February 5, 2012
'Nevertheless the Old Indians, unlike the other ancient nations, had vast conceptions of time and space. They thought in a big way. Even their mythology deals with ages of hundreds of millions of years. To them the vast periods of modern geology or the astronomical distances of the stars would not have come as surprise. Because of this background, Darwin's and other similar theories could not create in India the turmoil and inner conflict which they produced in Europe. The popular mind in Europe was used to a time scale which did not go beyond a few thousand years.'इस श्रंखला की तीन चिट्ठियां हिन्दूओं में सृष्टि रचना के बारे में यहां, यहां, और यहां लिखी हैं। इन चिट्ठियों और इस चिट्ठी पर अशोक पाण्डेय जी, दीपक भारतीय जी, ने इस तरफ इशारा किया है।
प्राचीन भारतीय, अन्य देशों की तरह से नहीं थे। उन्हें दूरी एवं यगान्तर का ज्ञान था। वे बड़ी तरह से सोचते थे। हमारे पुराण खरबों साल की बात करते हैं। हमें भूगर्भशास्त्र में लम्बे समय के कालचक्र या तारों की दूरी से, कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यही कारण है कि डार्विन के या इस तरह के अन्य सिद्धान्त ने उस तरह की मुश्किल नहीं खड़ी की, जैसा युरोप में हुआ। युरोप के लोगों के दिमाग में, इतने बड़े समय का विचार ही नहीं था। वे केवल कुछ हज़ार साल के बारे में सोचते थे।
'उन्मुक्त जी, क्या इस लेख का संबन्ध, भगवान विष्णु के १० अवतारों से है?'शायद, मेरे भाई, मेरी बहना इतनी जल्दी में क्यों रहते हैं। कुछ तो इंतज़ार करिये।
हज़रते डार्विन, हकीकत से बहुत दूर थे।यह श्रंखला तो पहले समाप्त हो गयी थी यह तो केवल पुनः लेख था। कोशिश करता हूं कि किसी नयी श्रृंखला के साथ मुलाकात करूं। लेकिन समय आभाव के कारण कुछ मुश्किल लग रहा है।
हम न मानेंगे, हमारे मूरिसान [पूर्वज] लंगूर थे।
नेपोलियन की तलवार में जड़ा – भारतीय हीरा
इस चिट्ठी में रीजेंट हीरे की चर्चा है।यह चित्र पेरिस के लूवर संग्रहालय के इस...
नेपोलियन की तलवार में जड़ा – भारतीय हीरा
इस चिट्ठी में रीजेंट हीरे की चर्चा है।यह चित्र पेरिस के लूवर संग्रहालय के इस...
हमारे यहां भरतपुर से अधिक पक्षी आते हैं
इस चिट्ठी में, मथुरा में स्थित, इंडियन आयल रिफ़ाइनरी की चर्चा है। मथुरा में एक...
दूसरे ग्रहों पर जीवन, उन पर बसेरा – कल्पना आर्थर सी क्लार्क की
इस चिट्ठी में, 'डिसकवरी साइंस' (Discovery Science) चैनल पर आ रही 'प्रॉफेटस् ऑफ साइंस फिक्शन'...
महिलायें जमीन पर लोट रही थीं
इस चिट्ठी में, गोकुल-मथुरा में रमण रेती आश्रम की चर्चा है। रमण रेती पर बालू...
सौ साल पहले…
इस चिट्ठी में, आज के दिन सौ साल पहले साहस के कारनामे की चर्चा है।
This...
नेपोलियन की तलवार में जड़ा – भारतीय हीरा
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सौ साल पहले…
इस चिट्ठी में, आज के दिन सौ साल पहले साहस के कारनामे की चर्चा है।
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समृद्ध आलेख । तृप्त हुए।
कृष्ण – मानव, संगीत के साथ;
गौतम बुद्ध – शांति और करुणा का प्रतीक
कल्कि Kalki – शायद यह ८४ हज़ार साल बाद आना है। इसी के साथ कलियुग की समाप्ति है और एक चक्र पूरा होगा।
यहाँ मैं हमेशा अटकता रहा हूँ। उत्तर वैदिक काल का कृष्ण योगी घोर आंगिरस का शिष्य है, लोक परम्परा में वंशी बजैया और महाकाव्य परम्परा में सुदर्शनधारी महाभारत जैसे युद्ध का सारथी। साम गायन हो या वैदिक मंत्रों के बलाघात – संगीत था लेकिन उसकी लय पर हजारो पशुओं की बलि भी होती थी। अन्य पुरानी सभ्यताओं में भी सांगीतिक अभिचार और नरबलि तक के प्रमाण मिले हैं।
ऐसे में बुद्ध का करुणा और अहिंसा का सन्देश सुकून देता सा लगता है लेकिन कल्कि अवतार को घोड़े पर बैठ तलवार द्वारा संहार करते बताया गया है। यह कैसा विकास है ?
वैसे तो ज्ञावार्ता चल रही है मगर:
हज़रते डार्विन, हकीकत से बहुत दूर थे।
हम न मानेंगे, हमारे मूरिसान [पूर्वज] लंगूर थे।
-मुझे कुछ लोगों की हरकत देखकर लगभग विश्वास हो चला है. नाम आपको अलग से बता दूँगा.