यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। महिलाओं को इसलिए काम करना चाहिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके।
हिमाचाल यात्रा के दौरान हम चायल भी गये। वहां महाराजा और पटियाला यादुवेन्द्र सिंह का महल था। १९७२ में, इसे हिमाचल सरकार के पर्यटन विभाग ने खरीद लिया। इसमें अब एक प्रीमियम हैरीटेज़ होटल बना दिया है। हम लोग इस होटेल को देखने गये। इसके बारे में विस्तार से, इस यात्रा विवरण के दौरान बात करेंगे। लेकिन, आज उस होटल में हुई एक घटना के बारे में।
लेकिन, यह आज क्यों? यह तो आपको अन्त में ही बात चलेगा।
होटल की मुख्य इमारत को के सामने एक बहुत बड़ा सा लॉन है। यह कोई फुटबॉल के मैदान के बराबर होगा। हम लोग, इस लॉन पर चल कर होटेल के अन्दर गये। लॉन पर बहुत से लोग वहां के नजारे एवं समा का आनन्द ले रहे थे। वहीं लॉन मेरी मुलाकात, एक परिवार से हुई। उनके साथ एक प्यारी सी युवती थी। उसके बाल बहुत लम्बे थे। मैंने परिवार के सदस्य से, उससे सवाल पूछने की अनुमति ली। उन्होंने कहा,
‘आपकी ही बेटी है, जरूर पूछिए।’
मैंने पूछा,
‘बिटिया तुम्हारे बाल असली हैं या नकली।’
उसके बगल में शायद उसके बड़े भाई या पिता होंगे उन्होंने कहा,
‘आप इसके बाल क्यों नहीं खींच कर देखते?’
मैंने कहा कि किसी अनजान युवती के बाल खींचने पर तो मुश्किल में फंसा जा सकता है। मैंने उस युवती से कुछ देर बात की। उसने अपना नाम साहेबा बताया और कहा,
‘मेरी मां के बाल तो इससे दुगने लम्बे थे।’
हांलाकि उस समय उसकी मां ने अपने बाल छोटे कर लिऐ थे
मैंने साहेबा से कहा,
‘दुनिया की हर शैम्पू कम्पनी, तुम्हें मॉडल के रूप में लेना चाहेंगी। तुम क्यों नहीं किसी शैम्पू कम्पनी के लिए मॉडलेंग करती हो?’
उसने इसका जवाब नहीं दिया। वह चुप रही। उनमें से एक वृद्ध सज्जन भी थे। उन्होंने इस सवाल का जवाब दिया,
‘इसे पैसे की आवश्यकता नहीं है। इसलिए इसे काम करने की जरूरत नहीं।’
पुरूष समाज में अक्सर इस तरह की बात कर, महिलाओं को काम करने से रोका जाता है। मेरे विचार से, यह दकियानूसी विचार है। महिलाओं को काम करने की बात इसलिए नहीं होती कि उन्हें पैसों की जरूरत है। लेकिन महिलाओं को इसलिए काम करना चाहिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। उनमें आत्म सम्मान आये। वे अपने मन मुताबिक, अपनी क्षमता के अनुसार, अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें।
हमें भी पैसों की जरूरत नहीं। भगवान ने हमें सब दिया। लेकिन फिर भी मेरी पत्नी शुभा पढ़ाती है।
मैने वृद्ध सज्जन को जीवन का यह दर्शन समझाने का प्रयत्न किया, लेकिन मैं नहीं कह सकता कि वे इसे वह समझ पाये अथवा नहीं। हांलाकि साहेबा कुछ मुस्कराई, कुछ लाचार सी लगी – शायद वह मेरी बात समझ पायी या फिर वह अपने परिवार को मुझसे बेहतर समझती थी।
‘उन्मुक्त जी, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस तो कल था। महिला सशक्तिकरण के बारे में आप, आज क्यों लिख रहे हैं? यह तो कल ही लिखना था।’
महिला सशक्तिकरण के बारे में, मैंने विस्तार से कड़ियों में, २००७ में इसी चिट्ठे पर लिखा था। इसे मैंने संकलित कर एक जगह आज की दुर्गा – महिला सशक्तिकरण नाम से अपने लेख चिट्ठे पर डाला है। इसकी पहली कड़ी में मैंने बताया था कि यह ८ मार्च को क्यों मनाया जाता है। इसे बाद में मेरी पत्नी शुभा ने, इसे चुरा कर अपने चिट्ठे की चिट्ठी ‘महिला दिवस ८ मार्च को क्यों मनाया जाता है?‘ पर डाल दिया
चायल पैलेस बहुत सुन्दर जगह है। यहां कई फिल्मों की शूटिंग भी हुई है जिसमें थ्री इडियट भी है। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल का यह विज्ञापन भी वहीं फिल्माया गया है। इसे देखिये और इस लॉन एवं इस पैलेस को देखें।
हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। यदि लगन है, काम करने का ज़स्बा है तो सफलता कदम चूमेगी।
मुन्ने राजा
तीन दशक पहले, तुमने हमारे जीवन में कदम रखा। पता ही नहीं चला कि वे कब बीत गये। तुमने, न केवल हमारे जीवन में, पर सबके जीवन में खुशी भरी।
आज, तुम्हारे साथ बिताये, दिन याद आये, घटनायें याद आयीं। तुम्हें याद है दूरदर्शन में आने वाला विज्ञान पहेली का प्रोग्राम – जिसे हम साथ देखा करते थे। इसमें दो बार पुरस्कार मिला:
पहली बार सवाल था कि चन्द्रमा पृथ्वी से दूर क्यों जा रहा है।
दूसरी बार सवाल था कि चमगादड़ किस प्रकार अपना शिकार ढ़ूढते हैं।
तुम्हारे बड़े होने के साथ, हमसे (शायद केवल मुझसे, तुम्हारी मां से नहीं) एक गलती हो गयी। मैंने अपने सपने, तुम्हारे साथ पूरे करने की कोशिश की। यह ठीक नहीं है। सबको अपने सपने देखने और पूरे करने की बात है न कि अपने पिता के। शायद भारतीय माता-पिता की यही कमी है। लेकिन, इसके बावज़ूद भी, तुममें वह सब है जिस पर किसी भी माता-पिता को गर्व हो। तुम्हारी आदतें, शौक, प्राथमिकता सही हैं। हां चाहो तो पेंसिल चबाना छोड़ सकते हो और जल्दी उठने की आदत डाल सकते हो
मैं आजकल आमिर एक्ज़ल की लिखी पुस्तक ‘द आर्टिस्ट एण्ड द मैथमेटीशियन: द स्टोरी ऑफ निकोला बूरबाकी, द जीनियस हू नेवर इक्ज़िस्टेड’ (The artist and the mathematician: the story of Nicolas Bourbaki, the genius mathematician who never existed by Amir D. Aczel) पढ़ रहा हूं।
पिछली शताब्दी में, आधुनिक गणित में बहुत से पेपर और पुस्तकें निकोला बूरबाकी (Nicolas Bourbaki) के नाम से लिखीं गयीं। इन पुस्तकों ने आधुनिक गणित को नयी उचांई दी। इस नाम का कोई भी गणितज्ञ नहीं था। कुछ फ्रांसीसी गणितज्ञों ने मिल कर यह कार्य के १९३० के दशक में शुरू किया। इस काम में १० से लेकर २० गणितज्ञ जुड़े थे। यह पुस्तक इन्हीं गणितज्ञों के बारे में है। यह भी एक रोचक बात है कि उन्होंने निकोला बूरबाकी नाम क्यों चुना।
जेनरल चार्ल्स डेनिस बूरबाकी का यह चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से
पुस्तकों में लेखक का नाम देना जरूरी होता है। जेनरल चार्ल्स डेनिस बूरबाकी (Charles Denis Sauter Bourbaki) फ्रांसीसी सेना के एक प्रसिद्ध अधिकारी थे। फ्रांसीसी गणितज्ञों ने, बस उसी के नाम पर, एक काल्पनिक नाम नीकोला बूरबाकी चुन लिया और लगे लिखने गणित पर पुस्तकें। यह इतनी अच्छी थीं कि उसने गणित को नयी दिशा ही दे दी। मैंने इसके बारे में ‘शून्य, जीरो, और बूरबाकी‘ की चिट्ठी में भी लिखा है।
मैं अभी तक इस इस पुस्तक में दो गणितज्ञों के बारे में पढ़ पाया हूं:
एलेक्ज़ेंडर का बचपन गरीबी और अकेलेपन में गुजरा। उसने गणित की पढ़ाई अपने आप की।
वहीं आन्द्रे का जीवन समृद्ध था। उसे किसी बात की कमी नहीं थी। उसने सबसे अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की और उसे जाने माने गणितज्ञों के साथ रहने का मौका मिला। उसे डॉक्टरेट मिलते ही, २३ साल की उम्र में, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी मिल गयी। वह वहां कुछ समय रहा फिर वापस यूरोप चला गया।
गणित के क्षेत्र में, दोनो का काम महत्वपूर्ण है पर एलेक्ज़ेंर ने ज्यादा काम किया है। वह २०वीं शताब्दी के महानतम गणितज्ञों में गिना जाता है। यह बताता है आपकी कैसी भी परिस्थिति हो यदि काम के लिये लगन है, ज़स्बा है – तो सफलता कदम चूमेगी। अंग्रेजी में पुरानी कहावत है,
‘The only place where success comes before work is dictionary.’ सफलता हमेशा काम के बाद ही आती है यहां तक कि शब्दकोश में भी।
यह भी सच है,
‘The real success is finding work that you love and the next best thing is finding love in whatever you do.’
अपने प्यार को ही, जीविका बना लेना सफलता है। दूसरी बेहतर बात, जीविका में ही प्यार पाना है।
आजकल ठंडक शुरू हो गयी है। सुबह कोहरा पड़ने लगा है। तुम्हारी भेजी स्वॅट जैकेट बहुत काम आती है। वही सुबह पहन कर, ठहलने जाता हूं।
जीवन में तुम खुश रहो, सफल हो।
पापा
हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
लीसा से मेरी मुलाकात वियाना में कॉन्वेंट में हुई थी। मैंने वायदा किया था कि उसके और मेरे बीच बीच ई-मेल की चर्चा करूंगा। यह चिट्ठी उसमें से एक है।
हिन्दू धर्म जीने का तरीका है और उन्हीं तरीकों को आसानी से समझने के लिये कथायें और देवी देवाताओं को रचा गया है। यही बात इस चिट्ठी में समझायी गयी है।
गुटन टाग (Guten Tag!) (नमस्ते), अंकल आप कैसे हैं। मैं माफी चाहूंगी कि मैंने बहुत दिन से आपको कोई ईमेल नहीं लिखी। मैं स्कूल में व्यस्त रही।
हमारी कक्षा के विद्यार्थी पिछली सर्दी, आयरलैंड (Ireland) गये थे। हम लोग दिन में घूमते थे। शाम को पब भी जाते थे। वहां का मौसम बरसाती था और बहुत जोर से हवा चलती थी। वहां बहुत ठंडक थी। आप तो उसे बिलकुल सहन नहीं कर पाते क्योंकि मैं भी वहां बर्फ से जम गयी।
यह हमारे क्लास विद्यार्थियों का आयरलैण्ड में खींचा चित्र है। क्या आप मुझे पहचान सकते हैं।
हम लोग आज कल स्कूल में हिन्दू धर्म के बारे में पढ़ रहें हैं। शायद आप भी हिन्दू हैं। क्या आप मुझे हिन्दू मज़हब (religion) के बारे में बतायेंगे क्योंकि मैं इसे एक सच्चे हिन्दू से जानना चाहती हूं न कि ईसाई टीचर से, जो कभी भारत नहीं गयी।
क्या हिन्दू अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकें जैसे कुरान, बाईबिल पढ़ते हैं?
आप लोग इतने भगवान पर कैसे विश्वास कर लेते हैं? क्या यह आपको उलझन में नहीं डालता? हम तो केवल एक ही भगवान पर विश्वास करते हैं।
लीसा
प्यारी लीसा तुम्हारी प्यारी ईमेल मिली, अच्छा लगा। यह सच है कि मुझे ठन्ड अच्छी नहीं लगती और मुझे आयरलैण्ड में अच्छा नहीं लगता।
तुम तो सबसे खास, सबसे अलग हो। चित्र में भी सबसे अलग – छाता लिये खड़ी हो।
मैं जन्म से हिन्दू हूं पर लालन-पालन, अपने वातावरण, और कर्म से, अज्ञेयवादी हूं।
हमारा देश धर्म-निरपेक्ष (secular) है। लेकिन पश्चिमी देशों और हमारे देश और की धर्म-निरपेक्षता में अन्तर है। पश्चिमी देशों में धर्म-निरपेक्षता का अर्थ है कि मज़हब (religion) को राज्य से दूर से रखो। हमारे यहां इसका अर्थ है कि सबका आदर करो। इसलिये राजकीय समारोह या शोक में सब मज़हब (religion) के लोग आते हैं और सारे मज़हब के अनुसार पूजा की जाती है। हमारे स्कूलों में भी सारे मज़हबों (religion) के बारे में पढ़ाया जाता है। इस कारण, मुझे सारे मज़हबों के बारे में थोड़ा बहुत ज्ञान है।
हिन्दुओं के अनुसार भी भगवान एक ही है, वह सर्वशक्तिमान है, वह हम सब, यहां तक कण कण में है – सब उसी के रूप हैं।
हिन्दू धर्म, जीवन जीने का तरीका है। इन तरीकों को समझाने के लिये, अलग-अलग कथाऐं रची गयीं। उनमें देवी देवाताओं का समावेश किया गया ताकि लोग उन्हें आसानी से समझ सकें, उस पर श्रद्धा करें।
तुमने अंग्रेजी की कहावत सुनी होगी,
United we stand, divided we fall, या
Union is strength, या
A house divided cannot stand.
यह तीनों मुख्य रूप से बताती हैं कि शक्ति, संगठन में है। साथ चलोगे तो हमेशा जीत का सेहरा बंधेगा―अलग-थलक रहोगे तो दुश्मन पर विजय नहीं हासिल कर सकोगे। इस तरह की बात, हर सभ्याताओं में है। हांलाकि, उसका रूप अलग है।
तुमने ईसप की कहानियां पढ़ी होंगी। इसी बात को उसने अपनी दो कहानियों, ‘चार बैल और शेर’ (The Four Oxen and the Lion) एवं ‘छड़ियों का गट्ठा’ (The Bundle of Sticks) में बतायी है। इसी बात को समझाने के लिये हिन्दू ऋषियों, मुनियों ने देवी दुर्गा को की कथा बतायी।
हिन्दुओं में, देवी दुर्गा शक्ति का रूप हैं और वे शक्ति की देवी के रूप में पूजी जाती हैं। हमारे पुराणों में उनका वर्णन है – उनके अनेक सिर हैं, अनेक हाथ हैं। प्रत्येक हाथ में वह अस्त्र-शस्त्र धारण किए हैं। सिंह, जो साहस का प्रतीक है, उनका वाहन है। ऐसा क्यों है? तुम, यह उनकी कथा पढ़ कर समझ सकोगी।
महिषासुर नामक एक दानव था। वह अत्याचारी था। देवता, महिषासुर से संग्राम में हार गये और उनका ऐश्वर्य, श्री, और स्वर्ग सब छिन गया तब वे दीन-हीन दशा में वे भगवान के पास पहुँचे। भगवान के सुझाव पर सबने अपनी सभी शक्तियॉं (शस्त्र) एक स्थान पर रखीं। शक्ति के सामूहिक एकीकरण से दुर्गा उत्पन्न हुई। उन्होंने ने महिषासुर का वध किया। वे महिषासुर मर्दनी कहलायीं।
देवी दुर्गा, संघटन की प्रतीक हैं। इसलिये उनके रूप का वर्णन है कि उनके सहस्त्र सिर और असंख्य हाथ हैं। यह वास्तव में संघटक के सहस्त्रों सिर और असंख्य हाथ हैं। यह कथा, एकता के महत्व को समझाने के लिये बतायी गयी है। देवताओं को जीत तभी मिली जब उन्होने अपनी ताकत एकजुट की।
इसी तरह से, ऋषि मुनियों ने अलग अलग महत्व को समझाने के भिन्न भिन्न देवी देवता को गढ़ा और उनकी कथायें बनायी।
आशा है तुम समझ सकी होगी कि इतने भगवान के रूप और कथायें होने का बाद भी, हिन्दू उलझन में क्यों नहीं पड़ते।
उन्मुक्त
आप शायद अगस्त २००९ में न्यूज़वीक में, हिन्दू धर्म से संबन्धित लेख ‘अब, हम सब हिन्दू हैं’ (We Are All Hindus Now) पढ़ना चाहें।
पुनः लगता है कि इस चिट्ठी में कुछ बातें स्पष्ट नहीं हो पायीं जैसा कि मेरे अज्ञात मित्र की टिप्पणी से लगता है। मैं यहां उसे स्पष्ट करना चाहूंगा।
मैंने यह चिट्ठी, अपनी छोटी ऑस्ट्रियन ईमेल मित्र की हिन्दू धर्म के बारे में जिज्ञासा शान्त करने के लिये, उसे लिखा था। मैंने उसे, अपनी समझ के अनुसार, हिन्दू धर्म के बारे में लिखा था। बाद में, मुझे लगा कि शायद और लोग भी इसे पढ़ना चाहें, इस लिये इसे हिन्दी में अनुवाद कर पोस्ट कर दिया।
इसी बीच न्यूज़वीक का लेख भी पढ़ लिया था चूंकि वह हिन्दू धर्म के बारे में है इसलिये उसकी भी लिंक दे दी।
मेरी चिट्ठी में स्पष्ट लिखा है कि मैं अज्ञेयवादी हूं। मैं पूजा-पाठ में नहीं विश्वास करता। मेरी मां भी विश्वास नहीं करती थीं। यदि आप धर्म के बारे में, मेरे विचार जानना चाहते हैं तो आप मेरी चिट्टी मेरे जीवन में धर्म का महत्व में पढ़ सकते हैं। यह मेरी सबसे प्रिय चिट्ठी है। इसे मैंने अनुगूंज के लिये लिखा था।
धर्म के बारे में मेरी लिखी चिट्ठी कुछ लोगों को पसन्द आती होगी क्योंकि यह मुझे कभी कभी अन्तरजाल कई नामों से मिल जाती है। उसमें एक जगह यह भी है।
हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। हमें घर में वह व्यवहार करना चाहिये जो हम अपने बच्चों में देखना चाहते हैं।
२०वीं शताब्दी की शुरूवात में, पिता -दिवस मां-दिवस के पूरक रूप शुरू किया गया। यह देशों में अलग अलग दिन मनाया जाता है पर अधिकतर देशों में जून के तीसरे इतवार, को मनाया जाता है। इसका मुख्य ध्येय, पारिवारिक सम्बन्धित गतिविधि करना है ताकि परिवार में लोगो के बीच सम्बन्ध प्रगाढ़ रहें।
कहा जाता है कि सोनारा लूई स्मार्ट (जन्म १८-२-१८९ मृत्यु २२-३-१९७८) ने जब मां-दिवस के बारे में सुना तब उसने यह वाशिंगटन में १९ जून १९०९ को मनाया। कुछ का कहना है कि यह सबसे पहले ५ जुलाई १९०८ को फेयरमॉन्ट, वेस्ट वर्जीनिया में मनाया गया।
मां-दिवस को लोगों ने उत्साह से लिया पर पिता दिवस को शुरू में मज़ाक के रूप में लिया गया। इस लिये इसे मान्यता प्राप्त होने में समय लगा।
यदि २०वीं शताब्दी के पहले भाग में सबसे चर्चित वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाईन थे तो दूसरे भाग में यह श्रेय रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन को है। १९६६ में उन्हें, भौतिक शास्त्र में नोबल पुरुस्कार मिला। मिशेल उनकी गोद ली पुत्री हैं। उन्होने फाइनमेन को लिखे गये कुछ पत्र तथा उनके द्वारा लिखे गये पत्रों का संकलन कर के ‘Don’t you have time to think’ नामक पुस्तक में प्रकाशित किया है। मैंने एक अन्य श्रंखला इस पुस्तक की समीक्षा करते हुऐ ‘क्या आपके पास सोचने का समय नहीं है?‘ नाम से लिखी है। इसकी एक कड़ी ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा‘ में पिता पुत्र के सम्बन्धों के बारे में बात की है।
आज पिता दिवस के दिन मेरे बेटे की ई-मेल और मेरा जवाब कुछ इस प्रकार था।
पापा मैंने तुम्हारे चिट्ठे में हिन्दू मज़हब में सृष्टि की रचना की पहली कड़ी पढ़ी। मुझे बहुत अच्छी लगी।
कार्ल सेगन को सुनना तो हमेशा ज्ञानवर्धक रहता है। इस प्यारी सी चिट्ठी प्रकाशित करने का शुक्रिया। ऐसी ही चिट्ठियां लिखा करो मुन्ना
बेटे राजा यह चिट्ठी लिखते समय, यह मुझे पुराने समय में ले गयी। इसने, मुझे तुम्हारी बहुत याद दिलायी।
टीवी में हर तरह के सीरियल आते थे। हम चाहते कि तुम फिल्म या चित्रहार न देख कर ज्ञानवर्धक सीरियल देखो। इसलिये हमने कभी भी चित्रहार या फिल्में नहीं देखीं। हमने वही सीरियल देखे जो तुम्हें देखने चाहिये थे। हम तुम्हें बातों से नहीं पर अपने व्यवहार से यह बताना चाहते थे कि कौन से सीरियल देखने लायक हैं और कौन से नहीं। इसलिये इस कॉसमॉस सीरियल की हर कड़ी हमने तुम्हारे साथ देखी।
मुझे वह समय भी याद आये जब हम इन सीरियल से जुड़ी सूचनाओं के बारे में बात करते थे। मुझे वे रातें भी याद आयीं जो हमने नदी के किनारे तारे देखने में बितायीं।
हम, तुम्हें कितना भी अच्छे सीरयल देखने का उपदेश देते पर यह तुम्हारी समझ में उतना नहीं आता जितना कि तब, जब हमने स्वयं तुम्हारे साथ अच्छे सीरियल देखे। यही बात अच्छी पुस्तकें पढ़ने से और घर में रखने से होता है। हमें अच्छे सीरयल देखते, अच्छी पुस्तकें पढ़ते, तुम्हें भी अच्छे सीरियल देखने और पुस्तकें पढ़ने की इच्छा रहती है। इस बात का हमेशा ध्यान रखना, अच्छी बातें उपदेश सुन कर नहीं पर व्यवहार देख कर समझी जाती हैं। अपने आने वाली पीढ़ी के साथ भी इसी तरह का व्यवहार करना। आज खास दिन है। मैं सुबह से तुम्हारे फोन या ई-मेल की बाट देख रहा था। मुझे लगा कि तुम लोग मां के खास दिन को तो याद रखते हो पर मेरे खास दिन को नहीं पर तुम्हार ई-मेल पा कर मलाल दूर हो गया। आज के दिन तुम्हारी प्यारी सी ई-मेल, मेरे लिये, इस दिन को और खास बनाती है। आजकल, मैं तुम लोगों के द्वारा भेजी गयी पुस्तकें पढ़ रहा हूं। मुझे वे पसन्द आ रही हैं। मैं जल्द ही इनके बारे में लिखूंगा।
पापा
जैसा आप करेंगे वैसे आपके आने वाली अगली पीढ़ी भी।
यह कार्टून मेरा बनाया नहीं है। मैंने इसे यहां से लिया है। Cartoon by Nicholson from “The Australian” newspaper: www.nicholsoncartoons.com.au
कुछ समय पहले शास्त्री जी ने एक चिट्ठी ‘बेटा किताबें नहीं पढता!‘ नाम से लिखी थी। मैंने, उस समय, यह टिप्पणी की थी,
‘मेरे विचार से किताबें पढ़ना एक शौक है। आप किसी से जबरदस्ती नहीं कर सकते। मेरा बेटे को यह शौक बचपन में नहीं था न ही हमने उसे किताबें पढ़ने के लिये कहा।
मेरे बेटे को जानवरों, जंगलों में रुचि थी। हम हमेशा छुट्टियों में किसी न किसी जंगल में जाते थे। उसने सब तरह के जानवर भी पाले। जिसमें हमारा सहयोग रहता था।
मैं उसे अक्सर जंगलों या जिम कॉर्बेट के बारे में बताया करता था और कम से कम महीने में दो बार किताबों की दुकान पर ले जाता था। उसे कोई पुस्तक खरीदने की छूट थी।
मेरे बेटे ने पहले अपने आप जानवरों के चित्रों वाली पुस्तकें खरीदने की इच्छा जाहिर की। फिर जेरॉल्ड डरल (Gerald Durrell) और जिम कॉर्बेट (Jim Corbett) की पुस्तकें खरीदने की। हमने वे सब पुस्तकें खरीदी। उसने उन्हें पढ़ा भी धीरे धीरे अपने आप ही उसे पुस्तकें पढ़ने का शौक हो गया आज हम अक्सर अच्छी पुस्तकों के बारे ई-मेल से बात करते हैं। वह जब भारत आता है तो अपने साथ अमेरिका पुस्तकें ले जाता है कहता है कि यहां सस्ती मिलती हैं।’
यह टिप्पणी भी, इस चिट्ठी पर लिखी बातों को, अन्य तरीके से बताती है।
हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)