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मिस्टर व्हाई – यह कौन हैं
‘कोर्ट गर्डल, महानतम तर्क शास्त्री माने जाते हैं। इस चिट्ठी में,  उनकी जीवनी और उस पर लिखी दो पुस्तकों की चर्चा है। 
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने
देखें।

कोर्ट गर्डल पर बहुत सी पुस्तकें लिखी गयी हैं। इनमें से मैंने निम्न चार पुस्तकें पढ़ी हैं:

  1. Gödel: A life of Logic by John L Casti (गर्डल: ए लाइफ ऑफ लॉज़िक लेखक जॉन एल कास्टी)
  2. A world Without Time: The forgotten legacy of Gödel and Einstein by Polle Yourgrau (ए वर्ल्ड विथआउट टाइम: द फॉरगॉटन लेगसी ऑफ गर्डल एंड आइंस्टाइन लेखक पॉले योरग्रॉ)
  3. Gödel, Escher, Bach: An Eternal Golden Braid by Douglas R. Hofstadter (गर्डल, ऍशर, बाख: एन ईटर्नल गोल्डेन ब्रेड लेखक डगलस आर हॉफस्टैडर)
  4. The Emperor’s New Mind: Concerning Computers, Minds and The Laws of Physics (द एमपररस् न्यू माइंड: कंसर्निग कंप्यूटरस्‌, माइंडस् एण्ड द लॉज़ ऑफ फिज़िक्स  लेखक रॉजर पेनरोज)

आज हम पहली दो पुस्तकों के बारे में बात करेंगे।

गर्डल जिज्ञासू थे और वह मिस्टर व्हाई (Mr. Why) के नाम से जाने जाते थे। वे असामान्य प्रतिभा के धनी थे। वे एक शर्मीले युवक से एक ऎसे व्यक्ति बन गये जिनके साथ अधिकतर लोग रहना पसंद करते थे। लेकिन जीवन के अन्त में वे फिर अकेलेपन में डूब गये।

गर्डल ने ऍडेले (Adele) नामक एक तलाकशुदा महिला से शादी की। वह उनसे ६ साल की बड़ी थी और  कैबरे  (Cabaret) नृत्य करती थी। यह शादी उनके माता पिता को पसंद नहीं थी इसलिए गर्डल को शादी के लिए १० साल इन्तजार करना पड़ा। उनके कोई सन्तान नहीं हुई।

कोर्ट गर्डल और अर्लबट आइंस्टाइन पिछले शताब्दी के दो महानतम वैज्ञानिक थे। जीवन के अंतिम दिनो में, वे दोनो ही   इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ (Institute of Advance Studies Princeton) चले गये थे। दोनो का स्वभाव एक दूसरे के विपरीत था। गर्डल थोड़ा निराशवादी और परेशान दार्शनिक  और  आइंस्टाइन मुक्त भावुक व्यक्ति थे।  लेकिन उन दोनों को एक दूसरे से शान्ति मिलती थी।  आइंस्टाइन  का कहना था कि,

‘इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ में सबसे अच्छी बात यह है कि, इंस्टिच्यूट से वापस घर जाते समय, गर्डल और मेरा साथ रहता है।’

फ्रीमैन डाइसन जाने माने भौतिक शास्त्री हैं। वे इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ के स्दस्य हैं। उनका कहना है कि,

‘Gödel was … the only one of our colleagues who walked and talked on equal terms with Einstein.’
हमारे साथ के लोगों में, केवल गर्डल ही था जो आइंस्टाइन के साथ चल सकता था और उनसे बराबरी पर बात कर सकता था।

गर्डल कुछ अजीब किस्म के व्यक्ति थे। उन्होंने अन्त में आत्महत्या कर ली। उनका आत्महत्या का तरीका भी एकदम अलग अपने अपूर्णनता सिद्धान्त की तरह। उनकी मृत्यु malnutrition के कारण हो गयी। वे जीवन के अन्त में अस्पताल में unitary tract की समस्या के लिये भरती थे। उन्होंने महीने भर खाना नहीं खाया। उनका कहना था कि डाक्टर उन्हें जहर दे कर मारना चाहते हैं।

इन दोनो पुस्तकों में गर्डल के बारे पर्याप्त सूचना है।  दूसरी पुस्तक में आइंस्टाइन के संबन्ध में भी कुछ सूचना है।

पहली पुस्तक में कुछ अध्याय, कृत्रिम बुद्धि (Artificial intelligence), सोचने वाली मशीन (Thinking machines), और जटिलता (complexity) के बारे में है। इसे उन लोगों के लिए समझना मुश्किल है जो विषय पर रूचि नही रखते है या जिनको इस क्षेत्र में कोई ज्ञान नहीं है। इसलिए यदि आप चाहें तो इन अध्याय को छोड़ सकते है पर यदि आपको तर्कशास्त्र या कम्पयूटर विज्ञान में रूचि है तब इन अध्यायों को अवश्य पढ़ें। बाकी अध्याय आसान हैं व आसानी से समझे जा सकते है।

दूसरी पुस्तक में, कुछ अध्याय गर्डल द्वारा समय के ऊपर किये गये काम के बारे में है। यह वास्तव में  मुश्किल है और पढ़ते समय यदि आप चाहें तो इनको छोड़ भी सकते है।

गर्डल ने एक बार कहा

‘We live in the World in which ninety-nine per cent of all beautiful things are destroyed in the bud.’
हम ऐसे संसार में रहते हैं जहां ९९ प्रतिश्त सुन्दर वस्तुएं शुरुवात में ही समाप्त हो जाती हैं।

मालुम नहीं क्यों मुझे लगता है कि यह हिन्दी चिट्टाजगत पर सही बैठता है। हम अच्छे लेख लिखने के बजाय, व्यर्थ की बात पर विवाद करते रहते हैं। 

गर्डल के अपूर्णनता सिद्धान्त के बारे में कुछ अन्य पुस्तकों की चर्चा – इस श्रंखला की अगली कड़ी में।

तू डाल डाल, मैं पात पात
भूमिका।। नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है।। नाई, महिला है।। मिस्टर व्हाई – यह कौन हैं।। गणित, चित्रकारी, संगीत – क्या कोई संबन्ध है।।

About this post in Hindi-Roman and English

yeh chitthi cyber apradh ki shrakhlaa kee kari hai. is chitthi mein Gödel  kee jeevani aut us per do pustkon kee charcha hai. yeh chitthi {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is part of series on Cyber crimes. It talks about Gödel life and two books on him. It talks about whether Epimenides’ or liar’s paradox was sorted out in Pricipia Mathematica or not. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
सांकेतिक शब्द
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नाई, महिला है
इस चिट्ठी में, ‘नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है‘ सवाल का जवाब और गर्डल के गणित की अपूर्णनता सिद्धान्त की चर्चा है। 
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मैंने पिछली बार बताया था कि बट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) ने ऍपीमेनेडीज़ या लाएरस् विरोधाभास को नयी तरह से रखा। उन्होंने कहा,

‘एक गांव में केवल एक ही नाई था। उसका कहना था कि वह उन लोगों की दाढ़ी बनाता है जो स्वयं अपनी दाढ़ी नहीं बनाते हैं।’

सवाल यह था कि

‘नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है?’


रसेल और व्हाइटहैड (Whitehad) के मुताबिक उन्होंने इस विराधाभास का हल,  प्रिंसिपिया मैथमैटिका (Principia Mathematica) (१९१३) में निकाल लिया था। उनका हल, कुछ इस तरह से समझा जा सकता है  कि नाई महिला है। इस दशा में तो उसे दाढ़ी बनाने की आवश्यकता नहीं है।

इस हल में वे पुरूषों के स्तर से ऊपर निकल कर व्यक्तियों के स्तर में चले जाते हैं जिसमें पुरूष और महिलायें दोनों रह सकती है।  लेकिन वे भूल गये कि व्यक्तियों के स्तर में अलग तरह  का विरोधाभास  है। जिस पर उन्होंने विचार नहीं किया।

टाइम पत्रिक का शताब्दी अंक

२०वीं शताब्दी के समाप्त होते समय, टाइम पत्रिका ने एक विशेष अंक निकाला था। इसमें उन्होंने बीसवीं शताब्दी के सौ महानतम  लोगों के बारे में लिखा था। इन सौ लोगों में एक ऑस्ट्रियन गणितज्ञ कोर्ट  गर्डल  भी थे।  उन्हें आज तक का सबसे महानतम तर्क शास्त्री माना जाता है। 

गर्डल ने १९३१ में एक पेपर जर्मन भाषा में लिखा। इसके शीर्षिक का अंग्रेजी में अनुवाद है,

‘On formally Undecidable Proposition of Principia Mathematica and Related Systems. 

इसमें  उन्होंने सिद्व किया, 

‘Proof of arithmetic consistency is not possible―every mathematical system is incomplete’.
आप किसी भी मूलभूत सिद्वान्तों को लेकर चलें, उनमें कुछ इस तरह के कथन अवश्य निकल आयेगें  जो न कि सही साबित किये जा सकते है न गलत। सुसंगत गणित सम्भव नहीं है … प्रत्येक व्यवस्था अपूर्ण है।

गर्डल ने हिलर्ब्ट के द्वारा १९०० और १९२८ की आईसीएम में रखे गये प्रश्न का जवाब ढूंढ  लिया। लेकिन यह वह जवाब नहीं था जो डेविड हिल्बर्ट चाहते थे। वे तो चाहते थे कि गणितीय तर्क का ऐसा संसार हो, जहां सारे कथन सही अथवा गलत सिद्घ किये जा सकें। गर्डल ने इसका उल्टा ही सिद्ध कर दिया। इससे हिल्बर्ट को परेशान हुई। लेकिन वे कुछ कर न सके – गर्डल के शोद्ध पत्र में आजतक कोई गलती नहीं निकाली जा सकी है। वे मन मनोस कर रह गये।

अगली बार हम लोग गर्डल और उसके अपूर्णता सिद्धान्त के बारे में लिखी कुछ  रोचक पुस्तकों के बारे में चर्चा करेंगे। 

कुछ समय पहले बीबीसी ने डेंजरस् नॉलेज (Dangerous Knowledge) नामक श्रृंखला प्रसारित की थी। यह श्रृंखला चार विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति, जिसमें तीन गणितज्ञ – जॉर्ज कैंटर (Georg Cantor), कोर्ट गर्डल (Kurt Gödel) और ऐलन ट्यूरिंग (Alan Turing) – और एक भौतिक शास्त्री लुडविंग बॉल्टज़मैन (Ludwig Boltzmann) पर थी। यह बेहतरीन श्रृंखला है और यदि इसे आपने नहीं देखा है तो यूट्यूब में देख सकते हैं। हांलाकि इस श्रृंंखला में, इनकी जीवनी के बारे में कुछ सूचनायें सही नहीं हैं। इसमें गर्डल के जीवन के शुरू का भाग यहां देखिये।


  तू डाल डाल, मैं पात पात
भूमिका।। नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है।। नाई, महिला है।। गर्डल और अपूर्णता सिद्धान्त पर  पुस्तकें।।

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नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है
कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, गणित के तर्क शास्त्र पर चलता है। कंप्यूटर वायरस, इसकी कमियों का फायदा उठाते हैं। इसलिये साइबर अपराध की श्रृंखला में, साइबर अपराधों के बारे में बात करने से पहले, कुछ बातें  गणित के प्रसिद्ध २३ सवालों, और तर्क शास्त्र के क्षेत्र से, स्वयं को संदर्भित करने वाले विरोधाभास के बारे में। 
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अक्सर समझा जाता है कि गणित अपने में सम्पूर्ण विषय है। लेकिन यह सच नहीं है। १९वीं शताब्दी के समाप्त होते होते गणितज्ञों को अपने विषय के बुनियादी सिद्वान्तों के बारे में शक होने लगा। वे गणित के अलग अलग क्षेत्रों के मूलभूत सिद्वान्तों के सबूत ढूंढने लगे।

गणित के बारे में सबसे महत्वपूर्ण सम्मेलन इंटरनेशनल काँग्रेस ऑफ मैथमैटीशियनस् (आईसीएम) (International Congress of Mathematicians) है। इसका आयोजन इंटरनेशनल मैथमैटकल यूनियन (आईएमयू) (International Mathematical Union) करती है। यह सम्मेलन चार साल में एक बार होता है। इसमें पिछले चार साल में गणित का लेखा जोखा देखा जाता है और भविष्य में गणित की राह।

इस बार आईसीएम, १९-२७ अगस्त २०१० के दौरान, हैदराबाद में हो रहा है। यह एक महत्वपूर्ण सम्मेलन है और ऐशिया में तीसरी बार हो रहा है। इसकी वेबसाइट में इस सम्मेलन के पोस्टर हैं। उसका एक पोस्टर आप दाहिने तरफ देख रहे हैं और दूसरे पोस्टर से यह संस्कृत का श्लोक आपके लिये।

यह चित्र आईसीएम २०१० की वेबसाइट के सौजन्य से

यथा शिखा मयूराणां नागानां मण्यो यथा।
तथा वेदाङ्गशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्।।
जिस तरह से,
मोरों के सिर पर कलगी,
सापों के सिर में मणियां,
उसी तरह विज्ञान का सिरमौर गणित।।

शायद आराधना जी जो कि संस्कृत विदुषी हैं या कोई अन्य संस्कृत ज्ञानी बता सके कि यह श्लोक कहां से है और क्या इसका अनुवाद सही है?

गणित में नोबल पुरस्कार नहीं मिलता है। इसका कारण स्पष्ट नहीं है। नोबल ने शादी नहीं की थी। लेकिन कई कहते हैं कि वे साइने लिंडफोर्स (Signe Lindfors) से प्रेम करते थे। उसने उनका प्रेम न स्वीकार कर, गणितज्ञ गोस्टा मिटंग लेफर {Magnus Gustaf (Gösta) Mittag-Leffler}  से शादी कर ली। इससे क्रोधित होकर, उन्होंने गणित में नोबल पुरुस्कार नहीं रखा। शायद यह सच नहीं है। नोबल ने शायद गणित का महत्व ही नहीं समझा।

चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से


गणित में सबसे महत्वपूर्ण पुरस्कार फील्डस् मेडल (Field’s Medal) है। यह पुरस्कार इसी आईसीएम में दिया जाता है। चूकिं यह चार साल में एक बार होती है इसलिये यह अधिक से अधिक चार लोगों को दिया जाता है। इसमें अधिकतम आयु सीमा ४० वर्ष की है।

आईसीएम में, आईएमयू स्कॉलर एवार्ड (IMU Scholar Award) भी दिया जाता है। यह पुरुस्कार नवोदित (३५ सालसे कम उम्र) गणितज्ञों को दिया जाता है। बहुत साल पहले शुभा को इसमें जाने का मौका मिला था। उसे आईएमयू स्कॉलर पुरस्कार मिल चुका है। मैं उसके पीछे पड़ा हूं कि वह इस सम्मेलन के बारे में अपने चिट्ठे पर लिखे। देखिये वह कब लिखती है। पत्नियां कब पतियों की बात मनाती हैं :-( वह जब लिखेगी तब देखा जायगा, हम लोग उसके लिये क्यों रुकें, चलिये आगे चलते हैं।

डेविड हिल्बर्ट का चित्र विकिपीडिया से

वर्ष १९०० की आईसीएम पेरिस में हुई थी। इसमें डेविड हिल्बर्ट ने २३ प्रश्नों को रखा था उसका कहना था कि इन मुश्किलों का हल ही गणित को नयी ऊँचाइयों तक ले जा सकता है। इसमें कुछ का हल तो निकाला जा सका है पर कईयों का नहीं।

इन प्रश्नों के, दूसरे प्रश्नों में सिद्घ करना कि,

‘Mathematical reasoning is reliable, it should not lead to contradictory results’
गणित का तर्क विश्वसनीय है। यह विरोधाभास को जन्म नहीं दे सकता।

वर्ष १९२८ की आईसीएम बोलोन्या इटली (Bologna, Italy) में हुई। यहां पर हिल्बर्ट ने पुन: विचार किया,
‘If it was possible to prove every true mathematical statement or can there be truly formal logical system for mathematics, where every statement could either be proved or disproved.
क्या यह संभव है कि प्रत्येक गणित के कथन को सिद्घ किया जा सके। दूसरे शब्दों में क्या गणितीय तर्क का ऐसा संसार हो सकता है जहां सही अथवा गलत कथन सिद्घ किये जा सके।

यह प्रश्न गणित के तर्क शास्त्र के क्षेत्र का है। इसमें सबसे मुश्किल स्वयं को संदर्भित करते हुए विरोधाभास (self referencing paradoxes) की है।

ऍपीमेनेडीज़ का चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से

स्वयं को संदर्भित करते विरोधाभास में सबसे प्रसिद्घ विरोधाभास ऍपीमेनेडीज़ या लाएरस् विरोधाभास (Epimenides’ or liar’s paradox) है। ऍपीमेनेडीज़ एक ग्रीक दार्शनिक थे और ईसा के ६०० साल पहले क्रीट में रहते थे। उन्होंने एक महत्वपूर्ण कथन किया,

‘The Cretans are always liars.’
सारे क्रीटवासी हमेशा झूठ बोलते हैं।

यदि आप इनको सच माने तो यह झूठ बन जाती है और इसे झूठ माने तो यह सच हो जाती है। यही इसका विरोधाभास है।

बट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) न केवल एक प्रसिद्व दार्शनिक थे बल्कि वह एक गणितज्ञ भी थे। उन्होंने सौ साल पहले इस विरोधाभास को नयी तरह से रखा। जिसको रसेल विरोधाभास या नाई का विरोधाभास (Russell’s or Barber’s paradox) भी कहा जाता है। यह कुछ इस प्रकार है,

‘एक गांव में केवल एक ही नाई था। उसने कहा कि वह उन लोगों की दाढ़ी बनाता है जो स्वयं अपनी दाढ़ी न बनाते हो।’

इस कथन में कोई भी मुश्किल नहीं है जब तक आप यह सवाल न पूछें कि,

‘नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है?’

यदि नाई अपनी दाढ़ी स्वयं बनाता है तो उसके कथनानुसार उसे अपनी दाढ़ी नहीं  बनानी चाहिए। यदि वह अपनी दाढ़ी नहीं बनाता है तो उसके कथनानुसार अपनी दाढ़ी बनानी चाहिए।

रसेल और व्हाइटहैड (Whitehad) ने इस तरह के विरोधाभास को समाप्त करने के लिए वर्ष १९१३ में अंकगणित की एक प्रसिद्घ पुस्तक प्रिंसिपिया मैथमैटिका (Principia Mathematica) नाम से प्रकाशित की।  उनके विचार से उन्होंने इसका हल निकाल लिया था।  क्या यह सच था – यह इस श्रृंखला की अगली कड़ी में। 

लाऍरस् विरोधाभास का एक रूप और भी देखिये। शायद यह बेहतर समझ में आये :-)

पुनः (१) मैंने कुछ समय पहले मार्टिन गार्डनर को श्रद्धांजलि देते समय सुझाव दिया था कि क्या अच्छा हो कि कोई विश्वविद्यालय उनके सम्मान में कोई कॉंफरेन्स या सम्मेलन करे। आईसीएम २०१० के आयोजकों को भी मैंने यह सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि यह मुश्किल है क्योंकि सब पहले से तय हो गया है पर वे प्रयत्न करेंगे। देखिये यह हो पाता है कि नहीं।

(२)  १९२८ की आईसीएम Bologna, Italy में हुई थी। मैंने शहर का नाम बोलगाना लिखा था। राम चन्द्र मिश्र जी इटली में शोद्ध करते हैं। उन्होंने टिप्पणी करके बताया कि इसे बोलोन्या कहते हैं। उनको मेरा धन्यवाद।

(३) मैथली गुप्त जू बलॉगवाणी के संचालक हैं। उन्होंने टिप्पणी कर के बताया कि यह श्लोक सुधाकर द्विवेदी जी द्वारा लिखित ज्योतिष ग्रंथ याजुष ज्योतिष (Yajush Jyotish) के इस पन्ने से लिया गया है। मेरा उनको धन्यवाद। मुझे अच्छा लगेगा यदि कोई चिट्टाकार बन्धु इस ग्रंथ एवं इस श्लोक के संदर्भ की व्याख्या कर उसे प्रकाशित करे। 

(४) प्रेत विनाशक जी ने टिप्पणी कर बताया कि उपरोक्त श्लोक मूल रूप से लगध ऋषि द्वारा रचित ’वेदांग ज्योतिष’ नामक ग्रंथ से लिया गया है। लगध ऋषि का काल १३५० ई. पूर्व का माना जाता है। वे भारतीय ज्ञान परम्परा में प्राचीनतम विद्वानों में से हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि सुधाकर द्विवेदी जी ने अपनी पुस्तक में इस श्लोक को मात्र संदर्भित किया है। वे इसके लिये इस पेज को भी देखने को कहते है। यह तो अब बहुत ही रोचक होता जा रहा है।  क्या कोई चिट्ठाकार बन्धु, विस्तार से प्राचीन भारत में गणित के योगदान के बारे में लिख सकेगा।

  तू डाल डाल, मैं पात पात
भूमिका।। नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है।।


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This post is part of ‘Cyber Crime’ series. Computer software are created with the help of mathematical logic. Computer virus take advantage of their shortcoming. In this post we talk about 23 most famous problems of Mathematics and about self referencing paradoxes. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
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मनोरंजात्मक गणित के जनक – मार्टिन गार्डनर को सलाम
मनोरंजात्मक गणित?
कहीं गणित जैसा नीरस विषय भी मनोरंजन का साधन हो सकता है? यह तो विरोधाभास है।
लेकिन यह सच है।
गणित में रोचक बनाने, उसमें मनोरंजन पाने की दिशा में, शायद मार्टिन गार्डनर ने सबसे अधिक काम किया है। यह चिट्ठी उनको श्रद्धांजलि है।
हम भाई बहन का बचपन, आज के बच्चों के बचपन जैसा नहीं था। न ही पढ़ने का इतना दबाव, न ही इतनी प्रतिस्पर्धा, और न ही इतने भारी भरकम बस्ते। यही कारण था कि शायद अधिकतर समय हमने खेलने में या इधर उधर की मस्ती में बिताया।
मैंने अधिकतर समय, रैकेट खेलों में यानि टेनिस, बेडमिंटन, टेबल टेनिस स्कवैश जैसे खेल खेलने में , या फिर आइज़ेक एसीमोव, आर्थर सी कलार्क, फ्रेड हॉयल की विज्ञान कहानियों को पढ़ते बिताया। इन्हीं के साथ एक और लेखक भी मुझे बेहद प्रिय था। मैंने उसकी सारी किताबें चाट डाली थीं वह था – मार्टिन गार्डनर।
मार्टिन गार्डनर अपनी लिखीं पुस्तकों के सामने। उनका यह चित्र मैथमैटिकल एसोसिएशन ऑफ अमेरिका के वेबसाइट के इस पेज से लिया गया है।
मार्टिन का जन्म  २१ अक्टूबर १९१४ को हुआ था। मार्टिन ने हाई स्कूल के बाद गणित नहीं पढ़ी थी। वे शिकागो विश्विद्यालय से दर्शन शास्त्र में स्नातक थे और अपने को गणित में कमजोर मानते थे।
मैंने १९६० के दशक साईंटिफिक अमेरिकन नामक पत्रिका पढ़नी शुरु की। साईंटिफिक अमेरिकन में,  मार्टिन मनोरंजनात्मक गणित पर एक स्तम्भ लिखा करते थे। मार्टिन गार्डनर से मेरी मित्रता उसी समय शुरू हूई, जो अभी तक कायम है। 
उनके लेख, पुस्तकें मनोरंजनात्मक गणित के अतिरिक्त, पहेलियों, विरोधाभास, और जादू के बारे  में रहते थे। यह न केवल ज्ञानवर्धक पर मनोरंजक  भी रहते थे।  इस युग में गणित को लोकप्रिय बनाने में जितना काम मार्टिन गार्डनर ने किया शायद उतना किसी और ने नही किया। 
न्यू यॉर्क से,  हम्टी डम्टी (Humpty Dumpty) नामक बच्चों की पत्रिका निकलती थी। मार्टिन उसी में सम्पादक की सहायता करते थे और  उसमें बच्चों के लिये सदाचरण की कवितायें लिखा करते थे। १९५६ में साईंटिफिक अमेरिकन पत्रिका ने, उनसे मनोरंजनात्मक गणित के ऊपर  प्रति माह एक लेख लिखने की बात की। उन्होंने, इस चुनौती को  स्वीकार किया और साईंटिफिक अमेरिकन में प्रति माह एक लेख लिखना शुरू किया। 
१९८१ में, उन्होंने साइंटिफिक अमेरिकन में स्तंभ लिखना छोड़ दिया  और स्वतंत्र लेखन करने लगे। पहेलियों के बारे में लिखीं पुस्तकों में मेरी प्रिय पुस्तकें हैं
  • Mathematical puzzles and diversions;
  • More mathematical puzzles and diversions;
  • Further mathematical diversions;
  • Mathematical carnival;
  • Mathematics magic and mystery;
  • Entertaining mathematical rules;
  • Science fiction, puzzle tales;
  • Aha! gotcha, paradoxes to puzzle and delight
उन्हें, छद्म विज्ञान से  बेहद चिढ़ थी। इस बारे में उनकी बेहतरीन पुस्तक है Science: Good, Bad, and Bogus है। बाद में यह Fads and Fallacies in the Name of Science के नाम से पुनः प्रकाशित हुई। इसमें ये ESP और UFO के अन्धविश्वास को दूर करने का प्रयत्न करते हैं।
उनकी पहेलियों की पुस्तक से, एक पहेली।
वोदका में खून ज्यादा या खून में वोदका ज्यादा।

एक सुबह ड्रैकुला  और श्रीमती ड्रैकुल ने सोने जाने से पहले रात के जश्न मनाने की बात सोची।

ड्रैकुला ने अलमारी से वोदका और आदमी के खून की, एक एक लीटर की बोतलें निकाली। वोदका की बोटल आधी और खून की बोतल तीन-चौथायी भरी थी। कुछ खून की बोतल से खून वोदका की बोतल में डाला। उसे अच्छी तरह से हिलाया फिर वोदका की बोतल से उतने मिश्रण को वापस खून की बोटल में डाल दिया कि वोदका और खून की बोतल में उतनी भरी रहें जितने की पहले थी।

श्रीमती ड्रैकुला सोने के कपड़े पहन शीशे में बाल संवार रहीं थी।  उन्होंने, यह सब शीशे में देखा।

 श्रीमती ड्रैकुला से पूछा जाय कि वोदका की बोतल में ज्यादा खून है कि खून की बोतल में ज्यादा वोदका तो उनका क्या जवाब होना चाहिये।

यह मान कर चलिये कि वोदका और खून को मिलाने में उनके आयतन में कोई अन्तर नहीं होता है और खून का घनत्व वोदाका से ज्यादा होता है। 

इस पहेली को सुलझाने में कोई विज्ञान जानने की आवश्यक्ता नहीं है।

मार्टिन गार्डनर पर,  ‘द नेचर ऑफ थिंगस्’  नाम से यह विडियो विम्को वेबसाइट से है। यह भागों में, युट्यूब में भी उपलब्ध है। यह एक बेहतरीन विडियो है। इस देख कर आप बहुत कुछ उनकी शख्सियत के बारे में जान पायेंगे।
मैंने पहले भी इनके बारे में दो चिट्ठियां  यहां और यहां लिखीं। फिर इन्हें संकलित कर, मार्टिन गार्डनर के बारे में एक चिट्ठी अपने लेख चिट्ठे पर यहां प्रकाशित की है।
क्या अच्छा हो कि कोई विश्वविद्यालय उनके नाम से, उनके सम्मान में कोई कॉंफरेन्स या सेमीनार का आयोजन करे।  

मार्टिन गार्डनर की मृत्यु २२ मई २०१० को हो गयी। गणित जैसे नीरस विषय को रोचक बनाने वाले इस व्यक्ति को, उन्मुक्त का सलाम।  
ज़ेमेंटा के द्वारा बताये सम्बन्धित लेख
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This post is tribute to Martin Gardner, who popularised Mathematics more than any one else. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
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तू डाल डाल, मैं पात पात
यह चिट्ठी, साइबर अपराधों पर नयी श्रृंखला की भूमिका है।
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फिल्म ‘इंडिपेंडेन्स डे’ से
क्या आपको मालुम है कि आज किसका जन्म दिन है? मेरा तो नहीं  है पर है किसी खास व्यक्ति का।

‘उन्मुक्त जी, कौन है वह व्यक्ति? क्या चिट्ठकार है? ज्लदी बताइये, उसे बधाई तो दे दें।’

वह चिट्ठकार तो नहीं है, पर है एक महान व्यक्ति, एक महान तर्क शास्त्री है। मेरे विचार से आज तक हुऐ सारे तर्क शास्त्रियों में महानतम―नाम है उसका, कोर्ट गर्डल (Kurt Gödel)।
चित्र इंस्टिट्यूट ऑफ एडवान्सड स्टडीज़ की वेबसाइट से

कोर्ट गर्डल का जन्म २८ अप्रैल १९०६ में , बर्नो चेक रिपब्लिक (Czech Republic) में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ायी वियान ऑस्ट्रिया में पूरी की पर बाद में इंस्टिट्यूट ऑफ एडवान्सड स्टडीज़, प्रिंक्सटन  चले गये। वहीं उनकी मृत्यु  १४ जनवरी १९७८ में हो गयी।

‘उन्मुक्त जी आपका शीर्षक तो है “तू डाल डाल, मैं पात पात” हम तो समझे कि यहां कुछ छकने, छकाने की बात होगी। लेकिन आप तो चालू हो गये तर्क शास्त्री कोर्ट गर्डल की बात करने। मालुम नहीं पहला चित्र क्या है, लगता है कि कहीं लड़ाई हो रही है।
हमें तो आप “द ऐबसेन्ट माइंडेड प्रोफेसर” फिल्म की याद दिला रहे हैं। आपको याद है वह फिल्म। आप शीर्षक कुछ देते हैं, लिखने कुछ और लग जाते हैं।’

मुझे  ‘द ऐबसेन्ट माइंडेड प्रोफेसर’ फिल्म की बहुत अच्छी तरह से याद है। यह १९६१ में बनी वॉल्ट डिज़नी की लोकप्रिय फिल्मों में से एक है। इसे मैंने चौथी या पांचवी कक्षा में पढ़ते समय देखा था। 

कौन भूल सकता है उस प्रोफेसर को, जिसने  भूल से, उड़ते रबर (flying rubber) (flubber) (फ्लबर) का आविष्कार कर लिया था। इसी रोमांच में वह अपनी शादी की तारीख भूल गया। बस, गुस्से में, उसकी मंगेतर ने शादी तोड़ दी और वह किसी अन्य से दोस्ती का दिखावा करने लगी। फिल्म में, फल्बर के साथ प्रोफेसर के रोमांचकारी किस्से और  अपने प्यार को वापस पाने की कहानी है।  कितनी प्यारी फिल्म थी, आज भी  याद है।



यह फिल्म, सैमुएल टेलर की विज्ञान कहानी ‘अ सिचुऐशन ऑफ ग्रैविटी’  (A Situation of Gravity by Samuel W Taylor) नामक कहानी के ऊपर बनी है। इसके बाद १९६३ में वॉल्ट डिज़नी ने इसकी ऊत्तर कथा फिल्म ‘सन ऑफ फल्बर’ (Son of Flubber) बनायी। यह  श्याम-श्वेत फिल्में थीं। कुछ साल पहले, ‘ऐबसेन्ट माइंडेड प्रोफेसर’ को नये सिरे   से रंगीन फिल्म फल्बर नाम से बनाया गया। मुझे याद है यह सब।

मैं बहुत कुछ हूं, मेरे चिट्ठियां इसकी गवाह हैं पर मैं भुलक्कड़ नहीं हूं। यह शीर्षक है, मेरी नयी श्रंखला का जो मैं साइबर अपराधों और कंप्यूटर हैकर के बारे में लिख रहा हूं। मैंने जानबूझ कर यह शीर्षक दिया है और ‘इंडिपेंडेन्स डे’ फिल्म का चित्र लगाया है।

‘उन्मुक्त जी, अब समझ में आया कि आपने इस श्रंखला का नाम “तू डाल डाल, मैं पात पात” क्यों रखा।  चोर-सिपाही के खेल में, अक्सर चोर सिपाही से एक कदम आगे रहते हैं। कंप्यूटर हैकर भी, कंप्यूटर विशेषज्ञयों से आगे रहते हैं। इसलिये आपने इस श्रंखला का यह नाम रखा है। है न सही?’

बिलकुल सही फरमाया आपने। 

‘क्या खाक सही फरमाया उन्मुक्त जी―पैर कब्र में जा रहे हैं लेकिन मज़ाक करने की आदत नहीं गयी। कोर्ट गर्डल या इस इस चित्र का, इस विषय से क्या समबंध। हमें बेवकूफ न बनाइये।’

 मेरे भाई, मेरी बहना, इतनी जल्दी नहीं। न केवल कोर्ट गर्डल, पर फिल्म ‘इंडिपेंडेन्स डे’ (जिस फिल्म से ऊपर का चित्र चित्र लिया गया है) का सम्बन्ध, इस विषय है। यह कैसे है इसका पता तो आपको इस श्रृंखला के दौरान चलेगा। इंतजार कीजिये इस श्रंखला की अगली कड़ी का, लेकिन उसमें कुछ समय लगेगा। मैंने इस कड़ी को केवल इसलिये प्रकाशित कर दिया क्योंकि आज कोर्ट गर्डल का जन्मदिन था।

अगली बार हम बात करेंगे कि कोर्ट गर्डल क्यों प्रसिद्ध हैं, उनके बारे में कुछ चर्चा, और मुझे यह श्रृंखला लिखने का विचार कैसे आया।


फिल्म ‘द ऐबसेन्ट माइंडेड प्रोफेसर’ में प्रोफेसर की, अपनी मगेंतर से पुनः मित्रता हो जाने के बाद के कुछ दृश्य

तू डाल डाल, मैं पात पात
भूमिका।।

About this post in Hindi-Roman and English

yeh chitthi cyber apradhon per nayee shrankhla kee bhumika hai. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is introduction to my new series on cyber crimes. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
Hindi, पॉडकास्ट, podcast,
सफलता हमेशा काम के बाद आती है

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। यदि लगन है, काम करने का ज़स्बा है तो सफलता कदम चूमेगी।

मुन्ने राजा

तीन दशक पहले, तुमने हमारे जीवन में कदम रखा। पता ही नहीं चला कि वे कब बीत गये। तुमने, न केवल हमारे जीवन में,  पर सबके जीवन में खुशी भरी।
आज, तुम्हारे साथ बिताये, दिन याद आये, घटनायें याद आयीं। तुम्हें याद है दूरदर्शन में आने वाला विज्ञान पहेली का प्रोग्राम – जिसे हम साथ देखा करते थे। इसमें दो बार पुरस्कार मिला:
  • पहली बार सवाल था कि चन्द्रमा पृथ्वी से दूर क्यों जा रहा है। 
  • दूसरी बार सवाल था कि चमगादड़ किस प्रकार अपना शिकार ढ़ूढते हैं।

तुम्हारे बड़े होने के साथ, हमसे (शायद केवल मुझसे, तुम्हारी मां से नहीं) एक गलती हो गयी। मैंने अपने सपने, तुम्हारे साथ पूरे करने की कोशिश की। यह ठीक नहीं है। सबको अपने सपने देखने और  पूरे करने की बात है न कि अपने पिता के। शायद भारतीय माता-पिता की यही कमी है। लेकिन, इसके बावज़ूद भी, तुममें वह सब है जिस पर किसी भी माता-पिता को गर्व हो। तुम्हारी आदतें, शौक, प्राथमिकता सही हैं। हां चाहो तो पेंसिल चबाना छोड़ सकते हो और जल्दी उठने की आदत डाल सकते हो :-)
मैं आजकल आमिर एक्ज़ल की लिखी पुस्तक ‘द आर्टिस्ट एण्ड द मैथमेटीशियन: द स्टोरी ऑफ निकोला बूरबाकी, द जीनियस हू नेवर इक्ज़िस्टेड’ (The artist and the mathematician: the story of  Nicolas Bourbaki, the genius mathematician who never existed by Amir D. Aczel) पढ़ रहा हूं। 
पिछली शताब्दी  में, आधुनिक गणित में बहुत से पेपर और पुस्तकें निकोला बूरबाकी (Nicolas Bourbaki) के नाम से लिखीं गयीं। इन पुस्तकों ने आधुनिक गणित को नयी उचांई दी। इस नाम का कोई भी गणितज्ञ नहीं था। कुछ फ्रांसीसी गणितज्ञों ने मिल कर यह कार्य के १९३० के दशक में शुरू किया। इस काम में १० से लेकर २० गणितज्ञ जुड़े थे। यह पुस्तक इन्हीं गणितज्ञों के बारे में है।  यह भी एक रोचक बात है कि उन्होंने निकोला बूरबाकी नाम क्यों चुना।
जेनरल चार्ल्स डेनिस बूरबाकी का यह चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से
पुस्तकों में लेखक का नाम देना जरूरी होता है। जेनरल चार्ल्स डेनिस बूरबाकी (Charles Denis Sauter Bourbaki) फ्रांसीसी सेना के एक प्रसिद्ध अधिकारी थे। फ्रांसीसी गणितज्ञों ने, बस उसी के नाम पर, एक काल्पनिक नाम नीकोला बूरबाकी चुन लिया और लगे लिखने गणित पर पुस्तकें। यह इतनी अच्छी थीं कि उसने गणित को नयी दिशा ही दे दी। मैंने इसके बारे में ‘शून्य, जीरो, और बूरबाकी‘ की चिट्ठी में भी लिखा है। 
मैं अभी तक इस इस पुस्तक में दो गणितज्ञों के बारे में पढ़ पाया हूं: 
  • एक हैं एलेक्ज़ेंडर ग्रॉथेन्डीक (Alexander Gronthendiek); और
  • दूसरे हैं  आन्द्रे वाइल (Andre Weil)। 

इन दोनो के पारिवारिक परिवेश में बहुत अन्तर था।

एलेक्ज़ेंडर का बचपन गरीबी और अकेलेपन में गुजरा। उसने गणित की पढ़ाई अपने आप की। 
वहीं आन्द्रे का जीवन समृद्ध था। उसे किसी बात की कमी नहीं थी। उसने  सबसे  अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की और उसे जाने माने गणितज्ञों के साथ रहने का मौका मिला। उसे डॉक्टरेट मिलते ही, २३ साल की उम्र में, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी मिल गयी। वह वहां कुछ समय रहा फिर वापस यूरोप चला गया। 
गणित के क्षेत्र में, दोनो का काम महत्वपूर्ण है पर एलेक्ज़ेंर ने ज्यादा काम किया है। वह २०वीं शताब्दी के महानतम गणितज्ञों में गिना जाता है। यह बताता है आपकी कैसी भी परिस्थिति हो यदि काम के लिये लगन है, ज़स्बा है – तो सफलता कदम चूमेगी। अंग्रेजी में पुरानी कहावत है,

‘The only place where success comes before work is dictionary.’ 
सफलता हमेशा काम के बाद ही आती है यहां तक कि शब्दकोश में भी। 

यह भी सच है,

‘The real success is finding work that you love and the next best thing is finding love in whatever you do.’

अपने प्यार को ही, जीविका बना लेना सफलता है। दूसरी बेहतर बात, जीविका में ही प्यार पाना है।

आजकल ठंडक शुरू हो गयी है। सुबह कोहरा पड़ने लगा है। तुम्हारी भेजी स्वॅट जैकेट बहुत काम आती है। वही सुबह पहन कर, ठहलने जाता हूं।
जीवन में तुम खुश रहो, सफल हो।
पापा
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Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
यह ऑडियो फइलें ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप -
  • Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
  • Linux पर सभी प्रोग्रामो में – सुन सकते हैं।
बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें।

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yeh post ee-paaati shrnkhla kee kari hai. yeh nayee peedhee ko smjhne, unse dooree kum karne, aur unhein jeevan ke moolyon smjhaane ka praytna hai. yadi lagan ho, jasba ho to saphaltaa kadam choomegee. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is part of e-paati (e-mail) series and is an attempt to understand the new generation, bridge the between gap and to inculcate right values in them. Success follows hard work. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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