इस चिट्ठी में मनाली में एक रोचक व्यक्ति राजेन्द्र कुमार से मुलाकात।
हम जब मनाली में, वन विहार से बाहर निकल कर, रोड़ पर जा रहे थे तब एक मारूति कार रुकी। उसे चला रहे व्यक्ति ने पूछा,
'क्या आपको गाड़ी चाहिए।'
मैनें पूछा कि आप मुझे गाड़ी किराये पर देंगे तो क्या ड्राइवर भी साथ में रहेगा या मुझे चलाने के लिए देंगे उसने कहा,
'यदि आप चाहेंगे तो ड्राइवर भी दिया जायेगा और केवल गाड़ी लेना चाहेंगे तो गाड़ी अकेले भी दी जा सकती है।'
मैंने कहा कि यदि मैं गाड़ी लेकर भाग गया तब। उसने कहा,
'आप देखने से बहुत सभ्य लगते हैं। आप नहीं भागेंगे।'
फिर मुस्करा कर बोला
'यहां से बाहर जाने का एक ही रास्ता है आप जायेंगे कहां?'
मुझे वह व्यक्ति थोड़ा सा रोचक लगा। मैंने कहा कि आइये चाय पर बात करते है। हम लोग चाय पीने बगल के एक रेस्त्रां में गये।
राजेन्द्र कुमार के साथ चाय का आनन्द
इस व्यक्ति ने अपना नाम राजेन्द्र कुमार बताया और कहा,
'मेरी पत्नी अस्पताल में नर्स है। हमारा डेढ़ साल का एक बच्चा है। मैं एलआईसी का एजेंट हूं और टैक्सी से लोगों को जगहें घुमाने का भी काम करता हूं।'
हम लोगों ने काफी देर बात की मैने उससे पूछा कि आप सड़क पर चलते हुए पूछ रहे थे। क्या आप किसी होटल से नहीं जुड़े हैं या क्या कोई ऎसी जगह नहीं है जहां पर आपकी टैक्सी का रजिस्ट्रेशन होता हो ताकि लोग आपको बुला सकें।
राजेन्द्र जी ने बताया,
'ऐसा होता है। लेकिन कभी कभी ऐसे भी लोग मिल जाते है। इसलिए मैंने आपसे पूछा।'
मैंने उसको सुझाव दिया कि आप क्यों नहीं सारी सूचना अन्तरजाल पर डालते और अपने बारे में लिखते हैं। इसमें किराये को भी लिखे। मैंने उसे अपनी साउथ अफ्रीका की यात्रा के बारे में बताया कि कैसे अंतरजाल पर हमने क्रुगर पार्क घूमने का इंतज़ाम किया था। उसने कहा,
'विचार तो अच्छा है। मैं स्वयं बहुत दिनों से कंप्यूटर लेने की बात सोच रहा हूं।'
इसी के साथ हम लोगों ने विदा ली। वह दूसरा ग्राहक ढूंढने के लिए चल दिया और हम लोग अपने होटल आ गये।
अगली बार मनाली के जॉन्सन होटल में स्मोकड ट्राउट और शाकाहरी पास्ता खाने चलेंगे।
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इस चिट्ठी में मानाली के बौद्व तृप्ति मंदिर और वन विहार की चर्चा है।
मनाली में वशिष्ट मन्दिर देखने के बाद, हम लोग बौद्व तृप्ति मंदिर देखने गये। हमारे टैक्सी ड्राईवर पवन जी ने मुझसे कहा,
'यह बौद्व मंदिर है न कि हिन्दू मंदिर।'
मैने उन्हें बताया,
'बौद्ध भी हिन्दु है। भगवान विष्णु के दशवतारो में गौतम बुद्ध नौवें अवतार हैं। गौतम बुद्ध के बारे में हमारे पुराणों में पहले से ही लिखा हुआ है। इसलिए यह सोचना कि बौद्ध लोग हिन्दु नहीं है गलत है। भगवान विष्णु का अंतिम और दसवां अवतार आना है। वह कल्कि के नाम से जाना जायेगा। यह करीब ८४,००० साल बाद आयेगा। उसके आने के बाद कलयुग समाप्त होगा।'
तृप्ति मंदिर में मेरी मुलाकात एक लामा से हुई जिसका नाम टैम्पा था। वह कपड़ों पर तथा कुछ पवित्र मंत्र प्रिंट कर रहा था। वही पवित्र मंत्र एक झालर के रूप में मंदिर के चारों ओर लगी थी। मैंने उनसे पूछा,
'क्या तुम मुझे एक झालर दे सकते हो?'
उसने कहा,
'मैं यह काम किसी के कहने पर कर रहा हूं। वह व्यक्ति इसको अपने घर में लगाना चाहता है। आप चाहें तो बाहर बाजार से ख़रीद सकते हैं। इसमें आपको कोई मुश्किल नहीं होगी।'
हम लोग वहां से निकल कर बगल के वन विहार में आये। वन विहार में बहुत ऊंचे-ऊंचे और सुन्दर देवदार के वृक्ष लगे हुए थे। वन विहार में २००१ में सर्वे हुआ था। इसके अनुसार इसका क्षेत्रफल २४.६८ है। इसमें २४७ पेड़ हैं। उस समय इसमें ४.४६ क्यूबिक मीटर लकड़ी थी। इसके अनुसार इन पेड़ो की कीमत तेईस करोड, ग्यारह लाख चौवन हजार रूपये थी। यह एक सुन्दर और हरी भरी जगह है। जिसमें एक छोटा सा तालाब भी है। जिसमें पैडल बोट चला सकते है। वन विहार से बाहर निकल कर रोड़ पर जाते समय मेरी मुलाकात राजेन्द्र कुमार नामक रोचक व्यक्ति से हुई। उसकी चर्चा अगली बार।
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मैंने इस चिट्ठे की पिछली चिट्ठी में बताया था कि मैंने ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके‘ श्रृंखला ज्योतिष पर विश्वास करने वालों का मजाक बनाने के लिये या किसी की आस्था या विश्वास पर चोट पहुंचाने के लिये नहीं लिखी थी और वायदा किया कि इसके लिखने का कारण बताउंगा। इस चिट्ठी इस श्रृंखला के लिखने का कारण है।
हिन्दी चिट्ठाजगत में एक चिट्ठा ‘टोना टुटके‘ नाम से शुरू हुआ था। इसका बहुत विरोध हुआ। उस समय नारद फीड एग्रेगेटर था। उससे इसे हटा देने की बात कही गयी। यह अन्त में बन्द हो गया। इस कारण इसी की आखरी चिट्ठी ‘सारे चिठ्ठाकार लोग नाराज‘ में दिया है। मेरे विचार से किसी भी चिट्ठे को उसके विचारों के लिये हटा देना अनुचित है कम से कम टोने टुटके जैसे चिट्ठे को। यदि कोई २+ २ = ५ कहता है तब उस पर हसा जा सकता है उसे हटाने की बात नहीं। इस चिट्ठी में मेरी टिप्पणी थी,
‘सबको अपने विचार रखने कि स्वतंत्रता है, आपको भी। आपको यदि इन पर विशवास हो तो जरूर लिखें। यदि कोई नराज होता है तो गलत होता है। हम सब (मेरा मतलब सब से है) बहुत सी बातों पर विशवास करते हैं जो कि टोने-टोटके जैसी है। ज्योतिष या हस्त रेखांये सब उसी श्रेणी मे हैं पर कोई अखबार नहीं है या पत्रिका नहीं है जो उसके कालम नहीं रखती हो। टीवी मे कभी न कभी हर चैनल इनका प्रयोग करते हैं। सारे शुभ कार्य सब इसी पर होते हैं। हां कुछ खिलाफ लेख लिखने वालों को तो झेलना पड़ेगा। उनमे से मै भी एक हूं। एक लेख ज्योतिष और टोने टोटके पर लिखूंगा।’
मैंने टोने टुटके को हटाये जाने के विरोध में, ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ श्रृंखला लिखी। यही बात इस श्रंखला की भूमिका लिखते समय लिखी। मैं अपनी इस श्रृंखला में बताना चाहता था कि अपने समाज में बहुत से अन्धविश्वास हैं जिसे समाज मानता है; यह सब अपनी बातें कह रहे हैं। इन्हें या टोने टुटके चिट्ठे को भी अपनी बात कहने देना चाहिये। मेरी श्रृंखला की अन्तिम कड़ी है ‘हस्तरेखा विद्या और निष्कर्ष‘। इसका निष्कर्ष लिखते समय लिखा,
‘मैंने पिछली पोस्टों पर यह बताने का प्रयत्न किया कि ज्योतिष, अंक विद्या, और हस्त रेखा विद्या में कोई भी तर्क नहीं है, फिर भी हमारे समाज में बहुत सारे काम इनके अनुसार होते हैं। बड़े से बड़े लोग इन बातों को विचार में रख कर कार्य करते हैं।
इनका एक कारण मुझे यह समझ में आता है कि यह सब कभी कभी एक मनश्चिकित्सक (psychiatrist) की तरह काम करते हैं। आप परेशान हैं कुछ समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें। मुश्किल तो अपने समय से जायगी पर इसमें अक्सर ध्यान बंट जाता है और मुश्किल कम लगती है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि इनमें कोई सत्यता है या यह अन्धविश्वास नहीं है या फिर टोने टुटके से कुछ अलग है।
मैं इन सब बातों पर विश्वास तो नहीं करता पर कोई मेरे बारे में अच्छी बात करे, तो सुन लेता हूं। कोई खास व्यक्ति हाथ पकड़ कर बताये तो क्या बात है। हां कभी मेले में आप मुझे किसी चिड़िया से अपना भाग्य बंचवाते भी देख सकते हैं जैसा कि यहां पर हो रहा है मैनें यह सब कुछ लोगो के द्वारा टोने टुटके के चिट्ठे पर की गयी आपत्ति के कारण लिखना शुरु किया। अधिकांश लोग टोने टुटके पर कुछ अंश तक विश्वास करते हैं इसलिये यदि कोई टोने टुटके के बारे में लिखे तो लिखे, जिसे पढ़ना हो पढ़े, जिसे न पढ़ना हो वह न पढ़े। हमसे किसी ने भी, किसी और के दिमाग ठेका नहीं ले रखा है।’
इस निष्कर्ष में मैंने कड़े शब्दों का प्रयोग किया था। यह नहीं करना चाहिये था, नया चिट्ठाकार था गलती हो गयी। इसलिये इसका प्रयोग संकलित कर रखते समय नहीं किया। शायद यही कारण हो कि मेरी मंशा स्पष्ट न हो पायी हो।
मैं स्वतंत्र विचारों का भी समर्थक हूं। उन्मुक्त है ही – मुक्त विचारों का संगम, कभी खुश कभी ग़म।
जॉर्ज ऑर्वल (George Orwell) ने एनीमल फार्म (Animal Farm) (इस पुस्तक के बारे में अन्य बातों के साथ यहां पढ़ें) की अप्रकाशित भूमिका में लिखा था,
‘If liberty means anything at all, it means the right to tell people what they do not want to hear.’
जेफरसन (Jefferson) ने भी स्वतंत्रता के प्रारूप (draft declaration) लिखते समय कहा,
‘We hold these truths to be self evident, that all men are created equal that they are endowed by their creator with inalienable rights, and that among these are life, liberty and pursuit of happiness.’
न्यायमूर्ति होल्मस् का चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से
न्यामूर्ति होल्मस् पिछली शताब्दी के जाने माने अमेरिकन न्यायधीश थे। उन्होंने United States v. Schwimmer 279 U.S. 644 (1929) के फैसले में कहा,
‘But if there is any principle of the Constitution that more imperatively calls for attachment than any other it is the principle of free thought – not free thought for those who agree with us but freedom for the thought that we have.’
मुझे यह विचारधारा अच्छी लगती है। मैं इस पर विश्वास करता हूं।
‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ श्रृंखला उन विचारों की स्वतंत्रता के लिये लिखी गयी जिससे हम इत्तफ़ाक नहीं रखते हैं। मैं टोने टुटके, ज्योतिष, हस्तरेखा, अंकविद्या पर विश्वास नहीं रखता। मुझे यह सब अन्धविश्वास लगता है। इस तरह के कोई भी कॉलम नहीं पढ़ता।लेकिन इन्हें भी अपने विचार रखने की स्वतंत्रता है। यदि किसी को यह ठीक नहीं लगता है तब वह उसे न पढ़े। लेकिन यदि कोई भी उन्हें अपनी बात कहने से रोकेगा तो यह अनुचित होगा। मेरी उसके खिलाफ आपत्ति रहेगी।
मेरे विचार में, इसी के साथ मेरी तरह के उन व्यक्तियों को भी यह व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिये जो वह कारण बताना चाहते हैं कि ज्योतिष, हस्तरेखा, अंकविद्या क्यों केवल टोना टुटका है। मैं समझता हूं कि ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ श्रृंखला लिखने कारण अब स्पष्ट हो गया होगा और मुझे उस चिट्ठी में वह टिप्पणियां नहीं मिलेंगी जो कि मिलती हैं
ऐसे क्या आपको मालुम है कि आपकी राशि क्या हैं। मुझे तो लगता है कि वह जो भी हो, बदल गयी है विश्वास नहीं यह विडियो देखिये।
इस चिट्ठी में, गर्डल से संबन्धित तीसरी पुस्तक, 'गर्डल, ऍशर, बाख: एन ईटनल गोल्डेन ब्रेड' की चर्चा है। इसके लेखक हैं - डगलस आर हॉफेस्टैडर।
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट, 'मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने' देखें।
'गर्डल, ऍशर, बाख: एन ईटनल गोल्डेन ब्रेड' पुस्तक १९७९ में छपी थी। मैंने तभी इसे पढ़ा था।
गर्डल तर्कशास्त्री, एम सी ऍशर (MC Eshcher) (१७ जून १८९८ – २७ मार्च १९७२) चित्रकार, और योहन सेबेस्टियन बाख (Johann Sebastian Bach) (३१ मार्च – २८ जुलाई १७५०) एक जाने माने संगीतज्ञ थे।
गर्डल का मुख्य काम स्वयं को संर्दभित करने वाले विरोधाभास के बारे में था।
ऍशर की चित्रकारी एकदम अलग तरह से है। इनके बहुत से चित्र वापस वहीं पहुंचते हैं जहां से वे शुरू होते हैं। इनमें से कई एक तरह से स्वयं को संदर्भित करते हैं। उनके दो प्रसिद्ध चित्र देखिये पहले में एक हाथ दूसरे हाथ को बना रहे है और दूसरा हाथ पहले को। दूसरे में (नीचे देखें), पानी का झरना ऊपर से नीचे गिर कर वहीं पहुंच रहा है।
बाख ने बहुत कुछ ऐसे संगीत को जन्म दिया जिसमें पुनरावृत्ति होती है।
यह पुस्तक इन तीनों के सम्बंधो को जोड़ती है और उनके समन्वय के बारे में चर्चा करती है। इसमें मुख्यतः गर्डल के अपूर्णता सिद्धान्त की चर्चा है। यह गणित (mathematics), सममिति (symmetry) और प्रतिभा (intelligence) के मूलभूत अवधारणा की गूढ़ व्याख्या करते हुऐ यह हुई यह बताने का प्रयत्न करती है कि किस प्रकार निर्जीव वस्तुओं से जीवन्त पदार्थ निर्मित हो सकता है।
यह पुस्तक एकदम अलग तरीके से लिखी गयी है। इस पुस्तक में एक अध्याय जनरल है। इस अध्याय में, गर्डल की गणित, ऍशर की चित्रकारी एवं बाख के संगीत को ऍक्लीस (Achilles), कछुआ (Tortoise), और केकड़ा (Crab) की बातचीत के द्वारा बताया गया है। तथा अगले अध्याय मे उसी विचार को गणित के द्वारा बताया गया है। इसमें गणित से सम्बन्धित अध्याय को समझने के लिए जरूरी है कि आपको मार्डन एलजेबरा आता हो। यह उत्कृष्ट पुस्तकों में से एक हैं। इन पुस्तकों को समझने के लिए कम से कम इण्टरमीडिएट या स्नातक स्तर की गणित का ज्ञान जरूरी है और तभी यह पढ़ने पर अच्छी तरह से समझ में आ सकेगी। यदि आप गणित या कंप्यूटर विज्ञान, या कृत्रिम बुद्धि (Artificial intelligence), सोचने वाली मशीन (Thinking machines), या जटिलता (complexity) जैसे विषय पर रुचि रखते हैं या इस क्षेत्र में काम करना चाहते हैं या आपके बेटे, बेटियां इण्टरमीडिएट या स्नातक स्तर पर गणित तथा विज्ञान के क्षात्र हैं और इन विषयों पर आगे काम करना चाहते हैं तब उन्हें यह पुस्तक अवश्य पढ़ने के लिए दें।
इस चिट्ठी में मानाली के वशिष्ठ मंदिर, राम मन्दिर और गर्म चश्मे की चर्चा है।
वशिष्ट मन्दिर
मनाली में वशिष्ठ मंदिर है। एक दिन उसे देखने के लिए गये। यहां के पुजारी ने, इस की यह कथा बतायी।
'सतयुग में महाऋषि वशिष्ठ ने मनाली में रह कर पूजा की थी। उनका एक आश्रम अयोध्या में भी था। भगवान राम के समय वे अयोध्या में रह कर उनकी शिक्षा का काम देखते थे। उसके बाद वे पुन: मनाली आ गये थे। पांच हजार साल पहले वे अंतर ध्यान हो गये। तब यह मूर्ति प्रकट हुई। जो इस मंदिर में स्थापित है।'
वशिष्ठ जी की मूर्ति में लगी आंखें चमक रही थी। मैंने पुजारी जी से इसका कारण पूछा। इस पर उनका कहना था,
'यह मूर्ति काले रंग की है। आंखों में चांदी जड़ी हैं। इसलिए यह चमक रही है।'
इसके बाहर लकड़ी का मंदिर बना हुआ है। जो कि १८०० साल पुराना कहा जाता है।
यहां पर एक गरम पानी का चश्मा है। जिसमें महिलायें और पुरूष को नहाने की अलग अलग सुविधा है। कहा जाता है कि यहां नहाने से सारी थकावट दूर हो जाती है। इस गर्म पानी के चश्मे की कथा कुछ इस तरह है।
रावण की हत्या करने के बाद भगवान राम पर ब्राहम्ण हत्या का पाप लगा। उन्होंने अश्वमेघ यक्ष करके इसको दूर करने की बात सोची। उन्हें सलाह दी गयी कि गुरू वाशिष्ठ को इस पूजा में बैठाया जाए। गुरू वाशिष्ठ तब तक वापस मनाली चले गये थे। लक्ष्मणजी उन्हें ढूंढने के लिए निकले। उन्हें वे मनाली में मिले। यहां पर अपने लक्ष्मण जी के मन में गुरू वशिष्ठ के नहाने के लिए गरम पानी की बात आयी। इसलिए उन्होंने पृथ्वी पर तीर चला कर गर्म पानी का यह चश्मा निकाला।
वाशिष्ठ जी, तपस्वी थे इसलिए उन्हें गर्म पानी की आवश्यक्ता नहीं थी। लेकिन उन्हें लगा कि लक्ष्मणजी कुछ थक गये होगें। इसलिए वशिष्ठ जी, लक्ष्मण जी को उसमें नहाने के लिए कहा और वरदान दिया।,
'जो भी व्यक्ति इस गरम चश्में में नहायेगा उसकी सारी थकान दूर हो जायेगी और चर्म रोग भी नष्ट हो जायेगें।'
राम मन्दिर
इसके बगल में राम मंदिर है। यहां के पुजारी के अनुसार यह मंदिर लगभग चार हजार साल पहले बना था। १६०० ई० में राजा जगत सिंह ने इसका उद्घार किया। यहां पर दोनों मंदिरों के पुजारियों से बात करने के बाद मुझे कुछ इस तरह का आभास हुआ कि दोनों में कुछ खटपट है और कुछ अलगाव सा है। यह इसलिये लगा क्योंकि दोनों ही अपने अपने मंदिर को ज्यादा महत्वपूर्ण और दूसरे के मन्दिर को नीचा बता रहे थे।
इन दोनों मंदिरों के बीच में एक गली है। इसमें एक जगह उसी गर्म चश्मे का पानी निकल रहा था। वहां का स्थान पक्का कर दिया गया है। उस जगह कुछ महिलाएं अपना कपड़ा और बर्तन धो रही थीं। मैं उनके पास जाकर बात की। उन्होंने बताया,
'हम लोग इसी मोहल्ले की है। यहीं बर्तन और कपड़े धोने का काम करती हैं। क्योंकि यहां पर गरम पानी की सुविधा है।'
जब मैं चित्र ले रहा था तब सबसे दाहिने वाली युवती शर्मा गयी और चेहरा छिपा लिया। हांलाकि बाकी महिलायें उससे कहने लगी कि चित्र क्यों नहीं खिंचवाती। इसीलिये बाकी सबके चेहरे उसकी तरफ हैं। शायद बाकी महिलायें शादी शुदा थीं। केवल वह ही कुंवारी थी, और सबसे सुन्दर। उसकी यह अदा भी भा गयी।
इसको देखने के बाद हम लोग बौद्व तृप्ति मंदिर और वन विहार देखने गये। उसकी चर्चा अगली बार।।
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