ली, पुस्तक पर बनी फिल्म प्रॉड्यूसर के साथ – चित्र सौजन्य विकिपीडिया
एटिक्स की भूमिका में ग्रेगरी पेक और स्कॉट की भूमिका में मैरी बैधम
।To Kill a Mockingbird, Atticus Finch, Boo Radley, Harper Lee, Truman Capote, Monroe ville
ली, पुस्तक पर बनी फिल्म प्रॉड्यूसर के साथ – चित्र सौजन्य विकिपीडिया
१९४१ में सैमुएल न्यायाधीश हो गये। वे जहां भी घूमने जाते थे, वहां न्यायालय की कार्यवाही देखना पसन्द करते थे। एक बार वे फ्लोरिडा गये। वहां न्यायालय की जूरी में ११ श्वेत लोगों के साथ एक अश्वेत भी था। दोपहर के भोजनावकाश के दौरान उसने वकीलों से पूछा,
‘क्या यहां अश्वेत लोग भी जूरी पर बैठते हैं?’
उस वकील ने जवाब दिया,
‘Yes, it is something new. This is the first time in our state we have had a nigger on a jury and it’s all on account of a son-of-a-bitch named Samual Leibowitz from New York. He came down to Alabama a few years ago to try a case and somehow he got to the Supreme Court in Washingtone, and damned if we haven’t had to put niggers on our juries over since.
हां यह कुछ नया है यह पहली बार है जब कोई अश्वेत व्यक्ति जूरी में है। यह सब उस उल्लू के पट्ठे सैमुएल लाईबोविट्ज़ के कारण हुआ जो कि कुछ साल पहले ऎलाबामा में एक मुकदमा करने आया था फिर उसने अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय से कानून बदलवा दिया अब हमें अश्वेत लोगों को जूरी पर रखना पड़ता है।
यह मुकदमा था स्कॉटस्बॉरो बायॉज़ पर चला मुकदमा। इस मुकदमें के समय ली छः साल की थीं और ऎलाबामा में रहती थीं। इस मुकदमें ने उन पर असर डाला। इसी के अधार पर, उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास ‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’ की रचना की। इस मुकदमें के तथ्य कुछ इस प्रकार थे।
१९३० का दशक अमेरिकी इतिहास में मंदी का दशक था। लोग इधर-उधर नौकरी की तालाश में घूमते थे। उनके पास टिकट खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे। इसलिए मालगाड़ी में बिना टिकट लिए जाया करते थे। २५ मार्च १९३१ में, एक मालगाडी में कुछ श्वेत व कुछ अश्वेत लड़के सफर कर रहे थे। उनमें आपस में, लड़ाई हो गयी। यह स्पष्ट नहीं है कि यह क्यों शुरू हुई पर इसमें श्वेत लड़कों की पिटाई हो गयी। श्वेत लड़कों ने मालगाड़ी से उतर कर स्टेशन मास्टर से इस बात की शिकायत की और अश्वेत लड़कों पर मुकदमा चलाने की बात कही।
अगले स्टेशन पर मालगाड़ी रोक ली गयी। पूरी मालगाड़ी में ९ अश्वेत लड़के मिले जिनकी उम्र १२ साल से १९ साल थी। वे सब पकड़ लिए गये। उनके साथ दो श्वेत लड़कियां विक्टोरिया प्राइस (Victoria Price) ,रूबी बेटस् (Ruby Bates) भी मिली। उन श्वेत लड़कियों से पूछा गया कि क्या अश्वेत लड़के उन्हें तंग कर रहे थे। उनका जवाब था,
‘अश्वेत लड़कों ने हमारे साथ बलात्कार किया है।’
इस पर अश्वेत लड़कों को जेल भेज दिया गया। इन पर बलात्कार का मुकदमा स्कॉटस्बॉरो में चला। इसलिए यह लड़के स्कॉटस्बॉरो बॉयज़ नाम से, और यह मुकदमा स्कॉटस्बॉरो बायॉज़ ट्रायल के नाम से जाना जाता है।
यह मुकदमा अमेरिकी कानूनी इतिहास में, एक शर्मनाक मुकदमे के रूप में जाना जाता है। यह मुकदमा २०वीं शताब्दी के न केवल संविधान, पर नागरिक अधिकारों के क्षेत्र में सबसे जाना माना मुकदमा है। यह दो बार अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय में गया और दोनों बार फांसी की सज़ा रद्द कर वापस पुन: सुनवाई के लिए वापस भेजा गया।
इस मुकदमें में क्या हुआ, यह अगली बार।
भूमिका।। वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी – कोर्टरूम।। सफल वकील, मुकदमा शुरू होने के पहले, सारे पहलू सोच लेते हैं।। कैमल सिगरेट के पैकेट पर, आदमी कहां है।। अश्वेत लड़कों ने हमारे साथ बलात्कार किया है।।
book, book, books, Books, books, book review, book review, book review, Hindi, kitaab, pustak, Review, Reviews, science fiction, किताबखाना, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, किताबी दुनिया, किताबें, किताबें, पुस्तक, पुस्तक चर्चा, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, समीक्षा,
। Hindi,
। Hindi Podcast, हिन्दी पॉडकास्ट,
क्या चश्मदीद गवाह, न चाहते हुए भी, गलत बयान दे देते हैं? ‘बुलबुल मारने पर दोष लगता है’की श्रंखला की इस चिट्ठी में, इसी की चर्चा है।
यह सच है कि चश्मदीद गवाह, न चाहते हुए भी, गलत बयान दे देते हैं या गलत व्यक्ति की शिनाख़्त कर देते हैं। लेकिन यह कहना गलत होगा कि वे उस समय झूठ बोल रहे होते हैं। क्योंकि, उनके मुताबिक वही सच है। लेकिन ऐसा क्यों होता है?
सैमुएल, अक्सर चश्मदीद गवाह के द्वारा आरोपी की शिनाख़्त किये जाने पर सवाल उठाया करते थे। उन्हें लगता था कि चश्मदीद गवाह गलत शिनाख़्त कर रहा है। एक बार, वे वकीलों के बीच इस विषय पर बोल रहे थे। वकीलों ने उनके इस कथन पर प्रश्न लगाया। सैमुएल ने उस वक्त कुछ नहीं कहा पर कुछ समय बाद उन्होंने लोगों से पूछा,
‘आप लोगों में से, कौन से लोग कैमल सिगरेट पीते हैं।’
कैमल सिगरेट, अमेरिका की लोकप्रिय सिगरेट में से एक है। यह उसी तरह की सिग्रेट है जैसे कि पहले पनामा हुआ करती थी या आजकल विलस् फिल्टर होती है। बहुत से लोगों ने हाथ उठाया। सैमुएल ने उनमें उन पांच लोगों को चुना जो पिछले २० सालों से दो पैकेट कैमल सिगरेट पी रहे थे। सैमुएल ने फिर पूछा,
‘आपने ७०० पैकेट प्रतिवर्ष और आज तक २४,००० पैकेट अर्थात कैमल पैकेट को आपने करीब ५ लाख बार देखा है।’
उन्होंने हामी भरी। सैमुएल ने, उन पांचों को एक कागज़ दिया फिर कहा,
‘आप लोग अलग-अलग लिख कर दें कि कैमल सिगरेट के पैकेट के ऊपर आदमी का चित्र कहा है ऊंट के आगे है, पीछे है, या ऊपर है।’
कागज वापस मिलने के बाद, उसने उसे खोल कर, जोर से पढ़ा। दो ने लिख कर दिया कि आदमी का चित्र ऊंठ के आगे है दो ने कहा कि उसके ऊपर है एक ने कहा कि कोई भी आदमी का चित्र नहीं है।
सैमुएल ने लोगों से पैकेट निकाल कर देखने को कहा। पैकेट के ऊपर कोई भी आदमी का चित्र नहीं था। यानि की चार लोगों के जवाब गलत थे। सैमुएल ने बताया,
‘यह इसलिये हुआ कि मैंने आपको यह सुझाव दिया था कि पैकेट पर आदमी का चित्र है। चश्मदीद गवाहों को इस तरह का सुझाव दिया जाता है। इसीलिये आपसे यह गलती हुई और चश्मदीद गवाह भी अक्सर गलत शिनाख़्त कर देते हैं।’
यही कारण है कि न्यायालय में पृच्छा (examination in chief) के समय, सूचक प्रश्न (leading question) पूछना मना है हालांकि प्रति पृच्छा (cross examination) के समय इस तरह के सवाल पूछे जा सकते हैं।
इस श्रृंखला की अगली कड़ी में बात करेंगे स्कॉटस्बॉरो बायॉज़ (Scottsboro boys trial) मुकदमे की। यह मुकदमा, अमेरिका में, २०वीं शताब्दी के संविधान एवं नागरिक अधिकारों के क्षेत्र में, सबसे जाना माना मुकदमा है। इसमें सैमुएल वकील थे। यह वही मुकदमा है जिसने हारपर ली को ‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’ लिखने के लिये प्रेरित किया। क्या हुआ था इसमें? क्यों यह मुकदमा इतना प्रसिद्ध है? यह सब अगली बार।
भूमिका।। वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी – कोर्टरूम।। सफल वकील, मुकदमा शुरू होने के पहले, सारे पहलू सोच लेते हैं।। कैमल सिगरेट के पैकेट पर, आदमी कहां है।।
book, book, books, Books, books, book review, book review, book review, Hindi, kitaab, pustak, Review, Reviews, science fiction, किताबखाना, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, किताबी दुनिया, किताबें, किताबें, पुस्तक, पुस्तक चर्चा, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, समीक्षा,
। Hindi,
। Hindi Podcast, हिन्दी पॉडकास्ट,
‘डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े’ श्रृंखला की कड़ी ‘यदि विकासवाद जीतता है तो ईसाइयत बाहर हो जायेगी‘ में, मैंने वकील क्लेरेन्स डैरो (Clarence Darrow) की चर्चा की थी। उनका जन्म १८ अप्रैल, १८५७ को हुआ था। उन्न्नीसवी शताब्दी के अंत होते होते वे अमेरिका के सबसे जाने माने वकील के रूप में स्थापित हो गये थे। उनका सितारा उदय हो चुका था। उसी समय एक अन्य वकील, सैमुएल लेबो (Samuel Lebeau) का जन्म १४ अगस्त १८९३ में रोमानिया में हुआ।
१८९७ में सैमुएल के पिता अमेरिका आ गये। वहां लोगों की सलाह पर सैमुएल के पिता ने अपने नाम का अमेरिकीकरण कर लिया—लेबो की जगह वे लाइबोविट्ज़ (Leibowitz) हो गये।
सैमुएल को विद्यार्थी जीवन में, वक्तृत्व (elocution) और वाद विवाद प्रतियोगिताएं (debate) बेहद पसन्द थे। इसमें, वे हमेशा आगे रहते थे। पिता के सुझाव पर सैमुएल ने वकील बनने की ठानी और कानून की शिक्षा कॉर्नेल विश्वविद्यालय से पूरी की।
बीसवीं शताब्दी के पहले चतुर्थांश के अन्त होते होते सैमुएल ने अपना नाम अमेरिका के जाने माने फौजदारी के वकील के रूप में स्थापित कर लिया। दूसरे चतुर्थांश में वे अमेरिका में फौजदारी के सबसे प्रसिद्व वकील हो गये। १९४१ में उन्होंने न्यायाधीश बनना स्वीकार कर लिया। न्यायधीश के रूप में वे जल्दी गुस्सा हो जाते थे। इसलिये वे बाद में कुछ विवादास्पद हो गये थे। उनकी मृत्यु ११ फरवरी, १९७८ में हो गयी।
१९५० में, क्वेंटिन रिनॉल्डस् (Quentin Reynolds) ने सैमुएल की जीवनी, कोर्टरूम (Courtroom) नामक पुस्तक में लिखी है। यह वकीलों के द्वारा लिखी गयी आत्मकथा या उनकी बारे में लिखी जीवनियों में सबसे अच्छी लिखी पुस्तक है। यह पुस्तक न केवल हर वकील को, पर प्रत्येक व्यक्ति के पढ़ने योग्य है। बहुत से लोग, वकीलों के बारे में अच्छे विचार नहीं रखते हैं। यह पुस्तक उनके नजरिये को बदलेगी।
अगली बार बात करेंगे सैमुएल को पहला मुकदमा कैसे मिला और उसमें क्या हुआ।
भूमिका।। वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी – कोर्टरूम।।
सांकेतिक शब्द
book, book, books, Books, books, book review, book review, book review, Hindi, kitaab, pustak, Review, Reviews, science fiction, किताबखाना, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, किताबी दुनिया, किताबें, किताबें, पुस्तक, पुस्तक चर्चा, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, समीक्षा,
। Hindi,
। Hindi Podcast, हिन्दी पॉडकास्ट,
न्यायालय से पटखनी खाने के बाद भी कट्टरवादियों ने हार नही मानी। वे किसी तरह से ऎसे कानून बनाने पर जोर दे रहे हैं जिससे कि लगे कि डार्विन का विकासवाद का सिद्वान्त गलत है। अमेरिका के ऎलाबामा (Alabama), फ्लोरिडा (Florida), मिशिगन (Michigan), मिसूरी (Missouri), और साउथ कैरोलाइना ( South Carolina) राज्यों में इस तरह के कानून लाये गये पर वे पास नहीं हो पाये और २००८ में मृत हो गये पर जून २००८ में, लूज़िआना राज्य में ‘साइन्स एजूकेशन ऐक्ट’ (Science Education Act) पारित किया गया है। यह पुन: विद्यार्थियों में सृजनवाद पढ़ाने के रास्ते खोल सकता है। इस अधिनियम की सारे वैज्ञानिकों ने निन्दा की है। अफसोस की बात यह है कि इसे भारतीय मूल के बॉबी ज़िन्दल ने हरी झंडी दी है।
डार्विन के जीवन पर इस साल एक नयी फिल्म ‘क्रिएशन’ (Creation) नाम से बनी है। इसमें डार्विन और उसकी पत्नी ऐमा की भूमिका, पॉल बेटॅनी और जेनिफर कॉनेली ने निभायी है जो कि वास्तविक जीवन में भी पति और पत्नी हैं। यह फिल्म अमेरीका में नहीं दिखायी जा रही है। वहां पर कोई भी फिल्म वितरक इसे वितरण के लिये नहीं लेना चाहता है। उन्हें डर है कि सृजनवादी इसके खिलाफ धरना देगें, प्रदर्शन करेंगे। इस फिल्म में एक जगह एक थॉमस हेनरी हक्सले डार्विन से कहता है
‘All mighty can no longer claim to have authored every species under a week.
You have killed God, Sir’
लोग, डार्विन के सिद्धांत को इसी तरह से समझते हैं। इसलिये, यदि आप कट्टरवादी हैं तो आपको उसका सिद्धांत, यह फिल्म विवादास्पद लगेगी। इस चिट्ठी का शीर्षक मैंने इसी डायलॉग से लिया है। इस फिल्म का ट्रेलर देखिये – आपको पसन्द आयेगा। मैंने जिस डायलॉग की चर्चा की है वह भी इसमें है।
चर्च आफ इंग्लैंन्ड ने, डार्विन के प्रति किये गये अन्याय पर माफ़ी मांग ली। उनका कहना है कि डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत उनके मज़हब के विरूद्ध नहीं है। वे प्रयत्नशील है कि किसी तरह यह लड़ाई समाप्त हो पर कट्टरवादी कहीं भी हो, किसी भी धर्म के हों, जब वे हाथ से बाहर निकल जाते है तो किसी की भी नहीं सुनते हैं। क्या वे तर्क को, सबूतों को, विज्ञान को समझेंगे या फिर क्ट्टरवादिता, विज्ञान पर विजय प्राप्त कर लेगी? क्या क्रिएशन फिल्म अमेरिका में प्रदर्शित हो पाएगी? लगता नहीं कि ऐसा हो पायेगा
‘उन्मुक्त जी यह आप कैसे कह सकते हैं?’
मैं तो यह ब्रिटिश काउंसिल (British Council) की प्रार्थना पर इप्सॉस मोरी (Ipsos MORI) के द्वारा डार्विन के ऊपर किये गये सर्वे के कारण कहता हूं। इसका डाटा आप यहां से डाउनलोड कर सकते हैं। इसका कुछ अंश मैं यहां प्रदर्शित कर रहा हूं।
| १ | २ | ३ | ४ |
| देश | विकासवाद वैज्ञानिक तथ्य हैं हां/ नहीं | विकासवाद और ईश्वर - दोनो सम्भव | विकासवाद अन्य सिद्धान्तों के साथ |
| अर्जेनटीना | ४४/ ७ | ६२ | २३/ ६५ |
| चीन | ५५/ ७ | ३९ | १९/ ४२ |
| मिस्र | ८/ १९ | ४५ | १८/ १ |
| इंगलैंड | ५१/ ७ | ५४ | २१/ ५४ |
| भारतवर्ष | ३८/ २ | ८५ | ३७/ ४० |
| मेक्सिको | ५२/ ९ | ६५ | २८/ ५६ |
| रूस | ३९/ ८ | ५४ | १०/ ५३ |
| द. अफ्रीका | ८/ ४ | ५४ | ११/ २९ |
| स्पेन | ३९/ ५ | ४६ | ३४/ ३१ |
| अमेरिका | ३३/ २४ | ५३ | २१/ ५१ |
यह चार्ट प्रतिश्त में है। इससे पता चलता है कि यद्यपि ‘विकासवाद के लिये वैज्ञानिक तथ्य हैं’ (कॉलम १) का प्रतिशत ‘विकासवाद के लिये वैज्ञानिक तथ्य नहीं हैं’ से केवल मिस्त्र (Egypt) को छोड़ कर बाकी देशों में ज्यादा है फिर भी ‘ईश्वर एवं विकासवाद पर एक साथ विश्वास किया जा सकता है’ (कॉलम २) से कम है और ‘विकासवाद व अन्य सिद्धान्त पढ़ाये जाने चाहिये’ (कॉलम ३) का प्रतिशत ‘केवल विकासवाद पढ़ाया जाना चाहिये’ के प्रतिशत से, स्पेन को छोड़, सब देशों में अधिक है।
कहावत है कि झूट, होता है, फिर सफेद झूट , फिर सांख्यिकी – आंकड़े अक्सर गलत बताते हैं। ईश्वर करे कि यह सही हो
ऐसे खबर है कि भारतीय और चीनी विद्यार्थियों को सृजनवाद भा रहा है। विश्वास नहीं, तो अन्तरजाल पर घूम रहा कार्टून देखिये।
आज दिवाली है – विजय का त्योहार: ज्ञान की अज्ञानता पर, धर्म की अधर्म पर, रोशनी की अंधकार पर – इसी पर्व पावन पर यह श्रंखला इस आशा के साथ समाप्त होती है कि विज्ञान की धार्मिक कट्टरता पर विजय होगी। आपको दीपवली शुभ हो।
मैं बहुत जल्दी आपको दो नयी श्रंखला में ले चलूंगा। पहली में हम बात करेंगे एक ऐसे उपन्यास और उससे जुड़ी कहानियों के बारे में है जो न केवल २०वीं शताब्दी के उत्कृष्ट अमेरिकन साहित्य में गिना जाना जाता है पर, मेरी बिटिया रानी के अनुसार, जिसे अमेरिका के कॉलेज जाने वाले प्रत्येक विद्यार्थी ने कम से कम एक बार पढ़ा है और दूसरी में, मैं आपको देव भूमि हिमाचल की यात्रा में ले चलूंगा।
मज़हबी कट्टरवादियों ने १९८९ में एक पुस्तक प्रकाशित की। इसका नाम ‘ऑफ पांडास् एण्ड पीपल’ है। इसमें सिद्वान्त तो सृजनवाद का ही है पर सृजनवाद की जगह ‘इंटेलिजेन्ट डिज़ाईन’ (Intelligent Design) शब्द का प्रयोग किया गया है। इन लोगों ने स्कूलों को निम्न तरह की यह नीति निर्णय लेने के लिए बाध्य किया,‘The Pennsylvania Academic Standards require students to learn about Darwin’s Theory of Evolution and Case eventually to take a standardized test of which evolution is a part.Because Darwin’s Theory is a theory, it continues to be tested as new evidence is discovered. The Theory is not a fact. Gaps in the Theory exist for which there is no evidence. A theory is defined as a well-tested explanation that unifies a broad range of observations.Intelligent Design is an explanation of the origin of life that differs from Darwin’s view. The reference book, Of Pandas and People, is available for students who might be interested in gaining an understanding of what Intelligent Design actually involves.With respect to any theory, students are encouraged to keep an open mind. The school leaves the discussion of the Origins of Life to individual students and their families. As a Standards-driven district, class instruction focuses upon preparing students to achieve proficiency on Standards-based assessments.’
‘स्कूल में डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत पढ़ाया जा सकता है। लेकिन शिक्षक उसको पढ़ाने के पहले विद्यार्थियों को बतायें कि यह केवल सिद्धांत है और इस सिद्धांत का कोई तथ्य नहीं है।
इंटेलीजेंट डिज़ाइन सिद्धांत भी प्राणियों की उत्पत्ति के बारे में बताता है और यह डार्विन के विकासवाद से भिन्न है। इस बारे में ‘ऑफ पांडास एण्ड पीपल’ नामक पुस्तक विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध है जो इस सिद्वान्त के बारे में बताती है।
विद्यार्थियों से कहा जाता है कि वे अपने मस्तिष्क को खुला रखे। इस बारे में, विद्यालय विद्यार्थियों को उनके एवं परिवार के विवेक पर छोड़ते है।’
यह नीति बहुत सारे स्कूलों में लागू कर दी गयी। कुछ अभिभावकों ने इस नीति निर्णय को न्यायालय के समक्ष चुनौती दी। 
अमेरिका के पेन्सिलवेनिया राज्य के परीक्षण न्यायालय ने, टैमी किट्ज़मिलर बनाम डोवर एरिया स्कूल डिस्ट्रिक्ट मुकदमें में, दिनांक २० दिसम्बर,२००५ को अपना फैसला देते हुऐ घोषणा की,
‘A declaratory judgement is issued in favour of Plaintiff … that Defendant’s [School's] policy violates the First Amendment of the Constitution of the United States and Article 1& 3 of the Constitution of the Commonwealth of Pennsylvania.… Defendants are permanently enjoined from maintaining ID Policy in any school within Dover Area District.’यह नीति अमेरिका के प्रथम संशोधन का उल्लघंन करती है, और असंवैधानिक है।
विपक्ष पक्ष को आदेशित किया जाता है कि वे इस नीति को डोवेर क्षेत्र के किसी भी स्कूल में लागू न करें।
मंकी ट्रायल का फैसला लगभग चालिस साल तक लागू रहा। अमेरिका के कई राज्यों में, डार्विन के विकासवाद सिद्धांत को पढ़ाने से मना करने वाले कानून चलते रहे। ऐरकेनसाज़ (Arkansas) भी अमेरिका का राज्य है। इसमें भी इस तरह का कानून था।
सूसन एपर्सन, लिटिल रॉक (पुलास्की कॉउंटी) के सेन्ट्रल हाई स्कूल {Central High School in Little Rock (Pulaski County)} में जीव विज्ञान की अध्यापिका थीं। उन्होंने डार्विन के विकासवाद सिद्धांत को पढ़ाने से मना करने वाले कानून को चुनौती दी।
अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को सर्वसम्मति से एपर्सन बनाम ऎरकेनसाज़ (Epperson V Arkansas: 393 US 97: 21 LEd 2d 228) में गैरकानूनी ठहराया। न्यायालय ने दिनांक १२ नवम्बर, १९६८ के फैसले में कहा,
‘Arkansas’ law cannot be defended as an act of religious neutrality. Arkansas did not seek to excise from the curricula of its schools and universities all discussion of the origin of man. The law’s effort was confined to an attempt to blot out a particular theory because of its supposed conflict with the Biblical account, literally read. Plainly, the law is contrary to the mandate of the First, and is violation of the Fourteenth, Amendment to the Constitution.’ऐरकेनसाज़ राज्य के कानून का बचाव, यह कह कर नहीं किया जा सकता है कि यह मज़हब निष्पक्षता का प्रतीक है। यह कानून अपने राज्य में प्राणियों के उत्पत्ति के बारे में पढ़ाने के लिए नहीं मना करता है। यह कानून उस सिद्धांत को पढ़ाने के लिए मना करता है जो बाईबिल के विरूद्ध है। यह न केवल पहले पर चौदहवें संशोधन के अन्दर असंवैधानिक है।
इस मुकदमें के निर्णय के साथ, अमेरीकी न्यायालय ने अपने ऊपर लगे धब्बे को साफ किया। लेकिन अमेरिका में इस ईसाई धर्म के अनुयायी लोगों ने, अपनी बात को कानूनी जामा पहनाने का दूसरा रास्ता अपनाया। क्या था यह रास्ता क्या उसमें सफलता मिली - अगली बार, हम लोग उसी की चर्चा करेंगे।
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल – व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।। मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है।। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी।। विकासवाद पढ़ाना मना करना, मज़हबी निष्पक्षता का प्रतीक नहीं।।
इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत, मज़हबों में प्राणी उत्पत्ति के खिलाफ था पर इसका विरोध ईसाई देशों में, खासकर अमेरिका में सबसे अधिक हुआ। यह अभी तक चल रहा है। वहां के अधिकतर राज्यों में, डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को स्कूल में पढ़ाने के लिए वर्जित कर दिया गया था।
१९२५ में, अमेरिका के टेनेसी राज्य ने, लगभग सर्वसम्मति से (७५ के विरूद्ध ५ वोटों से) कानून पास किया कि स्कूलों में डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत नहीं पढ़ाया जायेगा। डेटन (Dayton), टेनेसी राज्य का शहर है। यहां के लोगों ने सोचा कि उनके शहर को शोहरत दिलवाने का यह बहुत अच्छा मौका है। क्यों न यहीं पर इस कानून को चुनौती दी जाए।
जॉन टी. स्कोपस्, स्कूल में, जीव विज्ञान के अध्यापक थे। वे सरकारी स्कूल की नवीं कक्षा के विद्यार्थियों को डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत पढ़ाने के लिए तैयार हो गये। डार्विन के विकास वाद के सिद्धांत को पढ़ाने के लिए स्कोपस् के विरूद्व बीसवीं शताब्दी में दाण्डिक मुकदमा चला। यह दुनिया के चर्चित मुकदमों में से एक है। इसे मन्की ट्रायल (Monkey trial) भी कहा जाता है।
विलियम हेनिंगस ब्रायन (Williams Hennenigs Bryan) डेमोक्रेटिक पार्टी से तीन बार अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए नामित हो चुके थे। वे बाईबिल पर विश्वास करते थे। उन्हें अभियोजन पक्ष की ओर से वकील नामित किया गया। उस समय क्लेरेंस डेरो (Clarence Darrow), अमेरिका के प्रसिद्घ वकीलों में से थे। वे नि:शुल्क बचाव पक्ष की तरफ से पैरवी करने आये।
ब्रायन ने बहस शुरू करते समय कहा,
‘The trial uncovers an attack on religion. If evolution wins, Christianity goes.’
यह परीक्षण मज़हब पर हमला है। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायेगी।’
डैरो ने उत्तर दिया,
‘Scopes is not on trial, civilisation is on trial.’
यह मुकदमा स्कोपस् पर नहीं, लेकिन सभ्यता पर चल रहा है।
लोगों की सोच के मुताबिक, यह चर्चित मुकदमा बन गया। अमेरिका और इंगलैंड से प्रेस संवाददाता डेटन पहुँचकर प्रतिदिन इस मुकदमे के बारे में प्रेस विज्ञप्ति देने लग गये। यह मुकदमा अखबारों में छा गया।
प्रतिदिन इसे इतने लोग देखने आते थे जिससे लगा कि शायद कोर्ट की पहली मंज़िल का फर्श टूट जाये; भीड़ के कारण गर्मी और उमस भी बढ़ गयी। अन्त में मुकदमे की सुनवायी, न्यायालय के लॉन में स्थांतरित की गयी। जज़, जूरी, और वकीलों के लिये उठा हुआ प्लैटफॉर्म बनाया गया। उस पर उनके बैठने के लिये जगह थी। उसके नीचे अखबार, टेलीग्राफ और रेडिओ के लोगों के बैठने की जगह थी। प्रतिदिन लगभग पांच हज़ार लोग उसे देखने और सुनने आते थे। इस तरह के नज़ारे के साथ, मंकी ट्रायल, जो कि न्यूयॉर्क टाइम के अनुसार इतिहास के सबसे प्रसिद्ध परीक्षण मुकदमा था, सुना गया।
यह पहला मुकदमा था जिसमे कि अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता ने स्वयं अपने आपको गवाह के रूप में पेश किया। उसने यह गवाही दी कि बाइबिल में प्राणियों की उत्पत्ति की कथा सही है पर डैरो की प्रतिपृच्छा (cross examination) में उसकी सारी गवाही बेकार साबित हो गयी। लेकिन, अगले ही दिन , न्यायालय ने ब्रायन की सारी गवाही रिकार्ड पर लेने से, यह कहते हुऐ कर मना कर दिया,
‘यह सवाल प्रासंगिक नहीं है कि,डार्विन का सिद्वान्त सही है अथवा नहीं। न्यायालय के अनुसार उनका केवल यह देखना है कि,क्या स्कोपस ने डार्विन का सिद्वान्त पढ़ाया अथवा नहीं।’
यह बात तो स्वीकृत थी कि स्कोपस् ने डार्विन के विकासवाद के सिद्वान्त को पढ़ाया था। न्यायालय की इस आज्ञा के कारण स्कोपस् को तो सजा होनी थी। उसे सजा में, सौ डालर का दण्ड दे दिया गया। यह दण्ड जूरी ने न तय कर जज ने किया।
स्कोपस् ने, टेनेसी सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवायी पांच न्यायधीशों ने की। फैसला आने में साल भर लगा तब तक एक न्यायाधीश की मृत्यु हो गयी। सबने सर्वसम्मति से यह फैसला इसलिये उलट दिया कि दण्ड जूरी को तय करना चाहिये था न कि जज को। आश्चर्य इस बात का है कि केवल एक न्यायाधीश ने कहा कि यह कानून असंवैधानिक है। दो अन्य न्यायाधीशों ने कानून को वैध माना। चौथे न्यायाधीश ने कानून को तो वैध माना पर कहा कि यह न यह विकासवाद के सिद्धांत को पढ़ाने से मना करता है और न ही स्कोपस् पर लागू होता है। स्कोपस् पर यह मुकदमा फिर से चलना चाहिए था पर न्यायाधीशों ने इसे फिर से चलाने पर मनाही कर दी। यही कारण था कि यह मुकदमा अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में नहीं गया।
इस मुकदमे में जुड़े कुछ लोगों के बारे में भी कुछ बातें बताना उचित होगा।
इस श्रंखला की अगली कड़ी में, हम बात करेंगे उस मुकदमें की जिसने अमेरिकी न्यायालय के इस शर्म को दूर किया यानि कि, जिसमें विकासवाद के सिद्वान्त को स्कूल में न पढ़ाये जाने वाले कानून को अवैध घोषित कर दिया गया।
डैरो का जीवन शिक्षा-प्रद है, प्रेणना देना वाला है। मैंने उनकी आत्मकथा द स्टोरी ऑफ माइ लाइफ (The Story of My Life) और इर्विंग स्टोन (Irving Stone) की क्लेरेंस डैरो फॉर डिफेंस (Clarence Darrow For Defense) पढ़ी है। मुझे क्लेरेंस डैरो फॉर डिफेंस बहुत अच्छी लगी।
‘क्लेरेंस डैरो फॉर डिफेंस’ पुस्तक पढ़ने योग्य है। बहुत से लोग वकीलों के बारे में अच्छी राय नहीं रखते। यह पुस्तक उन्हें इस बारे में फिर से सोचने पर मज़बूर करेगी। शायद इससे आप अन्दाजा लगा सकें कि समाज में वकील का कितना अधिक योगदान है।
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल – व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।। मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है।। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी।
सांकेतिक चिन्ह
book, book, books, Books, books, book review, book review, book review, Hindi, kitaab, pustak, Review, Reviews, science fiction, किताबखाना, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, किताबी दुनिया, किताबें, किताबें, पुस्तक, पुस्तक चर्चा, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, समीक्षा,
। Richard Dawkins, Scopes trial, Monkey trial, Tennessee, Clarence Darrow,
। Common descent, Evidence of common descent, missing link,
। Creationism, Creation according to Genesis, Hindu views on evolution, History of creationism, intelligence design, intelligence design, Islamic creationism, Jewish views on evolution, religion, धर्म, bible, Bible, Charles Darwin, Charles Darwin, चार्लस् डार्विन, culture, evolution, Family, fiction, life, Life, On the Origin of Species, Religion, Science, spiritual, जीवन शैली, धर्म, धर्म- अध्यात्म, विज्ञान, समाज, ज्ञान विज्ञान,
। Hindi,।
। Hindi Podcast, हिन्दी पॉडकास्ट,
इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
सृजनवाद सारे मज़हबों में है। शायद यह इसलिए कि पुराने समय में प्राणियों की उत्पत्ति समझाने के लिए यह सबसे आसान तरीका था। सृजनवाद के अनुसार मनुष्यों की उत्पत्ति किसी विकासवाद से नहीं, पर किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा सृजन किये जाने पर हुई है। लेकिन यदि डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत सही है तब इसमें ईश्वर की, अदृश्य शक्ति की जरूरत नहीं है। यही दोनो में मतभेद है, विरोध है।
डार्विन के सिद्धांत पर मज़हबी लोगों की दो आपत्तियां हैं
चलिए पहले उनकी आसान यानि की पहली आपत्ति के बारे में बात करें। यह आपत्ति उष्मागति – विज्ञान के दूसरे नियम से संबन्धित है। यह नियम बताता है कि,
‘In any closed system, entropy always increases’
किसी भी बन्द सिस्टम में एंट्रॉपी (उत्क्रम माप) बढ़ती है।
इसका मोटे तौर पर अर्थ यह है;
‘In a closed system, things go from order to disorder’
कोई भी बन्द सिस्टम व्यवस्था से अव्यवस्था की तरफ बढ़ता है।
सृजनवादियों का कहना है कि विकासवाद में प्राणि जगत जीवन के निचले भाग में ऊँचे भाग की तरफ (from lower life form to higher life form) जा रहा है। अर्थात एंट्रॉपी घट रही है। यह नहीं हो सकता है।
सच तो यह है कि यह आपत्ति इस नियम को न समझने की भूल करती है। यह नियम किसी बन्द सिस्टम में ही लागू होता है। यदि कहीं एंट्रोपी घट रही है तो उस सिस्टम में कहीं पर बढ़ रही होगी ताकि पूरे सिस्टम में दोनो का जोड़ बढ़े।
हम सब जानते हैं कि जीवन की उत्पत्ति, इसके विकासवाद, में सूरज के प्रकाश और उष्मा का खास महत्व है। यदि सूरज न होता तो यह जीवन भी नहीं होता। सूरज से प्रकाश और उष्मा, पदार्थ की संहति (mass) का ऊर्जा में बदलने के कारण हो रहा है। इस कारण, वहां एंट्रोपी बढ़ रही है। यह पृथ्वी पर एंट्रोपी में आयी कमी से कहीं अधिक है। इन दोनो का जोड़, उष्मागति के दूसरे सिद्धांत का किसी प्रकार उल्लंघन नहीं करता है।
अगली बार मिलेंगे तब बात करेंगे सृजनवादियों की दूसरी और उनकी मुख्य आपत्ति पर।
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।।
सांकेतिक चिन्ह
। entropy, second law of thermodynamics,
Creationism, Creation according to Genesis, Hindu views on evolution, History of creationism, intelligence design, intelligence design, Islamic creationism, Jewish views on evolution, religion, धर्म, bible, Bible, Charles Darwin, Charles Darwin, चार्लस् डार्विन, culture, evolution, Family, fiction, life, Life, On the Origin of Species, Religion, Science, spiritual, जीवन शैली, धर्म, धर्म- अध्यात्म, विज्ञान, समाज, ज्ञान विज्ञान,
Hindi Podcast, हिन्दी पॉडकास्ट,
इस चिट्ठी और इसकी पिछली चिट्ठी को आप एक साथ सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
विकासवाद के सिद्धांत ने दुनिया की सबसे प्रसिद्ध बहस को भी जन्म दिया। यह बहस ३० जून, १८६० को, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के संग्रहालय में थॉमस हक्सले और बिशप सैमुअल विलबफोर्स के बीच हुई। बिशप सैमुअल, डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत के विरोधी और हक्सले समर्थक थे।
बिशप सैमुअल बहुत अच्छा बोलते थे। वे सोचते थे कि यह बहुत अच्छा तरीका है कि जब डार्विन के विकासवाद को सिद्धांत हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है। इस बहस में क्या बोला गया इसका रिकार्ड तो उपलब्ध नहीं है पर कहा जाता है कि बिशप ने हक्सले से प्रश्न पूछा,
‘आप अपने को अपनी माता की तरफ अथवा पिता की तरफ से बंदरो का वंशज कहलाना पसन्द करेंगे।’
हक्सले ने सोचा, ईश्वर ने ही बिशप को मेरे हाथ में सौंप दिया है उसने जवाब दिया,
‘If..the question is put to me, would I rather have a miserable ape for a grandfather or a may highly endowed by nature and possessed of great means of influence, and yet who employs these faculties and that influence for the mere purpose of introducing ridicule into a grave scientific discussion… I unhesitatingly affirm my preference for the ape.’
यदि मुझसे यह प्रश्न पूछा जाए कि क्या मैं बन्दरों से नाता जोड़ना चाहूँगा या ऐसे व्यक्ति से जो शक्तिशाली है, महत्वपूर्ण है, और वह वैज्ञानिक तथ्यों को मज़ाक के रूप में लेना चाहता है तो ऐसे व्यक्ति की जगह, मैं बन्दरों से रिश्ता जोड़ना चाहूँगा।
प्रबुद्व लोगों के बीच यह बहस तभी समाप्त हो गयी जब हक्सले ने इसका उत्तर दिया।
लेकिन कुछ लोग, सृजनवादी इसे मानने से इंकार करते हैं। इन लोगों की विकासवाद पर क्या आपत्ति है? उसमें क्या कोई गुणवत्ता है? इस सब की चर्चा, इस श्रंखला की अगली कड़ी में।
|
डार्विन के जीवन में कुछ पड़ाव-एक नजर
|
|
१२ फरवरी, १८०९
|
श्रेस्बरी (Shresbury) में जन्म।
|
|
१८१७
|
आठ वर्ष की उम्र में, माँ की मृत्यु।
|
|
१८१७-१८२५
|
डार्विन ने विभिन्न स्कूलों में औसत श्रेणी के विद्यार्थी के रूप में अध्ययन किया।
|
|
१८२५
|
१६ वर्ष की उम्र में, चिकित्सा की पढ़ाई शुरू की।
|
|
१८२७
|
चिकित्सा की पढ़ाई रास न आने पर, पिता के सुझाव पर, डार्विन ने आध्यात्मविद्या (Theology) की पढ़ायी शुरू कर पादरी बनने की सोची। लेकिन उसकी रूचि प्राकृतिक इतिहास की ओर थी। उसने वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर जान हेंसलॉ (John Henslow) के आधीन कार्य किया।
|
|
१८३१- १८३६
|
एचएमएस बीगल में प्राकृतिक विशेषज्ञ के तौर पर समुद्र यात्रा की।
|
|
१८३७
|
डार्विन को रहस्यमयी बीमारी ने पकड़ लिया। इसने डार्विन को अगले चालीस वर्षों तक जकड़े रखा। इस कारण उसे महीनों पूर्ण रूप से आराम करना पड़ा।
|
|
१८३८
|
थामस मैलथुस (Thomus Malthus) की पुस्तक, ‘ऎसे आन द प्रिंसिपल्स् आफ पॉप्युलेशन‘ (Essay on the principals of population) पढ़ने के बाद डार्विन, के मन में प्राकृतिक चुनाव (Natural selection) के विचार को दृढ़ किया।
|
|
१८३९
|
ऎमा वेज़वुड (Emma Wedgwood) के साथ शादी।
|
|
१८३९
|
समुद्री यात्रा पर, उसकी पुस्तक ‘द वॉयज ऑफ बीगल‘ (The voyage of the Beagle) प्रकाशित हुई।
|
|
१८ जून, १८५८
|
अल्फ्रेड रसल वॉलेस का पत्र मिला, जिसमें प्राणियों की उत्पत्ति के बारे में वही सिद्वान्त लिखा था जैसा कि डार्विन सोचते थे।
|
|
१ जुलाई, १८५८
|
वॉलेस तथा डार्विन के संयुक्त नाम से, लन्दन की लीनियिन सोसायटी में पेपर प्रस्तुत किया गया।
|
|
२४ नवम्बर, १८५९
|
डार्विन की पुस्तक ‘ऑन द ओरिजिन आफ स्पीशीज़‘ (On the Origin of Species) प्रकाशित हुई।
|
|
३० जून, १८६०
|
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के संग्रहालय में थॉमस हक्सले और बिशप सैमुअल विलबफोर्स के बीच बहस।
|
|
१८६८-१८७२
|
उनकी अन्य पुस्तकें प्रकाशित हुई।
|
|
१९ अप्रैल, १८८२
|
डार्विन की मृत्यु।
|
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।।
सांकेतिक चिन्ह
Bishop Samuel Wilberforce, Thomas Huxley,
Creationism, Creation according to Genesis, Hindu views on evolution, History of creationism, Islamic creationism, Jewish views on evolution, religion, धर्म,
bible, Bible, Charles Darwin, चार्लस् डार्विन, culture, Family, fiction, life, Life, On the Origin of Species, Religion, Science, spiritual, जीवन शैली, धर्म, धर्म- अध्यात्म, विज्ञान, समाज, ज्ञान विज्ञान,
Hindi Podcast, हिन्दी पॉडकास्ट,