सोलंग घाटी जाने का रास्ता हरा भरा था और सुन्दर लगा। वहां पर एक बहुत बड़ा मैदान था। वहां पर तारगाड़ी का निर्माण चल रहा था। इसके कारण मैदान बिगड़ गया था। वहां पर एक बंगाली सज्जन मिले। वे अपने परिवार के साथ थे। वह बहुत गुस्सा हो रहे थे। मैंने इसका कारण पूछा तब उन्होंने बताया।
'हम २००२ में यहां आये थे। उस दिन आये थे जिस दिन रानी मुखर्जी अपनी फिल्म की शूटिंग कर रही थी। उस समय यह मैदान घास से भरा था। बहुत सुन्दर लग रहा था। अब यह बिल्कुल बरबाद कर दिया गया है।'
अब रानी मुकर्जी हों तो दुनिया की सारी जगहें सुन्दर लगेंगी :-)
यह सच था कि उस समय, वह मैदान बेकार लग रहा था। इसका कारण यह भी था कि वहां तारगाड़ी का निर्माण हो रहा था। मुझे लगता है तारगाड़ी के निर्माण हो जाने के बाद वह फिर से सुन्दर हो जायेगा। यह भी हो सकता है उन सज्जन को रानी मुखर्जी के कारण वह जगह ज्यादा सुन्दर लगी या फिर रानी मुकर्जी से पुनः न मिलने की निराशा हो।
सोलंग घाटी में तारगाड़ी का निर्माण
सोलंग घाटी पर भी पैरा ग्लाईडिंग हो रही थी और बहुत से लोग कर रहे थे। हम लोग थक गये थे क्योंकि रोहतागं में काफी पैदल चले थे। वापस आकर खाना खाया और निद्रा देवी की गोद में पहुंच गये।
अगली बार हम लोग मनाली में वशिष्ट जी के मन्दिर देखने और वहां पर गर्म चश्में की कथा सुनेंगे।
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‘… एक बात और यहाँ साथ ही कहता चलूँ – जो मैंने उन्मुक्त की पोस्ट पर भी कही थी – कि बिना पूरी तरह जाने किसी विषय को, उस के बारे में अच्छी या बुरी धारणा बना लेना – पूर्वाग्रह है। सतर्क और जिज्ञासु – ज्ञान-पिपासु को इससे बचना चाहिए।’
राशियां - चित्र विकिपीडिया के सौजन्यसे
मैंने भी वहीं टिप्प्णी कर कहा था कि मैं जल्द ही अपनी बात रखूंगा। यह रहा मेरे जवाब का पहला भाग।
मेरी श्रृंखला ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ (पहली एवं अन्तिम चिट्ठी) के बारे में कुछ गलतफहमी है। इसके कारण मेरी अक्सर टांग खिंचायी और निन्दा होती है। उस चिट्ठी पर, अक्सर ऐसी टिप्पणियां आती हैं जो शालीनता के परे होती हैं। अक्सर लोग पूरी श्रृंखला नहीं पढ़ते हैं।
यह श्रृंखला लिखते समय, कड़ियों में लिखने का कारण स्पष्ट था पर संकलित कर रखते समय शायद यह स्पष्ट न रह सका कि मैंने वह श्रृंखला क्यों लिखी। मैं अपनी बात बात ज्योतिष प्रेमियों को समझाना चाहता हूं।
यह सच है कि मैं या मेरा परिवार ज्योतिष, या हस्तरेखा या अंकविद्या में विश्वास नहीं करता हूं। हम पूजा पाठ में भी विश्वास नहीं करते। मैंने अपनी मां का एक किस्सा ‘करो वही, जिस पर विश्वास हो‘ लिखा था। आपातकाल के समय, मेरे पिता जेल में थे। एक शुभचिन्तक ने, मेरी मां से कहा कि वे शिवपूजा करें तो मेरे पिता छूट सकेंगे। इसके लिये मां ने यह कह कर मना कर दिया। उन्हें इसमें विश्वास नहीं है।
हम सब भाई बहन की शादी के समय न तो जन्मकुंडली मिलवायी गयी न ही ज्योतिष के हिसाब से तिथि का ध्यान रखा गया। गृह निर्माण या प्रवेश में भी ज्योतिष का ध्यान नहीं रखा गया। हम सब अपने जीवन में खुश हैं।
कुछ समय पहले, मैंने दिल्ली के उपनगर में मकान बनवाया। उस बिल्डर ने नक्शा बनवाते समय पूछा कि क्या मकान वास्तु के हिसाब नहीं बनेगा। मैंने जवाब था,
‘मकान, वास्तु के हिसाब से नहीं बनेगा।’
उसका कहना था,
‘आप फिर से सोच लें। आजकल बिना वास्तु के कोई मकान नहीं बनवाता। आप पहले व्यक्ति मिले जो कह रहे हैं कि वास्तु के हिसाब से नहीं बनवायेंगे।’
मैंने कहा आप मकान का नक्शा सूरज की रोशनी और हवा की आने जाने की सुविधा से बनवाइये, न कि वास्तु के हिसाब से।
मेरे विचार में ‘ज्योतिष कूड़े का भार है‘। मैं कार्ल सेगन का प्रशंसक हूं। मेरे विचार उनके विचारों जैसे ही हैं। आप खुद इस विडियो में सुनिये।
उन्मुक्त चिट्ठे पर लिखी श्रृंखला को संपादित कर, लेख चिट्ठे पर लिखी चिट्ठी ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके‘, मेरी सबसे ज्यादा पढ़ी चिट्ठी है। इस श्रृंखला की चिट्ठियां, अन्तरजाल में कई जगह पूरी या इसके कुछ अंश – संदर्भ देते हुऐ या फिर बिना संदर्भ देते हुऐ – प्रकाशित हैं। यह मेरे ‘लेख’ चिट्ठे पर ही लगभग ५०,००० बार पढ़ी गयी है। यह सबसे विवादास्पद भी है।
इस पर तरह तरह की टिप्पणियां आती हैं। कुछ इसे सही मानते हैं, कुछ गलत। अधिकतर लोग मुझसे अपना भविष्य पूछते हैं। भविष्य पूछने वाली चिट्ठियों में से मैंने एक को प्रकाशित कर वहीं उसका जवाब लिख दिया पर उसके बाद में की टिप्पणियों को प्रकाशित नहीं करता हूं। टिप्पणी करने वालों को यह टिप्पणी और उसका जवाब पढ़ना चाहिये।
मेरी बातों को गलत कहने वालों में कुछ अपनी बात शालीनता से कहते हैं लेकिन अधिकतर लोग शालीनता के परे जवाब देते हैं। जो टिप्पणियां शालीनता के परे होती हैं, मैं उन्हें प्रकाशित नहीं करता – जबरदस्ती का विवाद होगा। लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि जो इस चिट्ठी को गलत बताते हैं – चाहे वह शालीनता से, चाहे शालीनता के परे – वे इसमें लिखे तर्क को नहीं काट पाते हैं। वे क्या कहते हैं यह तो आप वहीं जा कर देख सकते हैं। कुछ उदाहरण देखिये,
you are like a frog who jump around the well and like a pigeon who feel that if he close his eyes the cat back away. तुम उस मेढ़क की तरह हो जो कि कुऐं में कूदता रहता है और उस कबूतर की तरह जो कि सोचता है कि वह अपनी आंख बन्द कर लेगा तो बिल्ली चल जायगी;
APKA CHITHHA PAD KAR MUJE TO ESA LAGA JAISE KI AAPNE KISI BOOK MEI SE YAAD KARKE VAISE KA VAISA APNE CHHITHE MEI LIKH DIYA. आपका चिट्ठा पढ़ कर मुझे लगा जैसे कि आपने किसी बुक में से याद करके वैसा का वैसा अपने चिट्ठे में लिख दिया है;
sorry you are completely wrong … I think you didn’t meet from real astrologer if you meet, then you know that what is astrology … अफसोस तुम एकदम गलत हो तुम आज तक किसी सही ज्योतिषाचार्य से नहीं मिले, यदि तुम मिलोगे तब तुम्हारी समझ में आयेगा कि ज्योतिष क्या चीज़ है ;
mere mitra bhi mere sath hai kah rahe hai aap jaise logo ne hi bhrat ki lutiaa duboi hai.. to kripya aapse koi sambad na karu… मेरे मित्र भी मेरे साथ कह रहें हैं आप जैसे लोग ही भारत की लुटिया डुबोऐ हैं तो कृप्या आपसे कोई संबन्ध न करूं ;
bhagwan ki banai koi shastra galat nahi ho sakti phir jyotish to shastron ki janani hai jarurat hai भगवान की बनाई कोई शास्त्र गलत नहीं हो सकती फिर ज्योतिष तो शास्त्रों की जननी है जरूरत है;
अगर ज्योतिष को व्यर्थ सिद्ध करना है तो भी, पहले कुछ ज्योतिष अध्ययन आवश्यक है।
मैंने ज्योतिष, हस्तरेखा, और अंकविद्या के बारे में पढ़ा, अध्यन किया फिर लेख लिखा। यह कहना सही नहीं है कि मैंने बिना पढ़े ही वह श्रृंखला लिखी। यदि किसी को इस विषय का बेहतर ज्ञान हो, वह ही इन बातों को तर्क से समाप्त करे, इस बारे में लिखे।
क्या इस तरह की टिप्पणियां लेख गलत साबित होता है। क्या इनसे पता चलता कि ज्योतिष अन्धविश्वास नहीं है। मुझे यह टिप्पणियां दुखी करती हैं। इसीलिये मैंने आप सही हैं … मैं बदलाव कर रहा हूं नामक चिट्ठी लिखी।
यदि यह आस्था की बात है तब मुझे कुछ नहीं कहना क्योंकि आस्था को तर्क या ज्ञान से नहीं परखा जा सकता। वह इनके परे है।
मैं आज तक किसी भी हिन्दी चिट्ठकार से नहीं मिला। मैं उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में नहीं जानता। लेकिन मुझे वास्तविक में लोगों से मिलने उन्हें जानने का अवसर मिला है। अधिकतर लोग, कुछ न कुछ ज्योतिष, हस्तरेखा, अंक विद्या, या पूजा पाठ पर विश्वास करते मिले। मुझे ऐसे लोगों से कोई शिकवा या आपत्ति नहीं है। इनमें से बहुत, न केवल मेरे अच्छे मित्र हैं पर मुझसे कहीं गुणी और विद्वान भी हैं। वे और हम, एक दूसरे का आदर करते हैं।
मैंने ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ श्रृंखला (पहली एवं अन्तिम चिट्ठी) ज्योतिष पर विश्वास करने वालों का मजाक बनाने के लिये या किसी की आस्था या विश्वास पर चोट पहुंचाने के लिये नहीं लिखी थी।
‘उन्मुक्त जी, यदि यह श्रंखला किसी का मजाक बनाने के लिये नहीं थी तब आपने यह क्यों लिखी।’
यह सच है कि मैं यह तर्क द्वारा बताना चाह रहा था कि क्यों ज्योतिष, हस्तरेखा या अंकविद्या सही नहीं है पर इस श्रृंखला को लिखने का कारण कुछ और ही था। यह अगली बार इसी चिट्ठे पर।
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‘बकबक पर पॉडकास्ट कैसे सुने‘
उन्मुक्त चिट्ठे पर लिखी श्रृंखला ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ को यदि आप कड़ियों में पढ़ना चाहें तो नीचे लिखी लिंक पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।
'कोर्ट गर्डल, महानतम तर्क शास्त्री माने जाते हैं। इस चिट्ठी में, उनकी जीवनी और उस पर लिखी दो पुस्तकों की चर्चा है।
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
'मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने'
देखें।
कोर्ट गर्डल पर बहुत सी पुस्तकें लिखी गयी हैं। इनमें से मैंने निम्न चार पुस्तकें पढ़ी हैं:
Gödel: A life of Logic by John L Casti (गर्डल: ए लाइफ ऑफ लॉज़िक लेखक जॉन एल कास्टी)
A world Without Time: The forgotten legacy of Gödel and Einstein by Polle Yourgrau (ए वर्ल्ड विथआउट टाइम: द फॉरगॉटन लेगसी ऑफ गर्डल एंड आइंस्टाइन लेखक पॉले योरग्रॉ)
Gödel, Escher, Bach: An Eternal Golden Braid by Douglas R. Hofstadter (गर्डल, ऍशर, बाख: एन ईटर्नल गोल्डेन ब्रेड लेखक डगलस आर हॉफस्टैडर)
The Emperor's New Mind: Concerning Computers, Minds and The Laws of Physics (द एमपररस् न्यू माइंड: कंसर्निग कंप्यूटरस्, माइंडस् एण्ड द लॉज़ ऑफ फिज़िक्स लेखक रॉजर पेनरोज)
आज हम पहली दो पुस्तकों के बारे में बात करेंगे।
गर्डल जिज्ञासू थे और वह मिस्टर व्हाई (Mr. Why) के नाम से जाने जाते थे। वे असामान्य प्रतिभा के धनी थे। वे एक शर्मीले युवक से एक ऎसे व्यक्ति बन गये जिनके साथ अधिकतर लोग रहना पसंद करते थे। लेकिन जीवन के अन्त में वे फिर अकेलेपन में डूब गये।
गर्डल ने ऍडेले (Adele) नामक एक तलाकशुदा महिला से शादी की। वह उनसे ६ साल की बड़ी थी और कैबरे (Cabaret) नृत्य करती थी। यह शादी उनके माता पिता को पसंद नहीं थी इसलिए गर्डल को शादी के लिए १० साल इन्तजार करना पड़ा। उनके कोई सन्तान नहीं हुई।
कोर्ट गर्डल और अर्लबट आइंस्टाइन पिछले शताब्दी के दो महानतम वैज्ञानिक थे। जीवन के अंतिम दिनो में, वे दोनो ही इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ (Institute of Advance Studies Princeton) चले गये थे। दोनो का स्वभाव एक दूसरे के विपरीत था। गर्डल थोड़ा निराशवादी और परेशान दार्शनिक और आइंस्टाइन मुक्त भावुक व्यक्ति थे। लेकिन उन दोनों को एक दूसरे से शान्ति मिलती थी। आइंस्टाइन का कहना था कि,
'इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ में सबसे अच्छी बात यह है कि, इंस्टिच्यूट से वापस घर जाते समय, गर्डल और मेरा साथ रहता है।'
फ्रीमैन डाइसन जाने माने भौतिक शास्त्री हैं। वे इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ के स्दस्य हैं। उनका कहना है कि,
'Gödel was … the only one of our colleagues who walked and talked on equal terms with Einstein.' हमारे साथ के लोगों में, केवल गर्डल ही था जो आइंस्टाइन के साथ चल सकता था और उनसे बराबरी पर बात कर सकता था।
गर्डल कुछ अजीब किस्म के व्यक्ति थे। उन्होंने अन्त में आत्महत्या कर ली। उनका आत्महत्या का तरीका भी एकदम अलग अपने अपूर्णनता सिद्धान्त की तरह। उनकी मृत्यु malnutrition के कारण हो गयी। वे जीवन के अन्त में अस्पताल में unitary tract की समस्या के लिये भरती थे। उन्होंने महीने भर खाना नहीं खाया। उनका कहना था कि डाक्टर उन्हें जहर दे कर मारना चाहते हैं।
इन दोनो पुस्तकों में गर्डल के बारे पर्याप्त सूचना है। दूसरी पुस्तक में आइंस्टाइन के संबन्ध में भी कुछ सूचना है।
पहली पुस्तक में कुछ अध्याय, कृत्रिम बुद्धि (Artificial intelligence), सोचने वाली मशीन (Thinking machines), और जटिलता (complexity) के बारे में है। इसे उन लोगों के लिए समझना मुश्किल है जो विषय पर रूचि नही रखते है या जिनको इस क्षेत्र में कोई ज्ञान नहीं है। इसलिए यदि आप चाहें तो इन अध्याय को छोड़ सकते है पर यदि आपको तर्कशास्त्र या कम्पयूटर विज्ञान में रूचि है तब इन अध्यायों को अवश्य पढ़ें। बाकी अध्याय आसान हैं व आसानी से समझे जा सकते है।
दूसरी पुस्तक में, कुछ अध्याय गर्डल द्वारा समय के ऊपर किये गये काम के बारे में है। यह वास्तव में मुश्किल है और पढ़ते समय यदि आप चाहें तो इनको छोड़ भी सकते है।
गर्डल ने एक बार कहा
'We live in the World in which ninety-nine per cent of all beautiful things are destroyed in the bud.' हम ऐसे संसार में रहते हैं जहां ९९ प्रतिश्त सुन्दर वस्तुएं शुरुवात में ही समाप्त हो जाती हैं।
मालुम नहीं क्यों मुझे लगता है कि यह हिन्दी चिट्टाजगत पर सही बैठता है। हम अच्छे लेख लिखने के बजाय, व्यर्थ की बात पर विवाद करते रहते हैं। गर्डल के अपूर्णनता सिद्धान्त के बारे में कुछ अन्य पुस्तकों की चर्चा - इस श्रंखला की अगली कड़ी में।
रोहतांग पाइंट के रास्ते में पैराग्लाइडिंग होती है। इस चिट्ठी में उसी की चर्चा है।
रोहतागं पॉइंट के रास्ते में पैरा-ग्लाईडिंग भी होती है। रोहतागं पॉइंट से वापस आते समय, हमें रास्ते में कुछ लोग पैरा-ग्लाईडिंग करते हुए मिले। एक जगह कुछ लड़के, खड़े हुए थे। वहीं से पैरा-ग्लाईडिंग हो रही थी। मैंने ड्राइवर से कहा कि गाड़ी उनके पास ले चलो। मेरी पत्नी शुभा को यह बात बिल्कुल पसंद नही थी कि मै पैरा-ग्लाईडिंग करूं। वह कहने लगी कि हमें सीधे चलना चाहिए। मैंने कहा कि कम से कम बात तो करने दो। मैं जब उनके पास पहुंचा, तो उन्होंने बताया,
'हमारे पास दो विकल्प है। छोटी उड़ान और बड़ी उड़ान। छोटी उड़ान में आप मरहीं तक जा सकते है। लम्बी उड़ान, सोलंग वैली तक जाती है। छोटी उड़ान के लिए दो हजार रूपया और सोलंग वैली के लिए ३५००/-रूपये लगते हैं।'
अब तो विश्वास हुआ न कि मैंने पैराग्लाइडिंग की
मरहीं पर हम लोगों ने आते समय नाश्ता किया था और वापस लौटते समय वहीं खाना खाने की बात थी। इसलिए मैं छोटी उड़ान लेना चाहता था। मैंने पूछा कि क्या पैसा सही है। उसने हामी भरी। हांलाकि मुझे लगा कि यह पैसा कुछ ज्यादा है। शुभा बिलकुल नहीं चाहती थी कि मैं पैरा ग्लाईडिंग करूं। लेकिन मैं पैरा ग्लाईडिंग करना चाहता था। मैंने उसे समझाया।
'गोवा में पैरा-सेलिंग के समय मैं अकेला था। लेकिन यहां पर पैराग्लाइडिंग करते समय मेरे साथ एक ट्रेनर भी रहेगा इसलिए मुश्किल की कोई बात नहीं है तुम मुझे पैसे दे दो।'
इस पर वह गुस्से से बोली।,
'तुम किसी की बात नहीं सुनते हो। जो करना हो सो करो।'
मैंने उससे चित्र खीचने को कहा। उसने कहा,
'चित्र खींचना तो दूर, मैं तो यह सब देख भी नहीं सकती।'
लेकिन उसने २००० रूपये दे दिये पर मुंह दूसरी तरफ कर लिया।
पैरा ग्लाइडिंग करते समय मैं आगे था और ट्रेनर पीछे की ओर। सारे कंन्ट्रोल उसी के पास थे। वह डोरी की सहायता से दायें बायें या ऊपर नीचे करता था। गोवा में पैरागलाइडिंग करते समय अकेला था तो कुछ डर लगा था। लेकिन यहां पर ट्रेनर साथ था। इसलिए मुझे कोई डर नहीं लगा और बहुत मज़ा आया। हम सात मिनट में नीचे आये। शुभा गाड़ी में थी और उसको यह दूरी तय करने में लगभग चालीस मिनट लगे।
नीचे आते समय देखा कि कुछ लोग वीडियो और कुछ लोग साधारण कैमरे से फोटो ले रहे हैं। नीचे उतरने पर उन्होंने मुझे चित्र और वीडियो दिखाया और पूछा,
'क्या आप वीडियो या चित्र लेना चाहते हैं। सीडी में देने के लिये २०० रूपया लगेगा। चार चित्रो को प्रिंट करके देने में सौ रूपया लगेगा। यदि आप चित्र सीडी में चाहते है तो लगभग दस चित्र के १५०/-रूपये लगेंगे।'
मैंने कहा कि मैं लूंगा। बगल में तम्बू लगे थे। जिसमे कंप्यूटर रखे थे और वहीं उस कंप्यूटर में सीडी पर लिखने या चित्र प्रिंट करने की सुविधा थी। सारे कंप्यूटर विंडोज़ पर थे। मैंने पूछा,
मैंने, उनको थोड़ा बहुत लाइनेक्स के बारे में बताया। उनका कहना था हम लोग कोशिश करेगें। हो सकता है कि आप जायें तो उन्हें लाइनेक्स पर काम करते देखें।
मैंने कुछ देर पैरा-ग्लाईडिंग में साथ आये ट्रेनर से बात की। उसने बताया,
'मेरा नाम राजाराम है। मैं केवल इण्टरमीडिएट तक पढ़ा हूं। मैंने यह पैराशूट यूरोप से मंगाया है। यह दो लाख रूपये का पड़ा है। यह पैसा मेरे परिवार वालों ने दिया है। मैं अपनी जीविका इसी से चलाता हूं। इससे अच्छा पैसा मिल जाता है और दो साल के अन्दर दो लाख रूपये की भरपाई हो जाती है। '
वहां पर वह अकेले नहीं था। उसके साथ उसके ३-४ सहयोगी भी थे। २-३ अन्य ट्रेनर भी थे। वहां पर बहुत से लोग खड़े थे लेकिन कोई हिम्मत नही कर रहा था। लेकिन मुझे देखा-देखी और लोग भी आ गये। बाद में और लोगो ने बताया कि वह इस काम के लिए कुछ ने पन्द्रह सौ रूपये और कुछ ने बारह सौ रूपये दिए है। मुझे लगा कि मैं भी मोल भाव करता, तो वह पैसा कम कर सकता था। लेकिन यह मेरे स्वभाव में नहीं है। मेरी मां भी इसी तरह की थीं। वे दूसरे पूरे तरह से विश्वास करती थीं। यह मुझे उन्हीं से मिला है।
मुझे पैरा-ग्लाइडिंग वालों की यह बात अच्छी नहीं लगी, कुछ दुख हुआ। मेरे कारण वहां पर ५-६ लोगों में पैरागलाइडिंग की। सच बात तो यह है कि उसे मुझसे कम पैसा लेना चाहिए था बल्कि यहां पर तो उल्टा ही हुआ। मुझे यह भी सबक मिला कि वहां मोल भाव करना चाहिये था पर मुझे पैसा वापस मांगना ठीक नहीं लगा।
लगभग चालीस मिनट बाद शुभा और अन्य लोग आये। हम लोगों ने वहीं खाना खाया फिर सोलंग घाटी गये।
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इस चिट्ठी में, मनाली से रोहतंग पाइंट जाने की यात्रा और वहां मिले लोगों की चर्चा है।
रोहतांग पांइट जाने के लिए, हम लोग सुबह साढ़े सात बजे मनाली से निकले। रास्ते का नज़ारा बहुत सुन्दर था। दिखने वाली चोटियां बर्फ से ढ़की थीं, धूप तेज निकली थी लेकिन गाड़ी में ठंड लगने लगी। पिछले दिनो गर्मी थी। पूरी आस्तीन की शर्ट पहनने में पसीना निकल रहा था। इसी सोच में, मैंने ऊनी पैंट नहीं पहनी। लेकिन यह भूल थी। मुझे दुख हुआ कि मैं ऊनी पैंट लाने के बाद उसे क्यों नही पहना। रास्ते में पर्यटक जगह-जगह रूक कर गरम कपड़े और स्नो बूट ले रहे थे। यह वहां पर किराये पर मिल रहे थे।
रोहतागं पाइट पर मेरी मुलाकात सुरेश से हुयी। वे अपनी पत्नी के साथ बंगलौर से आये थे। इन्होंने एक बहुत ही रूमानी अंदाज में चित्र खिचवाया। वे बंगलौर से थे। वहां वे माइसेस नाम की आइटी कंपनी में काम करते हैं। यह बैकिंग सॉफ्टवेयर को टेस्ट करती हैं। मैंने जानना चाहा कि यह जो बैकिंग सॉफ्टवेयर है वह ओपेन सोर्स में है या मालिकाना लेकिन वे इसे स्पष्ट नहीं कर पाये। शायद मालिकाना है।
यहां पर मेरी मुलाकात एक अन्य दम्पत्ति से हुई। मुझे बहुत खुशी हुई कि वह ओपेन सोर्स में काम करते है और यूनिक्स (UNIX) एडमिनीस्ट्रेटर है। वे पुणे से आये थे। उन्होंने बताया, मैं पहले रेडहैट में काम करता था। अब संग्राम नामक कम्पनी में काम करते हैं। मैं उनके साथ कुछ और समय व्यतीत करता लेकिन उनके साथ जो घोड़े वाले थे। वे जल्दबाजी कर रहे थे। इसलिए उनसे विस्तार में बात नहीं हो पायी।
वहां पर मेरी मुलाकात जापानी युवती से हुई। वह नीपो एक्सप्रेस नामक कम्पनी में काम करती थी। उसके साथ दो अन्य महिलायें उसके बॉस की पत्नी और उनकी सास थीं।
नीपो कंपनी लॉजिस्टिक कम्पनी है। इस तरह की कम्पानियां बहुत तेजी से बढ़ रही है पर हिन्दुस्तान में इतनी तेजी से नहीं बढ़ रही है। जापानी युवती का कहना था,
'भारत में आधारभूत संरचना (Infrastructure) है ही नहीं, इस तरह की कंपनी बढ़ेंगी कैसे?'
हमारे पास आधारभूत संरचना तो है, नयी बनती भी हैं लेकिन उससे कहीं तेजी से हमारी जन संख्या बड़ रही है जो उसे नगण्य कर देती है। काश सरकार, यह हम इसे समझ पाते और इसे रोकने का तुरन्त उपाय करते। इसकी प्राथमिकता प्रथम है पर सरकार वोट से बनती है उसे इसकी क्या चिन्ता।
रोहतांग पॉइंट पर हिम
इस श्रृंखला की अगली कड़ी में, पैरा ग्लाइडिंग का आनन्द लेंगे।
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इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
'मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने'
देखें।
मैंने पिछली बार बताया था कि बट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) ने ऍपीमेनेडीज़ या लाएरस् विरोधाभास को नयी तरह से रखा। उन्होंने कहा,
'एक गांव में केवल एक ही नाई था। उसका कहना था कि वह उन लोगों की दाढ़ी बनाता है जो स्वयं अपनी दाढ़ी नहीं बनाते हैं।'
सवाल यह था कि
'नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है?'
रसेल और व्हाइटहैड (Whitehad) के मुताबिक उन्होंने इस विराधाभास का हल, प्रिंसिपिया मैथमैटिका (Principia Mathematica) (१९१३) में निकाल लिया था। उनका हल, कुछ इस तरह से समझा जा सकता है कि नाई महिला है। इस दशा में तो उसे दाढ़ी बनाने की आवश्यकता नहीं है।
इस हल में वे पुरूषों के स्तर से ऊपर निकल कर व्यक्तियों के स्तर में चले जाते हैं जिसमें पुरूष और महिलायें दोनों रह सकती है। लेकिन वे भूल गये कि व्यक्तियों के स्तर में अलग तरह का विरोधाभास है। जिस पर उन्होंने विचार नहीं किया।
टाइम पत्रिक का शताब्दी अंक
२०वींशताब्दी के समाप्त होते समय, टाइम पत्रिका ने एक विशेष अंक निकाला था। इसमें उन्होंने बीसवीं शताब्दी के सौ महानतम लोगों के बारे में लिखा था। इन सौ लोगों में एक ऑस्ट्रियन गणितज्ञ कोर्ट गर्डल भी थे। उन्हें आज तक का सबसे महानतम तर्क शास्त्री माना जाता है।
गर्डल ने १९३१ में एक पेपर जर्मन भाषा में लिखा। इसके शीर्षिक का अंग्रेजी में अनुवाद है,
'On formally Undecidable Proposition of Principia Mathematica and Related Systems.
इसमें उन्होंने सिद्व किया,
'Proof of arithmetic consistency is not possible―every mathematical system is incomplete'. आप किसी भी मूलभूत सिद्वान्तों को लेकर चलें, उनमें कुछ इस तरह के कथन अवश्य निकल आयेगें जो न कि सही साबित किये जा सकते है न गलत। सुसंगत गणित सम्भव नहीं है ... प्रत्येक व्यवस्था अपूर्ण है।
गर्डल ने हिलर्ब्ट के द्वारा १९०० और १९२८ की आईसीएम में रखे गये प्रश्न का जवाब ढूंढ लिया। लेकिन यह वह जवाब नहीं था जो डेविड हिल्बर्ट चाहते थे। वे तो चाहते थे कि गणितीय तर्क का ऐसा संसार हो, जहां सारे कथन सही अथवा गलत सिद्घ किये जा सकें। गर्डल ने इसका उल्टा ही सिद्ध कर दिया। इससे हिल्बर्ट को परेशान हुई। लेकिन वे कुछ कर न सके - गर्डल के शोद्ध पत्र में आजतक कोई गलती नहीं निकाली जा सकी है। वे मन मनोस कर रह गये।
अगली बार हम लोग गर्डल और उसके अपूर्णता सिद्धान्त के बारे में लिखी कुछ रोचक पुस्तकों के बारे में चर्चा करेंगे।
कुछ समय पहले बीबीसी ने डेंजरस् नॉलेज (Dangerous Knowledge) नामक श्रृंखला प्रसारित की थी। यह श्रृंखला चार विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति, जिसमें तीन गणितज्ञ - जॉर्ज कैंटर (Georg Cantor), कोर्ट गर्डल (Kurt Gödel) और ऐलन ट्यूरिंग (Alan Turing) - और एक भौतिक शास्त्री लुडविंग बॉल्टज़मैन (Ludwig Boltzmann) पर थी। यह बेहतरीन श्रृंखला है और यदि इसे आपने नहीं देखा है तो यूट्यूब में देख सकते हैं। हांलाकि इस श्रृंंखला में, इनकी जीवनी के बारे में कुछ सूचनायें सही नहीं हैं। इसमें गर्डल के जीवन के शुरू का भाग यहां देखिये।