10/30/09

हम तो पूरी दिल्ली में बदनाम हैं

मुझे दिल्ली में एक अच्छी पुस्तक दुकान की तलाश थी। इस बार वह मिल गयी। इस चिट्ठी में उसी की चर्चा है।

मुन्ने की मां के अनुसार मेरे तीन प्यार में से, एक  प्यार पुस्तकों से है। यह सच है, वे मेरी सबसे प्रिय मित्र हैं। हांलाकि, जबसे अन्तरजाल का चस्का लगा, तब से कुछ समय अन्तरजाल पर भी बीतता  है। जाहिर है पुस्तकों के लिये समय कम हो गया। मैं बाहर जाते समय,  पुस्तकों की जगह लैपटॉप ले जाने लगा। देव भूमि हिमाचल की यात्रा पर जाते समय मैंने तय कर लिया था कि लैपटॉप नहीं केवल पुस्तकें ले जाउंगा।  यात्रा में, पढ़ने के लिये चार पुस्तकें ले गया था। यह  अलग अलग विषय पर थीं।


  • पहली, फ्रीमन डाइसन की 'द सन, जनोम, एण्ड द इंटरनेट' (The Sun, Genome and the Internet by Freeman J Dyson) थी। यह  विज्ञान और तकनीक से संबन्धित है;
  • दूसरी, मैनेजमेन्ट से संबन्धित शू शिन ली की 'बिज़िनस द सोनी वे' (Business the Sony Way by Shu Shin Luh) थी;
  • तीसरी, मेरी प्रिय लेखिका आशापूर्णा देवी की हिन्दी उपन्यास 'प्रारब्ध' थी; और
  • चौथी, कानून से संबन्धित, सदाकान्त कादरी की 'ट्रायल' (Trial by Sadakant kadri)।
इसमें में पहली तीन पढ़ पाया पर चौथी पूरी नहीं। आने वाले समय में, इन पुस्तकों की भी चर्चा करूंगा।

यात्रा के बाद, मुझे लगा कि केवल पुस्तकें ले जाना ठीक था - कम से कम तीन तो पढ़ लीं। लैपटॉप न रहने के कारण भी कुछ अनुभव भी हुऐ। यह हिमाचल यात्रा संस्मरण के दौरान लिखूंगा। 


दूसरे शहर में, पुस्तकों की दुकान जाना, मेरा पसंदीदा शौक है। हैदराबाद में पुस्तक की दुकान में झुंझलाहट लगी। दिल्ली और लखनऊ में पुस्तकों की दुकान के बारे में, मार्टिन गार्डनर की पुस्तकों के बारे में जिक्र करते समय किया।  बुकवर्म के बन्द हो जाने के बाद मैं टैक्सन जाने लगा पर वहां का अनुभव अच्छा नहीं रहा। लेकिन दिल्ली में मेरे ठिकाने के  सबसे पास टैक्सन की ही दुकान है इसलिये वहीं जाता हूं। हिमाचल यात्रा के बाद, दिल्ली में रुकते समय वहां गया था।

इस बार टैक्सन में युवतियां बात तो नहीं कर रहीं थीं पर एक सज्जन जोर जोर से मोबाइल पर पुस्तकों के ऑर्डर के बारे में बात कर रहे थे। समय की कोई पाबंदी नहीं रही होगी क्योंकि जब तक मैं वहां था वे बात करते रहे। मैंने टैक्सन से, पांच पुस्तकें ली। अब लैपटॉप न रहने के कारण अन्तरजाल पर तो भ्रमण करना था इसलिये साइबर कैफे की तलाश, में चल दिया -  कभी बायें तो कभी दायें। वहीं पर एक अन्य पुस्तक की दुकान  बेसमेन्ट में दिखायी पड़ी। कभी उस तरफ गया नहीं था, इसलिये इस पर कभी नजर नहीं पड़ी थी।  सोचा चलो इसको देखा जाय, साइबर कैफे को बाद ढ़ूँढ़ा जायगा।  

इस पुस्तक दुकान का नाम मिडलैण्ड बुक शॉप था। यह  जी-८ (बेसमेन्ट) साउथ एक्सटेंशन पार्ट-१, नयी दिल्ली में है। इसमें ज्यादा पुस्तकें दिखीं पर वे अस्त-वयस्त थी। मैंने जो पुस्तकें टैक्सन में खरीदी थीं वे सारी वहां थीं पर उसके साथ बहुत सारी वे भी थीं जो टैक्सन में नहीं थीं। मुझे लगा कि पुस्तकों के मामले में यह बेहतर दुकान है। यहां पर भी मैंने चार अन्य पुस्तकें लीं। मैंने इसके मालिक से कहा,
'आपके यहां बहुत पुस्तकें हैं। इनका सेल क्यों नहीं लगा लेते ताकि पुस्तकें ठीक से लगायी जा सके और पुस्तकें ढूढ़ने में सुविधा रहे।'
उसने कहा,
'मुझे पुस्तकों से प्यार है। मैं नहीं चाहता कि कोई ग्राहक पुस्तक लेने आये और हम उसे दे न सकें। इसलिये हमारी दुकान में अधिक पुस्तकें हैं। हम रोज़ एक अलमारी ठीक करते हैं लेकिन जब तक उस पर वापस आते हैं उसकी पुस्तकें पुनः अस्त-वयस्त हो जाती हैं।'

मैंने उससे बिल बनवाया तो लगभग २५०० रुपये का आया। उसने उस पर मुझे २०% कम कर दिया। मेरे कस्बे का दुकान वाला जहां मैं लगभग १५ दिन में, एक बार पहुंच जाता हूं २०% तो क्या १०% भी कम नहीं करता। यहां तो मैं पहली बार गया था। मैंने उसे पैसे कम करने के लिये भी नहीं कहा था उसने फिर भी कर दिया।   मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे धन्यवाद दिया तो उसने मुस्कुराते हुऐ कहा, 
'इस बात के लिये तो हम दिल्ली के दुकान पुस्तक के मालिकों के बीच बदनाम हैं।'
उसने यह भी बताया,
'हमारी एक अन्य दुकान इसी नाम से २०, ऑरोबिन्दो प्लेस् हॉज़ खास नयी दिल्ली में और न्यू बुक लैण्ड नाम से इंडियन ऑयल भवन जनपथ नयी दिल्ली में भी है। आप को वहां भी कम दाम में पुस्तक मिलेगी।'
दिल्ली में मुझे, मिडलैण्ड बुक शॉप के रूप में, अच्छी पुस्तक की दुकान मिल गयी है। यदि आप कभी इस दुकान पर जायें और वहां किसी ग्राहक को दुकानदार या वहां खरीदने वालों से बात करते देखें तो समझ लीजियेगा कि वह कौन व्यक्ति है।
'उन्मुक्त जी यह तो बताईये कि साउथ एक्सटेंशन में कोई साइबर कैफ़े मिला? क्या आप अन्तरजाल पर जा पाये?'
हां जा तो पाया पर नानी याद आ गयी। उसके बारे में फिर कभी।


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I wanted to find out good book stall in Delhi. In this trip, I found one. This post talks about it. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.



सांकेतिक शब्द


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10/21/09

मुझे, केवल कुमारी कन्या ही मार सके

कन्याकुमारी जाते समय हमें मालुम चला कि इसे कन्याकुमारी क्यों कहते हैं। इस चिट्ठी में इसी की चर्चा है।

एक दिन हम लोग त्रिवेन्द्रम से कन्याकुमारी के लिये चले। कन्याकुमारी पहुंचने में लगभग ढाई घन्टे का समय लगता है। रास्ते में, एक टूरिस्ट गाइड खरीदी। इसमें कन्याकुमारी का यह नाम क्यों पड़ा, इसकी कथा इस तरह से बतायी गयी है।  

कहा जाता है कि बाणासुर नामक दैत्यों का राजा था उसने ब्रह्मा जी की पूजा कर उनसे अमृत देने का वर मांगा। ब्रह्माजी ने कहा,
'अमृत तो नहीं मिल सकता है पर जिस तरह से तुम अपनी मृत्यु  चाहते हो वह मांग सकते हो।‘
इस पर उसने कुमारी कन्या से ही मृत्यु मांगी। वह सोचता था कि कोई भी कुमारी कन्या उसे नहीं मार सकती है। 

इसके पश्चात बाणासुर, देवताओं को तंग करने लगा। तंग होकर, देवताओं ने भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी से सहायता की गुहार लगायी।  उन्होंने उन्हें पराशक्ति, जो कि देवी पार्वती का ही एक रूप हैं, की पूजा करने को कहा। ब्रह्मा जी के वर के कारण वे ही बाणासुर से मुक्ति दिला सकती थीं। देवताओं की पूजा  से प्रसन्न हो कर, देवी पराशक्ति ने, बाणासुर को मारने का वायदा किया। उन्होंने कुमारी  कन्या के रूप में जन्म लिया। 

कन्याकुमारी में विवेकानन्द रॉक मेमोरियल से समुद्र का दृश्य

पराशक्ति हमेशा शिव जी के साथ ही रहना चाहती हैं। इसलिये   समुद्र में एक चट्टान पर एक टांग से खड़े होकर, उन्होंने शिव जी की पूजा की। शिव जी ने उससे प्रसन्न होकर वर मांगने का कहा। उन्होंने शिवजी को  वर के रूप में प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। शिव जी ने उन्हे इसका वायदा कर दिया लेकिन देवता यह नहीं चाहते थे। क्योंकि, यदि वह शादी कर लेती तो वे कुमारी नहीं रहती और तब बाणासुर का वध नहीं हो पाता। देवताओं ने, नारद जी को अपनी दुविधा बतायी। नारद जी ने शिवजी से कहा,
‘भगवन आपकी शादी का शुभ मुहूर्त सुबह के पहले है। इसलिए वह सुबह के पहले ही शादी करें।‘
शिवजी अपनी बारात लेकर सुचीन्द्रम नामक जगह पर रूके। सुबह के पूर्व उनके बारात लेकर शादी के लिए निकलने के पहले ही, नारद जी ने मुर्गे का रूप धारण करके बांग देना शुरू कर दिया। जिससे उन्हें लगा कि सुबह हो गयी है और महूर्त नहीं रहा। इसलिए  वे शादी के लिए नहीं गये। 

कहा जाता है कि  कुमारी कन्या की जब शादी नहीं हो पायी तो उसके सारे गहने और जेवरात रंग बिरंगे पत्थरों में बदल गये, जो कि इस समय भी कन्याकुमारी के समुद्र तट पाये जाते हैं। 


बाणासुर को, कुमारी कन्या की सुंदरता के बारे में पता चला। उसने उनसे शादी करने की इच्छा प्रकट की जिसे, उन्होंने मना कर दिया। बाणासुर, उन्हें बलपूर्वक  जीतकर उनसे शादी करनी चाही। इस पर दोनो के बीच युद्घ हुआ और बाणासुर मारा गया । इस तरह से उस अत्याचारी की मृत्यु हुयी। इसलिये इस जगह का नाम कन्याकुमारी पड़ा। 



इस कहानी में मुझे कुछ संशय लगता है। जहां तक मुझे मालुम है बाणासुर बालि का पुत्र था और भगवान शिव का भक्त। उसने वर के रूप में ऐसे योद्दा से युद्ध करने की इच्छा प्रगट की थी जो उसे हरा सके। उसे भगवान कृष्ण ने पराजित किया। बाद में वह हिमालय में भगवान शिव की तपस्या करने चला गया।  मुझे कन्याकुमारी में बाणासुर की कथा, महिसासुर और देवी दुर्गा कहानी का दूसरा रूप लगता है।




सुचीन्द्रम में, सुचीन्द्र मन्दिर है। यह शिव जी का मंदिर है हालांकि इसमें ब्रम्हा और विष्णु जी की भी मूर्ति  है।  यहां पर गणेश जी की पत्नी की भी मूर्ति है।

सुचीन्द्र मन्दिर का चित्र विकिपीडिया से

कहा जाता है जिस चट्टान पर एक टांग से खड़े होकर  कुमारी कन्या ने अपनी पूजा की,  वहां पर उसका एक निशान बना हुआ है। स्वामी विवेकानंद उस निशान को देखने के लिए वहां गये जिससे  उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी  चट्टान पर  विवेकानंद रॉक मेमोरियल बना हुआ है। यह जगह देखने लायक है। कन्याकुमारी में, देवी कुमारी मन्दिर भी है।

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा
 क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे - महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।। पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं।। कुमाराकॉम पक्षीशाला में।। क्या खांयेगे - बीफ बिरयानी, बीफ आमलेट या बीफ कटलेट।। आखिरकार, हमें प्राइवेट और सरकारी होटल में अन्तर समझ में आया।। भारत में समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं न की निजी।। रात के खाने पर, सिलविया गुस्से में थी।। मुझे, केवल कुमारी कन्या ही मार सके।।

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सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
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  • Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
  • Linux पर सभी प्रोग्रामो में – सुन सकते हैं।
बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें।






यात्रा विवरण पर लेख चिट्ठे पर अन्य चिट्ठियां



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On our way to Kanyakumari, we came to know why is this place so named. This post explains it. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
Kanyakumari, Suchindram,
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Hindi, हिन्दी,
10/19/09

दीवार तोड़ो, दिल जोड़ो: बर्लिन की यात्रा

इस चिट्ठी में मेरी बर्लिन यात्रा का वर्णन है।

वर्ष २००७ में, मुझे बर्लिन जाने का मौका मिला। भारत से बर्लिन के लिये, कोई भी सीधी हवाई जहाज की उड़ान नहीं है। मैंने बर्लिन जाने के लिये, वियाना होते हुए टिकट लिया। मैंने लौटते समय दो दिन वियना में रहने का प्रोग्राम बनाया। मुझे लगा कि इससे अच्छा मौका, इन दोनो जगहों को देखने का नहीं मिलेगा।

जर्मनी और ऑस्ट्रिया दोनो जगह जर्मन भाषा बोली जाती है। इसलिये मैंने जर्मन भाषा के सीखने की बात सोची। इसके लिये मैंने दो पुस्तकें लीः

  • पहली है Learn German in a Month (Readwell Publication New Delhi); और
  • दूसरी है German in your pocket (Aureole Publishing, Noida)।

पहली पुस्तक का फायदा यह है कि इसमें शब्द देवनागरी में भी हैं जिससे उच्चारण ठीक से समझ में आते हैं। दूसरी का फायदा यह है कि यह छोटी है और आपकी जेब में आ जाती है।

मैंने जर्मन भाषा सीखने की सीडी भी सुनी यह हॉरर एजूकेशन लिमिटेड के द्वारा बनायी गयी है और अच्छी है इसमे सुनने में शब्दों के उच्चारण समझ में आये। जर्मन भाषा सीखने के लिये अन्तरजाल पर भी सहायता मिली

मैं जर्मन भाषा तो पूरी तरह नहीं सीख पाया। इसके लिये कुछ और समय चाहिये था पर कुछ सामान्य जर्मन शब्द इस प्रकार हैं। इन शब्दों की वहां जरूरत पड़ी और इसका फायदा हुआ।

अंग्रेजी में जर्मन भाषा में
जर्मन शब्दों का उच्चारण
Bye! See you later. (casual) Tschüs! ट्यूस्
Can you help me? Können Sie mir helfen? कॉनेन सिआ हेलफ्न
Fine, thanks. Danke, gut. डांकॅ गुट
Gentleman Herr हेर
Good गुट
Good Afternoon, Good day, Hello! – Hi! Guten Tag! – Tag! गुटन टाग
Good evening! Guten Abend! गुटेन आबेन्ड
Good morning! – Morning! Guten Morgen! – Morgen! गुटन मॉरनेन
Good night! Gute Nacht! गुट नाक्ट
Good-bye, Auf Wiedersehen. ऑउफ वीडरसेहन
Great, Very good Sehr gut. सेर गुट
How are you? Wie geht es Ihnen? वि गी इस इहनन
How are you? (familiar, informal) Wie geht’s?
I am sorry एन्ट शुलडिगन
I don’t understand German एक फसते हे काइन डॉइच (जर्मन)
I would like… Ich möchte… इश मश्तय्
Lady Dame डामे
May I? Darf ich? डार्फ इश
No thanks! Nein, danke! नाइन डान्कॅ
Not so well. Nicht so gut. नित्स सो गुट
Please! – Yes, please! Bitte! – Ja, bitte! बिटॅ
Thank you! Danke schön! डान्कॅ शॉन
Thanks a lot! – Many thanks! Vielen Dank! फिलेन डान्कॅ

Thanks! – No thanks!

Note: “Danke!” in response to an offer usually means “No thanks!” If you want to indicate a positive response to an offer, say “Bitte!”

Danke! डान्कॅ
What would you like? Was möchten Sie? वस मश्त इज़ी
You’re welcome! (in response to “Danke schön!”) Bitte schön! बिटॅ शॉन

 

ऑस्ट्रियन एयर लाइन

भारत से वियाना तक की फ्लाइट ऑस्ट्रियन एयर लाइन की थी। हवाई जहाज सही समय पर उड़ा। मुझे आगे की सीट मिली थी।  एक महिला अपने छोटे से बच्चे के साथ आयी। उसने कहा कि मैं उसे यह सीट दे दूं। आगे की सीट में बैठने का यह फायदा है कि बच्चों के लिये वह क्रैडल लग जाती है। जिस पर उन्हे लिटाया जा सकता है। मैंने मान लिया पर परिचायिका ने यह  नहीं करने दिया क्योंकि आगे  पहले से ही एक महिला बच्चे के साथ बैठी थी और ऊपर  केवल एक ही अतिरिक्त ऑक्सीजन मॉस्क था दो नहीं। उस महिला को पुनः अपनी जगह वापस जाना पड़ा। किसी भी अन्य यात्री ने  जिसकी सीट के सामने बच्चे के लिये क्रैडल लग सकता था, उस महिला के साथ सीट बदलने से मना कर दिया। वह कुछ मायूस हो गयी। इससे उसे रास्ते में कुछ तकलीफ तो जरूर हुई होगी पर मैं कुछ कर नहीं सकता था।

परिचारिकायें लाल परिधान पहने थीं।  युवतियां लाल स्कर्ट, लाल बेल्ट,  लाल या सफेद ब्लाउज,  लाल जैकेट,  लाल कोट, लाल स्टॉकिंग, यहां तक की लाल जूते पहने थीं। यही हाल युवकों का भी था। वे हमसे तो अंग्रेजी में बात करते थे पर आपस में किसी और भाषा में बात करते थे। मैंने एक परिचारिका से पूछा कि क्या वह जर्मन में बात कर रही है। उसने कहा,

‘हां, हम जर्मन में बात कर रहें हैं पर हमारा उच्चारण जर्मन के कुछ भिन्न है। लेकिन वर्तनी,  व्याकरण बाकी सब वही है।’

मैंने जवाब दिया डांके शॉन  (आपको बहुत धन्यवाद)। वह मुस्कराकर बोली,

‘लगता है आपको जर्मन आती है’।

मैंने कहा,  मैं जर्मनी जा रहा हूं  इसलिये  कुछ शब्द सीख लिये  हैं।

मेरे बगल की महिला इटली जा रही थी और जो महिला मुझसे सीट बदलना चाहती थी वह स्पेन जा रही थी। वे हरियाणा के किसी गांव की लग रही थी। उन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी। वे घबरा रही थी। मैंने कहा कि घबराने की जरूरत नहीं है मैं मदद करूंगा। मैंने वियना में उन्हें उस जगह तक पहुंचाया जहां से उन्हें अपनी, अगली उड़ान पकड़नी थी। हांलाकि बाहर निकलते समय एक व्यक्ति खड़ा था जो टिकट देखकर लोगों की सहायता कर रहा था।

मैं बर्लिन जाने के लिये, हाथ का सामान चेक करने के लिये देने लगा। एक व्यक्ति ने मुस्कुराते हुऐ पूछा कि,

‘क्या  लैपटॉप है?’

मैंने कहा नहीं। उसने कहा,

‘क्या नोटबुक है?’

मैंने कहा,

‘नहीं,  इसमें मेरे कपड़े हैं।’

उसे बहुत आश्चर्य हुआ, मानो कह रहा हो कि क्या कोई भारतीय बिना लैपटॉप के यात्रा कर सकता है। शायद सूचना प्रौद्योगिकी, भारतीयों की पहचान बन गयी है।

बीएसएनएल अन्तरराष्ट्रीय सेवा – मुश्कलें

मैं भारत से वियाना सुबह पहुंच गया था। वहां से बर्लिन के लिये उड़ान तीन घन्टे बाद थी। वियाना और बर्लिन का समय एक ही है और भारत के समय से ४:३० घन्टे पीछे है। मैंने अपनी पत्नी को फोन करने के लिये मोबाइल निकाला। यह बीएसएनएल का है। मैं इसे अन्तरराष्ट्रीय घूमने के लिये करवा कर ले गया था पर यह काम न कर, केवल सीमित सेवाओं को दिखा रहा था। वियाना हवाई अड्डे पर मुझे एक भारतीय सज्जन मिले। उनके फोन में भी यही मुश्किल थी। बहुत झुंझलाहट आयी। सामान ज्यादा होने के कारण, मैं अपना लैपटॉप नहीं ले गया था। मैंने अपना  प्रस्तुतीकरण पहले ही भेज दिया था।

घूमते-घूमते, मेरी नजर एक भारतीय युवक पर पड़ी। उसके पास लैपटॉप था। वह कम्प्यूटर इंजीनियर था और अपनी कंपनी की तरफ से पोलैंड जा रहा था। उसे, वहां पर, बैंक की क्रेडिट कार्ड सर्विस का कंप्यूटरीकरण करना था। उसके फोन के साथ भी यही मुश्किल थी। मैंने उससे पूछा कि क्या उसका लैपटॉप काम कर रहा है। उसने कहा हां। मैंने उससे पूछा कि क्या मैं उसके लैपटॉप से अपनी पत्नी को ई-मेल भेज सकता हूं। उसने मना कर दिया। उसका कहना था,

‘यह कम्पनी का है। इससे प्राइवेट ई-मेल नहीं जा सकती है। आप पब्लिक बूथ से फोन कर लीजिये।’

मैं नहीं जानता था कि वह बहाना कर रहा था या सच में ऐसा था। यदि यह सच था तो वह कंपनी, मैनेजमेंट के साधारण सिद्धांतो को नहीं समझती। क्या मालुम वह यह सोचता हो कि मैं ई-मेल से बम ब्लास्ट करने की बात सोचता हूं और इसके लिये वह पकड़ जायगा :-)

मेरे पास यूरो थे पर सिक्के नहीं। मैंने कभी पब्लिक बूथ से फोन नहीं किया था। भाषा की मुश्किल अपनी जगह थी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं। जीवन में, मैंने अपने आप को कभी इतना असहाय नहीं पाया।

बर्लिन पहुंच कर मैंने अपनी पत्नी को ई-मेल से, मोबाइल फोन की मुश्किल के बारे में बताया। उसने टेलीफोन वालों से पूछ कर निदान भी बताया पर काम नहीं बना। हार कर वहां पर प्रीपेड कार्ड खरीदा। मुझे इसका निदान वियाना में पता चला। इसके लिये Application में जाना पड़ता है। वहां से Network, फिर cell one में जाकर, International चुनना होता है। मैं Setting में जा कर, Network Service में, इसका हल ढूढ़ रहा था। वापस भारत आकर, यह प्रक्रिया पुन: अपनानी पड़ती है। इस बार National चुनकर उचित Network, जो कि Dolphin है, चुनना होता है।

बर्लिन में भाषा की मुश्किल

बर्लिन में मुझे होटल में ठहरना था। वहां होटलों में चेक-इन का समय ३ बजे का होता है। मैं वहां १० बजे सुबह पहुंच गया था। उन्होंने सामान रखने की अनुमति दे दी पर कहा कि कमरा तीन बजे के बाद ही मिलेगा। मैं सामान रख कर बर्लिन घूमने निकल गया।

बाज़ार

बर्लिन में ट्रेन, ट्राम, और बसें तीनों चलती हैं पर बस का सबसे ज्यादा प्रयोग होता है। शहर घूमने के लिए, कई एजेंसियां अपनी बस सेवा चलाती हैं। यह हॉप ऑन, हॉप ऑफ (Hop on, Hop Off) कहलाती हैं। आपको केवल एक बार टिकट लेना होता है। यह पूरे दिन के लिए वैध है। यह घूमने की जगह के पास रूकती हैं। आप किसी भी जगह उतरें और कहीं पर बैठ सकते हैं। दस मिनट बाद, वहां पर दूसरी बस आयेगी। बसों में हेडफोन है, जिससे सात भाषाओं में जगहों का वर्णन आता रहता है। इसमें अंग्रेजी तो शामिल है पर हिन्दी नहीं है। मैंने सोचा था कि एक चक्कर बिना उतरे लूंगा फिर दूसरी बार जो जगह अच्छी लगेगी उस पर उतर कर देखूंगा। बीच में ही मुझे भूख लगने लगी। एक जगह मुझे बहुत सारे ढ़ाबे दिखाई पड़े, मैं वहीं उतर गया।


ढ़ाबों में मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या खाऊं। मैं शाकाहारी खाने के साथ,  दूध, अण्डा, और मछली ले लेता हूं। हांलाकि चिकन या अन्य माँस नहीं खाता। मैंने भारत छोड़ते समय निश्चय किया था कि खाने से परहेज नहीं करुंगा लेकिन यह समझ में नहीं आ रहा था कि क्या खाना लूं। एक ढ़ाबे में, मैंने महिला से बात की। उसने जर्मन भाषा में कुछ जवाब दिया। मैंने कहा,

‘डाउच नाइन (जर्मन भाषा नहीं), इंगलिश याह (अंग्रजी हां)।’

वह बोली,

‘डाउच नाइन अला…ला…ला….।’

बर्लिन नगरपालिका की ईमारत

मुझे लगा भूख से मरा रा रा…।

बगल के ढ़ाबे में, अश्वेत लोग थे। वे अंग्रेजी अच्छी बोलते थे। मैंने उनसे कुछ शाकाहारी खाने के लिए कहा। उन्होंने मुझे चावल के साथ राजमां और सब्जियां दी, साथ में चटनी भी। खाना गर्म था, मजा आया। खाना खा कर मैं फिर बस में चढ़ गया।


बस में घूमते हुए हम उस क्षेत्र से भी गुजरे जहां पर दूतावास हैं। यहां भारतीय दूतावास भी देखा। यह लाल रंग की इमारत है। जिसके पत्थर राजस्थान से आये हैं। एक चक्कर पूरा करने में ही शाम हो गयी, दूसरा चक्कर लेने का न तो समय था, न ही हिम्मत। मैं वापस पैदल ही होटल की तरफ चल दिया, जो कि लगभग एक किलोमीटर दूर था।

बर्लिन में एक चर्च जो द्वितीय विश्व युद्ध में बमबारी का शिकार रहा

मैं वापसी में रास्ता भटक गया। मुझे दो छोटी लड़कियां मिलीं। मैंने उन्हें नक्शा दिखा कर पूछा कि मैं यहां कैसे जाऊं। वे अंग्रेजी नहीं समझती थीं पर उन्होंने मुस्करा कर इशारे में बताया और मैं उधर ही चल दिया। काफी दूर जाने के बाद भी जब होटल नहीं मिला तो घबरा गया। वहीं पर एक वृद्ध दंपत्ति दिखाई पड़े। वे भी अंग्रेजी नहीं समझते थे। मैंने उनसे पता पूछा तो वे मुस्करा कर बार बार कुछ इशारा करने लगे। कुछ देर बाद समझ में आया कि मेरा होटल दो इमारत के बाद था और वे उसके बोर्ड की तरफ इशारा कर रहे थे। मैंने उन्हे धन्यवाद दिया और कमरे में पहुंचा।

कमरे के फ्रिज में, पानी या बीयर के दाम में कोई अंतर नहीं था। मैं शराब या बीयर नहीं पीता हूं पर पानी इतना महँगा। बाथरूम से लेकर, पानी नहीं पिया गया। ७ बज रहे थे। मैंने पिछली रात हवाई जहाज में काटी थी – थकान अलग लग रही थी, जल्द ही गहरी नींद में डूब गया।


मुझे बर्लिन में भाषा की मुश्किल पड़ी। अच्छा हुआ कि मैं कुछ जर्मन के शब्द सीख कर गया था नहीं तो और भी मुश्किल पड़ती।

ऑफिस, स्कूल साइकिल पर – स्वास्थ भी बढ़िया, पर्यावरण भी ठीक

बर्लिन घूमते समय मुझे जगह-जगह लोग साइकिलों पर चलते आये। कुछ बच्चे थे कुछ युवक युवतियां तो फिर कुछ और बड़े। कुछ लोग अपने बच्चों को साइकिल पर बिठा कर जा रहे, कुछ लोग साइकिलों पर ही बर्लिन यात्रा कर रहे थे। बर्लिन में सारी जगह खम्भे बने हैं आप वहीं पर अपनी साइकिलों पर ताला लगा कर छोड़ सकते हैं। मेरे पास समय होता तो मैं भी किराये पर साइकिल लेकर घूमना पसन्द करता।

यूरोप में साइकिल चलाने का काफी चलन है। इसके दो बड़े कारण हैं। यह चालक के स्वास्थ और पर्यावरण दोनों के लिये फायदेमंद है। बर्लिन में, मुझे बहुत सारे बच्चे साइकिल पर स्कूल जाते, और महिलाएँ एवं पुरुष ऑफिस जाते दिखे। वियाना में भी लोग साइकिलों पर घूमते नजर आये। शायद यही कारण हो कि इन दोनों जगह प्रदूषण बहुत कम था। इन दोनो जगह बहुत कम मोटर साइकिलें दिखीं। बहुत से लोग छोटी कार चलाते दिखे। लगता है कि यहां छोटी कारें काफी लोकप्रिय हैं।

यूरोप में किराये में साइकिल भी बहुत आसानी से मिल जाती है और इसे जगह जगह पर किराये पर लिया जा सकता है। यह किराये में ली जाने वाली कार जैसा है और स्वचलित हैं। लेकिन अब नयी तकनीक से युक्त होने के कारण खोयी जाने वाली साइकिलों का आसानी से पता लगाया जा सकेगा। अमेरिका में भी इस तरह का चलन शुरू हो रहा है। इसके बारे में आप न्यू यॉर्क टाइमस् का यह लेख पढ़ सकते हैं।

कुछ दिन पहले न्यूयार्क टाइम्स के एक लेख में भी लिखा था कि अमेरिका के कई शहरों में साइकिलों ट्रैक बन रहे हैं और वे साइकिल चलाने पर जोर दे रहें हैं। अपने देश में कुछ उल्टा हो रहा है। हम सस्ती एक लाख रुपये की कार बनाने के बारे में सोच रहे हैं ताकि सबको कार मिल सके पर न तो सार्वजनिक यात्रा करने के संसाधनों को मजबूत कर रहे हैं, न ही पैदल अथवा साइकिल चलाने पर जोर दे रहे हैं। कुछ दिन पहले इसी बात को लेकर एक अन्य लेख न्यूयॉर्क टाइम्स में निकला था। यदि सारे हिंदुस्तानियों के पास कार हो जायें यानि की एक अरब कारें- क्या हाल होगा – अरे क्या होगा सब जगह ट्रैफिक जाम।

बर्लिन दीवाल पार करते समय, पूर्वी बर्लिन के गार्ड की गोली से मरा यूवक - चित्र विकिपीडिया से

बर्लिन दीवार का टूटना और दिलों का मिलना

बर्लिन दीवार १९६१ में बनी थी। यह इसलिये बनायी गयी थी ताकि लोग पूर्वी जर्मनी से, पश्चिमी जर्मनी की तरफ न जा सके। बस में चल रही कमेंटरी से पता चला कि इसके बनने के बावजूद भी लगभग ५००० लोग भागने में सफल हो गये पर ९० लोग मार दिये गये थे। जिसमें ६० गोलियों के शिकार हुए।


बर्लिन दीवार को १९९० में, तोड़ दिया गया। इस समय, दिखाने के लिये कि कुछ जगह यह छोड़ दी गयी है। बर्लिन दीवार, जहां पर हटा दी गयी है, वहां दो ईंटो की लाइन बिछी है जिससे पता चलाता है कि यहां पर बर्लिन दीवार थी। जगह-जगह उसमें लोहे की प्लेट जड़ी है। जिस पर नम्बर लिखें हैं। शायद किसी निश्चित जगह से उसकी दूरी बताते हैं।

हमारी बस वहां से भी गुजरी, जहां पर बर्लिन दीवाल का कुछ भाग अब भी है। वहां से गुजरते समय, मुझे १९६० के दशक में पढ़ा उपन्यास – The Spy Who Came In From the Cold – की याद आयी। उसी समय इस पर बनी फिल्म भी देखी थी। इस उपन्यास को John le Carre ने लिखा है। यह उस समय बर्लिन में चल रहे शीत युद्ध पर आधारित एक डबल एजेंट की कहानी है जिसमें बर्लिन दीवाल की अहम भूमिका है। इसमें कोई शक नहीं कि यह, शीत युद्ध से जुड़ा, सबसे बेहतरीन जासूसी रोमांचकारी उपन्यास है।

जब जर्मनी के दोनों भाग जुड़ रहे थे तब बहुत से लोग कहते थे क्योंकि कि पूर्वी जर्मनी के लोग पश्चिमी जर्मनी के कारण अमीर हो जायेंगे। इस बारे में पूछने पर वहां लोगों ने बताया कि ऐसा नहीं हुआ। पूर्वी जर्मनी अब भी गरीब है। वहां रोज़गार के साधन नहीं हैं। वहां अधिकतर शहरों में जनसंख्या कम होती जा रही है। युवक युवतियां वहां से निकल कर पश्चिमी जर्मनी आ रहे हैं और पूर्वी जर्मनी के शहर केवल वृद्ध लोगों के शहर होते जा रहे हैं

द्वितीय विश्व युद्घ के बारे में मैंने डरते डरते कुछ सवाल किये। उनका कहना था कि हांलाकि नयी पीढ़ी यह नहीं समझ पाती है कि जिसे देश में इतने विचारक, इतने दार्शनिक हुए हैं उन्होंने ऐसा काम कैसे कर लिया पर नई पीढ़ी यह भी सोचती है कि यह काम पुरानी पीढ़ी ने किया है जिसके लिये वे उत्तरदायी नहीं हैं।

बची हुई बर्लिन दीवाल - चित्र विकिपीडिया से

बर्लिन दीवाल का टूटना, पूर्वी-पश्चिमी जर्मनी का आपस में विलय, होना यह एक भावनात्मक बात थी। मुझे जर्मन लोगों ने बताया कि उन्हें इसकी प्रसन्नता है। हमारे भी – दो टुकड़े हुए हिन्दुस्तान और पाकिस्तान। बाद में पाकिस्तान के भी दो। यानि कि हम दो से तीन हो गये हैं। हम में एक खून है, एक सभ्यता है – क्या कभी हम तीन मिल कर एक हो सकेगें।

मैक्स मुलर - जन्मः ६.१२.१८२३ – मृत्युः २८.१०.१९०० चित्र विकिपीडिया से

भारतीय सभ्यता, संस्कृत, और उपनिषद के जर्मन विद्वान – मैक्स मुलर

मैक्स मुलर का जन्म ६ दिसम्बर १८२३ में देसा, (Dessan, Germany) में हुआ था। लिपजिंग विश्वविद्यालय से पढ़ाई और पी.एच.डी. लेने के बाद १८४५ में वे फ्रांस चले गये जहां उन्होंने संस्कृत सीखी। १८४६ में वे, संस्कृत का और अच्छा अध्ययन करने, इंगलैंड चले गये। उन्होंने १८६८ से १८७५ तक आल सोलस् कालेज All Soules College, Oxford में Comparative Theology के प्रोफेसर रहे।


मैक्स मुलर ने भारतीय सभ्यता, संस्कृत, उपनिषदों का अच्छा अध्ययन किया और कई पुस्तकें लिखी हैं। इनमें मुख्य हैं:

  1. A History of Ancient Sanskrit Literature So Far As It Illustrates the Primitive Religion of the Brahmans (1859),
  2. Lectures on the Science of Language (1864, 2 vols.),
  3. Chips from a German Workshop (1867-75, 4 vols.),
  4. Introduction to the Science of Religion (1873),
  5. India, What can it Teach Us? (1883),
  6. Biographical Essays (1884),
  7. The Science of Thought (1887),
  8. Six Systems of Hindu Philosophy (1899),
  9. Natural Religion (1889),
  10. Physical Religion (1891),
  11. Anthropological Religion (1892),
  12. Theosophy, or Psychological Religion (1893).
  13. Auld Lang Syne (1898),
  14. My Autobiography: A Fragment (1901);
  15. The Life and Letters of the Right Honourable Friedrich Max Müller (1902, 2 vols.), यह उनकी पत्नी द्वारा सम्पादित है

उनकी मृत्यु २८ अक्टूबर १९०० में हो गयी।

मैक्स मुलर कभी भारत नहीं आये हैं पर भारतीय सभ्यता के बारे में बहुत काम किया है। जर्मनी में, मैंने उनके बारे में लोगों से पूछा पर उन्होंने मैक्स मुलर का नाम नहीं सुना था। मैंने उन्हें बताया कि वे जर्मन थे उन्होंने भारतीय सभ्यता और संस्कृत भाषा पर बहुत काम किया था। उनके नाम पर भारत में भवन और मार्ग हैं। उन्हें यह सुन कर आश्चर्य हुआ।

खूबसूरत शहर – बर्लिन

मैंने एक दिन बाद, पुन: बर्लिन शहर देखने के लिये बस सेवा का प्रयोग किया। इस बार सोचा कि कुछ जगह उतर कर उसका आनंद लूंगा, पर हल्का-हल्का पानी भी बरसने लग गया इसलिये यह उतनी अच्छी तरह से नहीं हो पाया जैसा कि मैं चाहता था।

बर्लिन के रिक्शे

मैं सबसे पहली जगह बर्लिन गेट पर उतरा। यह १४ गेटों में से एक है जहां पर टैक्स की वसूली की जाती थी। यहां पर अलग तरह के रिक्शे हैं जिस पर लोग चढ़कर आस-पास की जगह घूमने जाते हैं। कुछ रिक्शों को लड़कियां भी चलाती दिखीं।


जर्मन संसद, पीछे और एक तरफ का हिस्सा

बर्लिन गेट के बगल में जर्मनी की संसद है। मैं इसके बगल और पीछे गया। मैं सामने इसलिये नहीं गया क्योंकि इसमें कुछ समय लगता और मैं बाकी जगह भी घूमना चाहता था इसलिये वापस जहां से बस मिलने वाली थी वहां पर वापस आ गया।


बर्लिन टावर

मैं वहां पर बर्लिन टावर भी देखने गया। रात के समय सारा बर्लिन बहुत सुन्दर लगता है। मुझे लगा कि यूरोप के मुख्य शहरों में टावर बनाने का चलन है। वियना में भी इस तरह की टावर है। मैं बर्लिन टावर पर टॉयलेट भी जाना चाहता था, पता चला कि इसके लिए ५० सैन्ट देने पड़ेगें यानी कि लगभग ३० रूपये। सू – सू करने के लिये ३० रूपये कुछ ज्यादा ही लगे पर यदि न देता तो ज्यादा मुश्किल पड़ती इसलिये पैसे देकर सुविधा का प्रयोग किया।


रास्ते में घूमते हुऐ, रात्रि में मनोरंजन की जगहों और साधनों के बारे में, कई जगह पोस्टर दिखायी पड़े, उनका निमंत्रण मिला। मुन्ने की मां की याद आ गयी और मैंने नजरें दूसरी तरफ कर ली :-)

वहां पर मैक्डॉनाल्ड, पीट्जा शॉप भी है पर मैं वहां जाना ठीक नहीं समझा। मैं एक जर्मन ढ़ाबे पर पहुंचा। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या लूं। वहां कि महिला को अंग्रेजी ठीक से नहीं आती थी। उसने मुझे बतख का मांस, डबलरोटी, चटनी के साथ खाने के लिए कहा। भूख बहुत जोरों से लगी थी सब अच्छा लगा। खाकर वापस आया अगले दिन मुझे वियाना जाना था और सामान लगाते ही मेरी आंख भी लग गयी।

यह मेरे उन्मुक्त चिट्ठे पर कड़ियों में प्रकाशित हो चुका है। यसदि इसे आप कड़ियों में पढ़ना चाहें तो नीचे चटका लगा कर जा सकते हैं।

 

सांकेतिक शब्द
Berlin, Berlin wall, The Spy who came in from the Cold, Max Müller,
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10/17/09

यू हैव किल्ड गॉड, सर

 इस चिट्ठी में अमेरिका के लूज़िआना राज्य के साइंस एजूकेशन ऐक्ट, विलायती फिल्म 'क्रिएशन' और 'डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े' श्रंखला के निष्कर्ष की चर्चा है।
इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
  • Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
  • Linux पर सभी प्रोग्रामो में,
सुन सकते हैं। ऑडियो फाइल पर चटका लगायें। यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम लिखा है वहां चटका लगायें। इन्हें डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर ले।
 
न्यायालय से पटखनी खाने के बाद भी कट्टरवादियों ने हार नही मानी। वे किसी तरह से ऎसे  कानून बनाने पर जोर दे रहे हैं जिससे कि लगे कि डार्विन का विकासवाद का सिद्वान्त गलत है। अमेरिका के ऎलाबामा (Alabama),  फ्लोरिडा (Florida), मिशिगन (Michigan),  मिसूरी (Missouri), और साउथ कैरोलाइना ( South Carolina)  राज्यों में इस तरह के कानून लाये गये पर वे पास नहीं हो पाये और २००८ में मृत हो गये पर जून २००८ में, लूज़िआना राज्य में 'साइन्स एजूकेशन ऐक्ट' (Science Education Act) पारित किया गया है। यह पुन: विद्यार्थियों में सृजनवाद पढ़ाने के रास्ते खोल सकता है। इस अधिनियम की सारे वैज्ञानिकों ने निन्दा की है।  अफसोस की बात यह है कि  इसे भारतीय मूल के बॉबी ज़िन्दल ने हरी झंडी दी है।
 


डार्विन के जीवन पर इस साल एक नयी फिल्म 'क्रिएशन' (Creation) नाम से बनी है। इसमें डार्विन और उसकी पत्नी ऐमा की भूमिका, पॉल बेटॅनी और जेनिफर कॉनेली ने निभायी है जो कि वास्तविक जीवन में भी पति और पत्नी हैं। यह फिल्म अमेरीका में नहीं दिखायी जा रही है। वहां पर कोई भी फिल्म वितरक इसे वितरण के लिये नहीं लेना चाहता है। उन्हें डर है कि सृजनवादी इसके खिलाफ धरना देगें, प्रदर्शन करेंगे। इस फिल्म में एक जगह एक थॉमस हेनरी हक्सले डार्विन से कहता है
'All mighty can no longer claim to have authored every species under a week.
You have killed God, Sir'
लोग, डार्विन के सिद्धांत को इसी तरह से समझते हैं। इसलिये,  यदि आप कट्टरवादी हैं तो आपको उसका सिद्धांत, यह फिल्म विवादास्पद लगेगी। इस चिट्ठी का शीर्षक मैंने इसी डायलॉग से लिया है। इस फिल्म का ट्रेलर देखिये - आपको पसन्द आयेगा। मैंने जिस डायलॉग की चर्चा की है वह भी इसमें है। 


इस फिल्म में डार्विन और उसकी पत्नी ऐमा की भूमिका पॉल बेटॅनी (Paul Bettany) और जेनिफर कॉनली (Jennifer Connelly) ने निभायी हो जो कि वास्तविक जीवन में भी पति और पत्नी हैं।

चर्च आफ इंग्लैंन्ड ने,  डार्विन के प्रति किये गये अन्याय पर माफ़ी मांग ली।  उनका कहना है कि डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत उनके मज़हब के विरूद्ध नहीं है।  वे प्रयत्नशील है कि किसी तरह यह लड़ाई समाप्त हो पर  कट्टरवादी कहीं भी हो, किसी भी धर्म के हों, जब वे हाथ से बाहर निकल जाते है तो किसी की भी नहीं  सुनते हैं।  क्या  वे तर्क  को, सबूतों को,  विज्ञान को समझेंगे या फिर क्ट्टरवादिता, विज्ञान पर विजय प्राप्त कर लेगी? क्या क्रिएशन फिल्म अमेरिका में प्रदर्शित हो पाएगी?  लगता नहीं कि ऐसा हो पायेगा :-(

'उन्मुक्त जी यह आप कैसे कह सकते हैं?'
मैं तो यह ब्रिटिश काउंसिल (British Council) की प्रार्थना पर इप्सॉस मोरी (Ipsos MORI) के द्वारा डार्विन के ऊपर किये गये सर्वे के कारण कहता हूं। इसका डाटा आप यहां से डाउनलोड कर सकते हैं। इसका कुछ अंश मैं यहां प्रदर्शित कर रहा हूं।







देश
विकासवाद वैज्ञानिक तथ्य हैं हां/ नहीं
विकासवाद और ईश्वर - दोनो सम्भव
विकासवाद अन्य सिद्धान्तों के साथ
अर्जेनटीना
४४/ ७
६२
२३/ ६५
चीन
५५/ ७
३९
१९/ ४२
मिस्र
८/ १९
४५
१८/ १
इंगलैंड
५१/ ७
५४
२१/ ५४
भारतवर्ष
३८/ २
८५
३७/ ४०
मेक्सिको
५२/ ९
६५
२८/ ५६
रूस
३९/ ८
५४
१०/ ५३
. अफ्रीका
८/ ४
५४
११/ २९
स्पेन
३९/ ५
४६
३४/ ३१
अमेरिका
३३/ २४
५३
२१/ ५१



यह चार्ट प्रतिश्त में है। इससे पता चलता है कि यद्यपि 'विकासवाद के लिये वैज्ञानिक तथ्य हैं' (कॉलम १) का प्रतिशत  'विकासवाद के लिये वैज्ञानिक तथ्य नहीं हैं' से केवल मिस्त्र (Egypt) को छोड़ कर बाकी देशों में ज्यादा है फिर भी  'ईश्वर एवं विकासवाद पर एक साथ विश्वास किया जा सकता है' (कॉलम २) से कम है और 'विकासवाद व अन्य सिद्धान्त पढ़ाये जाने चाहिये' (कॉलम ३) का प्रतिशत 'केवल विकासवाद पढ़ाया जाना चाहिये' के प्रतिशत से, स्पेन को छोड़, सब देशों में अधिक है।

कहावत है कि झूट, होता है, फिर सफेद झूट , फिर सांख्यिकी - आंकड़े अक्सर गलत बताते हैं। ईश्वर करे कि यह सही हो :-)

ऐसे खबर है कि भारतीय और चीनी विद्यार्थियों को सृजनवाद भा रहा है। विश्वास नहीं,  तो अन्तरजाल पर घूम रहा कार्टून देखिये।

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आज दिवाली है - विजय का त्योहार: ज्ञान की अज्ञानता पर, धर्म की अधर्म पर, रोशनी की अंधकार पर - इसी पर्व पावन पर यह श्रंखला इस आशा के साथ समाप्त होती है कि विज्ञान की धार्मिक कट्टरता पर  विजय होगी। आपको दीपवली शुभ हो। 

कौन ... कहता है कि हमारे और बन्दरों के पूर्वज एक थे देखिये हममें कितना अन्तर है।

यह चित्र मेरा नहीं है। इस श्रंखला के दौरान किसी ने यह चित्र भेजा है। यदि इसके कॉपीराइट स्वामी को आपत्ति हो तो मैं चित्र को हटा दूंगा।

मैं बहुत जल्दी आपको दो नयी श्रंखला में ले चलूंगा। पहली में हम बात करेंगे एक ऐसे उपन्यास और उससे जुड़ी कहानियों के बारे में है जो न केवल २०वीं शताब्दी के उत्कृष्ट अमेरिकन साहित्य में गिना जाना जाता है पर,  मेरी बिटिया रानी के अनुसार, जिसे अमेरिका के कॉलेज जाने वाले प्रत्येक विद्यार्थी ने कम से कम एक बार पढ़ा है और दूसरी में, मैं आपको देव भूमि हिमाचल की यात्रा में ले चलूंगा।

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े 
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल - व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।। मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है।। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी।। विकासवाद पढ़ाना मना करना, मज़हबी निष्पक्षता का प्रतीक नहीं।। सृजनवाद धार्मिक मत है विज्ञान नहीं है।। 'इंटेलिजेन्ट डिज़ाईन' - सृजनवादियों का नया पैंतरा।। यू हैव किल्ड गॉड, सर।।




About this post in Hindi-Roman and English
is chitthi mein america ke Louisiana rajya ke 'science education act', british film 'creation' aur 'Darwin, Vikaasvaad, aur Majhhabee rore' shrankhlaa ke nishkarsh kee charchaa hai. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is about Science Education Act enacted by State of Louisiana, British film 'Creation' and conclusion of 'Darwin, Evolution and Religious Fervour' series. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक चिन्ह
Hindi,।
Hindi Podcast, हिन्दी पॉडकास्ट,

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10/14/09

रात के खाने पर, सिलविया गुस्से में थी

 त्रिवेन्दम के समुद्र होटेल में मेरी मुलाकात, इटैलियन सुन्दरी सिलविया से हुई। यह चिट्ठी उसी के बारे में है।





त्रिवेन्दम में हम केटीडीसी के समुद्र होटेल में ठहरे थे। शाम को समुद्र तट पर घूमते हुऐ, एक चट्टान दिखायी पड़ी। हम लोग जाकर उसी पर बैठ गये। समुद्र में ऊंची लहरे उठ रहीं थी। इसलिये वहां पर कोई नहीं नहा रहा था। कुछ समय बाद, हम लोगों ने देखा कि एक विदेशी महिला आयी और समुद्र के अन्दर अकेली ही तैरती हुई चली गयी। इस कारण वह मुझे वह हिम्मती लगी। मैंने ताली बजाकर और हाथ हिला कर, उसका अभिवादन किया और उसकी हिम्मत की दाद दी



मेरी जब भी सिविया से मुलाकात हुई तब कैमरा साथ नहीं था इसलिये उसका चित्र नहीं खींच पाया :-( इस चिट्ठी में त्रिवेन्दम के चिड़िया घर में खींचे चित्रों से काम चलाइये।


अंधेरा होते ही हम लोग होटल में आ गये। हम लोगों ने सुबह से दिन का खाना नही खाया था इसलिए भूख भी जोरों से लग रही थी।  हम लोग स्वागत कक्ष पर, यह पूछने के लिये गये कि रात का खाना खाने कहां जाना है। हम जल्दी खाना खाकर सोना चाहते थे क्योंकि अगले दिन सुबह कन्याकुमारी जाना था।


स्वागत कक्ष में एक जगह बेचने की मशीन लगी थी। वहां पर काजू वगैरह मिल रहे  थे। मशीन में पैसा डालने पर वह पैकेट बाहर कर देती थी। मैं स्वागत कक्ष पर बैठी महिला से बात करने लगा। मुन्ने की मां उस मशीन को देखने लगी। इतने में समुद्र तट पर अकेले नहाने नहाने वाली युवती आयी। वह इटैलियन थी। उसने अपना नाम सिलविया बताया। उसके पास काजू का का पैकेट था। उसने मुन्ने की मां  से पूछा कि क्या वह काजू खरीदना चाहती हैं। मुन्ने की मां ने कहा,

'नहीं इसमे बहुत कैलरी होती है। मैं तो केवल देख रही थी कि यहां क्या मिल रहा है।'
सिलविया ने कहा फिर भी वह उसे कुछ काजू खाने के लिए देगी। हमने, उसके दिये काजू खाये। सिलविया पैरों में सुन्दर सुनहरे पायल पहने हुयी थी मैंने इसकी तारीफ की तो उसने कहा,

'यह असली सोने के नही हैं पर बनावटी हैं। मैंने इसे स्पेन में खरीदा था।'
सिलविया अगली रात हमें पुन: खाने में मिली पर वह केवल एक पैर में पायल पहने थी। मैने पूछा कि वह एक पायल क्यों पहने है। उसने वह पैर दिखाते हुए कहा,



'सुबह जब मै समुद्र में नहा रही थी तब लहरें मेरे एक पैर का पायल ले गयीं।'

रात के खाने पर वह मुझे कुछ गुस्से में लगी। मैंने उससे इसका कारण पूछा तो उसका कहना था कि वेटर उसके पेपर नैपकिन के प्रयोग करने पर आपत्ति कर रहा है। उस दिन रात के खाने में स्वादिष्ट फ्राइड फिश बनी थी पर उसमें तेल ज्यादा था। सिलविया पेपर नैपकिन में उसे सुखा कर, खा रही थी इस कारण उसने कुछ अधिक पेपर नैपकिन इस्तेमाल कर लिये। वेटर इसी पर आपत्ति कर रहा था। मुझे लगा कि वह, कितने भी पेपर नैपकिन प्रयोग करे आपत्ति नहीं करनी चाहिये। मैंने वेटर को अलग बुला कर बात की। उसने कहा,



 'यह युवती आज पहली बार यहां खाने आयी है और लगभग २०० पेपर नैपकीन प्रयोग कर चुकी है।'
मैंने उसकी मुश्किल बतायी तो वेटर ने कहा, 

'यदि उसने हमें बताया होता तो उसके लिए कम तेल वाली मछली बनवा देते पर २०० नैपकीन का दाम २०० रूपये से भी ज्यादा है जो कि रात के खाने से ज्यादा है।'
मैंने उससे कहा कि विदेशी है और युवती गुस्से में है।  तुम मेरे साथ चलो। मैं तुम्हे उसके सामने डाटूंगा। तुम माफ़ी मांग लेना बात इसी तरह समाप्त हो जायेगी। तुम  उसके लिए कम तेल की मछली बनवा दो।

मैंने वेटर को सिलविया के सामने डांट दिया उसका गुस्सा शांत हो गया।


अगले दिन वेटर मुझे पुन: मिला और कहने लगा कि उस युवती ने आज नाश्ता नही किया है उसका पेट खराब हो गया है कल उसने ज्यादा मछली खा ली थी।

अगली बार चलेंगे कन्याकुमारी और जानेगे वहां की कथा। 

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा
 क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे - महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।। पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं।। कुमाराकॉम पक्षीशाला में।। क्या खांयेगे - बीफ बिरयानी, बीफ आमलेट या बीफ कटलेट।। आखिरकार, हमें प्राइवेट और सरकारी होटल में अन्तर समझ में आया।। भारत में समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं न की निजी।। रात के खाने पर, सिलविया गुस्से में थी।। 


हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi

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Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
  • यू हैव किल्ड गॉड, सर:  
  • सृजनवादियों का नया पैंतरा और न्यायालय का फैसला:  
यह ऑडियो फइलें ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप -
  • Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
  • Linux पर सभी प्रोग्रामो में – सुन सकते हैं।
बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें।




यात्रा विवरण पर लेख चिट्ठे पर अन्य चिट्ठियां



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ktdc ke samudra hotel mein meree mulaakaat italian sundree sylvia se huee.  is chitthi mein usee kee charchaa hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.


I had met Italian beayty Sylvia at KTDC hotel at Trivandum. This post talks about her. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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Trivandum,
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Hindi, हिन्दी,
10/9/09

‘इंटेलिजेन्ट डिज़ाईन’ – सृजनवादियों का नया पैंतरा

अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय से दो बार हार जाने के बाद भी मज़हबी कट्टरवादियों ने हार नहीं मानी। उन्होनें अपना पैंतरा बदल दिया। इस चिट्ठी में उनकी इस चाल और उस पर टैमी किट्ज़मिलर बनाम डोवर एरिया स्कूल डिस्ट्रिक्ट मुकदमें में हुऐ फैसले की चर्चा है। 
इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
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मज़हबी कट्टरवादियों ने १९८९ में एक पुस्तक प्रकाशित की। इसका नाम 'ऑफ पांडास्  एण्ड पीपल' है। इसमें सिद्वान्त तो सृजनवाद का ही है पर सृजनवाद की जगह 'इंटेलिजेन्ट डिज़ाईन' (Intelligent Design) शब्द का प्रयोग किया गया है। इन लोगों ने स्कूलों को निम्न तरह की यह  नीति निर्णय लेने के लिए बाध्य किया,
'The Pennsylvania Academic Standards require students to learn about Darwin’s Theory of Evolution and Case eventually to take a standardized test of which evolution is a part.
Because Darwin’s Theory is a theory, it continues to be tested as new evidence is discovered. The Theory is not a fact. Gaps in the Theory exist for which there is no evidence. A theory is defined as a well-tested explanation that unifies a broad range of observations.
Intelligent Design is an explanation of the origin of life that differs from Darwin’s view. The reference book, Of Pandas and People, is available for students who might be interested in gaining an understanding of what Intelligent Design actually involves.
With respect to any theory, students are encouraged to keep an open mind. The school leaves the discussion of the Origins of Life to individual students and their families. As a Standards-driven district, class instruction focuses upon preparing students to achieve proficiency on Standards-based assessments.'

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'स्कूल में   डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत पढ़ाया जा सकता है। लेकिन शिक्षक उसको पढ़ाने के पहले विद्यार्थियों को बतायें कि यह केवल सिद्धांत है और इस सिद्धांत का कोई तथ्य नहीं है।
इंटेलीजेंट डिज़ाइन सिद्धांत भी प्राणियों की उत्पत्ति के बारे में बताता है और यह डार्विन के विकासवाद से भिन्न है। इस बारे में 'ऑफ  पांडास एण्ड पीपल' नामक पुस्तक  विद्यार्थियों  के लिए उपलब्ध है जो इस सिद्वान्त के बारे में बताती है।
विद्यार्थियों से कहा जाता है कि वे अपने मस्तिष्क को खुला रखे।  इस बारे में, विद्यालय विद्यार्थियों को उनके एवं परिवार के विवेक पर छोड़ते है।'

यह नीति बहुत सारे स्कूलों में लागू कर दी गयी।  कुछ अभिभावकों ने इस नीति निर्णय को न्यायालय के समक्ष चुनौती दी।

दो बेटियों की मां, टैमी किट्ज़मिलर २६ सितम्बर २००५ में, हैरिसबर्ग पैनिसलवेनिया के न्यायालय से बाहर आती हुईं - चित्र कैरलिन कैस्टर/ एपी फोटो Carolyn Kaster/ AP Photo


अमेरिका के पेन्सिलवेनिया राज्य के परीक्षण न्यायालय ने, टैमी किट्ज़मिलर बनाम डोवर एरिया स्कूल डिस्ट्रिक्ट मुकदमें में, दिनांक २० दिसम्बर,२००५ को अपना फैसला देते हुऐ घोषणा की,
'A declaratory judgement is issued in favour of Plaintiff ... that Defendant's [School's] policy violates the First Amendment of the Constitution of the United States and Article 1& 3 of the Constitution of the Commonwealth of Pennsylvania.
... Defendants are permanently enjoined from maintaining ID Policy in any school within Dover Area District.'  
यह नीति अमेरिका के प्रथम संशोधन का उल्लघंन करती है, और असंवैधानिक है।
विपक्ष पक्ष को आदेशित किया जाता है कि वे इस नीति को डोवेर क्षेत्र के किसी भी स्कूल में  लागू न करें।
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नवम्बर २००५ में डोवर स्कूल बोर्ड़ के सदस्यों का चुनाव हुआ। इस  चुनाव में इंटेलीजेन्ट डिज़ाइन नीति के पक्ष में वोट दिये जाने  वाले सारे सदस्य नहीं चुने गये। नये सदस्यों के मुताबिक यह नीति  ठीक नहीं थी। उन्होनें इसे ठुकरा दिया।


क्या कट्टरवादियों ने हार मान ली या कुछ नया राग छेड़ दिया - यह अगली बार। 

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े 
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल - व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।। मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है।। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी।। विकासवाद पढ़ाना मना करना, मज़हबी निष्पक्षता का प्रतीक नहीं।। सृजनवाद धार्मिक मत है विज्ञान नहीं है।। 'इंटेलिजेन्ट डिज़ाईन' - सृजनवादियों का नया पैंतरा।।


About this post in Hindi-Roman and English
is chitthi mein Tammy Kitzmiller V Dover Area School District mukdme kee charchaa hai. ismen court ne oos neeti ko gairkanoonee ghoshit kar diya jismen intelligent design ko pdhaane ka nirnay liya gayaa thaa. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is about Tammy Kitzmiller V Dover Area School District where the court has declared the policy to teach intelligent design as unconstitutional. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक चिन्ह
Hindi,।
Hindi Podcast, हिन्दी पॉडकास्ट,

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10/7/09

मोगाम्बो खुश हुआ

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मैंने कुछ समय पहले बचपन में पढ़ी आर्ची कॉमिक्स के बारे में ‘हाय, यह क्या किया – मेरा दिल ही टूट गया‘ नाम से एक चिट्ठी लिखी थी।  यह इसलिये क्योंकि आर्ची कॉमिक्स प्रकाशकों ने घोषणा की थी कि आर्ची, विरॉनिका से शादी कर रहा है। मेरा तो दिल ही टूट गया।

मुझे लगता है कि कोई बेवकूफ ही बॅटी जैसी प्यारी और बेहतरीन व्यक्तित्व की लड़की छोड़ कर, विरॉनिका जैसी अमीर पर घमन्डी लड़की से शादी कर ले। यह सारी कहानी छः अंकों में लिखी जानी थी। इसके पहले तीन अंक कुछ इस तरह के थे। इसे देख कर तो बस क्या बताउं …



मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि आर्ची क्यों इतनी बड़ी भूल कर रहा है। मेरे विचार में उसके लिये विरॉनिका नहीं, पर बॅटी सही है। उसे बॅटी से शादी करनी चाहिये। लेकिन मैंने पहली वाली चिट्ठी का अन्त करते समय लिखा था कि क्या कहानी में ट्विस्ट है।

ट्विस्ट तो है। लेकिन आने वाले तीन अंको का चित्र तो देखिये।

आ गया न मजा। दिल खुश हुआ न। शायद यह इसलिये हुआ कि इस बारे में सारे मतदान में ८०% लोगो ने कहा कि आर्ची को बॅटी से और केवल २०% ने कहा कि विरॉनिका से शादी करनी चाहिये। इसके बारे में आप विस्तार से न्यू यॉर्क टाइम्स् का यह या ईकोनॉमिक्स् टाइमस् का यह लेख पढ़ सकते हैं।


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सांकेतिक शब्द

Archie Comics, Archie Andrews, Betty Cooper, Veronica Lodge, Betty and Veronica,


Posted in दर्शन, विचार, सूचना
10/3/09

भारत में समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं न कि निजी

समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं। इस चिट्ठी में  इस चिट्ठी में त्रिवेन्दम के समुद्र तट के साथ, इसी की चर्चा है।



त्रिवेन्दम में हम लोग केटीडीसी के समुद्र होटेल में ठहरे थे। वहां पहुंच कर हम लोगों ने चाय पी और नीचे समुद्र तट पर घूमने चले गये। इस तट का नाम ही ‘समुद्र तट‘ है । यहां पर सूर्यास्त हो रहा था - बहुत दृश्य सुन्दर था। 



हम लोगों ने यह सोचा कि पूरे तट का एक नज़ारा ले लिया जाए। हम लोग जब एक तरफ आगे जाने लगे तो एक जगह, एक गार्ड,  हम लोगों को जाने से रोकने लगा। वहां पर कोई प्राइवेट होटल था। वह उसी का गार्ड था। उसने हमसे कहा,
‘यह समुद्र तट का हिस्सा केवल उसके होटल के अतिथि के लिए है सबके लिए नहीं  आप  लोग  नहीं जा सकते हैं।‘
मैंने उससे रौबीली आवाज़ में कहा,
‘भारत में कोई भी समुद्र तट प्राइवेट नहीं है। सारे समुद्र तट सरकारी और सार्वजनिक है। हां कुछ सुरक्षा की दृष्टि से  कुछ तट सार्वजनिक तौर पर नहीं  खुले है। तुम हमें यहां घूमने से नहीं रोक सकते हो।
हाँ यह बात अलग है कि हम लोग कोई अश्लील तरीके का कपड़ा पहने या कोई अश्लील काम को करें, तो रोक सकते हो। लेकिन हम लोग न अश्लील कपड़े पहने हुए हैं और न ही अश्लील हरकत कर रहे है। इसलिए हमें रोकना एकदम गलत है। तुम अपने मैनेजर को बुलाकर लाओ या फिर मुझे उसके पास ले चलो। मैं उसे समझा देता हूं।'
इतना सुनने के बाद वह थोड़ा सा घबरा सा गया। उसने कहा अच्छा-अच्छा आप लोग आगे जा सकते है। हम लोग आगे तक घूमने गये। वहां घूमते हुऐ उसकी बात समझ में आयी। 

उस होटल में बहुत सारे विदेशी पर्यटक भी थे। यह लोग भारतियों से बहुत कम कपड़े पहने हुए थे और धूप का आनन्द ले रहे थे या नहा रहे थे। सारे भारतीय उन्हीं की तरफ देख रहे थे। भारत के पुरूष भी जो नहा रहे थे वह भी ठीक तरह के कपड़े पहनकर नही नहा रहे थे।  मुझे ही देखने में अजीब लग रहा था तो विदेशियों को देखने में  अजीब लगेगा ही। किसी को भी यह हरकत परेशान करेगी। इसीलिए वह मना कर रहा था।


हम लोग दो साल पहले गोवा गये थे वहां पर 'सिटा दे गोवा' नामक होटल में ठहरे थे। यह बहुत सुन्दर होटल है पर इसने अपनी इमारत इस तरह से बना ली है कि इसके सामने का समुद्र तट इन्हीं का हो गया है। इस इमारत को भी उन्होंने गैर कानूनी तौर से बनाया है। इस बारे में वहां एक लोकहित याचिका हुई। जिसमें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इमारत तोड़ने का आदेश हो गया पर गोवा सरकार ने इसे बचाने के लिए अध्यादेश जारी कर दिया है। इसलिए आजकल वहां बवाल मचा है। इस विषय पर अधिक जानकारी आप डाउन टू अर्थ नामक पत्रिका के लेख में पढ़ सकते हैं। डाउन टू अर्थ एक अच्छी पत्रिका है। मैंने इसके और पर्यावरण पर कुछ अन्य पत्रिकाओं के बारे में यहां लिखा है। 

समुद्र तट पर घूमते हुए वहाँ पर कुछ लोगों ने मुझसे पूछा क्या नाव पर घूमना पसन्द करूंगा। मैंने कहा,
'इस समय तो कुछ अंधेरा हो रहा है इसलिए आज तो नहीं पर कल घूमना पसन्द करूंगा। लेकिन, इसके लिये आपको कितने पैसे देने होंगे।'
मेरा इतना ही कहना था कि मुन्ने की मां मुझसे कहने लगी, 
‘तुम नाव पर नहीं जाओगे। यदि तुम्हें नाव पर घूमने के लिए जाना है तो तुम अकेले आया करो या फिर मुझे अपने साथ न लाया करो।'
इतने में उस व्यक्ति ने जवाब दिया,
'नाव में एक बार घूमने पर चार सौ पचास रूपये लगेगा और कल सुबह साढ़े नौ बजे से सैर करना शुरू होगा।'
हम जब वहां से चलने लगे, तो मुन्ने की मां ने फिर से कहा,
'चाहे जो भी हो जाए, लेकिन, तुम नाव पर घूमने नहीं जाओगे।'
मैंने उसका मन रखने के लिए कहा, 
'मैं तो उससे केवल पैसा पूछ रहा था, मैं घूमने नहीं जा रहा हूं।'
मैंने सोचा कि अगले दिन अकेले आऊँगा और चुपके से बिना बताये घूमने चला जाऊँगा लेकिन यह हो न सका। हम उसके बाद बहुत व्यस्त रहे।

अगली बार बात करेंगे इटालियन सुन्दरी, सिलविया की।

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा
 क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे - महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।। पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं।। कुमाराकॉम पक्षीशाला में।। क्या खांयेगे - बीफ बिरयानी, बीफ आमलेट या बीफ कटलेट।। आखिरकार, हमें प्राइवेट और सरकारी होटल में अन्तर समझ में आया।। भारत में समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं न की निजी।। 


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सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
  • सृजनवादियों का नया पैंतरा और न्यायालय का फैसला:
  • सृजनवाद धार्मिक मत है, विज्ञान नहीं है:
यह ऑडियो फइलें ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप -
  • Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
  • Linux पर सभी प्रोग्रामो में – सुन सकते हैं।
बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें।




यात्रा विवरण पर लेख चिट्ठे पर अन्य चिट्ठियां



About this post in Hindi-Roman and English
samudra tat saarvjanik hote hain. is chitthi mein isee kee charchaa trivandum ke smudra tat ke sandarbh mein kee gayee hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.


Beaches in India are public. This post explains it in context of a beach in Trivandum.  It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
seashore, beach, Trivandum,
kerala, केरल, Travel, Travel, travel and places, Travel journal, Travel literature, travel, travelogue, सैर सपाटा, सैर-सपाटा, यात्रा वृत्तांत, यात्रा-विवरण, यात्रा विवरण, यात्रा संस्मरण,
Hindi, हिन्दी,