इस चिट्ठी में चर्चा है कि हम पर्यावरण को बचाने में क्या सहयोग कर सकते हैं।
क्या आप कभी अपनी पत्नी का जन्मदिन और शादी की सालगिरह दोनो एक साथ भूलें है।यदि आपका जवाब हां में है तब मुन्ने की मां का गुस्सा समझ सकते हैं।
मुझे पिछले साल काम के सिलसिले में बाहर रहना पड़ा - कुछ समय दिल्ली और कुछ समय भोपाल। न उसके जन्मदिन की याद रही, न ही शादी की सालगिरह की - यह दोनो आस-पास ही पड़ते हैं। जब याद आया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लगा कि जब वापस कस्बे में पहुंचूंगा, तो खैर नहीं। सोचा, मनाने के लिये, भोपाल से कुछ ले चलूं।
'उन्मुक्त जी, हम तो समझे कि आप पर्यावरण के बारे में कुछ बता रहें हैं यहां तो कुछ और ही है - पत्नी को मनाया जा रहा है।'
भोपाल में सबसे अच्छा बजार नयी मार्केट है। वहां, मध्य प्रदेश सरकार निगम की दुकान मृगनयनी है। वहां पर, अच्छा समान वाजिब दामों में मिल जाता है। बस उसके लिये, कुछ लेने के लिये, वहीं पहुंच गया।
'लगता है कि उन्मुक्त जी, बढ़िया सा शीर्षक देकर, हम सब को झांसा दे रहे हैं। समझ गये, कुछ नहीं, बस टीआरपी का चक्कर है।'
मैंने मृगनयनी से, एक सूती चन्देरी की साड़ी, शादी की सालगिरह और सूती सलवार-कुर्ते का सेट उसके जन्मदिन के लिये लिया। सलवार-कुर्ते के सेट में तीन कपड़े थे। एक रंगीन सादा कपड़ा और दो वैजिटेबल रंग (vegetable dye) से चित्रकारी किये हुए कपड़े थे।
वहां पर एक प्यारी सी, युवती विक्रेता थी। मैंने उससे पूछा कि इसमें कौन सा कपड़ा क्या है। उसने एक को, दुपट्टा बताया फिर मुस्करा कर बोली,
'वैसे सादा रंगीन कपड़ा सलवार है। लेकिन आजकल फैशन के अनुसार आप जिसे चाहें सलवार बना ले, जिसे कुर्ता।'
यानि कि सादे रंगीन कपड़े को कुर्ता और चित्रकारी करे हुऐ कपड़े को सलवार। मैं कुछ उलझन में पड़ गया। इस पर उसने कहा,
'आप बिलकुल मत खबराइये आपकी पत्नी को सब मालूम होगा। वह सब समझ जाएगी।'
यह जानने के लिये कि क्या वह युवती सच कह रही थी या नहीं - मैंने अन्तरजाल में ढ़ूंढा। मुझे यहां से, फैशन पत्रिका का यह चित्र मिला। इसे देख कर तो लगता है कि सादे कपड़े का कुर्ता ज्यादा सुन्दर लगता है। हांलाकि मुन्ने की मां के अनुसार यह इसलिये है कि मॉडल-युवती सुन्दर है।
'उंह हूं उन्मुक्त जी, इस चिट्ठी में पर्यावरण का जिक्र तो दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा है।'
वह युवती विक्रेता, जब इन कपड़ों को पैक करने लगी, तब मैं आश्चर्य से डूब गया। उसने समान को समाचार पत्रों के बने पैकेटों में पैक किया। उठाने के लिये, ऊपर सुतली लगी हुई थी। वह युवती समझदार थी समझ गयी कि मैं उन पैकेटों को देख कर आश्चर्य चकित हो रहा हूं। उसने बताया,
'अंकल, यह सब पर्यावरण को बचाने के लिये किया जा रहा है। हम प्लास्टिक का प्रयोग नहीं करते हैं। इसलिये इस तरह के पैकेट प्रयोग करते हैं। इसके अलावा, इसके कई फायदे हैं।
हमने रद्दी समाचार पत्रों का फिर से प्रयोग कर लिया; और
यह पैकेट लघु उद्योग के द्वारा बनाये जा रहे हैं। इस कारण बहुत से लोगों को काम मिल रहा है।'
यह छोटा सा, पर सराहनीय कदम है। यह छोटे-छोटे कदम ही हमारी पृथ्वी मां को बचा सकेंगे। यह हमारी जिम्मेवारी है कि यह काम सुचारु रूप से हो। क्योंकि किसी ने सच कहा है कि,
‘We have not inherited this planet from our parents. But have merely borrowed it from our children’ यह पृथ्वी हमें अपने पूर्वजों से नहीं मिली है यह हमारे पास वशंजों की धरोहर है
यह हमारी जिम्मेवारी है कि हम वशंजों की धरोहर, उन्हें ठीक प्रकार से उन्हें वापस दे सकें। क्या आप जानना चाहते हैं कि आप इसमें किस तरह से सहयोग कर सकते हैं। बहुत कुछ – देखिये आप क्या कर सकते हैं:
आप समान ऐसे पैकेटों में खरीदिये जो फिर से प्रयोग हो सकें और उन्हें बार बार प्रयोग करें।
शॉपिंग पर अपना बैग ले जायें।
पेपर को बेकार न करें। दोनों तरफ प्रयोग करें।
हो सके तो, लिफाफों को फाड़ कर, अन्दर की तरफ सादी जगह को, लिखने के लिये प्रयोग करें।
सारे बेकार कागजों को पुनर्चक्रण (recycling) के लिये इकट्ठा करें।
प्लास्टिक के पैकेटों का कम प्रयोग करें। सब्जी, फल या मांस को सुरक्षित रखने के लिये प्लास्टिक की जरूरत नहीं।
उन उत्पादनों को लें, जो हर बार पुनः फिर से भरने वाले पैकटों में मिलते हों। यदि आपकी प्रिय वस्तु ऐसे पैकेटों में न आती हो तो कम्पनी को इस तरह के पैकेटों में बेचने के लिये लिखें।
खाने की वस्तुओं को हवा-बन्द बर्तनों में रखें। उन्हें चिपकती हुई प्लास्टिक में रखने की जरूरत नहीं।
पेट्रोल बचायें, प्रदूषण कम करें।
अपने सहयोगियों और पड़ोसियों के साथ कार पूल कर प्रयोग करने का प्रयत्न करें।
बिना बात बिजली का प्रयोग न करें - बत्ती की जरूरत न हो तो बन्द कर दें।
पेड़ों, जंगलों के कटने को रोके। इनके कटने के खिलाफ लोगों को जागरूक करें।
पुनरावर्तित (recycled) वस्तुओं का प्रयोग करें।
ऐसे बिजली के उपकरण प्रयोग करें जो कम बिजली खर्च करते हों। इस समय इस तरह के नये तकनीक पर बने बल्ब आ रहें हैं। उनका प्रयोग करें।
पर्यावरण-मित्रवत उत्पादकों (environment friendly products) का प्रयोग करें।
आप इन पन्द्रह बिन्दुओं में से, कितने बिन्दुओं का पालन करते हैं। मैं इसमें सब तो नहीं, पर अधिकतर का पालन करता हूं। मेरे साइकिल चलाने के बारे में तो आप जानते ही हैं और शायद कोपेनहेगन व्हील (Copenhagen Wheel) बहुत कुछ बदल दे।
इसी के साथ, इस साल को अलविदा। नया साल आपके लिये शुभ हो, मंगलमय हो। नये साल में आप ऊपर-लिखित १५ बिन्दुओं में से, अधिक से अधिक बिन्दुओं का प्रयोग करें - आखिरकार हमें पृथ्वी मां को, अपने बच्चों के लिये बचा कर रखना है। हिन्दी चिट्ठाजगत भी नये साल में, नयी ऊंचाईयों पर पहुंचे - ऐसी कामना, ऐसा विश्वास।
हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
क्या चश्मदीद गवाह, न चाहते हुए भी, गलत बयान दे देते हैं: ►
यह ऑडियो फइलें ogg फॉरमैट में है। इन फाइलों को आप सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में, फायरफॉक्स ३.५ या उसके आगे के संस्करण में सुन सकते हैं। इस फॉरमैट की फाईलों को आप -
Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
Linux पर सभी प्रोग्रामो में – सुन सकते हैं।
बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें। इन्हें सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में फायरफॉक्स में भी सुना जा सकता है। इसे डिफॉल्ट करने के तरीके या फायरफॉक्स में सुनने के लिये मैंने यहां विस्तार से बताया है।
मैं काम के सिलसिले में बर्लिन गया था। वहां के लिये, भारत से कोई सीधी उड़ान नहीं थी। इसलिये दिल्ली से वियाना और वहां से बर्लिन गया था। लौटते समय, घूमने के लिये वियाना रुका था। इस चिट्ठी में वियाना यात्रा का वर्णन है।
वियाना – मैं पहुंच रहा हूं
बर्लिन से चलते समय, मैंने अपना कैमरा हैंड बैग में रख लिया था। बर्लिन हवाई अड्डे पर, एक महिला सिक्योरिटी की इंचार्ज थी। उसने कहा कि इस कैमरे से चित्र खींच कर दिखाओ। मैंने, उसे, उसका चित्र खींच कर दिखाया। उसने कहा कि अब इसे मिटा दो। मैंने उसकी बात मान ली। बाद में मैंने पूछा यदि चित्र ही मिटवाना था तो खिंचवाया ही क्यों? वह कहने लगी,
‘मैं देखना चाहती थी कि यह कैमरा ही है, न कि कुछ और।’
लगता है कि आतंकवादियों ने हवाई जहाज उड़ाने का नया तरीका निकाल लिया है
हवाई जहाज पर एक बम्बई के एक व्यापारी से मुलाकात हुई। मैंने पूछा कि वे बर्लिन कैसे आये थे। उनका जवाब था कि वे अपने लड़के से मिलने आये थे जो कि बर्लिन में यांत्रिकी इंजीनियरिंग पढ़ रहा है।
आईआईटी मद्रास, जर्मनी सरकार की सहायता से बना है। इसलिये वहां का यांत्रिकी इंजीनियरिंग विभाग बेहतरीन माना जाता है।
उन्होंने बताया कि जर्मनी की यांत्रिकी इंजीनियरिंग दुनिया में मशहूर है इसीलिये उनके लड़के वहां यांत्रिकी इंजीनियरिंग पढ़ रहे हैं। आईआईटी मद्रास, जर्मनी सरकार की सहायता से बना है। इसलिये वहां का यांत्रिकी इंजीनियरिंग विभाग बेहतरीन माना जाता है। उन्होने यह भी बताया कि जर्मनी में पढ़ाई का खर्च नहीं लगता – केवल रहने और खाने का। मैंने पूछा,
‘क्या यह केवल जर्मन लोगों के लिये है या सबके लिये।’
उन्होंने कहा कि यह सब के लिये है। मुझे यह कम समझ में आया कि क्यों जर्मन सरकार दूसरे देश के लोगों के लिये भी शिक्षा का पैसा नहीं लेती है। अमरीका में भी ऐसा होता है पर उसके एवज में उन्हें कुछ काम, जैसे टीचिंग एसिस्टेंट बनना पड़ता है।
वियाना में मुझे एक कॉन्वेन्ट में ठहरना था। इसी बात से, मुझे रास्ते में, १९६० के दशक में देखी फिल्म, सॉउन्ड ऑफ म्यूज़िक (Sound of Music), की याद आयी।
सॉउन्ड ऑफ म्यूज़िक फिल्म, सत्य कथा पर आधारित है
सॉउन्ड ऑफ म्यूज़िक (Sound of Music) फिल्म, १९६० के दशक में बनी थी। मैंने इसे तभी देखा था। यह आज तक की बनी संगीत-मय फिल्मों में, सबसे प्रसिद्ध है। इसे पांच ऐकेडमी पुरुस्कार मिलें हैं। यह मारिया नामक लड़की की सत्य कथा पर आधारित है।
मारिया का पूरा नाम मारिया फॉन ट्रैप (शादी के पहले कुक्षेरा) {Maria Von Trapp (nee Kutschera)} था। वह वियाना में रहने वाली एक अनाथ लड़की थी। वियाना से वह सॉल्सबर्ग (Salsburg) के एक कॉन्वेंट में नन बनने के गयी। वहां उसे, विधुर नेवल कमांडर के घर, सात बच्चों की देखभाल करने के लिये, भेजा गया। जहां दोनो में प्रेम हो गया और उन्होने शादी कर ली। द्वितीय विश्व युद्ध के समय, वे ऑस्ट्रिया से भाग कर, अमेरिका चले गये। मारिया ने बाद में अपनी जीवनी ‘द स्टोरी ऑफ ट्रैप फैमली सिंगरस् (The Story of the Trapp Family Singers) नाम से लिखी।
नन की भूमिका में जूलिया एंड्रयूस्
सॉउन्ड ऑफ म्यूज़िक, फिल्म मारिया की पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ ट्रैप फैमली सिंगरस्’ पर आधारित है। फिल्म की मूलभूत कहानी तो पुस्तक से ली गयी है पर फिल्मी मसाले के लिये, उसमें बदलाव किया गया है। वास्तव में, मारिया द्वितीय विश्व युद्ध के पहले ही कमांडर के घर बच्चों को देखने गयी थी और उसकी शादी भी पहले हो गयी थी पर यह फिल्म में यह सब द्वितीय विश्व युद्ध के समय का दिखाया गया है। हांलाकि वे द्वितीय विश्व युद्ध के समय ही वहां से भागे थे।
फिल्म में मारिया की भूमिका, जूलिया एंड्रयूस् कलाकारा ने निभाया है। यह कथा सॉल्सबर्ग की है और फिल्म की शूटिंग भी सॉल्सबर्ग में हुई है। यह एक बेहतरीन फिल्म है। यदि आपने नहीं देखी है तो अवश्य देखें। इस फिल्म का ट्रेलर का आनन्द लें।
सॉल्सबर्ग, वियाना से दूर है। वहां एक दिन में जाकर वापस नहीं आया जा सकता था इसलिये वहां नहीं गया। जिस जगह पर इस फिल्म की शूटिंग हुई है वहां पर कन्वेन्शन सेन्टर बन गया है और अन्तर-राष्ट्रीय सम्मेलन होते हैं। क्या मालुम कभी वहां सम्मेलन में जाने का मौका मिल जाय तब ही इस फिल्म की यादों को पूरा कर लूंगा।
इसी फिल्म पर आधरित हिन्दी की फिल्म ‘परिचय’ है। इसमें भारतीय परवेश के अनुसार, बदलाव किये गये हैं। इस फिल्म की मुख्य भूमिका में प्राण, जीतेन्द्र, और जया भादुड़ी हैं। परिचय फिल्म का गाना ‘सारे के सारे, गामा के संग’ सॉउन्ड ऑफ म्यूज़िक के लोकप्रिय गीत ‘डो रे मी … डो अ डीयर’ पर आधारित है। इसे भी आप सुन सकते हैं।
टमटम पर, राजसी ठाट-बाट के साथ
वियाना हवाई अड्डे पर, सिस्टर सिग्रेड और सिस्टर कारमेन, मुझे लेने आयी थीं। मैं इन लोगों से कभी नहीं मिला था। लेकिन उन्हें, उनके कपड़ों के कारण पहचान गया। यह लोग, एक बड़ी सी स्टेशन वैगन लेकर आयीं थीं जिसमें बैठने की तीन पंक्तियां थीं।
सिस्टर कारमेन जर्मनी से हैं। वे बहुत अच्छा कार चलाती हैं। उन्हें वियाना शहर के बारे में अच्छा पता है।
सिस्टर सिग्रेड महाराष्ट्र से हैं। उनकी हिन्दी अच्छी है। इस समय वे, सिस्टर जनरल की सलाहकार हैं। सिस्टर सिग्रेड को जर्मन भाषा तो आती है पर वियाना के बारे में ज्यादा पता नहीं था। वियाना में, सिस्टर सिग्रेड ने मेरा ख्याल रखा। मैं सारी सिस्टरस् और खास तौर से उनका आभारी हूं।
सिस्टर सीग्रेड, मुझे भाषाओं की खास जानकार लगीं
सिस्टर सिग्रेड की आवाज मधुर है वे गाना भी अच्छा गातीं हैं। एक दिन जब हम लोग घूमने निकले तब उन्होंने कार में, मां मरियम की स्तुति में एक भजन सुनाया। उन्होने बताया कि वे हमेशा बाहर जाते समय यह भजन गाती हैं। इस भजन में, मां मरियम से प्रार्थना है कि हमें अपनी शरण में ले लो। मैंने कार में ही इस गाने को रिकॉर्ड कर लिया था। आप भी इसे यहां सुन सकते हैं।
भारत जाते समय, सिस्टर सिग्रेड, मुझे हवाई अड्डे छोड़ने भी आयीं थीं। उस समय सिस्टर सिग्रेड ने हिन्दी में एक भजन सुनाया। वे भारत की लगभग सब भाषा में भजन गा लेती हैं और जर्मन में तो गाती ही हैं। मुझे, वे भाषा की खास जानकार लगीं।
सिस्टर सिंथिया और सिस्टर सीग्रिड, टमटम पर। साथ में है महिला चालक लियाना। यह चित्र हीरोस् स्कवैर (Heroes' Square) पर खींचा गया था। टमटम के पीछे, घुड़सवारी करते हुऐ, ऑस्ट्रिया के आर्कड्यूक चार्लस् Archduke Charles of Austria की मूर्ति है। वे राजा के पुत्र और १८वीं शताब्दी में आस्ट्रिया सेना में फील्ड मार्शल थे।
बर्लिन में यदि कुछ जगहों पर रिक्शा के द्वारा घूमा जा सकता है तो वियाना में घोड़ागाड़ी पर। वियाना में घोड़ागाड़ी, पुरूष वा महिला दोनो ही चलाते हैं। जिस घोड़ागाड़ी का मैंने चित्र लिया था उसकी चालक महिला थी। उसका नाम नाम लियाना है। उसने मुझे बताया कि इस घोड़ागाड़ी को फिआकर कहते हैं। मैंने उसे बताया कि भारत में इसे टमटम कहते हैं। चलते समय लियाना ने मुस्करा कर कहा ‘टमटम’। मैंने भी मुस्करा कर जवाब दिया – फिआकर। इन घोड़ागाड़ियों के इतिहास के बारे में कुछ जानकारी यहां से प्राप्त की जा सकती है।
इस तरह की घोड़ागाड़ी, महारानी विक्टोरिया की प्रिय सवारी थी और तभी इनका चलन बढ़ा। इसलिये इन्हें विक्टोरिया भी कहा जाता है। विक्टोरिया नम्बर २०३, घोड़ा गाड़ी के इर्द-गिर्द घूमती लोकप्रिय फिल्म है। इसमें मुख्य भूमिका अशोक कुमार और प्रान ने निभायी है।
सिगमंड फ्रायड संग्रहालय
सिगमंड फ्रायड का वियाना में घर जहां पर अब संग्रहालय है
वियाना दुनिया के संगीत की राजधानी कही जाती है। यहां बड़े-बड़े संगीतकार हुए हैं जिनमें बीथोवियन, (Beethoven) मोज़ार्ट (Mozart) मुख्य हैं। वियाना में लोग इनके संग्रहालय या म्यूज़िक कॉंसर्ट देखने जाते हैं पर मैं यदि वियाना में कहीं जाना चाहता था तो उस जगह, जहां सिगमंड फ्रायड (Sigmund Freud) ने अपना जीवन व्यतीत किया।
फ्रायड १९३८ तक वियाना में रहे। वे यहूदी थे। १९३८ में, वियाना जर्मनी का हिस्सा बन गया तब वे सपरिवार लंदन चले गये। १९३९ में, वहां उनकी मृत्यु हो गयी।
मैं बर्लिन से तैयार होकर निकला था। नाश्ता, हवाई जहाज में ही कर लिया था। हम लोग वियाना हवाई अड्डे से ही फ्रायड संग्रहालय देखने चले गये। इस संग्रहालय को बनाने में उसकी बेटी ने मदद की। संग्रहालय के इंचार्ज ने बताया कि इस संग्रहालय को लगभग १०० लोग रोज देखने आते हैं।
संग्रहालय में मेरे साथ सिस्टर सीग्रेड और सिस्टर कारमेल थीं। हमें देख कर, वहां पर काम कर रही महिला मुस्कराने लगी। मैंने पूछा,
‘क्या आप लोग, सिंगमड फ्रायड के संग्रहालय में, सिस्टरों को देख कर मुस्करा रही हैं?’
उसने हांमी भरी। लेकिन मुस्कराने का कारण यह भी बताया कि हम तीन में से दो भारतीय हैं।
फ्रायड पढ़ाई के सारे विषयों में या तो बहुत अच्छे थे या उत्कर्ष – इससे कम नहीं
मरीजों के लिये वेटिंग रूम
यहां पर फ्रायड के शिक्षा संबंधी सर्टिफिकेट भी देखे जा सकते हैं। यह बताते हैं कि फ्रायड सारे विषयों में,
बहुत अच्छे (very good) थे, या
उत्कर्ष (excellent) थे।
इससे कम नहीं।
इस संग्रहालय से कुछ यादगार सामाग्री (Souvenir) भी खरीदी जा सकती है। मैंने वहां से फ्रायड की एक फोटो खरीदी। उनके मरीजों का प्रतीक्षालय (Waiting room) वा उनका परामर्श देने वाला कमरा (Consulting chamber) भी देखा।
फ्रायड आजकल प्रासंगिक नहीं माने जाते हैं। लेकिन जिस समय उन्होंने सेक्स के बारे में अपने सिद्घान्तो को प्रतिपादित किया उस समय इस विषय पर चर्चा करना करना, एक हिम्मत की बात थी। उन्होंने सामाजिक बंधनो से ऊपर उठकर इस विषय पर बात की। उनके पूरे संघर्ष को, जीवनी के रूप में, इर्विंग स्टोन (Irving Stone) ने ‘पैशन आफ माइंड’ (The Passion of Mind) नामक पुस्तक में लिखा है। यह पुस्तक पढ़ने योग्य है।
मन प्रभू के चरणों में
कांवेन्ट से वियाना शहर
मैं वियाना के जिस कॉन्वेंट में ठहरा, वह एक पहाड़ी पर है। यह बेहद खूबसूरत जगह है। यहां से वियाना शहर का काफी भाग दिखाई पड़ता है। इसका क्षेत्रफल भी बहुत बहुत अधिक है। यहां से प्रकृति का नज़ारा भी सुन्दर है। उस समय पत्तियां लाल, और पीली हो रही थीं। जो कि ठंड के आते-आते, अधिकतर सारे पेड़ों से – क्रिसमस पेंड़ (Christmas Tree) को छोड़कर – गिर जाती हैं। बसन्त ऋतु के आते ही फिर निकलती हैं। पेड़ हरे, पीले, और लाल रंग के दिखायी देते हैं। यह एक खूबसूरत नज़ारा होता है। मुझे यहां शान्ति मिली और लगा कि मन ईश्वर के चरणों में है।
कॉंन्वेन्ट में कमरा
कांवेन्ट में केवल सिस्टरें ही रहती हैं। वे अपने कॉवेन्ट के मुखिया का भी चुनाव करती हैं जिसे सिस्टर जनरल कहा जाता हे। यह छ: साल के लिये होता है। इनकी चार सलाहकार होती हैं जो उन्हें सलाह देती हैं। इन्होंने विश्व को खण्डों में बांटा है। हर खण्ड का अपना मुखिया हैं। वे अपने सलाहकारों के साथ आगे की योजना बनाकर कॉवेन्ट में भेजती हैं। कॉंवेन्ट के अनुमोदन के बाद, उस खण्ड में योजना के अनुसार काम आगे चलता है।
कमरे की खड़की से बाहर का दृश्य
वियाना में सारे स्कूल सरकारी हैं। प्राइवेट स्कूल बहुत मंहगे हैं इसलिये यह कॉन्वेंट वहां पर कोई स्कूल नहीं चलाता है। लेकिन, बहुत सी सिस्टरें, स्कूलों में पढ़ाती हैं या फिर अस्पताल में या वृद्घ लोगों के आश्रम में नर्स की तरह काम करती हैं। किन्डरगार्डेन के लिये जरूर कांवेन्ट कुछ सुविधा प्रदान करता है। यहां से जो पैसे मिलते हैं वे कॉन्वेंट के पास जाते हैं। इससे वहां का खर्च वगैरह चलता है। कुछ पैसा सिस्टरों के वृद्घ उम्र के लिये रखा जाता है।
क्या भाई को सौतेली बहन स्वीकर कर लेनी चाहिये
सिस्टर साइन हिल डे और सिस्टर कारमेल
इस कॉन्वेंट में, मेरी मुलाकात सिस्टर साइन हिल डे से हुई। वे कांवेन्ट की सिस्टर जनरल रह चुकी हैं। सिस्टर डे, बहुत समय भारत में रहीं हैं। हिन्दी अच्छी समझती हैं पर बोल नहीं पाती हैं। उन्होंने बताया कि भारत में लोग उन्हें फ्लाइंग नन कहते थे क्योंकि वे पहले मोपेड, फिर स्कूटर, और बाद में मोटरसाइकिल चलाती थीं।
सिस्टर डे मुझे बहुत रोचक महिला लगीं। उनके पास किस्सों का भंडार था जिन्हें वे, न केवल नाश्ते और खाने पर, लेकिन शाम को घूमते समय सुनाती रहीं। उनका एक किस्सा तो मुझे फिल्मों की तरह लगा।
कॉन्वेंट के पूजाघर (Chapel) में मां मरियम की मूर्ती
उन्होंने बताया कि बहुत साल पहले, एक भारतीय प्रतिनिधि-मंडल वियाना आया था। उसके साथ, एक भारतीय डाक्टर भी था। वह कुछ महीने वहां रहा। उसके बाद लंदन, फिर वापस भारत चला गया। वियाना में, उसका प्रेम एक आस्ट्रियन लड़की से हो गया। उससे एक लड़की हुई। मां, आस्ट्रिया में ही रह गयी थी। उसने उस लड़की को अनाथालय में छोड़ दिया। लड़की देखने में एकदम भारतीय लगती है।
सिस्टर डे भारत में उसके पिता को जानती थीं। लेकिन वे उससे, इस बात को नहीं कह पायीं। उसका पुत्र अपनी पत्नी के साथ सिस्टर डे से अक्सर मिलने आया करता था। उन्होंने उसे एक दिन अकेले आने को कहा और उसे उसकी सौतेली बहन के बारे में बताया। वह लड़की, भारत में अपने सौतेले भाई से भी मिली। लेकिन उसके भाई ने, उसे मानने से इन्कार कर दिया।
सिस्टर डे ने बताया कि भाई का लड़का अर्थात आस्ट्रिया में रह रही लड़की का भतीजा, इन बातों को ज्यादा ठीक से समझता है। वह अपनी सौतेली बुआ को स्वीकार कर सकता है। शायद निकट भविष्य में, ऐसा संभव हो सके। यदि ऐसा होता है तो उस महिला को वह पहचान मिल सकेगी जो उसके पिता या सौतेले भाई ने नहीं दी।
मुझे लगता था कि यदि मैं वह पिता या भाई होता तो उसे जरूर स्वीकार कर लेता। गलतियां स्वीकारने में कोई छोटा नहीं होता – बड़ों की यही खासियत होती है। शायद उसके पिता को अपनी प्रतिष्ठा या भाई को अपने पिता के नाम पर समाज में धक्का लगने का डर रहा हो या हो सकता है कि भाई विश्वास ही नहीं करता हो।
मैं दिल से चाहता हूं कि भतीजा अपनी सौतेली बुआ को स्वीकार कर ले। मैं भगवान को नहीं मानता – अज्ञेयवादी हूं, धर्म को अलग तरह से देखता हूं, पर हे प्रभू, यदि तुम हो, तो ऐसा होने देना।
सिस्टर डे के पास बहुत से किस्से थे। मैंने उनसे कहा,
‘सिस्टर डे, आप इन किस्सों को किताब के रूप में लिख कर क्यों नहीं प्रकाशित करवातीं।’
वे इस बात का कोई जवाब देने से टाल गयीं। उन्होने मुझे फिर वियान कॉन्वेंट में रहने के लिये सपरिवार बुलाया है। यदि मैं फिर गया तो उनसे चिट्ठा लिखवाना जरूर शुरू करवा दूंगा
वियाना रात में
काहलेनबर्ग पर चर्च
एक दिन, शाम को, सिस्टर साइन हिल डे मुझे वियाना के नज़ारे दिखाने ले गयीं।
हम लोग पहले काहलेनबर्ग (Kahlenberg) पहाड़ी पर गये। अठ्ठारहवीं शताब्दी में टर्की ने आस्ट्रिया पर हमला बोल दिया था पोलैंड की सहायता से उन्हें हराया जा सका। इसी उपलक्ष में उस जगह पर एक चर्च का निर्माण हुआ था। यहां से पूरे वियाना, को जो की बिजली रोशनी में जगमग कर रहा था, देखा जा सकता है। यह अपने में सुन्दर दृश्य है। वहां पर होटल मैनेजमेंट स्कूल है जिसका अपना रेस्ट्रां है। इसमें असाम चाय के साथ, दार्जलिंग चाय भी मिलती है। मैंने इसे न लेकर फ्रूट चाय लेना पसन्द किया।
चाय पीने के बाद हम लोग ग्रिनज़िंग (Grinzing) नाम जगह गये। ग्रिनज़िंग यानि कि जहां इसी साल में बनी वाइन (wine) मिलती हो। ये जगह वियाना में प्रसिद्घ है। आस्ट्रिया न केवल अपने संगीत के लिये, पर अपनी वाइन के लिए भी प्रसिद्घ है। इस जगह बहुत सारे रेस्ट्रां हैं। जो कि अपनी वाइन स्वयं बनाते हैं और खाने में पेश करते हैं। पर वहां हर तरह की वाइन भी मिलती है।
काहेलबर्ग से वियाना - यह चित्र Clemens Pfeiffer का खींचा हुआ है और विकिपीडिया के सौजन्य से है।
हम लोग, वहां के ह्यूडोल्फ हाफ (Houdolf Haf) नामक रेस्ट्रां में खाने गये। यह १०० साल से भी ज्यादा पुराना रेस्ट्रां है। यहां पर अक्सर वियाना राजा के पुत्र आया करते थे।
रेस्ट्रां में पियानो एकार्डियन और वायलन बजाते रोमा जिप्सी
यहां पर एक व्यक्ति पियानो एकार्डियन और दूसरा वायलन बजा रहा था। वायलन बजाने वाला व्यक्ति मुझे भारतीय लगा। मैंने उससे बात की तो उसने बताया कि वह रोमा जिप्सी है। जिप्सियों का मूल, भारत ही कहा जाता है। शायद इसलिये वह मुझे भारतीय लगा। मुझसे बात करते समय, उसने मुस्कराकर, हिन्दी के कुछ शब्द भी बोले।
मैं बाहर जाता हूं तो वहीं का खाना पसन्द करता हूं। वहां पर मुझे एक भारतीय मिले उन्होंने एक आस्ट्रियन लड़की से शादी कर ली है और वहीं पर बस गये हैं। आजकल फैशन गहनों (Fashion Jewellery) का बोलबाला है। इसी को वे, दुनिया भर से निर्यात कर, आस्ट्रिया में बेचते हैं। उनकी पत्नी बहुत अच्छी हिन्दी बोलती हैं। मैंने पूछा कि वे कैसे इतनी अच्छी हिन्दी बोलती हैं। उन्होंने बताया,
‘वियाना के विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ायी जाती है। मैंने वहां पर हिन्दी पढ़ी और सीखी है।’
भारतीय शख्स की सलाह पर, मैंने आलू सलाद (Potato Salad), वीनर शीत्जल (Weiner Schnitzel) खाने में लिया।
विनर शीतजल एक नामिष भोजन है जिसमें पोर्क (सुअर का मांस) होता है। यह वियाना की खासियत है।
आलू सलाद में कुछ मिठास थी।
मुझे, आलू सलाद पसन्द आयी। इसके आलू बहुत कोमल थे, कांटे से पकड़ने पर टूटते थे। सिस्टर डे ने बताया कि अच्छा पका आलू इसी तरह से होता है। मैं, आलू सलाद को, कांटे से नहीं खा पाया अंतत: उसे चम्मच से ही खाना पड़ा। इसके बनाने का तरीका भी सिस्टर डे ने मुझे बताया था पर समझ में नहीं आया।
एक प्यारी सी लड़की – लीसा
लीसा
वियाना के कॉन्वेंट में, मेरी मुलाकात लीसा से हुई। वह मुझे एक प्यारी सी लड़की लगी।
लीसा ने मुझे बताया कि आस्ट्रिया में उच्च शिक्षा या व्यावसायिक (Professional) शिक्षा के पहले की शिक्षा निम्न भागों में है:
किण्डरगार्डन (Kindergarten) ३ से ६ साल की उम्र
फाल्क शुले (Volkschule) ७ से ११ साल की उम्र
जिमनेसियम (Gymnasium) ४ साल की पढ़ाई
मथुरा (Mathura) यह pre university की तरह है।
लीसा जिम्नेसियम में पढ़ती है। शायद यह हमारे यहां के हिसाब से दसवीं क्लास है।
लीसा को कॉवेन्ट में देखकर, मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने पूंछा कि वह यहां कैसे आयी है। उसने बताया,
‘मैं लिंज (Linz) में रहती हूं। यह वियाना से लगभग २०० किलोमीटर दूर है। कॉन्वेंट में रहने वाली एक सिस्टर का घर, मेरे घर के पास है। मैं उन्हीं के कहने पर, छुट्टियों में कॉवेन्ट में आती हूं। मुझे यहां अच्छा लगता है लेकिन मेरे मित्रों को कॉवेन्ट पर जाना अच्छा नहीं लगता है।’
लिंज़ शहर के घूमते हुऐ सुन्दर चित्र देखने के लिये यहां जायें।
लीसा के पिता एयर कंडीशनिंग कंपनी में काम करते हैं और मां उसी स्कूल में काम करती है जहां वह पढ़ती है। यह एक सरकारी स्कूल है। वह अपने माता पिता की इकलौती सन्तान है पर उसे कभी अकेलापन नहीं महसूस होता है क्योंकि उसके छ: चचेरे ममेरी, भाई – बहन हैं जिनके साथ वह सप्ताहान्त बिताती है। मैंने लीसा से कहा कि भारत में लोग अक्सर लड़के की चाहत रखते हैं क्या ऎसा यहां भी है उसने कहा,
‘नहीं, यहां इस तरह की कोई भावना नहीं है।’
लीसा के स्कूल में, नोटबुक वाली कक्षा
लीसा के पास एक लैपटॉप था। उसने बताया कि वह नोटबुक क्लास में है उसके क्लास में सभी बच्चे अपना लैपटॉप लेकर आते हैं और सारे नोट्स भी उसी पर लेते हैं। काश अपने देश के भी स्कूल इसी तरह के हों।
मुझे सिस्टर डे ने बताया कि लीसा बड़ी होकर डाक्टर बनना चाहती है। मुझे खून देखकर डर लगता है। मैं यह जानते हुए भी कि खून देने में कुछ नहीं होता है आज तक कभी खून नहीं दे पाया। इसीलिये मैं कभी डाक्टर नहीं बन सकता था। हालांकि मैंने उन पुस्तकों को पढ़ा है जिसे उन बच्चों को पढ़ना चाहिये जो डाक्टर बनने का सपना देखते हैं। इन पुस्तकों में से प्रमुख हैं,
मैंने लीसा को यह पुस्तकें भेजने का वायदा किया था। इनमें पहली वाली नहीं मिली पर दूसरी और तीसरी मिली। इन दो पुस्तकों को, मैंने उसके पास भेजा है।
आप पुस्तकों के नाम पर चटका लगा कर इनकी समीक्षा हिन्दी में पढ़ सकते हैं। इन समीक्षाओं का हिन्दी में पॉडकास्ट सुनने के लिये, इनके आगे कोष्टक के अन्दर लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ऑग फॉरमैट में है। सुनने के लिये दहिने तरफ का विज़िट पढ़ें।
Guten Tag, Lisa
It was pleasure to meet you in Vienna. I wish, I had more time to talk to you. I wanted to talk about about Austria and student life there. The time was short and I had to pack my things. I promise that when we meet next, I will have tea with you.
Do let me know when you receive the books. Do remember the conditions:
You have to read and tell me about the books.
You have to share it with your friends.
All the best in your life,
Auf Wiedersehen
लीसा नमस्ते
तुमसे वियाना में मिल कर अच्छा लगा। काश मेरे पास और समय होता तो मैं तुमसे ऑस्ट्रिया और वहां के विद्यार्थी जीवन के बारे में बात करता। मुझे समान पैक करना था। इसलिये तुम्हारे हाथ की बनी चाय न पी सका। अगली बार मिलेंगे तो चाय भी पियेंगे और बहुत सारी बातें करेंगे।
लिखना क्या किताबें मिली, शर्तों का भी ध्यान रखनाः
तुम्हें, इन किताबों को पढ़ कर, इनके बारे में, लिख कर मुझे बताना है
इन्हें सबको पढ़ने के लिये देना है
तुम्हें जीवन की हर खुशी मिले।
हम फिर मिलेंगे,
तब तक के लिये अलविदा।
लीसा से मेरी अक्सर ई-मेल पर बात होती है। मैं अपने बिटिया रानी (वास्तव में मेरी बहूरानी), बेटे राजा और लीसा से होने वाली ई-मेल की चर्चा ई-पाती श्रंखला में करता रहता हूं।
वियाना में घूमने की जगहें
हॉप ऑन - हॉप ऑफ बस का टिकट
वियाना में भी, बर्लिन की तरह हॉप ऑन – हॉप ऑफ (Hop on – Hop off) बसें चलती हैं। वियाना घूमने का यही सबसे अच्छा तरीका है। इनके तीन अलग-अलग रूट हैं पर उनके चलने तथा समाप्त होने की जगह एक ही है। तीनो के टिकट यदि एक साथ खरीदें तो वह २० यूरो पड़ता है।
जैसा कि मैंने पहले बताया है कि मैं एक दिन सिस्टर सीग्रिड और सिस्टर सिंथिया के साथ वियाना शहर घूमने गया था। हमने तीनो रूट का टिकट एक साथ लिया।
हीरोस् स्कवैर
हम लोग सबसे पहले हीरोस् स्कवैर (Heroes’ Square) पर उतरे। यह ऐतिहासिक जगह है। यहां महत्वपूर्ण कार्यक्रम होते हैं। १९३८ में जब हिटलर ने आस्ट्रिया को जर्मनी में मिलाया तो उसकी घोषणा यहीं पर की थी।
यहां पर एक जगह एक संगीतकार वायलिन पर धुन बजा रहा था। उसके सामने बर्तन में कुछ लोग पैसा भी डाल रहे थे।
अन्दर से, सेंट स्टीफंस कैथड्रल
हम लोग सेंट स्टीफंस कैथड्रल (Saint Stephens Cathedral) गये। यह कैथड्रल यहां का सबसे महत्वपूर्ण चर्च है। वहां पर पूजा (Mass) हो रही थी। यह चर्च अपने में भव्य है। पूजा जर्मन भाषा में थी। कैथड्रल जाते समय, हमने वह जगह भी देखी, जहां मोजार्ट ने अपने जीवन के कुछ साल बिताये थे।
चर्च में मोमबत्ती जलाने के रिवाज है। सिस्टर ने बताया,
‘ईसा मसीह ने दुनिया में प्रकाश दिया था। चर्च में मोमबत्ती जलाना, इसी का प्रतीक है।’
यहां मोम से बने दिये जलाये जाते हैं। मैंने दो दिये जलाये। सिस्टर सिग्रेड ने पूछा,
‘आप दो मोमबत्ती क्यों जला रहे हैं। आपका तो एक ही बेटा है।’
मैंने कहा,
‘यह सच है कि भगवान ने मुझे एक ही बेटा दिया है कोई बेटी नहीं दी। लेकिन मैं दूसरी मोमबत्ती अपनी बहूरानी के लिये जला रहा हूं। हम उसे बेटी की तरह ही मानते है।’
मुझे लगा कि सिस्टर सिंथिया के दिल में, एक छोटी सी, नटखट सी, बच्ची है।
हम लोग दूसरे रूट पर गये। इसमें एक मनोरंजन पार्क है और एक बहुत बड़ा गोल घूमने वाला गोला है। यह १० मिनट में पूरा एक चक्कर घूमता है। सिस्टर सीग्रेड ने पूछा कि क्या मैं यहां उतरना चाहूंगा। मैंने मना कर दिया क्योंकि मैं तीसरी रूट पर राजा के महल में उतरना चाहता था। सिस्टर सिंथिया पार्क की तरफ देख कर बोली,
‘एक दिन, मैं यहां आऊंगी और पूरा दिन यहीं रहूंगी।’
मुझे लगा कि उनके मन के किसी कोने में एक छोटी सी, नटखट सी, बच्ची है।
दूसरे रूट का चक्कर लेते समय, हमें डान्यूब (Danube) नदी मिली। यह नदी जर्मनी, आस्ट्रिया, स्लोवेकिया, हंगरी, क्रोशिया, सर्विंग, रोमानिया, बुलगारिया और यूक्रेल से गुजरते हुए ब्लैक समुद्र (Black sea) में गिरती है। इसे दो भागों में विभक्त कर, उसके बीच में द्वीप बना दिया गया है जिस पर मनोरंजन के कई साधन हैं। नदी पर नावें (cruise) भी चलती हैं। इसे देख मुझे अपनी गोवा यात्रा में मंडोवी नदी पर नाव से सैर की याद आयी।
राजा के महल में पीछे का बाग
तीसरी ट्रिप में हम राजा के महल (Schloss Schonbrunn) आये। इसके देखने के लिये कई टूर हैं और सबका पैसा अलग-अलग है। हम लोगों ने सबसे सस्ता वाला टूर लिया। इसमें ३५ कमरों का दिखाया जाता है। इसकी सबसे अच्छी बात है कि यह आपको एक माइक्रोफोन देते हैं। कमरे में जाकर बटन दबाइये तो वह उस कमरे के बारे में यह बताता है और उस कमरे के वर्णन के बाद रूक जाता है। अगले कमरे में जाकर पुन: बटन दबाने पर, उस कमरे के बारे में बताना शुरू करता है।
महल के पीछे राजा का बाग है। यह जगह बहुत सुन्दर थी। हर तरफ हरे भरे लॉन हैं। वहां पर लोगों ने बताया कि गर्मी में यह और भी खूबसूरत लगता है।
कॉन्वेंट में पूजा और सिस्टर लूसी
कॉंवेन्ट में पूजा
कॉवेन्ट में, मैंने उनकी पूजा (Mass) में भी भाग लिया। इसके पहले मैं कभी भी इसाई पूजा में शामिल नहीं हुआ था। उस दिन पूजा के लिये, लंदन से खास तौर पर एक पादरी (Father) आये थे। सिस्टर कारमेल अच्छा आर्गन बजाती हैं वे आर्गन बजा रही थीं। दो सिस्टर और एक अन्य पुरूष (जो इसी पूजा के लिए आये थे) गिटार बजा रहे थे।
सिस्टर ऎडल पान फ्लूट बजाती हुई।
सिस्टर ऎडल, कभी मेडोलिन बजाती थीं तो कभी एक अन्य वाद्य। मैं इस वाद्य को नहीं समझ सका। पूजा के बाद सिस्टर ऎडल ने बताया कि यह
‘पान फ्लूट है। मेडोलिन इटली का वाद्य है और पान फ्लूट इजिप्ट का। इसका वर्णन बाइबिल में भी है।’
यह पूजा जर्मन में थी जो कि समझ में नहीं आती थी पर भाव जरूर समझ में आये। कुछ देर भजन गाया जाता था फिर कुछ संदेश। कभी फादर संदेश देते थे तो कोई सिस्टर। मुझे उनका एक भजन ‘अले लू ल्या‘ कर्णप्रिय लगा। इसके संगीत से यह खुशहाली का भजन लगा। शायद इसका अर्थ भी कुछ इसी तरह है।
पूजा के बाद, वे कुछ पानी और कुछ डबलरोटी सा बांट रहे थे। सिस्टर सिग्रेड ने मुझे बताया कि मुझे यह नहीं लेना है इसके लिए संस्कारों की कई सीढ़ियां पार करनी होती है जो कि मैंने नहीं की है।
टौमी तो मुझे हमेशा हर जगह मिल जाते हैं - कॉन्वेंट में भी मिले।
सिस्टर लूसी
सुबह पूजा के बाद हम लोग नाश्ते के लिये गये। उस दिन सिस्टर लूसी का जन्म दिन था। वे मुम्बई से हैं। उनके लिये, हम लोगों ने Happy birth day गाया। इसी के बाद मैं, सिस्टर सिग्रेड, और सिस्टर सिंथिया वियाना घूमने चले गये थे। लौटते समय, मैंने सिस्टर लूसी के लिए एक सफेद गुलाब लिया। हम लोग जब कॉंवेंट वापस पहुंचे तो वहां रात का खाना चल रहा था। मैंने उनका हांथ चूमकर उन्हें गुलाब दिया। यह न केवल सिस्टर लूसी को पर सारी सिस्टरों को पसन्द आया। सबने तालियां बजाकर इसका स्वागत किया। सिस्टर लूसी ने कहा कि वे इसे ईसा के चरणों में समर्पित करती हैं और वे मेरे लिये प्रार्थना करेंगी। वे अगले सुबह तक, इस बात को याद करती रहीं और नाश्ते पर फिर से मुझे धन्यवाद दिया।
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा – वियाना से वापसी
वियाना से मेरी उड़ान दिन के ११ बजे थी। मेरे साथ एक और सिस्टर भी उस दिन जा रहीं थी। उन्होंने नाश्ते पर एक छोटा सा भाषण दिया। मैं भी खड़ा हो गया और कहा कि मैं भी कुछ कहना चाहता हूं। सबने इसका स्वागत किया।
मैंने कहा,
‘गुटन मारगेन (शुभ प्रभात)
वियाना में अनगिनत पर्यटक आते हैं सबके अनुभव अपने ही अलग अलग होते होंगे पर मेरा अनुभव अपने में अद्वितीय है। मैंने वियाना को रात में, दिन में, सिस्टरों के साथ देखा। इस तरह का अनुभव शायद किसी और पर्यटक को हुआ होगा।
आप सबका भारत में स्वागत है। भारत में आप मेरे साथ रहें तो मुझे अच्छा लगेगा।
डांके शॉन (आप सबको बहुत धन्यवाद)
ऑउफ वीडरसेह्न (गुड बाई फिर मिलेंगे)’
वियाना से दिल्ली की यात्रा में, मेरे बगल में एक माड़वाड़ी यूवक बैठे थे। वे फर्राटे से जर्मन बोल रहे थे। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने पूछा कि क्या वे जर्मनी में रहते हैं। उन्होने बताया कि नहीं। वे नेपाल में रहते हैं और वहां रह कर कालीन का व्यापार करते हैं और उन्हें जर्मनी में बेचते हैं। इसलिये उन्होने जर्मन भाषा सीखी है। वे साल में लगभग दो बार जर्मनी जाते हैं। उन्होने रास्ते में हवाई जहाज पर कुछ इत्र खरीदा। मैंने पूछा,
‘क्या पत्नी के लिये खरीद रहे हैं?’
वे बोले
‘नहीं। मैं यह उपहार देने के लये खरीद रहा हूं।’
मैंने पूछा,
‘क्या हवाई जहाज में खरीदने से कोई फायदा है?’
उन्होने बताया कि इसके दाम और ड्यूटी फ्री शॉप के दाम में कोई अन्तर नहीं है पर हवाई जहाज में खरीदने से पॉइंट मिल जाते हैं जिससे बाद में टिकट में सस्ते में मिल जाता है।
बात करते करते, हम दिल्ली के हवाई अड्डे पर पहुंच गये। धूल धक्कड़ भीड़ शोर शराबा – इसी सब के लिये तो मैं तरस रहा था। अपना देश तो सबसे प्यारा है।
इस चिट्ठी में कोवलम अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र तट की चर्चा है।
त्रिवेन्दम में हम केटीडीसी के होटेल में ठहरे थे। इस होटल के सामने के समुद्र तट का नाम 'समुद्र' था। यह बहुत सुन्दर है पर हमारे टैक्सी चालक प्रवीन के अनुसार,
'समुद्र तट बहुत जल्दी गहरा हो जाता है और बहुत लहरें आती हैं। इसमें यदि आप अच्छा तैरना नहीं जानते हैं तो नहीं नहा सकते हैं। कोवलम समुद्र तट में पानी जल्दी गहरा नहीं होता है। इसलिए इसमें आप बहुत दूर तक नहाने जा सकते हैं और यदि आपको बहुत अच्छा तैरना नहीं भी आता है तो भी आप नहा सकतें है। इसमें लहरें भी बहुत ऊँची- ऊँची नहीं आती हैं। इसलिये अधिकतर विदेशी कोवलम समुद्र तट पर जाते हैं। इसे अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र तट भी कहा जाता है। आपको वह तट भी देखना चाहिए।’
हम लोगों ने पहले सोचा था कि कन्याकुमारी से लौटते समय हम लोग कोवलम तट पर भी जायेगें। लेकिन लौटते-लौटते अंधेरा हो गया। इसलिये वहां नहीं जा पाये।
त्रिवेन्डम में काम समाप्त करने के बाद, हम कोवलम समुद्र तट पर गये। हांलाकि, जब हम वहां पहुंचे तब सूरज डूब चुका था पर यह हमारा आखिरी दिन था। हमारे पास इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं था।
कोवलम अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र तट के बारे में, हम लोगों ने कई तरह की बाते सुन रखीं थी पर हमें वैसा कोई दृश्य देखने को नहीं मिला। शायद वहां पहुंचते सूर्यास्त हो चुका था और अन्धेरा शुरू हो गया था।
हम जब कोवलम तट पर पहुंचे तब वहां अंधेरा हो चुका था। इस कारण समुद्र तट के कोई चित्र नहीं खींच पाये। ऊपर के दोनो चित्र, विकिपीडिया कि सौजन्य से, कोवलम समुद्र तट के हैं।
मेरे बेटे को शर्ट पसन्द है। उसका कहना है कि हम जहां जायें वहां से उसके लिये शर्ट ले आया करें। समुद्र तट पर बहुत सी दुकाने थीं जहां पर शर्ट मिल रही थीं। हम लोग एक दुकान पर गये वहां पर एक साधारण सी महिला बैठी थी पर जब हमने उससे बात शुरू की तब वह शुद्घ उच्चारण में अंग्रेजी बोलने लगी। यहां पर दुनिया भर से, विदेशी आते हैं इसलिये यहां के लोग कई भाषा सीख लेते हैं। मैंने कई दुकानदारों को अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच और स्पैनिश भाषा बोलते सुना।
कोवलम समुद्र तट के किनारे खाने की जगहें थी। हर खाने की जगह की टेबल से समुद्र दिखायी देता था। आप खाना भी खायें और समुद्र का आनन्द भी लें।
वहां पर बहुत सारे रेस्तरां भी थे। उनके सामने, मछलियां भी रखी रहती थी। आप पसन्द कर लें। वही बना दी जायेगी। मैं स्वयं मछली खाता हूं पर मालूम नहीं क्यों, इस तरह से मछली पसन्द कर, खाने का मन ही नहीं किया।
कोवलम तट का चक्कर लगाने के बाद हम वापस आ गये। हम खाना खा कर, जल्दी सो गये। हमें अगले दिन सुबह ही हवाई जहाज पकड़ना था। इसी के साथ केरल - ईश्वर की भूमि - यात्रा विवरण समाप्त होता है अब हम चलेंगे, देव भूमि हिमाचल की यात्रा पर।
हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
क्या चश्मदीद गवाह, न चाहते हुए भी, गलत बयान दे देते हैं: ►
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Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
Linux पर सभी प्रोग्रामो में – सुन सकते हैं।
बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें। इन्हें सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में फायरफॉक्स में भी सुना जा सकता है। इसे डिफॉल्ट करने के तरीके या फायरफॉक्स में सुनने के लिये मैंने यहां विस्तार से बताया है।
यह चित्र मैसाचुसेटस् इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजी की वेबसाइट से।
‘उन्मुक्त जी, आप यह इसलिये कह रहे हैं क्योंकि आप साइकिल प्रेमी हैं।’
यह सच है कि मैं साइकिल प्रेमी हूं और कई काम साइकिल पर ही करता हूं। मैंने अपने साइकिल प्रेम के बारे में पहले भी लिखा है। लेकिन यह बात मैं अपने साईकिल प्रेम के कारण नहीं पर कोपेनहेगन व्हील के कारण कह रहा हूं। मैं यह भी सोचता हूं कि साइकिल चलाना, अपनी पृथ्वी मां की धरोहर को बचा रखने में सहायक है।
‘कोपेनहेगन व्हील!! यह क्या बला है?’
कोपेनहेगन व्हील, मैसाचुसेटस् इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजी के द्वारा बनाया गया, नयी तरह का चक्का है। यह लाल रंग का है और किसी भी साइकिल में लगाया जा सकता है। आप जब ब्रेक लगाते हैं या पहाड़ी पर नीचे जाते हैं तो यह गतिक ऊर्जा (Kinetic energy) को बाद में प्रयोग के लिये संचित कर लेता है। इस ऊर्जा से वह, चक्के के अन्दर बैटरी को चार्ज करता है।
चित्र को बड़ा करने के लिये चटका लगायें।
लाल रंग के इस चक्के का प्रदर्शन कोपेनहेगन में १५ दिसंबर को २००९ को किया गया। यह हवा की स्वच्छता (प्रदूषण स्तर), आप कितना चले, और आपके रास्ते को रिकॉर्ड कर, ब्लूटूथ के जरिए आपके फोन पर सूचना भेज सकता है। इसे आप सबके साथ साझा भी कर सकते हैं। इसके बारे में यह छोटी सी क्लिप देखिये।
इसको चलाने का अपना नक्शा (snob value) रहेगा। क्या कोई snob value की सही हिन्दी बतायेगा।
इस बारे में आप विस्तार से न्यूयॉर्क टाईमस् के इस लेख या फिर मैसाचुसेटस् इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजी के इस वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं जहां से मैंने यह इस चिट्ठी का चित्र लिया है।
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विश्व में कम ही लोग, हिमालय और उसके आस पास के खण्ड की कला के बारे में जानते हैं। ‘रुबिन कला संग्रहालय’ (Rubin Museum of Art) न्यूयॉर्क में स्थित है। यह संग्रहालय लोगों के सामने, इस धरोहर को लाने का प्रयत्न करता है।
यह चित्र, रूबिन कला संग्रहालय के, इस प्रदर्शनी के बारे में सूचना दे रहे पेज से है।
इस संग्रहालय में, ११ दिसमबर २००९ से, ‘सृष्टि दर्शन: समुद्र मथंन से – ब्रह्माण्ड के कोने तक’ (Visions of the Cosmos: From the Milky Ocean to an Evolving Universe) नामक प्रदर्शनी चल रही है। यह प्रदर्शनी, हिन्दू सृष्टि के उत्पत्ति दर्शन से शुरू होकर, विज्ञान के द्वारा ब्रह्माण्ड की संरचना को दिखा रही रही है। यह प्रदर्शनी १० मई २०१० तक चलेगी।
यह प्रलेखी हिमालय से शुरू हो कर, ब्रह्माण्ड के उस कोने तक पहुंचती जहां तक ‘अमेरिकी प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय’ की नजर जाती है और उसके बाद वापस आती है। हम में से बहुत से लोग इस प्रदर्शनी को तो नहीं देख सकते हैं पर आप इस प्रलेखी फिल्म को अवश्य देख सकते हैं। इसका मजा उठाने से न चूकें।
सैमुएल लाइबोविट्ज़, २०वीं शताब्दी के दूसरे चतुर्थांश में अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध वकील थे। 'बुलबुल मारने पर दोष लगता है' श्रृंखला की इस चिट्ठी में, चर्चा है कि उन्हें पहला मुकदमा कैसे मिला और उसमें क्या हुआ।
इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें।
यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। सुनने के लिये, दाहिने तरफ का विज़िट, 'मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने' देखें।
सैमुएल की पृष्ठभूमि ऐसी नहीं थी कि उन्हें मुकदमे मिल सकें। एक बार कॉर्नेल विश्वविद्यालय में, जब कानून के डीन ने, उनसे, इस बारे में बात की तब सैमुएल का कहना था
'मैं पहले प्रसिद्व वकील बनूंगा। तब, बड़ी-बड़ी कम्पनियां मेरे पास मुकदमा कराने आयेंगी और मैं पैसे कमा सकूंगा।'
सैमुएल लाइबोविट्ज़ का यह चित्र लाइफ पत्रिका के सौजन्य से।
लेकिन जब सैमुएल वकील बन गये तब सबसे मुश्किल, उन्हें अपना पहला मुकदमा मिलने में हुई।
न्यायालय में जब आरोपी वकील नहीं कर पाते है तब न्यायालय उनके लिए वकील नियुक्त करता है। सैमुएल को भी अपना पहला मुकदमा इसी तरह मिला।
इस मुकदमें के आरोपी के ऊपर आरोप था कि उसने शराबखाने का ताला खोलकर, पैसे और शराब की चोरी की। उसी दिन सुबह, उसे शराब के नशे में धुत्त, पकड़ लिया गया। उसकी जेब में वह चाभी भी मिली जिससे उसने ताले को खोला था। पुलिस के सामने उसने अपना गुनाह कबूल करा लिया। अमेरिका में पुलिस के सामने दिया बयान न्यायालय में देखा जा सकता है हालांकि भारत में नहीं।
सैमुएल ने अपने मित्रों, सहयोगियों से इस संबन्ध में सलाह ली। उनका कहना था कि,
आरोपी को अपना दोष मान लेना चाहिए। क्योंकि सारे सबूत आरोपी के खिलाफ हैं।
दोष मान लेने पर सजा कम हो जायगी।
लेकिन सैमुएल को लगा कि यदि उसने अपने मुवक्किल से आरोप स्वीकार करवा दिया तब वह न तो प्रसिद्घ हो सकेगा, न ही पैसा कमा सकेगा। वह इस मुकदमे के उस पक्ष को देखने लगा, जिसकी तरफ कोई सोच भी नहीं सकता था।
कई रात, बिस्तर में लेटे-लेटे, सोचते-सोचते, उसे एक युक्ति समझ में आयी। यदि वह चल गयी तो जीत उसकी, नहीं तो आरोपी को सजा तो होनी ही थी। मुकदमा शुरू होने पर, अभियोजन के अधिवक्ता एवं न्यायाधीश को आश्चर्य हुआ, जब आरोपी ने आरोप स्वीकार नहीं किया।
अभियोजन का पक्ष समाप्त हो जाने के बाद, आरोपी ने गवाही दी कि उसने, पुलिस अत्याचार के कारण, आरोप स्वीकार कर लिया था।
अभियोजन का कथन था कि आरोपी ने चाभी से ताला खोलकर चोरी की है। सैमुएल ने न्यायालय के समक्ष बहस की,
'क्या सरकारी वकील ने यह स्वयं देखा है कि आरोपी के जेब से मिली चाभी से शराबघर का ताला खुल सकता था या नहीं। यदि नहीं तो, न्यायालय एवं जूरी चल कर देखें कि क्या इस चाभी से उस ताले को खोला जा सकता है। यदि ताला नहीं खुलता है तो उसके मुवक्किल पर चोरी का आरोप नहीं बनता है।'
यह सच था कि सरकारी वकील स्वयं इस बात की जांच नहीं की थी कि उस चाभी से ताला खोला जा सकता था अथवा नहीं। अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता को लगा कि यदि,
इस समय न्यायधीश, जूरी के सदस्य जा कर देखते हैं तो न्यायालय और जूरी का समय बरबाद होगा। इस तरह के अनगिनत मुकदमे लम्बित थे, उनका भी फैसला होना था।
ताला न खुला, तो सरकारी वकील की भद्द उड़ जायेगी।
यह सोचकर सरकारी वकील ने कहा कि उसे बहस नहीं करनी है। सैमुएल ने भी अपनी बहस समाप्त कर दी। यह बताने की जरूरत नहीं है कि जूरी को आरोपी को छोड़ने में कुछ भी समय नहीं लगा। हालांकि न्यायालय से बाहर निकलने के बाद जब सैमुएल ने उस चाभी से ताला खोलने का प्रयत्न किया तो उसने न्यायालय के सारे ताले खुल गये।
इस मुकदमे के बारे में अगले दिन अखबार में कुछ नहीं निकाला पर जेल में अन्य कैदियों, अधिवक्ताओं के बीच, यह बातचीत चलने लगी कि यह वकील कुछ ख़ास है। यहीं से, सैमुएल का सितारा, चमकना शुरू हो गया।
सैमुएल ने अपना पहला मुकदमा, रात में ही, बिस्तर पर सोचते सोचते जीत लिया था। उसने यह आदत, जीवन भर डाली। वह मुकदमा के शुरू होने से पहले ही सारे पक्षों के बारे में सोच लेता था। यही एक अच्छे वकील की निशानी है। वकील का वास्तविक जीवन, अर्ल स्टैनली गार्डनर के कल्पित वकील, पैरी मेसन की तरह नहीं, जो मुकदमें के दौरान ही सोचा करता था। हर सफल वकील मुकदमा शुरू होने के पहले ही, उसके सारे पहलुओं के बारे में सोच लेते हैं।
इस मुकदमें से, सैमुएल ने एक दूसरी बात यह सीखी, कि जूरी, पुलिस-अत्याचार के बारे में आसानी से विश्वास कर लेते हैं। इस बात ने भी, उसे अन्य मुकदमों सफलता दिलवायी।
क्या चश्मदीद गवाह, न चाहते हुऐ भी, आरोपी की गलत शिनाख्त कर देते हैं। इस बारे में, सैमुएल के क्या विचार हैं, यह अगली बार।
इस चिट्ठी में त्रिवेन्दम में घूमने की जगहों की चर्चा है।
हम केरल घूमने, इसलिये गये थे क्योंकि मुझे त्रिवेन्द्रम में मुझे कुछ काम था। इस काम के लिये, मैंने यात्रा के आखरी दिन, दोपहर के भोजन के बाद, का समय रखा था। हमारे पास सुबह का समय था। हमने वह समय त्रिवेन्द्रम घूमने का प्रोग्राम बनाया। हम लोग सबसे पहले वहाँ के राजा के महल गये। वहां हमने एक गाइड लिया। उसने बताया,
'केरल राज्य तीन राज्यों को मिलाकर बना है। इसकी स्थापना १९५६ में हुई थी। त्रिवेन्द्रम पहले त्रावणकोर राज्य (Travancore State) में था। यहाँ पर राजा का लड़का तो नहीं, पर उस की बहन का लड़का राजा बनता था।'
महल में बाहर की तरफ उन्नीसवीं शताब्दी की बनी एक खास घड़ी, जिसमें घन्टे के पूरे होने पर उतनी बार ऊपर के बकरों सिर, एक दूसरे से टक्कर मारते हैं।
मेरे पूछने पर कि ऎसा क्यों होता था, तब उसका जवाब था,
’यह इसलिये होता था क्योंकि ट्रावनकोर राज्य मातृ प्रधान राज्य था। यदि परिवार में लड़की नहीं है तो लड़की गोद ले ली जाती थी।’
इसने मुझे शिलॉग में खसी लोगों की याद दिलायी। वह भी मातृ प्रधान समाज है। वहां पर पुरूष अपनी पत्नी का सर नाम रख लेतें हैं और उसी के घर रहने चले जाते हैं। गाइड के मुताबिक,
'यहां पुरुष शादी के बाद महिलाओं का सर नेम तो नहीं रखते पर अधिकतर पति, पत्नियों के साथ उनके घर में रहते हैं और यह गलत नहीं समझा जाता है।'
हमारे तरफ तो ऎसे लोगों को घर जमाई कहा जाता है और अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है।
महल को देखते समय गाइड ने यह बताया,
'इस महल को हजार आदमियों ने मिलकर चार साल में बनाया था। लेकिन राजा इसमे सात महीने ही रह पाये। क्योंकि उनकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद राजा के परिवार वालों ने इस महल को छोड़ दिया। उन्हे लगा कि यह महल अपशकुन है। इसलिए उसके बाद इस महल में कोई नहीं रहा।'
राजा के महल के बगल में ही एक भगवान विष्णु का मंदिर है। इस मंदिर में कोई कोट, पैंट पहनकर नहीं जाया जा सकता है और महिलायें सलवार, कुर्ता पहनकर नहीं जा सकती हैं। इसे देखने जाने के लिए आपको ऊपर के कपड़े उतारने पड़ेगें और एक धोती पहनकर जाना होगा। महिलायें सलवार, कुर्ता के ऊपर धोती पहन सकती है।
मुन्ने की मां मंदिर को भीतर से देखने नहीं गयी पर मुझे लगा कि इसे अन्दर से देखना चाहिए। फिर मुश्किल पड़ी धोती पहनने की। वहां पर धोती किराये पर भी मिल रही थी पर मैने वहीं पर एक केरल में पहनी जाने वाली शर्ट और धोती खरीदी। उसे ही पहन कर अन्दर गया।
मन्दिर, अन्दर से बहुत भव्य है। इसमें एक जगह सारी महिलायें भजन गा रही थीं। इसमें, भगवान विष्णु की, शेषनाग की शैय्या पर लेटे हुए मूर्ति है। इस मूर्ति को एक बार में नहीं देखा जा सकता है। इसके लिऐ कई दरवाजे हैं।
मैं इस मूर्ति के किसी भाग को नहीं देख पाया क्योंकि वहाँ पर भीड़ थी और मुझे लगा कि यदि में लाइन में खड़ा होऊँगा तो शायद सब समय यहीं पर चला जायेगा। मैंने महल में ही उस मूर्ति का छोटा सा मॉडल देख लिया था। त्रिवेन्द्रम में एक ताराघर (Planetarium) और चिड़ियाघर (Zoo) भी है। मैं इन्हें भी देखना चाहता था।
मंदिर देखने के बाद, हम लोग ताराघर देखने गये। वहां पता चला कि केवल एक प्रदर्शन अंग्रेजी में है और बाकी सब मलयालम में हैं। अंग्रेजी का प्रदर्शन बारह बजे था लेकिन वह तभी चलेगा जब कि कम से कम चालीस व्यक्ति देखने के लिए आये। हम लोगों को लगा कि यहां इन्तजार करने से अच्छा है कि हम चिड़िया घर देख लें।
चिड़ियाघर में तरह तरह के जानवर देखने को मिले। मैंने वहां पर जानवरों की तसवीर इस चिट्ठी में प्रकाशित की हैं। चिड़ियाघर में एक बात अजीब लगी। वहां पेड़ों पर बहुत से चमगादड़ लटके थे। हम लोग भोजने के समय वापस आ गये। मुझे अपना काम भी करना था।
मुझे काम के बाद, वहां के लोगों ने यादगार के रूप में राजा रवी वर्मा का एक चित्र यादगार के लिये भेंट किया। वे अप्रैल २९,१८४८ में जन्में त्रावणकोर राज्य के चित्रकार थे। उनकी मृत्यु अक्टूबर २, १९०६ में हो गयी।
साड़ी पहने मराठी महिला का चित्र, जो मुझे भेंट में मिला
रवी वर्मा, महाभारत एवं रामायण की घटनाओं और पारंपरिक परिधान साड़ी पहने भारतीय महिलाओं के सुन्दर चित्र बनाने के लिये जाने जाते हैं। उनके चित्र, भारतीय परम्परा और युरोपीय कला के एकीकरण के, सबसे अच्छे उदाहरण भी हैं। उन्हें १८७३ में वियाना चित्रकला प्रदर्शनी में प्रथम पुरुस्कार भी मिला। उनके अन्य चित्र आप यहां देख सकते हैं।
यदि आप त्रिवेन्दम जायें, तो यह तो हो नहीं सकता कि आप कोवलम समुद्र तट न जांये। अगली बार वहीं चलेंगे।
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यह ऑडियो फइलें ogg फॉरमैट में है। इन फाइलों को आप सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में, फायरफॉक्स ३.५ या उसके आगे के संस्करण में सुन सकते हैं। इस फॉरमैट की फाईलों को आप -
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यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। यदि लगन है, काम करने का ज़स्बा है तो सफलता कदम चूमेगी।
मुन्ने राजा
तीन दशक पहले, तुमने हमारे जीवन में कदम रखा। पता ही नहीं चला कि वे कब बीत गये। तुमने, न केवल हमारे जीवन में, पर सबके जीवन में खुशी भरी।
आज, तुम्हारे साथ बिताये, दिन याद आये, घटनायें याद आयीं। तुम्हें याद है दूरदर्शन में आने वाला विज्ञान पहेली का प्रोग्राम - जिसे हम साथ देखा करते थे। इसमें दो बार पुरस्कार मिला:
पहली बार सवाल था कि चन्द्रमा पृथ्वी से दूर क्यों जा रहा है।
दूसरी बार सवाल था कि चमगादड़ किस प्रकार अपना शिकार ढ़ूढते हैं।
तुम्हारे बड़े होने के साथ, हमसे (शायद केवल मुझसे, तुम्हारी मां से नहीं) एक गलती हो गयी। मैंने अपने सपने, तुम्हारे साथ पूरे करने की कोशिश की। यह ठीक नहीं है। सबको अपने सपने देखने और पूरे करने की बात है न कि अपने पिता के। शायद भारतीय माता-पिता की यही कमी है। लेकिन, इसके बावज़ूद भी, तुममें वह सब है जिस पर किसी भी माता-पिता को गर्व हो। तुम्हारी आदतें, शौक, प्राथमिकता सही हैं। हां चाहो तो पेंसिल चबाना छोड़ सकते हो और जल्दी उठने की आदत डाल सकते हो :-)
मैं आजकल आमिर एक्ज़ल की लिखी पुस्तक 'द आर्टिस्ट एण्ड द मैथमेटीशियन: द स्टोरी ऑफ निकोला बूरबाकी, द जीनियस हू नेवर इक्ज़िस्टेड' (The artist and the mathematician: the story of Nicolas Bourbaki, the genius mathematician who never existed by Amir D. Aczel) पढ़ रहा हूं।
पिछली शताब्दी में, आधुनिक गणित में बहुत से पेपर और पुस्तकें निकोला बूरबाकी (Nicolas Bourbaki) के नाम से लिखीं गयीं। इन पुस्तकों ने आधुनिक गणित को नयी उचांई दी। इस नाम का कोई भी गणितज्ञ नहीं था। कुछ फ्रांसीसी गणितज्ञों ने मिल कर यह कार्य के १९३० के दशक में शुरू किया। इस काम में १० से लेकर २० गणितज्ञ जुड़े थे। यह पुस्तक इन्हीं गणितज्ञों के बारे में है। यह भी एक रोचक बात है कि उन्होंने निकोला बूरबाकी नाम क्यों चुना।
जेनरल चार्ल्स डेनिस बूरबाकी का यह चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से
पुस्तकों में लेखक का नाम देना जरूरी होता है। जेनरल चार्ल्स डेनिस बूरबाकी (Charles Denis Sauter Bourbaki) फ्रांसीसी सेना के एक प्रसिद्ध अधिकारी थे। फ्रांसीसी गणितज्ञों ने, बस उसी के नाम पर, एक काल्पनिक नाम नीकोला बूरबाकी चुन लिया और लगे लिखने गणित पर पुस्तकें। यह इतनी अच्छी थीं कि उसने गणित को नयी दिशा ही दे दी। मैंने इसके बारे में 'शून्य, जीरो, और बूरबाकी' की चिट्ठी में भी लिखा है।
मैं अभी तक इस इस पुस्तक में दो गणितज्ञों के बारे में पढ़ पाया हूं:
एलेक्ज़ेंडर का बचपन गरीबी और अकेलेपन में गुजरा। उसने गणित की पढ़ाई अपने आप की।
वहीं आन्द्रे का जीवन समृद्ध था। उसे किसी बात की कमी नहीं थी। उसने सबसे अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की और उसे जाने माने गणितज्ञों के साथ रहने का मौका मिला। उसे डॉक्टरेट मिलते ही, २३ साल की उम्र में, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी मिल गयी। वह वहां कुछ समय रहा फिर वापस यूरोप चला गया।
गणित के क्षेत्र में, दोनो का काम महत्वपूर्ण है पर एलेक्ज़ेंर ने ज्यादा काम किया है। वह २०वीं शताब्दी के महानतम गणितज्ञों में गिना जाता है। यह बताता है आपकी कैसी भी परिस्थिति हो यदि काम के लिये लगन है, ज़स्बा है - तो सफलता कदम चूमेगी। अंग्रेजी में पुरानी कहावत है,
'The only place where success comes before work is dictionary.' सफलता हमेशा काम के बाद ही आती है यहां तक कि शब्दकोश में भी।
यह भी सच है,
'The real success is finding work that you love and the next best thing is finding love in whatever you do.'
अपने प्यार को ही, जीविका बना लेना सफलता है। दूसरी बेहतर बात, जीविका में ही प्यार पाना है।
आजकल ठंडक शुरू हो गयी है। सुबह कोहरा पड़ने लगा है। तुम्हारी भेजी स्वॅट जैकेट बहुत काम आती है। वही सुबह पहन कर, ठहलने जाता हूं।
जीवन में तुम खुश रहो, सफल हो।
पापा
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