इस श्रृंखला की पिछली चिट्ठी में हनुमान जी से मिलवाने की बात की थी। इस चिट्ठी में उनसे मुलाकात और शिमला के जाखू पर्वत पर हनुमान जी के मन्दिर की चर्चा है।
इस मन्दिर की कथा कुछ इस प्रकार है कि जब लक्ष्मण जी को मेघनाथ की शक्ति लगी तब हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के लिए निकले। जब वे जाखू पर्वत पर पहूंचे, तो वहां पर तपस्या कर रहे ऋषि ने बताया कि संजीवनी बूटी किस प्रकार की है और कहां मिलेगी।
चित्र शिमला के पर्यटन विभाग की वेबसाइट के सौजन्य से
हनुमान जी के बहुत सारे अन्य साथी भी थे। वे थके हुये थे और सो गये। हनुमान जी जल्दी में थे। इसलिए वे तुरन्त आगे की ओर निकल गये। उनके साथी वहीं छूट गये। इस मंदिर में बंदरों की बहुत बड़ी संख्या है। कथा के अनुसार वे हनुमान जी के वही साथी ही हैं जो वहां पर छूट गये थे।
हनुमान जी लौटते समय इस पर्वत पर नहीं आये और छोटे मार्ग से लक्ष्मण जी के पास पहुंच गये। इस पर ऋषि व्याकुल हो गये तब हनुमान जी ने प्रकट होकर न रुकने का कारण बताया। उनके अन्तर ध्यान होते ही वहां पर एक मूर्ती प्रकट हो गयी जो कि वहीं पर स्थापित है। पंडित जी ने मुझे कुछ प्रसाद दिया। बाहर लिखा हुआ था कि बन्दरों को प्रसाद बानर राज जगह में ही दें। मैंने वहीं जाकर बन्दरों में प्रसाद बांटा।
अधिकतर लोग, वहां पर डंडा लिये हुये थे। यह डंडा पांच रूपया किराया देकर मिलता है। यह बंदर को डराने के लिये है ताकि वे पास न आयें। वहां पर कुछ युवक और युवतिया भी थीं। युवक के पास डंडा था मैंने कहा,
'क्या तुम्हे मालुम नहीं कि बंदर लोग उन्ही के पास आते हैं जिनके पास डंडा रहता है।'
उसने पूछा ऎसा क्यों है। मैंने कहा,
''वे समझते हैं कि वह मदारी है और वे मदारी के पास ही पहुंचते हैं।'
उसके साथ की युवतियां हंस कर उसे मदारी कह कर चिढ़ाने लगीं। लेकिन किसी का मजाक बनाना अच्छा नहीं। मुझे इसकी सजा मिली। लगता है हनुमान जी ने स्वयं आकर यह सजा दी।
१९वीं शताब्दि में जाखू मन्दिर - चित्र विकिपीडिया से
मै जब नीचे आ रहा था तो मेरे पास सामने से एक बडा सा बंदर आ गया मुझे लगा कि इसको डांटना या झगड़ा करना व्यर्थ है। कहीं वह मुझे काट न ले। मैं उसी जगह खडा हो गया। मैं कैमरा कार में ही छोड़ गया था। क्योंकि लोगो ने बताया था कि हो सकता है कि बंदर आपका कैमरा छीन ले। मुझे लगा कि यदि कैमरा छीन कर फेंक देगा तो वह टूट जायेगा। मेरे पास कैमरा तो नहीं पर चश्मा और पर्स था। इस कारण मेरी जेब कुछ फूली हुई थी। बंदर ने बहुत सावधानी से मेरी जेब में हाथ डाला। शायद प्रसाद ढूंढ रहा था। लेकिन वह तो पहले ही बन्दरों को दे दिया गया था। उसने जेब से मेरा पर्स निकाल लिया और उसे अंदर खोलकर देखने लगा कि उसमें क्या है। वह पर्स को मुंह में दबाकर दूर बैठकर मेरी तरफ देखने लगा। जैसे कि कह रहा हो,
'जब तक मुझे प्रसाद नहीं मिलेगा तब तक पर्स नहीं दूंगा।'
मेरी पत्नी शुभा नीचे जाकर कुछ प्रसाद खरीद कर ले आयी। उसने प्रसाद को एक जगह पर रख दिया। उस बंदर ने प्रसाद ले लिया और पर्स वहीं छोड़ दिया जैसे कि कह रहा हो,
'मैं तो यहीं चाहता था।'
क्या मालूम, शायद हनुमान जी स्वयं बताना चाह रहें हो कि आगे से किसी का मजाक मत बनाना, नहीं तो कड़ी सजा दूंगा। मैंने अपने रुपयों को उठा कर पर्स में रखा और नीचे चला आया।
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बढिया व रोचक संस्मरण। धन्यवाद।