कर्म से है सबकी पहचान
मेरे कुछ दिन तनाव में बीते। कल मन में शान्ति आयी। मैं और शुभा बहुत दिनो बाद मस्ती करने के लिये निकल गये। बिना किसी प्रोग्राम के, बिना किसी खास जगह जाने के लिये, खाना भी रात में बाहर ही खाया। रात देर में लौटे।
कल गांधी जयन्ती भी थी। मुझे अपनी पुरानी एक चिट्ठी मेरे जीवन में धर्म का महत्व याद आयी। यह मैंने अनुगूंज के लिये लिखी थी। एक अनमोल तोहफा लिखते समय मैंने लिखा था कि यह मेरी सबसे प्यारी चिट्ठी है। यह आज भी सच है। मेरी सारी चिट्ठियों में केवल यही चिट्ठी पद्य में है। यह पुनः प्रेषित है।
नहीं बसता मैं किसी मन्दिर या मस्जिद में,
न ही रहता हूं किसी गिरिजाघर या गुरुद्वारे में,
न ही बसता हूं किसी पूजा घर में।
यह तो है केवल अपना दिल बहलाना,
मैं तो हूं तुम्हारे आशियाना।
मैं नहीं पाया जाता पुरी, रामेश्वर में,
न ही मक्का, मदीना में,
जेरूसलम या कोई अन्य पवित्र स्थल भी नहीं है मेरे ठिकाने।
यह सब तो है लोगों के अफसाने,
तरीके दिल बहलाने के,
क्योंकि मैं तो वास करता हूं, तुम्हारे मन मानस में।
मुझे, न बता सकते हैं कोई महात्मा, योगी,
न ही कोई बाबा सांई,
न ही मेरी व्याख्या कर सके फकीर, पादरी।
यह तो सब हैं लोगों के फसाने,
तरीके खुद को फुसलाने के।
मैं नहीं सीमित गीता या रामायण में,
न ही हूं बंधा बाईबल या कुरान में।
यह तो थे अपने समय के उचित आचरण,
मैं तो हूं ऊपर इनसे।
मैं नहीं बंधता समय से,
मैं हूं स्वयं समय,
क्या करूंगा, खुद से लड़ कर।
जो परम्परा समय के साथ नहीं बदलती,
वह कहलाती रूढ़िवादिता।
मैं नहीं हूं, रूढ़िवादिता,
न ही, जकड़ा जा सकता किसी परम्परा से।
मैं नही बन्धता इनसे,
मैं तो हूं उन्मुक्त, इन बन्धनों से परे।
मैं न तो हूं राम, न ही कृष्ण,
न ही अल्लाह, न ही पैगमबर,
न ही हूं मैं ईसा मसीह,
या पूजा किये जाने वाले कोई और नाम।
यह तो हैं तरीके, लोगों को समझाने के,
मैं तो हूं ऊपर इन सबके।
नही हूं मैं दकियानूसी,
न ही हूं, अन्धी आधुनिकता।
मैं तो हूं केवल एक आचरण।
मैं नही वह आचरण, जो तोड़े दूसरों के पूजा स्थल।
मैं तो हूं वह आचरण,
जो जवानी के मदहोश दिवानो से, रात में अकेली अबला चाहे;
अभिलाशे दंगे में फंसा इन्सान, आवेश में अधें दंगाइयों से।
मैं नहीं धरोवर केवल हिन्दुवों की,
न ही केवल मुस्लिम, सिख, ईसाई की।
मैं तो हूं वह आचरण,
जो पाया जाये, सब मज़हब में।
मैं नही हूं विचारों का टकराव।
मैं तो हूं दूसरे के विचारों का समझाव।
मैं करता विचारों का आदर, समझता दूसरों का पक्ष।
मैं तो हूं अलग अलग विचारों का सगंम,
जो लाता जीवन में कभी खुशी कभी गम।
मैं हूं वह आचरण—
जो आप अपने लियें चाहें, दूसरे से;
या आप लें, अपने ईमान से।
जो मेरे मर्म को जाने,
नहीं जरूरत उसे किसी पूजा स्थल की।
न ही किसी इष्ट देव की,
शान्ति रहे हमेशा, उससे चिपकी।
जो चले मेरे रस्ते
न भटके वह,
किसी महात्मा, फकीर के बस्ते।
क्योंकि मैं हूं हमेशा संग उसके।
जो मेरे महत्व को समझे
करे कर्म का वह सेवन,
कर्म ही पूजा, कर्म ही उसका जीवन।
उसका मन, मानस चले संग।
आओ ढूढ़ो, पहचानो मुझको,
मैं हूं खड़ा तुम्हारे अन्दर।
मैं तो हूं केवल,
जी हां, केवल अन्त:मन से लिया गया विवेकशील आचरण।
यह चिट्ठी मुझे अक्सर अन्तरजाल में देखने को मिल जाती है – कभी पूरी, कभी कुछ भाग – कभी आभार लेकिन अधिकतर आभार रहित। इसका जिक्र मैंने अपनी चिट्ठी जिया धड़क धड़क जाये पर किया है। मुझे इस बात का कभी कोई गुमान नहीं रहा कि मेरी चिट्ठियां अन्य लोग छाप देते हैं। मैंने अपने चिट्ठियों में कभी कोई भी कॉपीराईट के अधिकार नहीं रखे। कुछ लोगों को यह अजीब भी लगता है। इसलिये शुभा ने इस सवाल को, द टेलेग्राफ अखबार में निकले लेख Hitchhiking through a non-English language blog galaxy के जवाब में, भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर नामक चिट्ठी में स्पष्ट किया।
हिन्दी चिट्टाजगत में लोग अक्सर कॉपी राइट के बारे में परेशान रहते हैं। अक्सर सवाल उठते कि किसी किसी की चिट्ठी चोरी कर ली – कभी कानून की नजर में गलत, तो कभी कुछ भी गलत नहीं। मेरे विचार से हिन्दी चिट्ठकारी में यह समय इसके लिये नहीं है। मैंने यह बात डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी नामक चिट्ठी में स्पष्ट की थी। सच तो यह है कि कोई भी कॉपीराइट न रखने के अपने फायदे हैं। उनमें से है यह चिट्ठा। इस पर भी बहुत से लोग चिट्ठियों को पढ़ने के लिये आते हैं।
यह व्यक्ति कौन है, वह ऐसा क्यों करता है मालुम नहीं। रवी जी ने इस पर एक चिट्ठी जरा सामने तो आओ छलिए… नाम से लिखी उसके बाद भी इसका पता न चल सका। लेकिन यह सच है मेरी चिट्ठियों पर बहुत से लोग इस चिट्ठे की चिट्ठियों से आते हैं। मेरे अज्ञात मित्र कौन हो तुम, मुझे न केवल आश्चर्य चकित, पर अभिभूत भी करते हो। मैं तुमसे बात करना चाहूंगा।
लेकिन आज का दिन कापीराईट की चर्चा का नहीं है, आज का दिन तो है
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान का भगवान
जहां से इस चिट्ठी का शीर्षक लिया गया है।
नया रास्ता फिल्म से इस भजन को, सुनिये रफी की आवाज़ में – शायद इससे बेहतर तरह से यह न कभी गाया गया, न ही गाया जा सकेगा।
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और वह शर्मा गयी पता नहीं हलुवा घी में, या घी हलुवे में तैर रहा था