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यह तो धोखा देने की बात हुई

Posted on January 28, 2010 in Full Articles | by
हिमाचल यात्रा में, पवन हमारे टैक्सी चालक थे। इस चिट्ठी में, कुछ उनके बारे में और कुछ दिल्ली एवं केरल टैक्सी सेवा के तुलना है।


हिमाचल यात्रा के लिये, हमने ईनोवा टैक्सी  ली थी क्योंकि सामान कुछ ज़्यादा था। पवन, हमारे टैक्सी चालक, के पिता सेना में नौकरी करते थे। अब, वे सेवानिवृत्त हो गये हैं। उनके दो भाई हैं, बड़े भाई स्कूल में पढ़ाते हैं और छोटा भाई पढ़ रहा है। पवन जी को एक बेटा एक बेटी है। जिनकी उम्र छः और चार साल है।

केरल यात्रा में प्रवीण हमारे साथ थे। उनका भी स्वभाव अच्छा था। वे काफी बातूनी थे।

पवन का स्वभाव अच्छा था। लेकिन वे उल्टे थे। कम बात करते थे। यह टैक्सी उनकी नहीं थी। वे केवल चालक के रूप में कार्यरत थे। 

हमारे टैक्सी चालक - पवन, रोहतांग पास पर। 
क्या आपको वह किसी फिल्म हीरो से कम लग रहे हैं :-) 

इस टैक्सी में टैक्सी का नम्बर न होकर प्राइवेट नम्बर था। मैंने पवन से पूछा,
'इस गाड़ी' में प्राइवेट नम्बर क्यों है? क्या ये टैक्सी की तरह रजिस्टर्ड नहीं है?  इसका बीमा टैक्सी की तरह है या नहीं?'
मैंने उसे बताया कि यदि इस गाड़ी का बीमा टैक्सी की तरह नहीं है तो दुर्घटना हो जाने पर हम सब मुश्किल में पड़ सकते हैं। हमारे परिवार वालों को  बीमा कम्पनी से पैसा नहीं मिल पायेगा। यह सुनने के बाद उसने कहा,
'इस गाड़ी का बीमा टैक्सी की तरह है और यह वैसे ही रजिस्टर्ड है। इसका नंबर टैक्सी का नम्बर है। लेकिन उसके मालिक ने इसमें एक प्राइवेट गाड़ी की तरह नम्बर पेन्ट किया है। यह इसलिए किया है ताकि लगे कि यह प्राइवेट गाड़ी है। चूंकि हम लोग कई राज्यों में जा रहे हैं इसलिये यदि ऐसा नहीं करते तो सब जगह टैक्स देना पड़ता।'
मैंने कहा,
'यह तो धोखा देने की बात हुई। यह बात गलत है। आपको कोई घाटा नहीं होता क्योंकि टैक्स तो हमको देना पड़ता। आपके मालिक को इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी अपने मालिक से कहियेगा कि हमें यह बात पसन्द नहीं आयी।'
उसने कहा कि इस बात को जरूर अपने मालिक से कहेगा और अगली बार ऐसा नहीं होगा। मालूम नहीं कि उसने कहा कि नहीं। यदि कहा तो क्या उसने माना।

मुझे केरल यात्रा के दौरान भी टैक्सी का अनुभव रहा। वहां हमारे टैक्सी चालक प्रवीण ज़्यादा साफ सुथरे रहते थे। केरल में लोग पेशेवर हैं। वहां की गाड़ी भी टैक्सी की तरह रजिस्टर्ड थी। इस गाड़ी को भी उसी तरह से होना चाहिए था।

हम लोग सबसे पहले पिंजौर रुके। अगली चिट्ठी में उसी के बारे में।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा

वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।।

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About this post in Hindi-Roman and English
dev bhumi himachal yatra mein, pawan hamare taxi driver the. is chitthi mein mein kuchh unke baare mein aur delhi evam keral taxi sevaa kee tulnaa hai.  yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

Pawan was our taxi driver in the Himachal trip. This post is about him and compares Delhi taxi service with Kerala taxi service. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
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4 Responses to “यह तो धोखा देने की बात हुई”

  1. Prashant(PD) says:

    अपना अनुभव यही रहा है कि लगभग हर क्षेत्र में दक्षिण भरतीय उत्तर भरतियों से अधिक प्रोफेशनल हैं.. चाहे वह गाड़ी चलाना ही क्यों ना हो..

  2. मुझे लगता है आपकी तरह सोचने वाले ग्राहक उनको बिरले ही मिलते होंगे जो टैक्स बचाने की बजाये भरने को तैयार हैं.

    उसने अगर अपने मालिक से आपकी बात कही होगी तो दोनों मिल कर खूब हँसे होंगे आप पर. :)

  3. समीर जी, अमेरिकन न्यायमूर्ति होल्मस्, २०वीं शताब्दी में के सबसे जाने माने न्यायमूर्ति के रूप में जाने जाते हैं। वे टैक्स संबन्धित नियमों को हमेशा कानूनी ठहराते थे। एक बार उनकी सक्रेटरी ने पूछा,
    ‘क्या आपको टैक्स देना बुरा नहीं लगता?’
    उनका जवाब था,
    ‘मैं टैक्स देना पसन्द करता हूं। सरकार, समाज, सभ्यताएं इसी से चलती हैं।’
    मुझे भी यही लगता है। मैं कोई भी खरिदारी करते समय बिल लेना पसन्द करता हूं ताकि दुकानदार, एक्साइस या सेल्स टैक्स न बचा पाये :-)

  4. munish says:

    hari om ! sundar vichar !

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