Unmukt – उन्मुक्त

हिन्दी चिट्ठाकार उन्मुक्त की चिट्ठियाँ

June, 2010

यह माईक की सबसे बडी भूल थी

इस चिट्ठी में, मनाली में इस्रायली खाना, और वहां पर गोवा में क्रिकेट की कोचिंग करते ऑस्ट्रेलिया दम्पत्ति से मुलाकात की चर्चा है।

हम लोग जब कस्बे से, मनाली के लिये चले थे तब एक मित्र ने कहा था,

‘मनाली में ड्रैगन गेस्ट हाउस हैं। वहां ईस्रायली खाना मिलता है। उसे जरूर खा कर आना।’

मनु के मन्दिर से वापस आते समय, हम लोग डैग्रन गेस्ट हाउस को ढूढ़ने लगे। उसे ढूढ़ंते समय, हमारी मुलाकात एक विदेशी दम्पत्ति से हुई। हमने उन्हीं से इसका पता पूछा। वे लोग वहीं ठहरे थे। उन्होंने हमें रास्ता बताया और कहा,

‘हम लोग वहीं ठहरे है। क्या आप भी वहीं ठहरने जा रहे है?

हमने बताया कि हम लोग वहां पर इस्रायली खाना खाने के लिए जा रहे है। कुछ देर इनसे बात हुई। इनका नाम माईक और पैटी था। मैंने माईक और पैटी से कहा कि वे भी हमारे साथ क्यों नहीं खाना खाते हैं। कुछ देर, सोचने के बाद, वे हमारे साथ खाना खाने आ गये।

माइक और पैटी अस्ट्रेलिया के हैं। वे बहुत सालों से, गोवा में रह रहे हैं। माइक वहां क्रिकेट की कोचिंग करते हैं। माईक न्यू-साउथ वेल्स की तरफ से खेला करते थे। वे १९८२ में, इंग्लैण्ड में काउंट्री क्रिकेट खेल रहे थे तभी हिन्दुस्तान आ गये। जब माइक बता रहा था तब पैटी ने कहा, 

‘यह माईक के जीवन की सबसे बडी भूल थी। क्योंकि तभी उसके पास वह अस्ट्रेलिया की तरफ से खेलने के लिए तार आया था। लेकिन, किसी को नहीं मालूम था कि माईक कहां पर हैं। इसलिए न उससे बात हो पायी, न ही वह आस्ट्रेलिया के लिए  खेल पाया।’

माइक मुख्यत: लेग स्पिनर हैं। उसने कहा,

‘पिछली बार आइपीएल में, मेरे द्वारा कोच किया गया एक लडके का चयन बंगलोर की तरफ से खेलने के लिए हो गया था। लेकिन प्रैक्टिस करते समय उसके अंगूठे में चोट लग गयी थी। जिसके कारण वह आइपीएल में नहीं खेल सका।’

शायद दुर्भाग्य अभी तक उसका साथ नहीं छोड़ रहा है। भगवान करे कि उसका कोच किया हुआ लड़का, भारत की तरफ से खेले। 

हम लोगों ने उन्हें बताया कि हम लोग शाकाहारी भोजन करेगे। इस पर उन्होंने  शाकाहारी व्यंजन शुशुका, ग्रिल्ड वेजीटेबल हम्मस (Grilled Vegetable Hummus),  पीटा ब्रेड के साथ खाने की सलाह दी। हम लोगों ने उन्हीं के सुझाव पर,इसे खाने के लिए ऑर्डर किया।

  • शुशुका, चना और अंडे के साथ बना हुआ एक व्यंजन है।
  • ग्रिल्ड वेज़ीटेबिल हम्मस,  चने  लहसुन के साथ पीसकर बनाया गया व्यंजन है। मुझे यह पसंद आया।
  • पीटा ब्रेड,  तंदूरी रोटी की तरह,  पर उससे पतली थी।

मनाली में शराब आसानी से मिलती है। अधिकतर रेस्तरां रेस्तरां बार भी है। मैं शराब नहीं पीता हूं। लेकिन मैंने माइक और पैटी से पूछा कि क्या वह वाइन या अन्य किस्म की शराब लेना पसन्द करेगें। इस पर माइक ने कहा,

‘मैं खिलाड़ी हूं। शराब का सेवन नहीं करता। हम लोग इसे न लेगे।’

खाना खाने के बाद माइक ने पैसा देने की बात की। मैने कहा,

‘हमने आपको आमंत्रित किया है। इसलिए पैसा हम ही देगें।’

काफी देर तक बहस के बाद,  उन्होनें  हमें पैसा देने दिया।

इस श्रृंखला की अगली कड़ी में हम लोग रोहतांग पांइट चलेंगे। वहां अन्य लोगों के साथ, जापानी महिलाओं से बात करेंगे कि वे क्या हमारे देश के बारे में क्या सोचती हैं और हो सका तब लौटते समय पैरा-ग्लाइडिंग का आनन्द लेगें।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी।। जहां हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे की बात हुई हो, वहां मीटिंग नहीं करेंगे।। बात करनी होगी और चित्र खिंचवाना होगा – अजीब शर्त है।। हनुमान जी ने दी मजाक बनाने की सजा।। छोटे बांध बनाना, बड़े बांध बनाने से ज्यादा अच्छा है।। लगता है कि विंडोज़ पर काम करना सीख ही लूं।। गाड़ी से आंटा लेते आना, रोटी बनानी है।। बच्चों का दिमाग, कितनी ऊर्जा, कितनी सोचने की शक्ति।। यह माईक की सबसे बडी भूल थी।।  हमने भगवान शिव को याद किया और आप मिल गये।। आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते।।
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This post talks about Israilee food in Manali and our meeting with Australian cricket coach in Goa. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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बच्चों का दिमाग, कितनी ऊर्जा, कितनी सोचने की शक्ति

मनाली में, सबसे पहले, हम मंदिरों को देखने के लिए, पुरानी मनाली गये। इस चिट्ठी में हिडिम्बा और मनु मन्दिर की चर्चा है।

हिडिम्बा मन्दिर

मनाली में हिडिम्बा का मंदिर है।  कहा जाता है कि यहीं पर भीम की मुलाकात हिडिम्बा से हुई थी। हिडिम्बा को काली का अवतार का अवतार कहा गया है। इसी कारण इस मंदिर के अन्दर दुर्गा की मूर्ति भी है। इस मंदिर में, हिडिम्बा के पैर के ही निशान हैं जो कि एक गुफा के अन्दर हैं।

इसके चारो तरफ मंदिर बना हुआ है। इस  हिस्से को राजा बहादुर सिंह ने १५५३ बनवाया था। हिडिम्बा के मंदिर में, बाहर की तरफ बहुत सारी सींगें लगी थीं। मैंने इसका कारण पूछा तब बताया गया कि यहां पर जानवरों की बलि दी जाती है और उसके बाद उनकी सींग यहीं पर टांग दी जाती है।

मनु मन्दिर

कहा जाता है कि मनाली में, महर्षि मनु ने तपस्या की थी। इसी लिये, इस जगह को पहले मनुआलय कहा गया। बाद में, यह मनाली हो गया। जिस जगह मनु ने तपस्या की थी वहीं पर उनका मन्दिर बना दिया गया। हिडिम्बा के मन्दिर देखने के बाद, हम लोग मनु के मन्दिर को भी देखने गये।

रास्ते में लोग, ताश खेल रहे थे। उन्होने बताया,

‘सीज़न के समय पर्यटको के कारण, दम मारने की फुरसत नहीं रहती लेकिन जब सीज़न न हो, तब समय ही समय रहता है। इस समय हम लोग ताश खेलकर अपना मनोरंजन करते हैं।’


वे लोग टिल्ली नामक खेल खेल रहे थे । जब उन्होने विस्तार से इस खेल के बारे में  बताया तब मुझे लगा कि यह रमी की तरह का ही खेल है। एक बार जीतने पर ५ प्वाइंट मिलते  हैं। २१ प्वाइंट जीत जाने पर जितने पैसे की शर्त हो वह जीत लेता है। वे लोग ५०/-रूपये शर्त के साथ खेल रहे थे।

मनु के मंदिर में, बहुत सारे बच्चे थे। वे कुछ अजीब सा खेल खेल रहे थे। मैंने पूछा कि यह कौन सा खेल है उन्होंने बताया कि वे घोड़ा-घोड़ा खेल रहें है। इसमें दीवाल के सहारे, झुक एक लड़का खड़ा हो जाता था। उसके बाद उसके पीछे से एक लड़का दौड़ता हुआ आता था और उसकी पीठ पर चढ़ जाता था। उसके बाद घोड़े बने लड़के को, दूसरे को गिराना होता है। यदि पीठ पर चढ़ा लड़का, गिर जाता था तब वह घोडा बनता था। इनमें से एक लड़का बड़ा था। मैंने उससे कहा कि तुम तो बहुत बड़े हो। उसने बताया,

‘इसीलिए मै अकेले हूं और बाकी तीन लड़के एक साथ खेल रहे हैं।’

मैंने न यह खेल कभी अपने बचपन में खेला, न इसके पहले कभी सुना था। मनाली मैदान नहीं हैं। इसीलिये बच्चों ने यह खेल निकाल लिया। बच्चों के दिमाग में कितनी ऊर्जा और सोचने की शक्ति होती है। वे मनोरंजन के लिए कैसे तरह, तरह के खेल निकाल लेते हैं।

इस श्रृंखला की अगली चिट्ठी में, मनाली में इस्रायली खाना और वहां पर गोवा में क्रिकेट की कोचिंग करते ऑस्ट्रेलिया दम्पत्ति से मुलाकात की चर्चा होगी।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी।। जहां हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे की बात हुई हो, वहां मीटिंग नहीं करेंगे।। बात करनी होगी और चित्र खिंचवाना होगा – अजीब शर्त है।। हनुमान जी ने दी मजाक बनाने की सजा।। छोटे बांध बनाना, बड़े बांध बनाने से ज्यादा अच्छा है।। लगता है कि विंडोज़ पर काम करना सीख ही लूं।। गाड़ी से आंटा लेते आना, रोटी बनानी है।। बच्चों का दिमाग, कितनी ऊर्जा, कितनी सोचने की शक्ति।। यह माईक की सबसे बडी भूल थी।।  हमने भगवान शिव को याद किया और आप मिल गये।। आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते।।
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नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है

कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, गणित के तर्क शास्त्र पर चलता है। कंप्यूटर वायरस, इसकी कमियों का फायदा उठाते हैं। इसलिये साइबर अपराध की श्रृंखला में, साइबर अपराधों के बारे में बात करने से पहले, कुछ बातें  गणित के प्रसिद्ध २३ सवालों, और तर्क शास्त्र के क्षेत्र से, स्वयं को संदर्भित करने वाले विरोधाभास के बारे में। 
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
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अक्सर समझा जाता है कि गणित अपने में सम्पूर्ण विषय है। लेकिन यह सच नहीं है। १९वीं शताब्दी के समाप्त होते होते गणितज्ञों को अपने विषय के बुनियादी सिद्वान्तों के बारे में शक होने लगा। वे गणित के अलग अलग क्षेत्रों के मूलभूत सिद्वान्तों के सबूत ढूंढने लगे।

गणित के बारे में सबसे महत्वपूर्ण सम्मेलन इंटरनेशनल काँग्रेस ऑफ मैथमैटीशियनस् (आईसीएम) (International Congress of Mathematicians) है। इसका आयोजन इंटरनेशनल मैथमैटकल यूनियन (आईएमयू) (International Mathematical Union) करती है। यह सम्मेलन चार साल में एक बार होता है। इसमें पिछले चार साल में गणित का लेखा जोखा देखा जाता है और भविष्य में गणित की राह।

इस बार आईसीएम, १९-२७ अगस्त २०१० के दौरान, हैदराबाद में हो रहा है। यह एक महत्वपूर्ण सम्मेलन है और ऐशिया में तीसरी बार हो रहा है। इसकी वेबसाइट में इस सम्मेलन के पोस्टर हैं। उसका एक पोस्टर आप दाहिने तरफ देख रहे हैं और दूसरे पोस्टर से यह संस्कृत का श्लोक आपके लिये।

यह चित्र आईसीएम २०१० की वेबसाइट के सौजन्य से

यथा शिखा मयूराणां नागानां मण्यो यथा।
तथा वेदाङ्गशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्।।
जिस तरह से,
मोरों के सिर पर कलगी,
सापों के सिर में मणियां,
उसी तरह विज्ञान का सिरमौर गणित।।

शायद आराधना जी जो कि संस्कृत विदुषी हैं या कोई अन्य संस्कृत ज्ञानी बता सके कि यह श्लोक कहां से है और क्या इसका अनुवाद सही है?

गणित में नोबल पुरस्कार नहीं मिलता है। इसका कारण स्पष्ट नहीं है। नोबल ने शादी नहीं की थी। लेकिन कई कहते हैं कि वे साइने लिंडफोर्स (Signe Lindfors) से प्रेम करते थे। उसने उनका प्रेम न स्वीकार कर, गणितज्ञ गोस्टा मिटंग लेफर {Magnus Gustaf (Gösta) Mittag-Leffler}  से शादी कर ली। इससे क्रोधित होकर, उन्होंने गणित में नोबल पुरुस्कार नहीं रखा। शायद यह सच नहीं है। नोबल ने शायद गणित का महत्व ही नहीं समझा।

चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से


गणित में सबसे महत्वपूर्ण पुरस्कार फील्डस् मेडल (Field’s Medal) है। यह पुरस्कार इसी आईसीएम में दिया जाता है। चूकिं यह चार साल में एक बार होती है इसलिये यह अधिक से अधिक चार लोगों को दिया जाता है। इसमें अधिकतम आयु सीमा ४० वर्ष की है।

आईसीएम में, आईएमयू स्कॉलर एवार्ड (IMU Scholar Award) भी दिया जाता है। यह पुरुस्कार नवोदित (३५ सालसे कम उम्र) गणितज्ञों को दिया जाता है। बहुत साल पहले शुभा को इसमें जाने का मौका मिला था। उसे आईएमयू स्कॉलर पुरस्कार मिल चुका है। मैं उसके पीछे पड़ा हूं कि वह इस सम्मेलन के बारे में अपने चिट्ठे पर लिखे। देखिये वह कब लिखती है। पत्नियां कब पतियों की बात मनाती हैं :-( वह जब लिखेगी तब देखा जायगा, हम लोग उसके लिये क्यों रुकें, चलिये आगे चलते हैं।

डेविड हिल्बर्ट का चित्र विकिपीडिया से

वर्ष १९०० की आईसीएम पेरिस में हुई थी। इसमें डेविड हिल्बर्ट ने २३ प्रश्नों को रखा था उसका कहना था कि इन मुश्किलों का हल ही गणित को नयी ऊँचाइयों तक ले जा सकता है। इसमें कुछ का हल तो निकाला जा सका है पर कईयों का नहीं।

इन प्रश्नों के, दूसरे प्रश्नों में सिद्घ करना कि,

‘Mathematical reasoning is reliable, it should not lead to contradictory results’
गणित का तर्क विश्वसनीय है। यह विरोधाभास को जन्म नहीं दे सकता।

वर्ष १९२८ की आईसीएम बोलोन्या इटली (Bologna, Italy) में हुई। यहां पर हिल्बर्ट ने पुन: विचार किया,
‘If it was possible to prove every true mathematical statement or can there be truly formal logical system for mathematics, where every statement could either be proved or disproved.
क्या यह संभव है कि प्रत्येक गणित के कथन को सिद्घ किया जा सके। दूसरे शब्दों में क्या गणितीय तर्क का ऐसा संसार हो सकता है जहां सही अथवा गलत कथन सिद्घ किये जा सके।

यह प्रश्न गणित के तर्क शास्त्र के क्षेत्र का है। इसमें सबसे मुश्किल स्वयं को संदर्भित करते हुए विरोधाभास (self referencing paradoxes) की है।

ऍपीमेनेडीज़ का चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से

स्वयं को संदर्भित करते विरोधाभास में सबसे प्रसिद्घ विरोधाभास ऍपीमेनेडीज़ या लाएरस् विरोधाभास (Epimenides’ or liar’s paradox) है। ऍपीमेनेडीज़ एक ग्रीक दार्शनिक थे और ईसा के ६०० साल पहले क्रीट में रहते थे। उन्होंने एक महत्वपूर्ण कथन किया,

‘The Cretans are always liars.’
सारे क्रीटवासी हमेशा झूठ बोलते हैं।

यदि आप इनको सच माने तो यह झूठ बन जाती है और इसे झूठ माने तो यह सच हो जाती है। यही इसका विरोधाभास है।

बट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) न केवल एक प्रसिद्व दार्शनिक थे बल्कि वह एक गणितज्ञ भी थे। उन्होंने सौ साल पहले इस विरोधाभास को नयी तरह से रखा। जिसको रसेल विरोधाभास या नाई का विरोधाभास (Russell’s or Barber’s paradox) भी कहा जाता है। यह कुछ इस प्रकार है,

‘एक गांव में केवल एक ही नाई था। उसने कहा कि वह उन लोगों की दाढ़ी बनाता है जो स्वयं अपनी दाढ़ी न बनाते हो।’

इस कथन में कोई भी मुश्किल नहीं है जब तक आप यह सवाल न पूछें कि,

‘नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है?’

यदि नाई अपनी दाढ़ी स्वयं बनाता है तो उसके कथनानुसार उसे अपनी दाढ़ी नहीं  बनानी चाहिए। यदि वह अपनी दाढ़ी नहीं बनाता है तो उसके कथनानुसार अपनी दाढ़ी बनानी चाहिए।

रसेल और व्हाइटहैड (Whitehad) ने इस तरह के विरोधाभास को समाप्त करने के लिए वर्ष १९१३ में अंकगणित की एक प्रसिद्घ पुस्तक प्रिंसिपिया मैथमैटिका (Principia Mathematica) नाम से प्रकाशित की।  उनके विचार से उन्होंने इसका हल निकाल लिया था।  क्या यह सच था – यह इस श्रृंखला की अगली कड़ी में। 

लाऍरस् विरोधाभास का एक रूप और भी देखिये। शायद यह बेहतर समझ में आये :-)

पुनः (१) मैंने कुछ समय पहले मार्टिन गार्डनर को श्रद्धांजलि देते समय सुझाव दिया था कि क्या अच्छा हो कि कोई विश्वविद्यालय उनके सम्मान में कोई कॉंफरेन्स या सम्मेलन करे। आईसीएम २०१० के आयोजकों को भी मैंने यह सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि यह मुश्किल है क्योंकि सब पहले से तय हो गया है पर वे प्रयत्न करेंगे। देखिये यह हो पाता है कि नहीं।

(२)  १९२८ की आईसीएम Bologna, Italy में हुई थी। मैंने शहर का नाम बोलगाना लिखा था। राम चन्द्र मिश्र जी इटली में शोद्ध करते हैं। उन्होंने टिप्पणी करके बताया कि इसे बोलोन्या कहते हैं। उनको मेरा धन्यवाद।

(३) मैथली गुप्त जू बलॉगवाणी के संचालक हैं। उन्होंने टिप्पणी कर के बताया कि यह श्लोक सुधाकर द्विवेदी जी द्वारा लिखित ज्योतिष ग्रंथ याजुष ज्योतिष (Yajush Jyotish) के इस पन्ने से लिया गया है। मेरा उनको धन्यवाद। मुझे अच्छा लगेगा यदि कोई चिट्टाकार बन्धु इस ग्रंथ एवं इस श्लोक के संदर्भ की व्याख्या कर उसे प्रकाशित करे। 

(४) प्रेत विनाशक जी ने टिप्पणी कर बताया कि उपरोक्त श्लोक मूल रूप से लगध ऋषि द्वारा रचित ’वेदांग ज्योतिष’ नामक ग्रंथ से लिया गया है। लगध ऋषि का काल १३५० ई. पूर्व का माना जाता है। वे भारतीय ज्ञान परम्परा में प्राचीनतम विद्वानों में से हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि सुधाकर द्विवेदी जी ने अपनी पुस्तक में इस श्लोक को मात्र संदर्भित किया है। वे इसके लिये इस पेज को भी देखने को कहते है। यह तो अब बहुत ही रोचक होता जा रहा है।  क्या कोई चिट्ठाकार बन्धु, विस्तार से प्राचीन भारत में गणित के योगदान के बारे में लिख सकेगा।

  तू डाल डाल, मैं पात पात
भूमिका।। नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है।।


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yeh chitthi cyber apradh ki shrakhlaa kee chitthi hai. computer software ganit ke tark shatra per banaaye jaate hain. computer virus iskee kamiyon kaa faydaa utthate hain. is chitthi mein kuchh baaten ganit kee aur kuch bate svayam ko sandarbhit karte virodhabhas ke baare mein. yeh chitthi {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is part of ‘Cyber Crime’ series. Computer software are created with the help of mathematical logic. Computer virus take advantage of their shortcoming. In this post we talk about 23 most famous problems of Mathematics and about self referencing paradoxes. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
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अरे, यह तो मेरे ध्यान में था ही नहीं

इस चिट्ठी में ‘टू किल अ मॉकिंगबर्ड’ के प्रकाशन के ५०वें साल पर हो रहे सम्मेलनों की चर्चा है। This post talks about function on 50th anniversary of publication of ‘To Kill a Mockingbird’. is chitthi mein ‘To Kill a Mockingbird’ ke prakashn ke 50ven sal per ho rahe samelanon kee charchaa hai.

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गाड़ी से आंटा लेते आना, रोटी बनानी है

स्टर्लिंग रिज़ॉर्ट कुछ अलग तरह के रुकने की जगहें हैं।
इस चिट्ठी में मनाली में स्टर्लिंग रिज़ॉर्ट की चर्चा है।


हम लोगों का आरक्षण स्टर्लिंग रिज़ॉर्ट में था। इनके बहुत से रिज़ॉर्ट भारत वर्ष में हैं। यह अच्छे होटल हैं पर कुछ अलग तरह के हैं। इनके कमरों में ही छोटा सा किचन होता है जिसमें आप खाना भी बना सकते हैं।

मनाली के स्टर्लिंग रिज़ॉर्ट में दो ब्लॉक थे। एक ब्लॉक में किचन था पर दूसरे में नहीं। किचन में, हर तरह के बर्तन थे। हम लोग किचन वाले ब्लॉक में थे। मैं नहीं जानता की यह विचार कहां से लिया गया। मुझे यह व्यवहारिक नहीं लगता था क्योंकि मेरे विचार में लोग अक्सर घूमने के लिए जाते है और खाना बनाने में व्यस्त नहीं रहना चाहते है पर मैं गलत था। शुरू में, उलझन भी लगी पर धीरे धीरे मज़ा आने लगा।

इसमे मुझे कुछ कमियां लगीं। आजकल तो मामूली होटल में भी बिजली की केतली, चाय, चीनी, दूध पैकेट रखे रहते है। सारे होटलों में, स्वयं चाय बनाने की बात रहती है लेकिन यहां पर बर्तनो में न तो बिजली की केटली थी, न चाय, दूध चीनी के पैकेट थे। वहां पर बिजली का एक हीटर था। चाय हीटर में गर्म करके बनानी होती थी। इसमें ज्यादा बर्तन गन्दे होते हैं फिर उन्हें धोना भी पड़ता है। जितने कम बर्तनों का प्रयोग हो, उतना ही अच्छा होता है।

स्टर्लिंग का इसी तरह का रिज़ॉर्ट ऊटी में भी है। हम लोग वहां दस साल पहले ठहरे थे। लेकिन ऊटी में सबसे अच्छी बात यह थी कि वहां पर रिज़ॉर्ट के अंदर ही एक छोटी से दुकान थी जिसके यहां आप सब चीजें खरीद सकते थे। यहां पर सामान खरीदने के लिए होटल के बाहर जाना पड़ता था। लेकिन रोड़ पार करते ही, एक दुकान थी जहां पर सारी चीजें मिल जाती थीं।

मैंने स्वागत कक्ष पर रखी शिकायत पुस्तक में इस बात को लिखा कि वे इन कमरों में बिजली की केटली, टी बैग, मिल्क वगैरह की सुविधा दें। इसका पैसा वे चाहें तो अलग से ले लें। हो सकता है कि जब आप वहां कभी जायें, तो यह सुविधा मिले। तब मुझे धन्यवाद देना न भूलियेगा।

बिजली की केटली न होने कारण शुरू में उलझन लगी। लेकिन मुझे कभी, कभी पीठ में दर्द होता है इसलिये हम बिजली की केटली भी साथ रखते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर पानी गरम कर, गर्म पानी की बोतल से पीठ सेकी जा सके। हम इस बार भी बिजली की केटली साथ ले गये थे। इसलिये चाय बनाने में उलझन नहीं हुई।

सफाई करने की भी जिम्मेवारी मेरी थी।

हम लोग सुबह जाकर डबल रोटी, ब्रेड, अंडे, प्याज, रिफाइन तेल का छोटा पैकेट दूध, १०० ग्राम चीनी और कुरकुरे खरीद लाये। मैं अपने लिए आमलेट बनाता था। टोस्ट को हम रिफाइन आयल में फ्राई करते थे। अमूल दूध का एक पैकेट भी खरीद लिया था। मेरी पत्नी आमलेट की जगह उबला अंडा पसन्द करती थी। नाश्ता बनाने की जिम्मेदारी मेरी रहती थी। इस काम में आनन्द आने लगा।

हम लोग रात का खाना नहीं बनाते थे। लगता है बहुत से लोग रात का खाना बनाते है क्योंकि पहले दिन हम लोग रात का खाना खाने जा रहे थे। ऊपर से एक महिला की आवाज सुनायी पड़ी। वह अपने पति से कह रही थी।

‘गाड़ी में आटा रखा है, लेते आना, रोटी बनानी है’।

मैने स्वागत कक्ष में पूछा कि कितने लोग स्वयं अपना खाना भी बनाते हैं। स्वागत कक्ष पर युवक ने बताया,

‘उसमें सुबह की चाय सब अपने आप बनाते हैं। ५० प्रतिशत लोग नाश्ता भी स्वयं बनाते है। २० प्रतिशत लोग नाश्ते के साथ रात का खाना भी स्वयं बनाते है। क्योंकि घर का बना हुआ खाना उबला हुआ, बिना मसाले का होता है जो कि होटल के खाने से कहीं बेहतर है। रोज़ रोज़  बाहर का खाना खाते खाते आदमी ऊब जाता है। दोपहर का खाना लोग बाहर खाते हैं।

यानि कि, हम ५० प्रतिशत लोग जैसे थे जो सुबह का नाश्ता स्वयं बनाते थे। यह भी, छुट्टियों का आनन्द लेने का अलग तरह से तरीका है। जो कि शायद समान्य तरह के होटल में रहकर पूरा नहीं हो सकता है। यह भी सच है कि रोज़  बाहर का खाना भी नहीं खाया जा सकता है।

स्टर्लिंग रिज़ॉर्ट में, प्रत्येक शाम को कुछ न कुछ गतिविधि होती रहती थी – कभी बुझौवल, तो कभी ज्ञान विज्ञान, प्रतियोगिता कभी कविताओं की तो कभी गानों की शाम। एक व्यक्ति हम लोगों को रोज उसमें भाग लेने के लिये फोन करता था। लेकिन हम इतने थके रहते थे कि वहां नहीं जा पाते थे।

एक रात को खाना खा कर लौट रहे थे, एक हॉल से गाने की आवाज आ रही थी। उस दिन शाम को वही गतिविधि थी। हम लोग वहां रुके अच्छा लगा। ईश्वर ने बहुत कुछ मुझे दिया पर संगीत, नृत्य चित्रकारी, कविता जैसी बेहतरीन विधाओं को से दूर रखा। ऐसी जगह जा कर लगता है कि मैंने क्यों नहीं बचपन में इनमें रुचि ली। यदि लेता तो शायद आज बात अलग होती है।

स्टर्निंग रिज़ॉर्ट  में मुझे एक बात अजीब लगी। एक दिन जब रात्रि में खाना खाकर वापस आये तो हमारे कमरे में सिगरेट की बदबू आ रही थी। हमारी समझ में नहीं आया कि यह कैसे हो गया क्योंकि, हमारे कमरे में कोई नहीं आया था। बाद में इसका कारण, हमारी समझ में आया।

रिज़ॉर्ट की लॉबी में स्मोकिंग करना मना था। लेकिन कमरों में स्मोकिंग करना मना नहीं था। यानी कि आप अपने कमरे में सिगरेट पी सकते थे। हर कमरे के बाथरूम में एक्ज़ॉस्ट फैन लगा हुआ था। एक तल के कमरों में एक्ज़ॉस्ट, एक पाइप में हवा फेंकते थे और वह होटल के बाहर निकलती थी। लगता है कि बगल के कमरे से किसी ने सिगरेट पीते समय अपना एक्ज़ॉस्ट चल रखा था। हम  कमरे में नही थे। इसलिए हमारे कमरे का एक्ज़ॉस्ट नही चल रहा था। इस कारण पाइप से सिगरेट का धुंआ हमारे कमरे में आ गया। अगली बार जब हम कमरे से बाहर गये तो एक्ज़ॉस्ट चला कर गये ताकि किसी अन्य कमरे से सिगरेट का धुआं हमारे कमरे में न आ सके और ऐसा ही रहा। फिर हमारे कमरे में सिग्रेट का धुआं नहीं आया।

मेरे विचार से  कमरों  में भी सिगरेट पीने की मनाही होनी चाहिये। मैं जर्मनी और साउथ अफ्रीका में होटल में ठहरा था। वहां न केवल लॉबी में पर कमरों में भी सिगरेट पीना मना था। हलांकि कुछ खास कमरे थे। केवल उनमें ही सिगरेट पी जा सकती थी। यहां भी ऐसा ही होना चाहिए। मैंने इसके बारे में भी स्वागत कक्ष में कहा भी। लेकिन मुझे नहीं लगता कि अपने देश मे कमरों में सिगरेट पीने में, कभी मनाही हो सकेगी।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
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