Unmukt – उन्मुक्त

हिन्दी चिट्ठाकार उन्मुक्त की चिट्ठियाँ

February, 2010

समय के साथ बदलना ही जीवन है

इस चिट्ठी में,  ‘हू मूव्ड माई चीज़’ नामक पुस्तक के साथ, पिंजौर के मुगल (यादुवेन्द्र सिंह) उद्यान  की चर्चा है।

कुछ समय पहले डा. सपेंसर जॉनसन के द्वारा लिखित ‘हू मूव्ड माई चीज़’ (Who moved my cheese) नामक पुस्तक आयी थी। यह प्रसिद्ध पुस्तक है। इसका कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।  

इस पुस्तक में  चार चूहों के द्वारा एक मैनेजमेंट के सिद्घान्त को बताया गया है। यह इस प्रकार है कि चूहों को पनीर मिल जाती है। कुछ उसी में तृप्त हो जाते हैं। उनका जीवन, पनीर के समाप्त होते ही, हो जाता है। लेकिन वहीं कुछ चूहों को लगता है कि उनकी पनीर समाप्त हो रही है। वे नई पनीर को ढूंढने के लिए निकल पड़ते हैं। वे नयी पनीर ढूंढ लेते हैं और जीवन में सफल होते हैं। समय के साथ बदलना ही जीवन है।

आप यह सोच रहे होंगे कि इस पुस्तक  का पिंजौर के मुगल उद्यान से क्या सम्बन्ध है। चलिये, मुगल उद्यान में चल कर देखते हैं कि वहां क्या हो रहा है।

पिंजौर का मुगल उद्यान

पिंजौर में, हम लोग हरियाणा पर्यटन का विभाग बजरीगर मोटेल में ठहरे थे। यह उद्यान के बगल में है। शाम के समय  उद्यान को देखने के लिए गये। यह अच्छा है पर शायद उतना सुन्दर नहीं जितना इसके बारे में कहा जाता है। लेकिन अंधेरा होते होते वहां पर सब बत्तियां जल गयी और फव्वारे भी चलने लगे जिससे कि उसकी सुन्दरता बढ़ गयी।

उद्यान के अन्दर मेरी मुलाकात एक सुरेश कुमार से हुई। वे एक छोटा सा स्टॉल लगाये हुये थे और उस स्टॉल में वे कैमरा और कैमरे की रील बेच रहे थे। उनके पास कोडेक के कैमरे थे जो उसे किराये पर देते थे। इसे लेने के लिए ६०० रूपये की जमानत  देनी पड़ती थी और एक घंटे का किराया वे ७० रूपया लेते थे। उसने बताया वे ठेके  पर कार्य करते हैं। इसके लिऐ, ठेकेदार ने  दो साल के अनुबंध के लिए २ लाख चालीस हजार रुपये दिये हैं। मैंने पूछा,

‘क्या इतनी आमदनी हो जायेगी।’

उसने कहा कि नहीं। फिर उसने मुझे वह कापी दिखायी जिसमें लोगों के द्वारा दिये गये पैसे   को लिखता था। किसी दिन १०० तो किसी दिन २०० और अधिकतम शायद ५०० रू० थे। उसका कहना था, 

‘यह बहुत घाटे में चल रही है। इसका कारण मोबाइल फोन में लगे कैमरे हैं। लोग कैमरे और रील से फोटो न लेकर अब मोबाइल फोन से ही फोटो ले रहे हैं।’

यह बात मुझे देखने में भी मिली क्योंकि अधिकतर लोग अपने मोबाइल से ही फोटो ले रहे थे। किसी भी तकनीक के पुराने होते ही उससे संबन्धित व्यापार भी समाप्त हो जाते हैं। रील फोटो ग्राफी का व्यापार समाप्त हो चुका है। यदि आप नयी तकनीक पर नहीं जाते हैं तब भगवान ही आपका मालिक है। मेडिकल के भी क्षेत्र में इसी तरह से बहुत सारी तकनीक समाप्त हो रही हैं, या समाप्त हो गयी हैं।

मेरा एक मित्र डाक्टर है उसके पास एक ऐक्सरे मशीन थी। इसमें ऐक्सरे,  पुरानी तकनीक से लिया जाता था। इस समय जितने भी ऐक्सरे होते हैं वह डिजिटल होते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि उसे बड़ा या छोटा किया जा सकता है या ई-मेल के द्वारा कहीं भेज कर राय मांगी जा सकती है। मैंने अपने मित्र से कई बार कहा कि यदि वह डिजिटल ऐक्सरे नहीं लेता है तो उसका व्यापार चौपट हो जायेगा। उसने मेरी बात नहीं मानी और इस समय उसका व्यापार समाप्त हो गया है।

मेरे एक और जान पहचान के व्यक्ति की चश्मे की दुकान थी। समय के साथ उसने बदलाव किया। पहले कन्टैक्ट लेंस भी बेचने शुरू किये। कुछ सालों पहले उन्हें लगा कि कन्टैक्ट लैंस का व्यापार समाप्त हो रहा है। इस समय लोग न तो चश्मा लगाना चाहते हैं और न ही कन्टैक्ट लेंस लगाना चाहते हैं पर वे एक लेज़र के द्वारा आंख की पुतलियों का आपरेशन करा लेते हैं और उसके पश्चात आपको आंख के चश्मे से छूट मिल जाती है। उसने इस तकनीक से आपरेशन के लिए मशीन ले ली। कुछ समय पहले तक यह केवल पढ़ने वाले चश्मे से निजात पा सकते थे। लेकिन इस समय बाइफोक्ल चश्मे वालों को भी  चश्मों से छुटकारा मिल सकता है।

यह आगे देखने वाला व्यक्ति है। उसने दिल्ली में, मेडिकल पर्यटन नाम की बात शुरू कर रखी है। देश विदेश से लोग आते हैं। दोपहर तक आपरेशन करवाते है। इसमें ऑपरेशन के बाद मरीज को तुरन्त छोड़ा जा सकता है। क्योंकि ऑपरेशन बाद बहुत सावधानी की जरूरत नहीं होती है। उसने एक जगह ले रखी है जहां वह लोगो को टिकाता है। उसके बाद ऑपरेशन होता है। उसके बाद मरीजों को आगरा, राजस्थान की तीन दिन की यात्रा में भेजता है। लोग लौट कर अपने  देश चले जाते हैं। बहुत से सैलानी इसी तरह से आ रहे हैं। बाहर से आये व्यक्तियों अपने देश में ऑपरेशन कराने में जितना पैसा लगता है वह यहां ऑपरेशन और घूमने के बाद खर्च किये गये पैसों से अधिक है। इसलिए लोग भारत आ रहे हैं। उसका धंधा अच्छा रहा है।

यह सच है कि यदि आप तकनीक के साथ नहीं बदलेंगे, तो वह आपको बदल देगी, आपका व्यापार समाप्त हो जायेगा।

अगली चिट्ठी में भीमा देवी के मन्दिर एवं संग्रहालय के बारे में।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा

वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। समय के साथ बदलना ही जीवन है।।

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क्या ‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’ हर्पर ली की जीवनी है

स्कॉटस्बॉरो  बॉयज़ ट्रायल में, ९ अश्वेत लोगों पर, श्वेत लड़कियों के साथ बलात्कार करने का मुकदमा ऍलाबामा राज्य में चला था। इस मुकदमे ने हार्पर ली पर असर डाला। उनके द्वारा लिखा उपन्यास, ‘टु किल अ मॉकिंग बर्ड’ इसी पर आधारित है।  आज चर्चा करेंगे – इस उपन्यास की कहानी के बारे में और इसके एवं ली के वास्तविक जीवन में समन्वय को भी देखेंगे।
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upright=1.ली, पुस्तक पर बनी फिल्म प्रॉड्यूसर के साथ – चित्र सौजन्य विकिपीडिया
हार्पर ली का जन्म २८ अप्रैल, १९२६ को ऍलाबामा राज्य में हुआ था। ऍलाबामा राज्य अमेरिका के दक्षिण में है उस समय दक्षिण और उत्तर अमेरिका में, अश्वेतों के बर्ताव में   काफी अन्तर था। दक्षिण में नागरिक अधिकारों का उतना महत्व नहीं था। स्कॉटस्बॉरो बायॉज़  के मुकदमे के समय, ली छ: साल की थी। इस मुकदमे ने, उस के जीवन में बहुत कुछ असर डाला। ‘टू किल अ मॉकिंगबर्ड’ इसी अनुभवों के आधार पर लिखा उपन्यास है। यह कहानी १९३० के दशक की है। यह कहानी है एक बहन स्काउट, उसके भाई जेम और उनके मित्र डिल की।


स्काउट के पिता एटिक्स फिंच एक वकील हैं। बू रैडली उनके रहस्यमय पड़ोसी हैं। इसमें एक अश्वेत व्यक्ति पर एक श्वेत लड़की से बलात्कार का प्रयत्न करने के लिए मुकदमा चलता है। एटिक्स को बचाव पक्ष का अधिवक्ता नियुक्त किया जाता है। इस मुकदमे में यह सिद्ध हो जाता है कि अश्वेत व्यक्ति निर्दोष है और श्वेत लड़की को चोटें,उसके पिता ने ही पहुंचायी थी। फिर भी, अश्वेत व्यक्ति को सजा हो जाती है।  इस मुकदमे के बाद श्वेत लड़की का पिता  स्काउट और जेम को मारने का प्रयत्न करता है। उस समय बू रैडली जो कि अविवेकी के रूप में जाना जाता है उनकी जान बचाता है।

‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’ फिल्म में 
एटिक्स की भूमिका में ग्रेगरी पेक और स्कॉट की भूमिका में मैरी बैधम 

बहुत से लोगों  का कहना है कि ‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’  हर्पर ली की जीवनी है पर वे इस बात को तो नकारती है पर यह भी स्वीकारती हैं कि उन्होंने जीवन में जो भी  देखा, उसी को इस कहानी में उतारा है।

लोगों का कहना भी गलत नहीं है क्योंकि वास्तविक जीवन में भी ली का बड़ा भाई और मित्र था।  उसके पिता भी वकील थे और शादी के पहले उनकी माँ का नाम  फिंच था जो कि उपन्यास में इनका सर-नाम है। उपन्यास से में ली का मित्र डिल है और वास्तविक जीवन में उनके मित्र का नाम ट्रूमैन कापाटे था।

उसका पहले नाम ट्रूमैन स्ट्रेकफस परसॉनस् (Truman Streckfus Persons) था। ट्रूमैन, जब चार साल का था तभी उनके माता-पिता में तलाक हो गया। उसकी मां हमेशा अच्छा जीवन जीने की सोचा करती थी। लेकिन तलाक से वह टूट गयी। उसने ट्रूमैन को उनकी आंटी के पास, मॉनरोविले में भेज दिया। वह ली को पड़ोसी था। वहीं उसका लालन पालन हुआ। ‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’  में भी डिल दूसरी जगह से आता है।

ट्रूमैन की मां न्यूयार्क चली गयी जहां उसने दूसरी शादी कर ली। बाद में  ट्रूमैन के सौतेले पिता ने उसे गोद ले लिया जिससे उसका नाम बदलकर  ट्रूमैन कापाते हो गया।

‘टु किल अ मॉकिंग बर्ड’ जीवन के दर्शन को कुछ सरल वाक्यों में बताती है। अगली बार मिलेंगे तब इसी के बारे में बात करेंगें।

बुलबुल मारने पर दोष लगता है

ज़ेमेन्टा के द्वारा बताये संबन्धित लेख

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This post talks about story of ‘To Kill A Mockingbird’ and compares it with her real life. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
 
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अपने प्यार को ढ़ूंढिये

विश्वविद्यालयों का दीक्षांत समारोह, न उसके विद्यार्थियों के लिये पर विश्वविद्यालय के लिये भी महत्वपूर्ण होता है। विद्यार्थी इस दिन अपने नये जीवन में प्रवेश करते हैं और विश्वविद्यालय के लिये यह मील का पत्थर होता है। इस दिन, हर विश्विद्यालय किसी खास व्यक्ति को छात्रों के बीच व्याख्यान के लिये आमंत्रित करता है

‘धत्त तेरे कि, हम तो समझे थे कि वेलेंटाइन दिवस पर उन्मुक्त जी, उन्मुक्त हो कर प्रेम चर्चा करेंगे। यहां तो मालुम नहीं कहां विश्वविद्यालय के चक्कर में पड़ गये हैं।’

स्टीव जॉबस् का यह चित्र विकीपीडिया से
स्टैनफोर्ड विश्विद्यालय दुनिया के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक है। इस विश्वविद्यालय के वर्ष २००५ के दीक्षांत समारोह पर, स्टीव जॉबस्  व्याख्यान देने के लिये आये।
स्टीव,  ऍप्पेल कंप्यूटर के जनक हैं। इसमें शक नहीं कि इन कंप्यूटरों का कोई मुकाबला नहीं है। यह दुनिया के सबसे बेहतरीन कंप्यूटर हैं। विंडोज़ तो इसे केवल कॉपी करने की कोशिश है। 
ऍप्पेल कंप्यूटर के द्वारा, मैकिंटॉश कंप्यूटर २४, जनवरी १९८४ में बजार में उतारा गया था। इसका विज्ञापन, अमेरिका की सबसे बड़ी प्रोफेशनल लीग – नेशनल फुटबाल लीग (National Football League) – के द्वारा आयोजित सुपर बोल (Super Bowl) प्रतियोगिता के दौरान, २२ जनवरी १९८४ में दिखाया गया था। इस उत्पाद ने न केवल कंप्यूटरों  की दुनिया बदल दी पर विज्ञापनो के आयाम भी। इसके बारे में मैंने यहां विस्तार से लिखा है।
मेरे बेटे को मैक ऍप्पेल कंप्यूटर पसन्द हैं। वह इसी के लैपटॉप पर काम करता है। मैं स्वयं ओपेन सोर्स का समर्थक हूं और ओपेन सोर्स पर चलने वाले कंप्यूटरों का प्रयोग करता हूं। लेकिन यदि कभी ओपेन सोर्स को छोड़ूंगा तो फिर ऍप्पेल कंप्यूटर ही लूंगा। क्यों नकल की हुई चीज ली जाय।

‘कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती। चालू हो गये उन्मुक्त जी, ओपेन सोर्स के बारे में।’

स्टैनफोर्ड विश्विद्यालय में, २००५ के दीक्षांत समारोह पर, स्टीव के द्वारा दिया गया यह व्याख्यान जितना प्रेणनाप्रद है, उतना प्रेरित करने वाला भाषण कम ही सुनने को मिलता है। कम से कम, मुझे याद नहीं कि मैंने इसके पहले कब ऐसा भाषण सुना था। इसे मैं कई बार सुन चुका हूं। मुझे लगा कि प्रेम के दिवस पर इससे अच्छी कोई और चिट्ठी नहीं हो सकती है।

‘किसी ने सच कहा है कि बुढ़ापे की तरफ पहुंचते ही लोग सठियाने लगते हैं। उन्मुक्त जी, अधिक उम्र वाले हिन्दी चिट्ठाकार हैं। उनकी आंखें कमजोर हो गयीं हैं, २००८ में मरते मरते बचे थे – लगता है कि अब सठिया भी गये हैं। आज के रोज कोई बढ़िया सी प्यार के बारे में चिट्ठी लिखनी थी। यहां तो भाषण की बात करने लगे – भगवान ही इनका मालिक है।’

स्टीव के जीवन में तीन महत्वपूर्ण घटनायें हुई हैं,
  • पहली, वे विश्वविद्यालय तो गये पर डिग्री न ले सके। उन्होंने विश्विद्यालय छोड़ दिया (ड्रॉप आउट)। 
  • दूसरा, वे ऍप्पेल कंप्यूटर से निकाल दिये गये। ऍप्पेल कंपनी डूबने लगी। उसने स्टीव से वापस आने की प्रार्थना की। आज ऍप्पेल कंपनी पुनः बुलंदियों पर है। इसका कारण वे ही हैं।
  • तीसरा, उन्हे पाचक-ग्रंथि में कैंसर हो गया और पता चला कि वे छः महीने तक ही जीवित रह सकेंगे। लेकिन बाद में पता चला कि यह कैंसर ऑपरेशन से ठीक हो सकता है। वे ऑपरेशन करा कर ठीक हो गये।   
इस भाषण में, वे इन्हीं तीन घटनाओं का जिक्र करते हुऐ, जीवन के दर्शन को बताते हैं।

‘मैं तो चला चिट्ठाचर्चा देखने। उन्मुक्त जी तो वहां मिलते नहीं हैं। लेकिन  आज तो वहां बढ़िया, बढ़िया प्रेम चिट्ठियों के लिंक होंगे। यहां तो बोरियत हो रही है। मालुम नहीं क्यों, आज के दिन यह चिट्ठी प्रकाशित कर दी है।’

अपने व्याख्यान में, स्टीव कहते है कि,

‘The only thing that kept me going was that I loved what I did. You’ve got to find what you love … the only way to do great work is to love what you do. If you haven’t found it yet, keep looking. Don’t settle. As with all matters of the heart, you’ll know when you find it. And, like any great relationship, it just gets better and better as the years roll on.’
मैं जो भी करता हूं उससे प्यार करता हूं। इसी ने मुझे आगे चलते रहने की प्रेणना दी। तुम्हे वह तलाशना है जिससे तुम प्यार करते हो … जीवन में किसी बड़े सफल काम को करने के लिऐ, तुम जो भी करो, उससे प्यार करो। यदि तुम्हें अपना प्यार नहीं मिला है तो उसे ढूंढो – रुको नहीं। तुम्हें मालुम चल जायगा जब वह तुम्हें मिलेगा। यह दिल के किसी भी अन्य विषय की तरह है। समय बीतते, यह किसी भी अन्य रिश्ते की तरह बेहतर होता जायेगा।

 
उसकी यदि आप स्टीव के भाषण को पढ़ें तो आपको लगेगा कि उसके जीवन की इन तीनों महत्वपूर्ण घटनाओं को, जीवन के दर्शन से जोड़ने वाला धागा,  प्यार ही है। बस, इसी लिऐ, मैंने इसे प्यार दिवस पर इस चिट्ठी को प्रकाशित किया है। 
यदि आपने इस वीडियो को नहीं देखा है तब अवश्य देखिये। अपने बेटे, बेटियों, और बहुओं को भी दिखायें। यह न केवल उनके लिऐ पर आपके  लिये भी महत्वपूर्ण है – चाहे आपकी उम्र जो भी हो।
जिसमें मन लगे उसे ही करो। यह बात न केवल स्टीव कहते हैं पर शायद हर बड़ा व्यक्ति। कुछ समय पहले भौतिक शास्त्र में नोबेल पुरुस्कार विजेता  रिचर्ड फाइनमेन पर एक श्रंखला लिख कर उसे यहां संग्रहीत किया है। इस श्रंखला में उनके द्वारा दूसरे शब्दों कही गयी यही बात यहां प्रकाशित की है। रिचार्ड फाइनमेन के लिखे पत्रों संग्रहीत कर लिखी गयी बेहतरीन पुस्तक ‘Don’t you have time to think’ है। मैंने इसकी समीक्षा कई कड़ियों में कर इसे यहां संग्रहीत किया है। 
लीसा से मेरी मुलाकात वियाना में कॉन्वेंट में हुई थी। उसके और मेरे बीच बीच ई-मेल की चर्चा में ई-पाती नामक श्रंखला में करता हूं। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। इससे संबन्धित एक चिट्ठी,  लीसा, अपने मन की बात सुनो में मैंने इसे अपने शब्दों में लिखा है।

‘उन्मुक्त जी, यह सब छोड़िये, यह तो बताइये कि क्या आप वह काम करते हैं जो आपके दिल के सबसे पास था?’

नहीं, मैं वह नहीं कर पाया। मेरे विद्यार्थी जीवन के समय, जो मां-बाप ने कह देते थे, वही किया जाता था। मैंने भी वैसा ही किया। मेरे पुराने सहपाठी जब भी मिलते हैं तो हमेशा कहते हैं कि वे कभी नहीं सोचते थे कि मैं फाइलों को इधर उधर करूंगा। लेकिन यह भी सच है कि मैंने जो भी किया या करता हूं उस पर न केवल विश्वास करता हूं पर उसे प्यार भी करता हूं। चाहे वह हिन्दी की चिट्ठाकारी ही क्यों न हो :-)
प्रेम और वेलेंटाइन से संबन्धित मेरी कुछ अन्य चिट्ठियां
जाने क्यों लोग ज़हर ज़िन्दगी में भरते हैं।। वेलेंटाइन दिवस, ओपेन सोर्स के साथ मनायें।। वेलेंटाईन दिन।। लिनेक्स प्रेमी पुरुष – ज्यादा कामुक और भावुक???।। तो क्या खिड़की प्रेमी ठंडे और कठोर होते हैं?।। Love means not ever having to say you’re sorry।। अनएन्डिंग लव।। प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो।। प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।। जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते है।। प्यार किया तो डरना क्या।।
जीवन के दर्शन के बारे में मेरी कुछ चिट्ठियां

अभिषेक जी ने टिप्पणी कर दस बेहतरीन दीक्षांत व्याख्यान के बारे में जानकारी दी है। इसके लिंक नीचे दिये गये हैं। इन्हें भी देखें।

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यह चिट्ठी नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। यह बताती कि जो भी करो उससे प्यार करो तभी सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी।

yeh chitthi nayee peedhee ko smjhne, unse dooree kum karne, aur unhein jeevan ke moolyon ko smjhaane ka praytna hai. yeh bataatee hai ki jo bhi karo usase pyaar karo tabhi saphalta tumhare kadam choomegee. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is an attempt to understand the new generation, bridge the between gap and to inculcate right values in them. You should love whatever you do – only then you will succeed. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया

हिमाचल यात्रा के दौरान, हम लोग सबसे पहले पिंजौर रुके। इस चिट्ठी में, कुछ सूचना पिंजौर के बारे में।

पिंजौर, चंडीगढ़ से लगभग २० किलोमीटर शिमला के रास्ते पर है। यह हरयाणा राज्य में है। हम लोग,  दोपहर को, पिंजौर पहुंचे।


पिंजौर की सबसे प्रसिद्ध जगह वहां का उद्यान – सूर्यास्त के समय

पिंजौर का सम्बन्ध महाभारत से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि पाडंवों ने अपने अज्ञातवास का अंतिम एक वर्ष यहीं व्यतीत किया था और उसी आधार पर इसका नाम पंचपुर पड़ा। इस समय  पंचपुर का अपभ्रंश होकर यह इस समय पिंजौर हो गया।

हरियाणा पुरात्तव एवं संग्रहालय विभाग द्वारा छपी प्रचार पुस्तक में बताया गया है कि पृथ्वी राज के शिलालेख (११६७ ईसवी – विक्रमी संवत १२२४) में भी इस स्थल का उल्लेख ‘पंचपुर’ के नाम से हुआ है।

तस्मात्पंचपुरा धिपाय विभुना दत्ता…….(८)
दग्ध पंचपुरं हता:प्रतिमढ़ा ……………..(११)

इस क्षेत्र में एक लाख वर्ष पूर्व प्रयोग किये गये पत्थरों के औजार भी मिले हैं। जो इस क्षेत्र की प्राचीनतम ऐतिहासिक सम्पदा के प्रमाण हैं।

पिंजौर क्षेत्र में बहुतायत में फैले हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों एवं मंदिर अवशेष मिले हैं। इससे लगता है कि प्राचीन समय (१३वीं शताब्दी तक) में ही पिंजौर एक अन्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थल के रूप में विकसित हो चुका था। यह इतिहासकार अलबरूनी (१०३० ई०) के विवरण से भी पता चलता है।

पिंजौर से प्राप्त अवशेषों का समृद्व संग्रह पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, हरियाणा के अतिरिक्त, म्यूज़ियम एण्ड आर्ट गैलरी, चण्डीगढ़, एवं प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तव विभाग, कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरूक्षेत्र में भी है।

 

हिमाचल यात्रा के दौरान एक चित्र

१३वीं शताब्दी के मध्य में मूर्तिभंजक विदेशी आक्रमणकारियों के कोपभाजन के परिणामस्वरूप इन मन्दिरों की तोड़फोड़ का दौर प्रारम्भ हुआ। 

मिन्हज-पस- सराज नामक तत्कालीन इतिहासकार ने “तदकाते नासिरी” नामक ग्रंथ में उल्लेख किया है कि इल्तुतमिश के पुत्र नसीरूद्दीन महमूद ने १२५४ ईस्वी में इस स्थान को सिरमौर के राजा से छीनकर अनेक मंदिर एवं बावड़ियों को तोड़ा। इसके बाद पिंजौर ने १३९९ ई० मे तैमूर एवं १५०७ ई० में चंगेज खां के आक्रमणों को झेला।

औरंगजेब के शासनकाल के दौरान उसका चचेरा भाई  फदई खां यहां का गवर्नर हुआ। १६६१ ई० में, उसने यहां मुगल उद्यान बनाने के लिए अनेक मन्दिरों एवं बावड़ियों को तोड़ा। इनके मन्दिरों के अवशेष, आज भी इस उद्यान  की दिवालों पर मिलते  हैं।  

यह उद्यान,  यहां की सबसे प्रसिद्घ जगह है। महाराजा यादुवेन्द्र सिंह पटियाला के सबसे आखरी राजा थे। यह उद्यान, अब उन्हीं के नाम से जाना जाता है। इस उद्यान के बगल में हरियाणा पर्यटन का विभाग बजरीगर मोटेल है। हम लोग इसी  में ठहरे थे।

यहां पर घूमने के लिये, इस उद्यान के अतिरिक्त भीमा देवी का मंदिर एवं संग्रहालय है।  

अगली बार, इस उद्यान, और ‘हू मूव्ड माई चीज़’ (Who moved my cheese) नामक पुस्तक एवं समय के साथ बदलने के बारे में।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा

वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।।

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जुरी चिट्ठे में जालसाज़ी की गयी है

मैंने पिछली बार बताया था कि ९ अश्वेत लोगों पर, दो श्वेत लड़कियों के साथ बलात्कार करने के लिये तीन बार अलग अलग मुकदमा चला था। पहली बार, यह ऐलाबामा के स्कॉटस्बॉरो शहर में चला था। इसलिये इस मुकदमें को स्कॉटस्बॉरो  बॉयज़ ट्रायल के नाम से जाना जाता है। इन आरोपियों पर अलग अलग मुकदमा चला। आज चर्चा का विषय है कि इस मुकदमें में क्या फैसला हुआ।

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स्कॉटस्बॉरो  बॉयज़ अपने वकील सैमुएल लाइबोविट्ज़ के साथ।

पहली बार एक को छोड़कर आठ को फांसी की सजा सुनाई गयी। एक लड़के को, इसलिए छोड़ दिया गया था क्योंकि उसकी आयु १२ साल थी। ऎलाबामा राज्य के सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय की पुष्टि कर दी लेकिन  अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला पॉवेल बनाम ऎलाबामा (Powell Vs. Albama 287 US) में उलटते हुए कहा,

‘A defendant should be afforded a fair opportunity to secure counsel of his own choice. Not only was that not done here, but such designation of counsel as was attempted was either so indefinite or so close upon the trial as to amount to a denial of effective and  substantial aid in that regard.’
आरोपी को अपनी पसन्द का वकील करने का पर्याप्त समय मिलना चाहिए। इस मुकदमे में ऎसा नहीं हुआ। न्यायालय ने जो वकील उन्हें दिया वह न केवल अनियमित था पर उसकी नियुक्ति मुकदमा शुरू होने के इतनी करीब थी कि आरोपियों को कोई भी ठोस एवं प्रभावी कानूनी सहायता नहीं मिल पायी।

  
रूबी बेटस्, दूसरी बार मुकदमा चलते समय, गवाही देते हुऐ।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से वापस आने के बाद यह मुकदमे अन्य शहर में स्थानान्तरित कर दिए गये।  इसमें सबसे पहले पैटरसन पर मुकदमा चला और बचाव पक्ष की तरफ से सैमुएल लाइबोविट्ज़ वकील नियुक्त हुये। इस मुकदमे में रूबी बेटस् ने बचाव पक्ष  की तरफ से गवाही दी।  उसने कहा,

‘अश्वेत लड़कों ने हमें नहीं छेड़ा था। मैंने पहली बार बलात्कार की बात विक्टोरिया प्राइस के कहने पर कही थी। क्योंकि विक्टोरिया ने कहा था कि यदि मैं इस तरह से नहीं कहूंगी  तो हमें इस तरह (बिना टिकट, माल गाड़ी पर) राज्य  की सीमा पार करने के लिए जेल में रखा जा सकता है।’ 


इस बार सबूत में यह बात सिद्घ हो चुकी थी कि पैटरसन दोषी नहीं है फिर भी जूरी ने उसे   फांसी  की सजा सुनाई। इसे परीक्षण न्यायधीश ने रद्द कर दिया। इसके बाद पैटरसन तथा बाकी सब पर पुन: मुकदमा चला। इस बार पुनः, एक को छोड़कर सबको फांसी की सजा हो गयी। ऎलाबामा सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी। यह मुकदमा दुबारा फिर से अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा।

सर्वोच्च न्यायालय में, सैमुएल ने जूरी चयन को मुद्दा बनाया। इसने बहस कि,

‘वहां एक भी अश्वेत व्यक्ति को जूरी सेवा के लिये नहीं बुलाया गया हालांकि वहां के अश्वेत लोग जूरी सेवा के लिये योग्य थे। जुरी चिट्ठे में जालसाज़ी कर, बाद में अश्वेत लोगों के नाम बढ़ाये गये हैं।’

जब अमेरिका सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने सैमुएल से पूछा,

‘क्या तुम यह सिद्घ कर सकते हो?’

सैमुएल ने हांमी भरी और जुरी चिट्ठा को सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखा। जिससे पता चलता ता कि उसमें जालसाज़ी हुई है। यह अमेरिकी इतिहास में पहली, और केवल एक बार हुआ कि उन्होंने तथ्यों को अपनी अदालत में देखा। अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने पुन: फैसले को रद्द करते समय (Norris Vs. Albama 294 US 587)   कहा,

‘Whenever by any action of State, whether through its legislature, through its courts, or through its executive or administrative officers, all persons of the African race are excluded, solely because of their race or color, from serving as grand jurors in the criminal prosecution of a person of the African race, the equal protection of the laws is denied to him, contrary to the Fourteenth Amendment of the Constitution of the United States.  

We think that the evidence that for a generation or longer no negro had been called for service on any jury in Jackson County, that there were Negroes qualified for jury service, that according to the practice of the jury commission their names would normally appear on the preliminary list of male citizens of the requisite age but that no names of Negroes were placed on the jury roll, and the testimony with respect to the lack of appropriate consideration of the qualifications of negroes, established the discrimination which the Constitution forbids. The motion to quash the indictment upon that ground should have been granted.’
जब अफ्रीकन मूल लोगों को उनके रंग या कुल के कारण अफ्रीकन मूल पर चल रहे मुकदमे में रखने से वंचित किया जाता है तो यह १४ वें संशोधन का उल्लंघन है।
जब पीढ़ी दर पीढ़ी से किसी भी अश्वेत को न तो जूरी सेवा के लिए बुलाया जाए, न ही उनका नाम जूरी चिट्ठे पर हो जब कि वे इसके लिए उपयुक्त हों तब यह भेदभाव, संविधान के विरूद्व है और इस अभियोग को अपास्त करने के लिए पर्याप्त है।

अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय से वापस आने पर पाँच लोगों के खिलाफ मुकदमा समाप्त कर दिया गया। एक को फांसी की सजा दी गयी पर उसे गवर्नर ने आजीवन कारावास में बदल दिया। इस समय सब मानते है कि वे अश्वेत लड़के  दोषी नहीं थे। उन्हें यह सजा गलत तरीके से दी गयी।

इस मुकदमे पर कई फिल्म और प्रलेखी बनी हैं। १९७६ में एनबीसी ने जज हॉरटन एण्ड द स्कॉटस्बॉरो  बॉयज़ (Judge Horton and the Scottsboro Boys) नाम से टीवी फिल्म, १९९८ में कोर्ट टीवी (नया नाम ट्रूटीवी) ने इसी पर ग्रेटेस्ट ट्रायल ऑफऑल टाइमस् श्रंखला (Greatest Trials of All Time series) के लिये प्रलेखी,  २००१ में स्कॉटस्बॉरो  बॉयज़ ट्रायल (Scottsboro: An American Tragedy) के नाम से प्रलेखी, और २००६ में हैवेनस् फॉल (Heavens Fall) फिल्म बनी है।

इस श्रंखला की अगली कड़ी में चर्चा करेंगे कि इस मुकदमे ने किस तरह से हारपर ली पर असर डाला और उन्हें ‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’ लिखने के लिये प्रेरित किया।

चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से।
बुलबुल मारने पर दोष लगता है

भूमिका।। वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी – कोर्टरूम।। सफल वकील, मुकदमा शुरू होने के पहले, सारे पहलू सोच लेते हैं।। कैमल सिगरेट के पैकेट पर, आदमी कहां है।। अश्वेत लड़कों ने हमारे साथ बलात्कार किया है।। जुरी चिट्ठे में जालसाज़ी की गयी है।।

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is chitthi mein, Scottsboro boys’ trial mukdme  ke phaisle kee chrchaa hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padhne ke  liye, daahine taraf, oopar ka widget dekhen.

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सांकेतिक शब्द
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