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मिस्टर व्हाई – यह कौन हैं
‘कोर्ट गर्डल, महानतम तर्क शास्त्री माने जाते हैं। इस चिट्ठी में,  उनकी जीवनी और उस पर लिखी दो पुस्तकों की चर्चा है। 
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने
देखें।

कोर्ट गर्डल पर बहुत सी पुस्तकें लिखी गयी हैं। इनमें से मैंने निम्न चार पुस्तकें पढ़ी हैं:

  1. Gödel: A life of Logic by John L Casti (गर्डल: ए लाइफ ऑफ लॉज़िक लेखक जॉन एल कास्टी)
  2. A world Without Time: The forgotten legacy of Gödel and Einstein by Polle Yourgrau (ए वर्ल्ड विथआउट टाइम: द फॉरगॉटन लेगसी ऑफ गर्डल एंड आइंस्टाइन लेखक पॉले योरग्रॉ)
  3. Gödel, Escher, Bach: An Eternal Golden Braid by Douglas R. Hofstadter (गर्डल, ऍशर, बाख: एन ईटर्नल गोल्डेन ब्रेड लेखक डगलस आर हॉफस्टैडर)
  4. The Emperor’s New Mind: Concerning Computers, Minds and The Laws of Physics (द एमपररस् न्यू माइंड: कंसर्निग कंप्यूटरस्‌, माइंडस् एण्ड द लॉज़ ऑफ फिज़िक्स  लेखक रॉजर पेनरोज)

आज हम पहली दो पुस्तकों के बारे में बात करेंगे।

गर्डल जिज्ञासू थे और वह मिस्टर व्हाई (Mr. Why) के नाम से जाने जाते थे। वे असामान्य प्रतिभा के धनी थे। वे एक शर्मीले युवक से एक ऎसे व्यक्ति बन गये जिनके साथ अधिकतर लोग रहना पसंद करते थे। लेकिन जीवन के अन्त में वे फिर अकेलेपन में डूब गये।

गर्डल ने ऍडेले (Adele) नामक एक तलाकशुदा महिला से शादी की। वह उनसे ६ साल की बड़ी थी और  कैबरे  (Cabaret) नृत्य करती थी। यह शादी उनके माता पिता को पसंद नहीं थी इसलिए गर्डल को शादी के लिए १० साल इन्तजार करना पड़ा। उनके कोई सन्तान नहीं हुई।

कोर्ट गर्डल और अर्लबट आइंस्टाइन पिछले शताब्दी के दो महानतम वैज्ञानिक थे। जीवन के अंतिम दिनो में, वे दोनो ही   इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ (Institute of Advance Studies Princeton) चले गये थे। दोनो का स्वभाव एक दूसरे के विपरीत था। गर्डल थोड़ा निराशवादी और परेशान दार्शनिक  और  आइंस्टाइन मुक्त भावुक व्यक्ति थे।  लेकिन उन दोनों को एक दूसरे से शान्ति मिलती थी।  आइंस्टाइन  का कहना था कि,

‘इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ में सबसे अच्छी बात यह है कि, इंस्टिच्यूट से वापस घर जाते समय, गर्डल और मेरा साथ रहता है।’

फ्रीमैन डाइसन जाने माने भौतिक शास्त्री हैं। वे इंस्टीट्यूट आफ एडवांसड स्टडीज़ के स्दस्य हैं। उनका कहना है कि,

‘Gödel was … the only one of our colleagues who walked and talked on equal terms with Einstein.’
हमारे साथ के लोगों में, केवल गर्डल ही था जो आइंस्टाइन के साथ चल सकता था और उनसे बराबरी पर बात कर सकता था।

गर्डल कुछ अजीब किस्म के व्यक्ति थे। उन्होंने अन्त में आत्महत्या कर ली। उनका आत्महत्या का तरीका भी एकदम अलग अपने अपूर्णनता सिद्धान्त की तरह। उनकी मृत्यु malnutrition के कारण हो गयी। वे जीवन के अन्त में अस्पताल में unitary tract की समस्या के लिये भरती थे। उन्होंने महीने भर खाना नहीं खाया। उनका कहना था कि डाक्टर उन्हें जहर दे कर मारना चाहते हैं।

इन दोनो पुस्तकों में गर्डल के बारे पर्याप्त सूचना है।  दूसरी पुस्तक में आइंस्टाइन के संबन्ध में भी कुछ सूचना है।

पहली पुस्तक में कुछ अध्याय, कृत्रिम बुद्धि (Artificial intelligence), सोचने वाली मशीन (Thinking machines), और जटिलता (complexity) के बारे में है। इसे उन लोगों के लिए समझना मुश्किल है जो विषय पर रूचि नही रखते है या जिनको इस क्षेत्र में कोई ज्ञान नहीं है। इसलिए यदि आप चाहें तो इन अध्याय को छोड़ सकते है पर यदि आपको तर्कशास्त्र या कम्पयूटर विज्ञान में रूचि है तब इन अध्यायों को अवश्य पढ़ें। बाकी अध्याय आसान हैं व आसानी से समझे जा सकते है।

दूसरी पुस्तक में, कुछ अध्याय गर्डल द्वारा समय के ऊपर किये गये काम के बारे में है। यह वास्तव में  मुश्किल है और पढ़ते समय यदि आप चाहें तो इनको छोड़ भी सकते है।

गर्डल ने एक बार कहा

‘We live in the World in which ninety-nine per cent of all beautiful things are destroyed in the bud.’
हम ऐसे संसार में रहते हैं जहां ९९ प्रतिश्त सुन्दर वस्तुएं शुरुवात में ही समाप्त हो जाती हैं।

मालुम नहीं क्यों मुझे लगता है कि यह हिन्दी चिट्टाजगत पर सही बैठता है। हम अच्छे लेख लिखने के बजाय, व्यर्थ की बात पर विवाद करते रहते हैं। 

गर्डल के अपूर्णनता सिद्धान्त के बारे में कुछ अन्य पुस्तकों की चर्चा – इस श्रंखला की अगली कड़ी में।

तू डाल डाल, मैं पात पात
भूमिका।। नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है।। नाई, महिला है।। मिस्टर व्हाई – यह कौन हैं।। गणित, चित्रकारी, संगीत – क्या कोई संबन्ध है।।

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yeh chitthi cyber apradh ki shrakhlaa kee kari hai. is chitthi mein Gödel  kee jeevani aut us per do pustkon kee charcha hai. yeh chitthi {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is part of series on Cyber crimes. It talks about Gödel life and two books on him. It talks about whether Epimenides’ or liar’s paradox was sorted out in Pricipia Mathematica or not. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
सांकेतिक शब्द
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मनोरंजात्मक गणित के जनक – मार्टिन गार्डनर को सलाम
मनोरंजात्मक गणित?
कहीं गणित जैसा नीरस विषय भी मनोरंजन का साधन हो सकता है? यह तो विरोधाभास है।
लेकिन यह सच है।
गणित में रोचक बनाने, उसमें मनोरंजन पाने की दिशा में, शायद मार्टिन गार्डनर ने सबसे अधिक काम किया है। यह चिट्ठी उनको श्रद्धांजलि है।
हम भाई बहन का बचपन, आज के बच्चों के बचपन जैसा नहीं था। न ही पढ़ने का इतना दबाव, न ही इतनी प्रतिस्पर्धा, और न ही इतने भारी भरकम बस्ते। यही कारण था कि शायद अधिकतर समय हमने खेलने में या इधर उधर की मस्ती में बिताया।
मैंने अधिकतर समय, रैकेट खेलों में यानि टेनिस, बेडमिंटन, टेबल टेनिस स्कवैश जैसे खेल खेलने में , या फिर आइज़ेक एसीमोव, आर्थर सी कलार्क, फ्रेड हॉयल की विज्ञान कहानियों को पढ़ते बिताया। इन्हीं के साथ एक और लेखक भी मुझे बेहद प्रिय था। मैंने उसकी सारी किताबें चाट डाली थीं वह था – मार्टिन गार्डनर।
मार्टिन गार्डनर अपनी लिखीं पुस्तकों के सामने। उनका यह चित्र मैथमैटिकल एसोसिएशन ऑफ अमेरिका के वेबसाइट के इस पेज से लिया गया है।
मार्टिन का जन्म  २१ अक्टूबर १९१४ को हुआ था। मार्टिन ने हाई स्कूल के बाद गणित नहीं पढ़ी थी। वे शिकागो विश्विद्यालय से दर्शन शास्त्र में स्नातक थे और अपने को गणित में कमजोर मानते थे।
मैंने १९६० के दशक साईंटिफिक अमेरिकन नामक पत्रिका पढ़नी शुरु की। साईंटिफिक अमेरिकन में,  मार्टिन मनोरंजनात्मक गणित पर एक स्तम्भ लिखा करते थे। मार्टिन गार्डनर से मेरी मित्रता उसी समय शुरू हूई, जो अभी तक कायम है। 
उनके लेख, पुस्तकें मनोरंजनात्मक गणित के अतिरिक्त, पहेलियों, विरोधाभास, और जादू के बारे  में रहते थे। यह न केवल ज्ञानवर्धक पर मनोरंजक  भी रहते थे।  इस युग में गणित को लोकप्रिय बनाने में जितना काम मार्टिन गार्डनर ने किया शायद उतना किसी और ने नही किया। 
न्यू यॉर्क से,  हम्टी डम्टी (Humpty Dumpty) नामक बच्चों की पत्रिका निकलती थी। मार्टिन उसी में सम्पादक की सहायता करते थे और  उसमें बच्चों के लिये सदाचरण की कवितायें लिखा करते थे। १९५६ में साईंटिफिक अमेरिकन पत्रिका ने, उनसे मनोरंजनात्मक गणित के ऊपर  प्रति माह एक लेख लिखने की बात की। उन्होंने, इस चुनौती को  स्वीकार किया और साईंटिफिक अमेरिकन में प्रति माह एक लेख लिखना शुरू किया। 
१९८१ में, उन्होंने साइंटिफिक अमेरिकन में स्तंभ लिखना छोड़ दिया  और स्वतंत्र लेखन करने लगे। पहेलियों के बारे में लिखीं पुस्तकों में मेरी प्रिय पुस्तकें हैं
  • Mathematical puzzles and diversions;
  • More mathematical puzzles and diversions;
  • Further mathematical diversions;
  • Mathematical carnival;
  • Mathematics magic and mystery;
  • Entertaining mathematical rules;
  • Science fiction, puzzle tales;
  • Aha! gotcha, paradoxes to puzzle and delight
उन्हें, छद्म विज्ञान से  बेहद चिढ़ थी। इस बारे में उनकी बेहतरीन पुस्तक है Science: Good, Bad, and Bogus है। बाद में यह Fads and Fallacies in the Name of Science के नाम से पुनः प्रकाशित हुई। इसमें ये ESP और UFO के अन्धविश्वास को दूर करने का प्रयत्न करते हैं।
उनकी पहेलियों की पुस्तक से, एक पहेली।
वोदका में खून ज्यादा या खून में वोदका ज्यादा।

एक सुबह ड्रैकुला  और श्रीमती ड्रैकुल ने सोने जाने से पहले रात के जश्न मनाने की बात सोची।

ड्रैकुला ने अलमारी से वोदका और आदमी के खून की, एक एक लीटर की बोतलें निकाली। वोदका की बोटल आधी और खून की बोतल तीन-चौथायी भरी थी। कुछ खून की बोतल से खून वोदका की बोतल में डाला। उसे अच्छी तरह से हिलाया फिर वोदका की बोतल से उतने मिश्रण को वापस खून की बोटल में डाल दिया कि वोदका और खून की बोतल में उतनी भरी रहें जितने की पहले थी।

श्रीमती ड्रैकुला सोने के कपड़े पहन शीशे में बाल संवार रहीं थी।  उन्होंने, यह सब शीशे में देखा।

 श्रीमती ड्रैकुला से पूछा जाय कि वोदका की बोतल में ज्यादा खून है कि खून की बोतल में ज्यादा वोदका तो उनका क्या जवाब होना चाहिये।

यह मान कर चलिये कि वोदका और खून को मिलाने में उनके आयतन में कोई अन्तर नहीं होता है और खून का घनत्व वोदाका से ज्यादा होता है। 

इस पहेली को सुलझाने में कोई विज्ञान जानने की आवश्यक्ता नहीं है।

मार्टिन गार्डनर पर,  ‘द नेचर ऑफ थिंगस्’  नाम से यह विडियो विम्को वेबसाइट से है। यह भागों में, युट्यूब में भी उपलब्ध है। यह एक बेहतरीन विडियो है। इस देख कर आप बहुत कुछ उनकी शख्सियत के बारे में जान पायेंगे।
मैंने पहले भी इनके बारे में दो चिट्ठियां  यहां और यहां लिखीं। फिर इन्हें संकलित कर, मार्टिन गार्डनर के बारे में एक चिट्ठी अपने लेख चिट्ठे पर यहां प्रकाशित की है।
क्या अच्छा हो कि कोई विश्वविद्यालय उनके नाम से, उनके सम्मान में कोई कॉंफरेन्स या सेमीनार का आयोजन करे।  

मार्टिन गार्डनर की मृत्यु २२ मई २०१० को हो गयी। गणित जैसे नीरस विषय को रोचक बनाने वाले इस व्यक्ति को, उन्मुक्त का सलाम।  
ज़ेमेंटा के द्वारा बताये सम्बन्धित लेख
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This post is tribute to Martin Gardner, who popularised Mathematics more than any one else. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
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क्या काली मां की कृपा से यह चमत्कार हो गया
इस चिट्ठी में प्रसिद्ध टेनिस खिलाड़ी रमेश कृष्णन से मुलाकात की चर्चा है।

मुझे सारे रैकेट के खेल पसन्द हैं। टेनिस सबसे पहले खेलना शुरू किया। शायद ४थी-५वीं कक्षा से। मैंने इसकी कोचिंग भी ली है। बचपन में दुनिया के बेहतरीन टेनिस खिलाड़ियों को भी देखने का मौका भी मिला – रॉय एमरसन, फ्रेड स्टोले, मार्टिन मुलिगन, बॉब हेटिट, आयन टिरियाक, नास्तासे, रामानथन और रमेश कृष्णन, जयदीप मुकर्जी, प्रेमजीत लाल, अमृतराज बन्धु, निरुपमा वसंत, किरण बेदी आदि। 


मुझे आज भी, १९६६ में, कलकत्ता के साउथ कल्ब में भारत बनाम ब्राज़ील के डेविस कप इंटर ज़ोन फाईनल मैच  की याद है। उस समय, मैं स्कूल का विद्यार्थी था। मेरे कान में आज भी, रेडियो में आ रही कमेन्टरी की आवाज गूंजती है।

उस समय जयदीप मुकर्जी, प्रेमजीत लाल के साथ के साथ डबलस् खेलते थे। जयदीप उस बार कृष्णन के साथ खेले और डबलस् का मुकाबला जीत लिया। कृष्णन ने अपना एकल मुकाबला जीत लिया था लेकिन भारत अपने दोनो अन्य एकल मुकाबले हार चुका था। मैच स्कोर दो बराबर। पांचवां मैच रामानाथन कृष्णन बनाम थॉमस कॉख। कृष्णन १-२ सेट, चौथे सेट में २-५ गेम, और आठवें गेम में १५-३० से पीछे।

ब्राज़ील से मैच जीतने के बाद,  ऑस्ट्रेलिया के टोनी रॉश् और जॉन न्यूकॉम्ब विरुद्ध जयदीप मुकर्जी और रामानाथन कृष्णन डबल्स् का मैच खेलते हुऐ। यह मैच भारत ने जीता पर मुकाबला १-४ से हार गया। चित्र हिन्दू अखबार के सौजन्य से।  

आप उस समय के तनाव को तब तक नहीं समझ सकते जब तक आपने स्वयं वह आखों देखा हाल न सुना हो या आपने वह मैच न देखा हो। वहां से लगातार कृष्णन ने लगातार ९ गेम जीत लिऐ और मैच भी। भारत को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चैलेंज राउंड में खेलने का मौका मिला। क्या काली मां की कृपा थी कि यह चमत्कार हो गया। कृष्णन तो यही कहते हैं। वे मैच के तुरन्त बाद काली मां के मन्दिर गये। 




कुछ इसी तरह का कारनामा रमेश कृष्णन ने १९९३ में फ्रांस के विरुद्ध कर दिखाया था।


कुछ समय पहले, मुझे रमेश से एक कल्ब में मिलने का मौका मिला और यह मौका में नहीं छोड़ना चाहता था। हमने साथ साथ डबलस् का एक सेट भी खेला। वे मेरे साथी थे। बीच, बीच में, वे मेरी गलतियों को सुधारते जाते थे। इस उम्र में, अब क्या मैं टेनिस सीखू पांऊगा पर उनके प्यार से समझाने में मजा ही कुछ और था। वे कहने लगे चाहे दूसरी तरफ गेंद कोर्ट के बाहर चली जाय पर नेट नहीं अटकनी चाहिये। एक बार जब वे स्वयं यह गलती कर गये तो अपने आप से कहा। दूसरों को सलाह दे रहा हूं पर इसे तो मुझ भी मानना चाहिये।

खेलने के बाद, हमने कुछ समय साथ बिताया। मेरे पास उनकी वा उनके पिता की निर्मल शेकर के साथ लिखी पुस्तक ‘अ टच ऑफ टेनिस – द स्टोरी ऑफ टेनिस फैमिली’ थी। इस पर मैंने उनसे हस्ताक्षर लिये। पूछने लगे, 

‘मैं अपने पिता के भी दस्खत कर सकता हूं। क्या उनके लिये भी कर दूं।’

मैंने कहा नहीं मैं अगली बार चेन्नेई आउंगा तब खुद मिल कर करवाऊंगा।

सरल हृदय के व्यक्ति, उम्र में मुझसे बहुत छोटे, पर कद में कहीं ऊंचे। मैंने विश्वविद्यालय स्तर तक का टेनिस खेला है। आजकल कभी, कभी कल्ब में ही खेलता हूं। लेकिन उनके मुकाबले नगण्य। उन्हें मेरे साथ, मेरे पार्टनर बन कर खेलने में कोई हिचक नहीं थी। बात करने में कोई घमन्ड नहीं। यह उनका बड़प्पन था। रमेश ने कुछ अपने बारे में भी बताया।

रॉय एमरसन टेनिस के बेहतरीन खिलाड़ी रहें हैं। वे ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी थे पर अब कैलीफोर्निया में बस गये हैं। वे हर साल दो महीने के लिये स्विटज़रलैण्ड में टेनिस का कैम्प करते हैं। रमेश गर्मियों में वही उस कैंप में रहते हैं।  


रमेश को दो बेटियां हैं। उनके बारे में भी बात की। वे  अमेरिका में पढ़ रही हैं। प्रतियोगिता स्तर का टेनिस तो नहीं, पर अपने विश्वविद्यालय स्तर का खेल खेलती हैं। वे अपने पिता रामानाथन कृष्णन के साथ चेन्नई टेनिस ऐकादमी तो नहीं पर टेनिस कल्ब चला रहें हैं।

उनके साथ समय बिताना सुखद अनुभव रहा। अगली बार चेन्नई में मिलने का वायदा कर, मैंने उनसे विदा ली। देखिये कब चेन्नई में उनके पिता रामानाथन कृष्णन से मिल पाता हूं। 

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अन्य संबन्धित चिट्ठियां

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is chitthi mein ramesh krishnan se mulakaat aur unkee jeevanee ‘a touch of tennis – a story of tennis family’ kee charchaa hai.  yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is about my meeting with Ramesh Krishnan and is about autobiography  ‘A Touch of Tennis – A Story of Tennis Family’.  It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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अश्वेत लड़कों ने हमारे साथ बलात्कार किया है
इस चिट्ठी में उस मुकदमें की चर्चा है जिसने हार्पर ली को ‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’ लिखने के लिये प्रेरित किया। इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें।
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१९४१ में सैमुएल न्यायाधीश हो गये। वे जहां भी घूमने जाते थे,  वहां न्यायालय की कार्यवाही देखना पसन्द करते थे। एक बार वे फ्लोरिडा गये। वहां न्यायालय की जूरी में ११ श्वेत लोगों के साथ एक अश्वेत भी था। दोपहर के भोजनावकाश के दौरान उसने वकीलों से पूछा,

‘क्या यहां अश्वेत लोग भी जूरी पर बैठते हैं?’

उस वकील ने जवाब दिया,

‘Yes, it is something new. This is the first time in our state we have had a nigger on a jury and it’s all on account of a son-of-a-bitch named  Samual Leibowitz from New York. He came down to Alabama a few years ago to try a case and somehow he got to the Supreme Court in Washingtone, and damned if we haven’t had to put niggers on our juries over since.
हां यह कुछ नया है यह पहली बार है जब कोई अश्वेत व्यक्ति जूरी में है। यह सब उस उल्लू के पट्ठे सैमुएल लाईबोविट्ज़ के कारण हुआ जो कि कुछ साल पहले ऎलाबामा में एक मुकदमा करने आया था फिर उसने अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय से कानून बदलवा दिया अब हमें अश्वेत लोगों को जूरी पर रखना पड़ता है।

यह मुकदमा था स्कॉटस्बॉरो बायॉज़ पर चला मुकदमा।  इस  मुकदमें के समय ली छः साल की थीं और ऎलाबामा में रहती थीं। इस मुकदमें ने उन पर असर डाला। इसी के अधार पर, उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास ‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’ की रचना की।  इस मुकदमें के तथ्य कुछ इस प्रकार थे।


१९३० का दशक अमेरिकी इतिहास में मंदी का दशक था। लोग इधर-उधर नौकरी की तालाश में घूमते थे। उनके पास टिकट खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे। इसलिए मालगाड़ी में बिना टिकट लिए जाया करते थे। २५ मार्च १९३१ में, एक मालगाडी में कुछ श्वेत व कुछ अश्वेत लड़के सफर कर रहे थे। उनमें आपस में, लड़ाई हो गयी। यह स्पष्ट नहीं है कि यह क्यों शुरू हुई पर इसमें श्वेत लड़कों की पिटाई हो गयी। श्वेत लड़कों ने मालगाड़ी से उतर कर स्टेशन मास्टर से इस बात की शिकायत की और अश्वेत लड़कों पर मुकदमा चलाने की बात कही।

 रूबी बेटस् और विक्टोरिया प्राइसका चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से

अगले स्टेशन पर मालगाड़ी रोक ली गयी। पूरी मालगाड़ी में ९ अश्वेत लड़के मिले जिनकी उम्र १२ साल से १९ साल थी। वे सब पकड़ लिए गये। उनके साथ दो श्वेत लड़कियां विक्टोरिया प्राइस (Victoria Price) ,रूबी बेटस् (Ruby Bates) भी मिली। उन श्वेत लड़कियों से पूछा गया कि क्या अश्वेत लड़के उन्हें तंग कर रहे थे। उनका जवाब था,

‘अश्वेत लड़कों ने हमारे साथ बलात्कार किया है।’

इस पर अश्वेत लड़कों को जेल भेज दिया गया। इन पर  बलात्कार का मुकदमा स्कॉटस्बॉरो में चला।  इसलिए यह लड़के स्कॉटस्बॉरो बॉयज़ नाम से, और यह मुकदमा  स्कॉटस्बॉरो बायॉज़ ट्रायल के नाम से जाना जाता है।

यह मुकदमा अमेरिकी कानूनी इतिहास में,   एक शर्मनाक मुकदमे के रूप में जाना जाता है। यह मुकदमा २०वीं शताब्दी के न केवल संविधान, पर नागरिक अधिकारों के क्षेत्र में सबसे जाना माना मुकदमा है। यह दो बार अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय में गया और दोनों बार फांसी की सज़ा रद्द कर वापस पुन: सुनवाई के लिए वापस भेजा गया।

इस मुकदमें में क्या हुआ, यह अगली बार।

बुलबुल मारने पर दोष लगता है

भूमिका।। वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी – कोर्टरूम।। सफल वकील, मुकदमा शुरू होने के पहले, सारे पहलू सोच लेते हैं।। कैमल सिगरेट के पैकेट पर, आदमी कहां है।। अश्वेत लड़कों ने हमारे साथ बलात्कार किया है।।

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This post talks about the case that inspired Harler Lee to write ‘To Kill A Mocking Bird’. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
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कैमल सिगरेट के पैकेट पर, आदमी कहां है

क्या चश्मदीद गवाह,  न चाहते हुए भी,  गलत  बयान दे देते हैं? ‘बुलबुल मारने पर दोष लगता है’की श्रंखला की इस चिट्ठी में, इसी की चर्चा है।

इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें।
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यह सच है कि चश्मदीद गवाह, न चाहते हुए भी,  गलत बयान दे देते हैं या गलत व्यक्ति की शिनाख़्त कर देते हैं। लेकिन यह कहना गलत होगा कि वे उस समय झूठ बोल रहे होते हैं। क्योंकि, उनके मुताबिक वही सच है। लेकिन ऐसा क्यों होता है?

सैमुएल, अक्सर चश्मदीद गवाह के द्वारा आरोपी की शिनाख़्त किये जाने पर सवाल उठाया करते थे। उन्हें लगता था कि चश्मदीद गवाह गलत शिनाख़्त कर रहा है। एक बार, वे वकीलों के बीच इस विषय पर बोल रहे थे। वकीलों ने उनके इस कथन पर प्रश्न लगाया। सैमुएल ने उस वक्त कुछ नहीं कहा पर कुछ समय बाद उन्होंने लोगों से पूछा,

‘आप लोगों में से, कौन से लोग कैमल सिगरेट पीते हैं।’

कैमल सिगरेट, अमेरिका की लोकप्रिय सिगरेट में से एक है। यह उसी तरह की सिग्रेट है जैसे कि पहले पनामा हुआ करती थी या आजकल विलस् फिल्टर होती है। बहुत से लोगों ने हाथ उठाया। सैमुएल ने उनमें उन पांच लोगों को चुना जो पिछले २० सालों से दो पैकेट कैमल सिगरेट पी रहे थे। सैमुएल ने फिर पूछा,

‘आपने ७०० पैकेट प्रतिवर्ष और आज तक २४,००० पैकेट अर्थात कैमल पैकेट को आपने करीब ५ लाख बार देखा है।’

उन्होंने हामी भरी। सैमुएल ने, उन पांचों को एक कागज़ दिया फिर कहा,

‘आप लोग अलग-अलग लिख कर दें कि कैमल सिगरेट के पैकेट के ऊपर आदमी का चित्र कहा है ऊंट के आगे है, पीछे है, या ऊपर है।’


कागज वापस मिलने के बाद, उसने उसे खोल कर, जोर से पढ़ा। दो ने लिख कर दिया कि आदमी का चित्र ऊंठ के आगे है दो ने कहा कि उसके ऊपर है एक ने कहा कि कोई भी आदमी का चित्र नहीं है।

सैमुएल ने लोगों से पैकेट निकाल कर देखने को कहा। पैकेट  के ऊपर कोई भी आदमी का चित्र नहीं था। यानि की चार लोगों के जवाब गलत थे। सैमुएल ने बताया,

‘यह इसलिये हुआ कि मैंने आपको यह सुझाव दिया था कि पैकेट पर आदमी का चित्र है। चश्मदीद गवाहों को इस तरह का सुझाव दिया जाता है। इसीलिये आपसे यह गलती हुई और चश्मदीद गवाह भी अक्सर गलत शिनाख़्त कर देते हैं।’


यही कारण है कि न्यायालय में पृच्छा (examination in chief) के समय, सूचक प्रश्न (leading question) पूछना मना है हालांकि प्रति पृच्छा (cross examination) के समय इस तरह के सवाल पूछे जा सकते हैं।

इस श्रृंखला की अगली कड़ी में बात करेंगे स्कॉटस्बॉरो बायॉज़ (Scottsboro boys trial) मुकदमे की। यह मुकदमा, अमेरिका में, २०वीं शताब्दी के संविधान एवं नागरिक अधिकारों के क्षेत्र में, सबसे जाना माना मुकदमा है। इसमें सैमुएल वकील थे। यह वही मुकदमा है जिसने हारपर ली को ‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’ लिखने के लिये प्रेरित किया। क्या हुआ था इसमें? क्यों यह मुकदमा इतना प्रसिद्ध है? यह सब अगली बार।

बुलबुल मारने पर दोष लगता है

भूमिका।। वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी – कोर्टरूम।। सफल वकील, मुकदमा शुरू होने के पहले, सारे पहलू सोच लेते हैं।। कैमल सिगरेट के पैकेट पर, आदमी कहां है।।

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This post explains that why eyewitnesses, unknowingly, make wrong statements. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
सांकेतिक शब्द
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सफल वकील, मुकदमा शुरू होने के पहले, सारे पहलू सोच लेते हैं
सैमुएल लाइबोविट्ज़, २०वीं शताब्दी के दूसरे चतुर्थांश में अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध वकील थे। ‘बुलबुल मारने पर दोष लगता है’ श्रृंखला की इस चिट्ठी में, चर्चा है कि उन्हें पहला मुकदमा कैसे मिला और उसमें क्या हुआ।
इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें।
यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। सुनने के लिये, दाहिने तरफ का विज़िट, ‘मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने’ देखें।


सैमुएल की पृष्ठभूमि ऐसी नहीं थी कि उन्हें मुकदमे मिल सकें। एक बार कॉर्नेल  विश्वविद्यालय में, जब कानून के डीन ने, उनसे,  इस बारे में बात की तब  सैमुएल का कहना था

‘मैं पहले प्रसिद्व वकील बनूंगा। तब, बड़ी-बड़ी कम्पनियां मेरे पास मुकदमा कराने आयेंगी और मैं पैसे कमा सकूंगा।’ 

 सैमुएल लाइबोविट्ज़ का यह चित्र लाइफ पत्रिका के सौजन्य से।

  लेकिन जब सैमुएल वकील बन गये तब सबसे मुश्किल, उन्हें अपना पहला मुकदमा मिलने में हुई।

न्यायालय में  जब आरोपी वकील नहीं कर पाते  है तब  न्यायालय उनके लिए वकील नियुक्त करता है।  सैमुएल को भी अपना पहला मुकदमा इसी तरह मिला। 

इस मुकदमें के आरोपी के ऊपर आरोप था कि उसने  शराबखाने  का ताला खोलकर, पैसे और शराब की चोरी की। उसी दिन सुबह, उसे शराब के नशे में धुत्त, पकड़ लिया गया। उसकी जेब में वह चाभी भी मिली जिससे उसने ताले को खोला था। पुलिस के सामने उसने अपना गुनाह कबूल करा लिया। अमेरिका में पुलिस के सामने दिया बयान न्यायालय में देखा जा सकता है हालांकि भारत में नहीं।


सैमुएल ने अपने मित्रों, सहयोगियों  से इस संबन्ध में सलाह ली। उनका कहना था कि,

  • आरोपी को अपना दोष मान लेना चाहिए। क्योंकि सारे सबूत आरोपी के खिलाफ हैं। 
  • दोष मान लेने पर सजा कम हो जायगी। 

लेकिन सैमुएल को लगा कि यदि उसने अपने मुवक्किल से आरोप स्वीकार करवा दिया तब वह न तो प्रसिद्घ हो सकेगा, न ही पैसा कमा सकेगा। वह इस मुकदमे के उस पक्ष को देखने लगा,  जिसकी तरफ कोई सोच भी नहीं सकता था। 

कई  रात, बिस्तर में लेटे-लेटे, सोचते-सोचते, उसे एक युक्ति समझ में आयी।  यदि वह चल गयी तो जीत उसकी, नहीं तो आरोपी को सजा तो होनी ही थी। मुकदमा शुरू होने पर,  अभियोजन के अधिवक्ता एवं न्यायाधीश को आश्चर्य हुआ, जब आरोपी ने आरोप स्वीकार नहीं किया।

अभियोजन का पक्ष समाप्त हो जाने के बाद, आरोपी ने गवाही दी कि उसने, पुलिस अत्याचार के कारण, आरोप स्वीकार कर लिया था। 

अभियोजन का कथन था कि आरोपी ने चाभी से ताला खोलकर चोरी की है।  सैमुएल ने न्यायालय के समक्ष बहस की,


‘क्या सरकारी वकील ने यह स्वयं देखा है कि आरोपी के जेब से मिली चाभी से शराबघर का ताला खुल सकता था या नहीं। यदि नहीं तो, न्यायालय एवं जूरी चल कर देखें कि क्या इस चाभी से उस ताले को खोला जा सकता है। यदि ताला नहीं खुलता है तो उसके मुवक्किल पर चोरी का आरोप नहीं बनता है।’

यह सच था कि सरकारी वकील स्वयं इस बात की जांच नहीं की थी कि उस चाभी से ताला खोला जा सकता था अथवा नहीं। अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता को लगा कि यदि, 
  • इस समय न्यायधीश, जूरी के सदस्य जा कर देखते हैं तो न्यायालय और जूरी का समय बरबाद होगा।  इस तरह के अनगिनत मुकदमे लम्बित थे, उनका भी फैसला होना था।
  • ताला न खुला, तो सरकारी वकील की भद्द उड़ जायेगी। 

यह सोचकर सरकारी वकील ने कहा कि उसे बहस नहीं करनी है। सैमुएल ने भी अपनी बहस समाप्त कर दी। यह बताने की जरूरत नहीं है कि जूरी को  आरोपी को छोड़ने में कुछ भी समय  नहीं लगा। हालांकि न्यायालय से बाहर निकलने के बाद जब सैमुएल ने उस चाभी से ताला खोलने का प्रयत्न किया तो उसने न्यायालय के सारे ताले खुल गये। 

इस मुकदमे के बारे में अगले दिन अखबार में कुछ नहीं निकाला पर जेल में अन्य कैदियों, अधिवक्ताओं के बीच, यह बातचीत चलने लगी कि यह वकील कुछ ख़ास है। यहीं से, सैमुएल का सितारा, चमकना शुरू हो गया।

सैमुएल ने अपना पहला मुकदमा, रात में ही, बिस्तर पर सोचते सोचते जीत लिया था। उसने यह आदत,  जीवन भर डाली। वह मुकदमा के शुरू होने से पहले ही सारे पक्षों के बारे में सोच लेता था। यही एक अच्छे वकील की निशानी है। वकील का वास्तविक जीवन, अर्ल स्टैनली गार्डनर के कल्पित वकील, पैरी मेसन की तरह नहीं, जो मुकदमें के दौरान ही सोचा करता था। हर सफल वकील मुकदमा शुरू होने के पहले ही, उसके सारे पहलुओं के बारे में सोच लेते हैं।

इस मुकदमें से, सैमुएल ने एक दूसरी बात यह सीखी, कि जूरी, पुलिस-अत्याचार के बारे में आसानी से विश्वास कर लेते हैं। इस बात ने भी, उसे अन्य मुकदमों सफलता दिलवायी। 

क्या चश्मदीद गवाह,  न चाहते हुऐ भी,  आरोपी की गलत शिनाख्त कर देते हैं। इस बारे में, सैमुएल के क्या विचार हैं, यह अगली बार। 

बुलबुल मारने पर दोष लगता है

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This post describes how Samuel Leibowitz, the most famous American  lawyer of the 20th century, got his first case and what happened to it. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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Samuel Leibowitz, biography, कानून, Law, Good advocate ponders over all aspects of a case beforehand,

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वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी – कोर्टरूम
सैमुएल लाइबोविट्ज़, २०वीं शताब्दी के दूसरे चतुर्थांश में अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध वकील थे। ‘बुलबुल मारने पर दोष लगता है’ श्रृंखला की इस चिट्ठी में, उनके जीवन पर लिखी पुस्तक ‘कोर्टरूम’ के बारे में चर्चा है।

‘डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े’ श्रृंखला की कड़ी ‘यदि विकासवाद जीतता है तो ईसाइयत बाहर हो जायेगी‘ में, मैंने वकील क्लेरेन्स डैरो (Clarence Darrow) की चर्चा की थी। उनका जन्म १८ अप्रैल, १८५७ को हुआ था। उन्न्नीसवी शताब्दी के अंत होते होते वे अमेरिका के सबसे जाने माने वकील के रूप में स्थापित हो गये थे। उनका सितारा उदय हो चुका था। उसी समय एक अन्य वकील, सैमुएल लेबो (Samuel Lebeau) का जन्म १४ अगस्त १८९३ में रोमानिया में हुआ।

१८९७ में सैमुएल के पिता अमेरिका आ गये। वहां लोगों की सलाह पर सैमुएल के पिता ने अपने नाम का अमेरिकीकरण कर लिया—लेबो की जगह वे लाइबोविट्ज़  (Leibowitz) हो गये।


सैमुएल को विद्यार्थी जीवन में,  वक्तृत्व (elocution) और वाद विवाद प्रतियोगिताएं (debate) बेहद पसन्द थे। इसमें, वे हमेशा आगे रहते थे। पिता के सुझाव पर  सैमुएल ने   वकील बनने की ठानी और कानून की शिक्षा कॉर्नेल विश्वविद्यालय से पूरी की।


बीसवीं शताब्दी के पहले चतुर्थांश के अन्त होते होते सैमुएल ने अपना नाम  अमेरिका के जाने माने फौजदारी  के वकील के रूप में स्थापित कर लिया।  दूसरे चतुर्थांश  में वे अमेरिका में फौजदारी के सबसे प्रसिद्व वकील हो गये। १९४१ में  उन्होंने न्यायाधीश बनना स्वीकार कर लिया। न्यायधीश के रूप में वे जल्दी गुस्सा हो जाते थे। इसलिये वे बाद में कुछ विवादास्पद हो गये थे। उनकी मृत्यु ११ फरवरी, १९७८ में हो गयी।

 सैमुएल लाइबोविट्ज़ एवं उनकी पत्नी अपने पौत्र के साथ खेलते हुऐ – चित्र लाइफ पत्रिका के इस सौजन्य से। 

१९५० में, क्वेंटिन रिनॉल्डस् (Quentin Reynolds) ने सैमुएल की जीवनी,  कोर्टरूम (Courtroom) नामक पुस्तक में लिखी है। यह वकीलों के द्वारा लिखी गयी आत्मकथा या उनकी बारे में लिखी जीवनियों में सबसे अच्छी लिखी पुस्तक है। यह पुस्तक न केवल हर वकील को, पर प्रत्येक व्यक्ति के  पढ़ने योग्य है। बहुत से लोग, वकीलों के बारे में अच्छे विचार नहीं रखते हैं। यह पुस्तक उनके नजरिये को बदलेगी।

अगली बार बात करेंगे सैमुएल को पहला मुकदमा कैसे मिला और उसमें क्या हुआ।

इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इन फाइलों को आप सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में, फायरफॉक्स ३.५ या उसके आगे के संस्करण में सुन सकते हैं। इन फॉरमैट की फाइलों को आप,
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बुलबुल मारने पर दोष लगता है

भूमिका।। वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी – कोर्टरूम।।

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Samuel Leibowitz was most famous American  lawyer of the second quarter of the 20th century. Quentin Reynolds has written his biography titled as ‘Coutroom’. It is the finest lawyer’s biography ever written. This post of my new series ‘bulbul maarne per dosh lagtaa hai’ is about this book. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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मुझे फिर कभी ग़ुलामों के देश में न जाना पड़े
इस चिट्ठी में चर्चा का विषय है डार्विन का व्यक्तित्व और उसे १८ जून १८५८ को मिला पत्र।
इस चिट्ठी और इसकी अगली चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
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सुन सकते हैं। ऑडियो फाइल पर चटका लगायें। यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम लिखा है वहां चटका लगायें। इन्हें डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर ले।

डार्विन को १८ जून १८५८ को मिला पत्र, अल्फ्रेड रसल वॉलेस ने लिखा था। वॉलेस ने अपने पत्र में, प्राणियों की उत्पत्ति के बारे में उसी सिद्धांत को लिखा था जिस पर डार्विन स्वयं पहुँचे थे। लेकिन, वॉलेस के पास, इसके लिए तथ्य नहीं थे। इस सिद्धांत को विश्वसनीयता का जामा पहनाने के लिए, तथ्य डार्विन के ही पास थे। १ जुलाई १८५८ को, डार्विन और वॉलेस के संयुक्त नाम से, एक पेपर लंदन की लिनियन सोसाइटी में पढ़ा गया। इस पेपर में इस सिद्धांत की व्याख्या की गयी थी। मोटे तौर पर यह बताता है,

‘Evolution is result of chance mutation and natural selection, where survival of the fittest played crucial role.’
प्राणी जगत का विकास संयोगिक उत्तपरिर्वन, प्राकृतिक वरण, और योग्यतम की उत्तर जीविका पर आधारित है।


अल्फ्रेड रसल वॉलेस

डार्विन बेहतरीन व्यक्तित्व के भी मालिक थे डार्विन के लिए यह आसान था कि वह वॉलेस का पत्र छिपा जाते और तथ्यों के साथ सिद्धांत को अपने नाम से प्रकाशित कर देते। लेकिन उन्होंने ऐसा नही किया।


डार्विन के विचार गुलामी के भी विरूद्ध थे जबकि बीगल के कप्तान फिट्ज़रॉय की राय में यह गलत नहीं था। वे इसकी सफाई देते थे। फिट्ज़रॉय के इन विचारों के लिये, डार्विन ने उसकी निन्दा भी की। इसके कारण बीगल से उसकी नौकरी जाते, जाते बची। ब्राज़ील में उन्हें वहां के जंगलों की सुंदरता तो भायी पर गुलामी ने दुखी किया। वहां से निकलने के बाद डार्विन ने कहा,

‘I thank God I shall never again visit a slave country ‘

मैं भगवान को धन्यवाद दूँगा कि मुझे फिर कभी ग़ुलामों के देश में न जाना पड़े।


डार्विन का सिद्धांत इतना क्रांतिकारी था कि ऑन द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़ पुस्तक के पहले प्रकाशन की सारी पुस्तकें, प्रकाशन के चौबीस घण्टे के अन्दर ही बिक गयीं। यह एक ऐसा रिकार्ड है जिसे अभी तक किसी अन्य पुस्तक ने नही बनाया और न ही इसे शायद कभी बराबर किया जा सकेगा। हांलाकि डार्विन ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि इस पुस्तक का प्रकाशन नहीं पर बीगल पर दुनिया की यात्रा करना ही उसके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। सच तो यह है कि इसी घटना के कारण तो ही वह विकासवाद के सिद्धांत को समझ पाये और उसके लिये सबूत इकट्ठा कर पाये।


पहले प्रकाशन के समय इस पुस्तक का नाम ‘ऑन द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़’ (On the Origin of Species) था। उस समय इसका पूरा नाम था – ‘On the Origin of Species by Means of Natural Selection, or the Preservation of Favoured Races in the Struggle for Life’. इस पुस्तक का छटवां प्रकाशन १८७२ में हुआ। उस समय इसका नाम छोटा कर ‘द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़’ कर दिया गया।

ऑन द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़ पुस्तक के पहले प्रकाशन की पुस्तक का पहला पन्ना

पुस्तक का पहला प्रकाशन १४ नवंबर १८५८ को हुआ था। इसकी १२५० कॉपियां प्रिन्ट की गयी थीं। इसकी अधिकतर कॉपियां नष्ट हो गयी हैं। लेकिन बची हुई सारी कॉपियां संसार की धरोहर हैं और वे बहुत मूल्यवान हैं। पिछले साल, इस तरह की एक पुस्तक की नीलामी १,९४,५०० डॉलर में हुई थी।

आप सोचने लगे न कि कहीं आपके पास की कॉपी पहली प्रकाशित पुस्तक तो नहीं है। यह पता करना आसान है। अपने पुस्तक के पृष्ट २० पर ११वीं पंक्ति देखिये। क्या इस पंक्ति में शब्द ’species’ गलत तरीके से ’speceies’ वर्तनी के साथ लिखा है। यदि इसका जवाब हां है तो फिर आपको बधाई – आप करोड़पति हो गये।

मेरी कॉपी तो ऐसी नहीं है :-( चलिये इस श्रंखला में जब अगली बार मिलेगें तब चर्चा करेंगे उस प्रसिद्ध बहस की जिसे विकासवाद के सिद्धांत ने जन्म दिया। यह बहस दुनिया की सबसे प्रसिद्ध बहस भी मानी जाती है। क्या थी वह बहस, किसके बीच में थी वह – यह सब अगली बार।


विकासवाद को आसानी से समझने के लिये आप अंग्रेजी में यह विडियो भी देख सकते हैं। मैंने इसे साइंस इज़ सेक्सी: वॉट इज़ रिवोलूशन (Science is Sexy: What is Evolution?) नामक लेख से लिया है।

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े

भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलामों के देश में न जाना पड़े।। मैं, ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से नाता जोड़ना चाहूँगा।।

इस चिट्ठी के सारे चित्र विकिपीडिया से हैं।

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is chitthi mein darwin ke vyktitva aur use 18 june 1858 ko mile patra kee charchaa hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post talks about the letter received by Darwin on 18 June 1858 and his personality. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
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बसेरे से दूर

यह, हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा के तीसरे भाग ‘बसेरे से दूर’ की, समीक्षा है। This is book review of the third part of the autobiography of Harivansh Rai Bachcan – ‘Basere se door’.

नीड़ का निर्माण फिर

यह चिट्ठी बच्चन जी की जीवनी के दूसरे भाग ‘नीड़ का निर्माण फिर’ की पुस्तक की समीक्षा है। yeh post bchchcan jee ki jeevanee ke doosre bhag kee smeekshaa hai. This post is book review of Harivansh Rai Bachchan’s autobiography’s second part ‘Neer ka Nirman Phir’.