथ सिद्धांत को अपने नाम से प्रकाशित कर देते। लेकिन उन्होंने ऐसा नही किया।


डार्विन के विचार गुलामी के भी विरूद्ध थे जबकि बीगल के कप्तान फिट्ज़रॉय की राय में यह गलत नहीं था। वे इसकी सफाई देते थे। फिट्ज़रॉय के इन विचारों के लिये, डार्विन ने उसकी निन्दा भी की। इसके कारण बीगल से उसकी नौकरी जाते, जाते बची। ब्राज़ील में उन्हें वहां के जंगलों की सुंदरता तो भायी पर गुलामी ने दुखी किया। वहां से निकलने के बाद डार्विन ने कहा,

‘I thank God I shall never again visit a slave country ‘

मैं भगवान को धन्यवाद दूँगा कि मुझे फिर कभी ग़ुलामों के देश में न जाना पड़े।


डार्विन का सिद्धांत इतना क्रांतिकारी था कि ऑन द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़ पुस्तक के पहले प्रकाशन की सारी पुस्तकें, प्रकाशन के चौबीस घण्टे के अन्दर ही बिक गयीं। यह एक ऐसा रिकार्ड है जिसे अभी तक किसी अन्य पुस्तक ने नही बनाया और न ही इसे शायद कभी बराबर किया जा सकेगा। हांलाकि डार्विन ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि इस पुस्तक का प्रकाशन नहीं पर बीगल पर दुनिया की यात्रा करना ही उसके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। सच तो यह है कि इसी घटना के कारण तो ही वह विकासवाद के सिद्धांत को समझ पाये और उसके लिये सबूत इकट्ठा कर पाये।


पहले प्रकाशन के समय इस पुस्तक का नाम ‘ऑन द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़’ (On the Origin of Species) था। उस समय इसका पूरा नाम था – ‘On the Origin of Species by Means of Natural Selection, or the Preservation of Favoured Races in the Struggle for Life’. इस पुस्तक का छटवां प्रकाशन १८७२ में हुआ। उस समय इसका नाम छोटा कर ‘द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़’ कर दिया गया।

ऑन द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़ पुस्तक के पहले प्रकाशन की पुस्तक का पहला पन्ना

पुस्तक का पहला प्रकाशन १४ नवंबर १८५८ को हुआ था। इसकी १२५० कॉपियां प्रिन्ट की गयी थीं। इसकी अधिकतर कॉपियां नष्ट हो गयी हैं। लेकिन बची हुई सारी कॉपियां संसार की धरोहर हैं और वे बहुत मूल्यवान हैं। पिछले साल, इस तरह की एक पुस्तक की नीलामी १,९४,५०० डॉलर में हुई थी।

आप सोचने लगे न कि कहीं आपके पास की कॉपी पहली प्रकाशित पुस्तक तो नहीं है। यह पता करना आसान है। अपने पुस्तक के पृष्ट २० पर ११वीं पंक्ति देखिये। क्या इस पंक्ति में शब्द ‘species’ गलत तरीके से ‘speceies’ वर्तनी के साथ लिखा है। यदि इसका जवाब हां है तो फिर आपको बधाई – आप करोड़पति हो गये।

मेरी कॉपी तो ऐसी नहीं है :-( चलिये इस श्रंखला में जब अगली बार मिलेगें तब चर्चा करेंगे उस प्रसिद्ध बहस की जिसे विकासवाद के सिद्धांत ने जन्म दिया। यह बहस दुनिया की सबसे प्रसिद्ध बहस भी मानी जाती है। क्या थी वह बहस, किसके बीच में थी वह – यह सब अगली बार।


विकासवाद को आसानी से समझने के लिये आप अंग्रेजी में यह विडियो भी देख सकते हैं। मैंने इसे साइंस इज़ सेक्सी: वॉट इज़ रिवोलूशन (Science is Sexy: What is Evolution?) नामक लेख से लिया है।

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े

भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलामों के देश में न जाना पड़े।। मैं, ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से नाता जोड़ना चाहूँगा।।

इस चिट्ठी के सारे चित्र विकिपीडिया से हैं।

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is chitthi mein darwin ke vyktitva aur use 18 june 1858 ko mile patra kee charchaa hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post talks about the letter received by Darwin on 18 June 1858 and his personality. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
ज़ेमेन्टा के द्वारा बताये गये संबन्धित ले

सांकेतिक चिन्ह

Alfred Russel Wallace, Linnean society, Robert FitzRoy,

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bible, Bible, Charles Darwin, चार्लस् डार्विन, culture, Family, fiction, life, Life, On the Origin of Species, Religion, Science, spiritual, जीवन शैली, धर्म, धर्म- अध्यात्म, विज्ञान, समाज, ज्ञान विज्ञान,

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साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं

केरल यात्रा के दौरान हम कुमाराकॉम गये थे। यहां हम लोग ताज गार्डेन रिट्रीट में ठहरे थे। यह चिट्टी इसी के बारे में है।


हम लोग दोपहर के भोजन के समय कुमाराकॉम पहुंचे। यहां हमें ताज गार्डन रिट्रीट (Taj Garden Retreat) होटल में एक रात रूकना था।

सुबह, झील से, होटेल का दृश्य

ताज गार्डन रिट्रीट होटल मुझे बहुत सुन्दर और शान्त लगा। यहां पहले बेकर परिवार रहा करता था इसलिये इसे बेकर हाउस के नाम से जाना जाता था। केरल में, बेकर परिवार ने शिक्षा क्षेत्र में काम किया है। इनके परिवार का आखिरी सदस्य १९६२ में भारत छोड़कर चला गया और इसे १९७७ में बेच दिया। १९९२ में इसे ताज ग्रुप ने ले लिया।

यह लगभग १५ हेक्टेयर में स्थित है इसके बीचो बीच एक झील है। मन किया कि यहां कुछ दिन रुककर पुस्तकों का अध्ययन करूं, कुछ लिखूं। इस होटेल में एक जगह पुस्तकें रखीं थी। आप उन्हें कहीं पर बैठ कर पढ़ सकते थे। पूरे होटल में वाई-फाई (wi-fi) है। आप जहां चाहें वहां बैठ कर अपने लैपटॉप से काम कर सकते हैं, अन्तरजाल पर जा सकते हैं।

हम होटेल की इसी कॉटेज में रुके थे

हम लोगों को जब मालूम चला था कि एक रात हमें ताज रिट्रीट गार्डन में ठहरना है तब हमने इसके बारे में अन्तरजाल में देखा था। हमें वहां इसकी कुछ समीक्षाएं अच्छी नहीं थी। इसलिए हम घबरा रहे थे पर यह न केवल बेहतरीन होटल है पर यहां कि सेवा भी अति उत्तम है। मुझे दुख हुआ कि मैंने वहां केवल एक रात ही रूकने का क्यों प्रोग्राम बनाया।

बेकर पिरवार जिस भाग में रहता था इस समय वह होटल का मुख्य भाग था। इसमें उनके हेरीटॅज़ कमरे थे। बाद में इसमें जगह जगह कॉटेज बना दिये गये हैं। वहां पहुंच कर हमें बताया कि यहां भी हमें अपग्रेड कर दिया गया है इसका कारण वही बताया गया जो कि ताज मालाबार होटेल में दिया गया था


हम जिस कॉटेज़ में ठहरे थे वह सुन्दर थी इसका बाथरूम अनूठा सा था। इसका कुछ भाग ऊपर से खुला था और उसके ऊपर जाल पड़ा था। वहां पर उसे प्रयोग करने पर लगता था कि हम खुली जगह पर हैं पर वह था, प्राइवेट।


वहां बहुत सी साइकलें रखी थीं मैने स्वागत कक्ष में बैठी महिला से पूछा कि यह यहां क्यों रखी हैं। उसने कहा,

‘हमारा होटल बहुत फैला है। हमने यह साइकलें हमारे यहां ठहरने वाले मेहमानो के लिये रखी हैं। ताकि वे इसका प्रयोग कर एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिये करें।’

मैंने वहां काफी साइकिल चलायी। होटेल के अन्दर आप जहां चाहें वहां साइकिल छोड़ सकते थे या कहीं भी रखी साइकिल को ले सकते थे। रात के समय होटेल वाले साइकिलों को वापस एक जगह पर रखते थे।

वहां कुछ साइकिलों के टायर पतले थे और कुछ के मोटे। पतले टायरों की साइकिल चलाने में मुश्किल पड़ी। लगता था कि वह इधर उधर भाग रही है। मुझे लगा कि कहीं मैं झील में न गिर जाऊँ। मोटे टायर वाली साइकिल चलाने में ज्यादा दम लगती थी।

मैंने न केवल बचपन में पर बाद के जीवन में काफी साइकिल चलायी है। हम अक्सर मित्रों से मिलने साइकिल पर जाया करते थे पर बाद में मुन्ने की मां को साइकिल चलाने में तकलीफ होने लगी तब साइकिल चलाना छोड़ दिया। मैंने जिन साइकलों को चलाया है उनके टायर इन दोनो के बीच के होते थे। वे ही बेहतर थे।

आजकल मैंने पुन: साइकिल चलाना शुरू किया है। मेरी साइकिल में बीच के ही टायर हैं। मैं, आजकल इतवार को सुबह लगभग १५-२० किलोमीटर चलाता हूं और सप्ताह में प्रयत्न करता हूं कि सारे काम साइकिल में ही करूं। पेट्रोल भी बचा और वातावरण भी दूषित नहीं हुआ। हांलाकि भीड़ के कारण सब जगह साइकिल पर नहीं जाया जा सकता है।

इस होटेल में मेरी मुलाकात कई लोगों से हुई। वहां मुझे महिला सशक्तिकरण का नया रूप देखने को मिला। इस श्रंखला की अगली कुछ कड़ियों में उसी के बारे में।

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा

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यह ऑडियो फइलें ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप -
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यात्रा विवरण से संबन्धित लेख चिट्ठे पर अन्य चिट्ठियां


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इंटरनेट (अन्तरजाल) का प्रयोग – मौलिक अधिकार है

yeh chitthi French Constitutional council ke dvaara three strike kanoon ke khilaaf diye gaye phasle ke baare mein hai.
This post is about the decision of French Constitutional council holding three strike law as illegal.
यह चिट्ठी फ्रांस के कॉन्स्टिट्यूशनल काउंसिल के द्वारा थ्री स्ट्राइक कानून के खिलाफ दिये गये फैसले के बारे में है।

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