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महिला अधिकार

आप को कैसी फिल्में पसन्द हैं

ऍलिसन बेचडेल का चित्र विकिपीडिया सेकिसी विचारधारा को समाज में पहुंचाने के लिये,  फिल्में और टॅ

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महिलाएं बेवकूफ़ बन रही हैं

इस चिट्ठी में पॉन्डिचेरी में फ्रांसीसी खाने की चर्चा है।पॉन्डेचेरी के समुद्र तट पर एक और शाम पॉà…

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आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते

इस चिट्ठी में महिला सश्क्तिकरण और  परी से बातें।

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। महिलाओं को इसलिए काम करना चाहिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके।

हिमाचाल यात्रा के दौरान हम चायल भी गये। वहां महाराजा और पटियाला यादुवेन्द्र सिंह का महल था। १९७२ में, इसे हिमाचल सरकार के पर्यटन विभाग ने खरीद लिया। इसमें अब एक प्रीमियम हैरीटेज़ होटल बना दिया है। हम लोग इस होटेल को देखने गये। इसके बारे में विस्तार से, इस यात्रा विवरण के दौरान बात करेंगे। लेकिन, आज उस होटल में हुई एक घटना के बारे में।

लेकिन, यह आज क्यों? यह तो आपको अन्त में ही बात चलेगा।

होटल की मुख्य इमारत को के सामने एक बहुत बड़ा सा लॉन है। यह कोई फुटबॉल के मैदान के बराबर होगा। हम लोग, इस लॉन पर चल कर होटेल के अन्दर गये। लॉन पर बहुत से लोग वहां के नजारे एवं समा का आनन्द ले रहे थे। वहीं लॉन मेरी मुलाकात, एक परिवार से हुई। उनके साथ एक प्यारी सी युवती थी। उसके बाल बहुत लम्बे थे। मैंने परिवार के सदस्य से, उससे सवाल पूछने की अनुमति ली। उन्होंने कहा,

‘आपकी ही बेटी है, जरूर पूछिए।’

मैंने पूछा,

‘बिटिया तुम्हारे बाल असली हैं या नकली।’

उसके बगल में शायद उसके बड़े भाई या पिता होंगे उन्होंने कहा,

‘आप इसके बाल क्यों नहीं खींच कर देखते?’

मैंने कहा कि किसी अनजान युवती के बाल खींचने पर तो मुश्किल में फंसा जा सकता है। मैंने उस युवती से कुछ देर बात की। उसने अपना नाम साहेबा बताया और कहा,

‘मेरी मां के बाल तो इससे दुगने लम्बे थे।’

हांलाकि उस समय उसकी मां ने अपने बाल छोटे कर लिऐ थे

मैंने साहेबा से कहा,

‘दुनिया की हर शैम्पू कम्पनी, तुम्हें मॉडल के रूप में लेना चाहेंगी। तुम क्यों नहीं किसी शैम्पू कम्पनी के लिए मॉडलेंग करती हो?’

उसने इसका जवाब नहीं दिया। वह चुप रही। उनमें से एक वृद्ध सज्जन भी थे। उन्होंने इस सवाल का जवाब दिया,

‘इसे पैसे की आवश्यकता नहीं है। इसलिए इसे काम करने की जरूरत नहीं।’

पुरूष समाज में अक्सर इस तरह की बात कर, महिलाओं को काम करने से रोका जाता है। मेरे विचार से, यह दकियानूसी विचार है। महिलाओं को काम करने की बात इसलिए नहीं होती कि उन्हें पैसों की जरूरत है। लेकिन महिलाओं को इसलिए काम करना चाहिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। उनमें आत्म सम्मान आये। वे अपने मन मुताबिक, अपनी क्षमता के अनुसार, अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें।

हमें भी पैसों की जरूरत नहीं। भगवान ने हमें सब दिया। लेकिन फिर भी मेरी पत्नी शुभा पढ़ाती है।

मैने वृद्ध सज्जन को जीवन का यह दर्शन समझाने का प्रयत्न किया, लेकिन मैं नहीं कह सकता कि वे इसे वह समझ पाये अथवा नहीं। हांलाकि साहेबा कुछ मुस्कराई, कुछ लाचार सी लगी – शायद वह मेरी बात समझ पायी या फिर वह अपने परिवार को मुझसे बेहतर समझती थी।

‘उन्मुक्त जी, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस तो कल था। महिला सशक्तिकरण के बारे में आप, आज क्यों लिख रहे हैं? यह तो कल ही लिखना था।’

महिला सशक्तिकरण के बारे में, मैंने विस्तार से कड़ियों में, २००७ में इसी चिट्ठे पर लिखा था। इसे मैंने संकलित कर एक जगह आज की दुर्गा – महिला सशक्तिकरण नाम से अपने लेख चिट्ठे पर डाला है। इसकी पहली कड़ी में मैंने बताया था कि यह ८ मार्च को क्यों मनाया जाता है। इसे बाद में मेरी पत्नी शुभा ने, इसे चुरा कर अपने चिट्ठे की चिट्ठी ‘महिला दिवस ८ मार्च को क्यों मनाया जाता है?‘ पर डाल दिया :-)

‘उन्मुक्त जी, फिर आपने आज का ही दिन क्यों चुना?’


वह इसलिऐ कि आज, हमारे जीवन में तो नहीं, पर किसी अन्य के ‘जीवन में आयी एक नन्ही परी‘। मालुम नहीं कि वह ‘अब भी परेशान है या खोई है अपने सपनो में‘। वह भी शोध  कर रही है। हम सब को अच्छा लगेगा कि वह नाम कमाये और अपने साथ हमें भी गौरवान्तित करे।

चायल पैलेस बहुत सुन्दर जगह है। यहां कई फिल्मों की शूटिंग भी हुई है जिसमें थ्री इडियट भी है। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल का यह विज्ञापन भी वहीं फिल्माया गया है। इसे देखिये और इस लॉन एवं इस पैलेस को देखें।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा

वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी।। आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते।।

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मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने

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yeh post ee-paaati shrnkhla kee kari hai. yeh nayee peedhee ko smjhne, unse dooree kum karne, aur unhein jeevan ke moolyon smjhaane ka praytna hai. mahilaaon ko kaam is liye karna cahiye ki ve apne pairon mein kharee ho saken. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is part of e-paati (e-mail) series and is an attempt to understand the new generation, bridge the between gap and to inculcate right values in them. Women should work so that they may stand on their legs. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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पति, पत्नी के घर में रहते हैं

इस चिट्ठी में त्रिवेन्दम में घूमने की जगहों की चर्चा है।
हम केरल घूमने, इसलिये गये थे क्योंकि मुझे त्रिवेन्द्रम में मुझे कुछ काम था। इस काम के लिये, मैंने यात्रा के आखरी दिन, दोपहर के भोजन के बाद, का समय रखा था। हमारे पास सुबह का समय था। हमने वह समय त्रिवेन्द्रम घूमने का प्रोग्राम बनाया। हम लोग सबसे पहले वहाँ के राजा के महल  गये। वहां हमने एक गाइड लिया। उसने बताया,

‘केरल राज्य तीन राज्यों को मिलाकर बना  है। इसकी स्थापना १९५६ में हुई थी। त्रिवेन्द्रम पहले त्रावणकोर राज्य (Travancore State) में था। यहाँ पर राजा का लड़का तो नहीं, पर उस  की बहन का लड़का राजा बनता था।’

महल में बाहर की तरफ उन्नीसवीं शताब्दी की बनी एक खास घड़ी, जिसमें घन्टे के पूरे होने पर उतनी बार ऊपर के बकरों सिर, एक दूसरे से टक्कर मारते हैं।
 
मेरे पूछने पर कि  ऎसा क्यों होता था, तब उसका जवाब था,

’यह इसलिये होता था क्योंकि ट्रावनकोर राज्य मातृ प्रधान राज्य था। यदि परिवार में लड़की नहीं है तो लड़की गोद ले ली जाती थी।’

इसने मुझे शिलॉग में खसी लोगों की याद दिलायी। वह भी मातृ प्रधान समाज है। वहां पर पुरूष अपनी पत्नी का सर नाम रख लेतें हैं और उसी के घर रहने चले जाते  हैं। गाइड के मुताबिक,

‘यहां पुरुष शादी के बाद महिलाओं का सर नेम तो नहीं रखते पर अधिकतर पति, पत्नियों के साथ उनके घर में रहते हैं और यह गलत नहीं समझा जाता है।’

हमारे तरफ तो ऎसे लोगों को घर जमाई कहा जाता है और अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है।
महल को देखते समय गाइड ने यह बताया,

‘इस महल को हजार आदमियों ने मिलकर चार साल में बनाया था। लेकिन राजा इसमे सात महीने ही रह पाये। क्योंकि उनकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद राजा के परिवार वालों ने इस महल को छोड़ दिया। उन्हे लगा कि यह महल अपशकुन है। इसलिए उसके बाद इस महल में कोई नहीं रहा।’

राजा के महल के बगल में ही एक भगवान विष्णु का मंदिर है। इस मंदिर में कोई कोट, पैंट पहनकर नहीं जाया जा सकता है और महिलायें सलवार, कुर्ता पहनकर नहीं जा सकती हैं। इसे देखने जाने के लिए आपको ऊपर के कपड़े उतारने पड़ेगें  और एक धोती पहनकर जाना होगा। महिलायें सलवार, कुर्ता के ऊपर धोती पहन सकती है। 
मुन्ने की मां मंदिर को भीतर से देखने नहीं गयी पर मुझे लगा कि इसे अन्दर से देखना चाहिए।  फिर मुश्किल पड़ी धोती पहनने की। वहां पर धोती  किराये पर भी मिल रही थी पर मैने वहीं पर एक केरल में पहनी जाने वाली शर्ट और धोती  खरीदी। उसे ही पहन कर अन्दर गया।
मन्दिर, अन्दर से बहुत भव्य है। इसमें एक जगह सारी महिलायें भजन गा रही थीं। इसमें, भगवान विष्णु की, शेषनाग की शैय्या पर लेटे हुए मूर्ति है। इस मूर्ति को  एक बार में नहीं देखा जा सकता है। इसके लिऐ कई दरवाजे हैं। 
मैं इस मूर्ति के किसी भाग को नहीं देख पाया क्योंकि वहाँ पर भीड़ थी और मुझे लगा कि यदि में लाइन में खड़ा होऊँगा तो शायद सब समय यहीं पर चला जायेगा। मैंने महल में ही उस मूर्ति का छोटा सा मॉडल  देख लिया था। त्रिवेन्द्रम में एक ताराघर (Planetarium) और चिड़ियाघर (Zoo) भी है। मैं इन्हें भी देखना चाहता था।

मंदिर देखने के बाद, हम लोग ताराघर देखने गये। वहां पता चला कि  केवल एक प्रदर्शन अंग्रेजी में है और बाकी सब मलयालम में हैं। अंग्रेजी का प्रदर्शन बारह बजे था लेकिन वह तभी चलेगा जब कि कम से कम चालीस व्यक्ति देखने के लिए आये। हम लोगों को लगा कि यहां इन्तजार करने से अच्छा है कि हम चिड़िया घर देख लें।
चिड़ियाघर में तरह तरह के जानवर देखने को मिले। मैंने वहां पर जानवरों की तसवीर इस चिट्ठी में प्रकाशित की हैं। चिड़ियाघर में एक बात अजीब लगी। वहां पेड़ों पर बहुत से चमगादड़ लटके थे। हम लोग भोजने के समय वापस आ गये। मुझे अपना काम भी करना था

मुझे काम के बाद, वहां के लोगों ने यादगार के रूप में राजा रवी वर्मा का एक चित्र यादगार के लिये भेंट किया। वे अप्रैल २९,१८४८ में जन्में त्रावणकोर राज्य के चित्रकार थे। उनकी मृत्यु अक्टूबर २, १९०६ में हो गयी।
साड़ी पहने मराठी महिला का चित्र, जो मुझे भेंट में मिला 
रवी वर्मा, महाभारत एवं रामायण की घटनाओं और पारंपरिक परिधान साड़ी पहने भारतीय महिलाओं के सुन्दर चित्र बनाने के लिये जाने जाते हैं। उनके चित्र, भारतीय परम्परा और युरोपीय कला के एकीकरण के, सबसे अच्छे उदाहरण भी हैं। उन्हें १८७३ में वियाना चित्रकला प्रदर्शनी में प्रथम पुरुस्कार भी मिला। उनके अन्य चित्र आप यहां देख सकते हैं।
यदि आप त्रिवेन्दम जायें, तो यह तो हो नहीं सकता कि आप कोवलम समुद्र तट न जांये। अगली बार वहीं चलेंगे।  
कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा
 क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे – महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।। पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं।। कुमाराकॉम पक्षीशाला में।। क्या खांयेगे – बीफ बिरयानी, बीफ आमलेट या बीफ कटलेट।। आखिरकार, हमें प्राइवेट और सरकारी होटल में अन्तर समझ में आया।। भारत में समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं न की निजी।। रात के खाने पर, सिलविया गुस्से में थी।। मुझे, केवल कुमारी कन्या ही मार सके।। आपका प्रेम है कि आपने मुझे अपना मान लिया।। आप,  टाइम पत्रिका पढ़ना छोड़ दीजिए।। पति, पत्नी के घर में रहते हैं।।
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यात्रा विवरण पर लेख चिट्ठे पर अन्य चिट्ठियां

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पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं

 ताज गार्डन रिट्रीट, कुमाराकॉम में मेरी मुलाकात कई लोगों से हुई। इस चिट्ठी में ऑस्ट्रेलियायी महिलाओं से मुलाकात और महिला सशक्तिकरण के एक दूसरे रुप की चर्चा है।

कुमाराकॉम में भी अप्रवाही जल है। शाम के समय हमने वहां पर नाव से सैर की और सूर्यास्त का नज़ारा लिया।


नाव पर मेरी मुलाकात,आस्ट्रेलिया से आयी दो महिलाओं से भी हुई। हम लोग कुमाराकॉम से त्रिवेन्द्रम  जाने वाले थे जब कि वे लोग त्रिवेन्द्रम से आ रही थीं और इसके बाद कोचीन जाने वाली थीं। वहां से वे ऊटी जा रही थीं।


शाम को गर्मी और उमस थी। मैं नेकर पहने था। उस महिला ने कहा कि वह भी नेकर पहनना चाहती थी पर उनसे बताया गया था कि वे भारत में ऐसे कपड़े न पहने। मैंने बताया,

‘भारत में पुरूष लोग नेकर पहन लेते हैं पर महिलाएं नहीं। हांलाकि इस होटल में नेकर पहन कर या नहाने की ड्रेस पहन कर घूमने में कोई एतराज़ नहीं करेगा।‘

उसने कहा,

‘तब तो मैं भी कल नेकर ही पहनूगी।‘



यह दोनो महिलाएं निरोषध चिकित्सक (Physiotherapist) थीं। उनके मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में इस पेशे में पैसा बहुत कम है शायद आने वाले समय में इसमें पैसा मिले।


इन दोनों ऑस्ट्रेलियाई महिलाओं के पति  साथ में नहीं थे न ही उनके बच्चे साथ थे। मैंने पूछा, कि क्या आपके पति ऑस्ट्रेलिया  में बच्चों की देखभाल करने के लिए रूक गये हैं। उसने कहा, नहीं। हमारे बच्चे  बहुत बड़े हो गये हैं। उनकी शादी भी हो गयी है। वे लोग अलग रहते है। उसके बाद बताया,

‘हमने कई बिल्लियां पाल रखी हैं। हमारे पति ऑस्ट्रेलिया में रहकर  बिल्लियों की देखभाल कर रहे हैं और हम दोनों भारत में मस्ती मारने आयें हुए हैं।‘



यह भी महिला सशक्तिकरण का एक अलग रूप है। पति ऑस्ट्रेलिया में बिल्लियां देखें और पत्नियां भारत घूमे।

रात्रि भोज पर, मेरी मुलाकात फिर से इन महिलाओं से हुयी। शाम को नाव की सैर करते समय वे नेकर तो नहीं पहने थी पर  अनौपचारिक परिधान पहने थीं। रात के भोजन पर वे एकदम औपचारिक परिधान पहन कर आयीं थीं। मैंने उनकी तारीफ की वे बोली,

‘रात्रि का भोजन तो खास होता है। इसलिए ये खास परिधान।‘

रात्रि भोज पर कुछ युवतियां केरल के पारम्परिक नृत्य कर रही थी। केरल में, परम्परागत परिधान में  सफेद या हल्के पीले रंग की साड़ी पहनी जाती है। जिसमें सुनहरा किनारा होता है। वे इसी तरह की साड़ी पहने थीं। नृत्य के पहले वे मलयालम में उस नृत्य के बारे में बताती थी। यह  हमारे या वहां पर भोजन कर रहे किसी के समझ में नहीं आ रहा था। मैं इनकी मुख्य नृतकी के पास गया और उससे कहा कि वह अंग्रेजी में हमें इसके बारे में बताये ताकि हम उसे ठीक से समझ सके। अगले नृत्य के पहले उसने ऎसा ही किया पर उसकी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं थी । मै इतना ही समझ पाया कि वह नृत्य शिव वंदना से जुड़ा है।


कुमाराकॉम में, एक पक्षीशाला है। इस श्रंखला की अगली कड़ी में वहीं घूमने चलेंगे।

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा

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यात्रा विवरण और महिला अधिकार पर लेख चिट्ठे पर अन्य चिट्ठियां


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At  Taj Garden Retreat at Kumarakom, we met a two ladies from Australia. This post talks about them and a different shade of women empowerment. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं

ताज गार्डन रिट्रीट कुमाराकॉम में मेरी मुलाकात कई लोगों से हुई। इस चिट्ठी में सिख और अंग्रेज दंपत्ति से मुलाकात और महिला सशक्तिकरण के एक दूसरे रुप की चर्चा है।



कुमाराकॉम में, हमारी मुलाकात एक सिख दंपत्ति से भी हुई। वे शिकागो में रहते हैं और अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि वे दादा-दादी बन गये हैं और  भारत घूमने के लिए आये हुए हैं। सिख महिला ने बताया,

‘हम एल्लपी से आये हैं। यह सफर हमने कल रात नाव पर किया।  रात में नाव, झील के बीचो बीच रूक गयी थी। अगले दिन  मैं तो सुबह पांच बजे ही उठ गयी थी लेकिन नाव को चलाने वाले ६:३७ पर उठे। इसलिये चलने में देर हो गयी।’

मैंने उससे पूछा,  

‘उस समय कितने सेकेंड हुए थे।‘

पहले तो उस महिला को मज़ाक समझ में नहीं आया कि मैं यह क्यों पूछ रहा हूं। फिर वह समझ गयी कि उसने ६:३७ मिनट कहा था। इसलिए उससे सेकेंड के बारे में पूछा जा रहा है। वह मुस्कुरा कर बोली,

‘उस वक्त ४२ सेकण्ड हुये थे।‘

हमें लगा कि रात को नाव से चलना ज्यादा रोमांचकारी होता पर हम तो यात्रा शुरू कर चुके थे और अब उसमें बदलाव संभव नहीं था। 

यहां हमारी मुलाकात एक अंग्रेज दंपत्ति से भी हुई। अंग्रेज महिला ने सलवार, कुर्ता पहन रखा था। मैंने उस महिला से कहा कि वे सलवार, कुर्ता में बहुत ही सुन्दर लग रही है। उसने मुस्कुरा कर कहा,

‘मैं १९७२ से लगातार भारत आ रही हूं। यहां  इसी वेषभूषा को पहनना  सुविधाजनक है। आप दूसरे से अलग नहीं लगते और आप इसे पहनकर किसी भी मंदिर में आसानी से जा सकते हैं।‘

मैंने कहा कि क्या लोग आपको देखकर नहीं पहचान पाते हैं क्योंकि आप देखने में भारतीय  नहीं लगती हैं। उसने कहा,

‘ऐसी बात नहीं है। एक बार मैंने साड़ी पहनी थी। लोग मुझे कश्मीरी समझ गये थे। लेकिन जब मैं  चलने लगी तब वह समझ गये कि मैं भारतीय नहीं हूँ क्योंकि मुझे साड़ी पहनकर चलना नहीं आता है।  मैं लम्बे-लम्बे कदम रख रही थी जब कि भारतीय महिलाएं साड़ी पहनकर  छोटे-छोटे कदम लेती हैं।‘



उसके पति ने मुझे बताया कि वह एक एरिक्सन कम्पनी में इंजीनियर थे। अब वे अवकाश प्राप्त हो गये हैं। उन्हें भारत से प्रेम हैं इसलिए वे हर साल यहां आते है। मैं, उनसे   जीएसएम, सीडीएमए तकनीक और मोबाइल फोन के बारे में के बारे में बात करने लगा। थोड़ी देर बाद उनकी पत्नी ने अपने हाथों की हथेली को अजीब तरह से  खोलना और बंद करना शुरू कर दिया मेरी समझ में नही आया कि वह ऐसा क्यों कर रही हैं। लेकिन, उसे  देखकर उनके पति चुप हो गये। महिला ने बताया  कि,

‘हम लोग एक मस्ती के लिए भारत आये हैं इस समय कोई व्यापार या काम की बात नहीं की जा सकती है। जब मेरे पति व्यापार या काम सम्बन्धी बातें करना शुरू कर देते है तो मै उनको इस तरह से इशारा से मना करती हूं। जब इसके बाद भी वह नहीं मानते तब मैं उन्हें पैर से ठोकर देती हूं। तब उनके  समझ में आ जाता है कि इस तरह की बाते नहीं करनी है।‘

 उनके पति ने इसका प्रतिवाद किया,

‘मैं  कोई भी व्यापार या काम की बात नहीं कर रहा था हम तो केवल तकनीक के बारे में सूचना साझा कर रहे थे।‘

 लेकिन उन्होनें इस विषय पर बात करना बंद कर दिया। महिला सशक्तिकरण का एक रूप यह भी है। 

इस श्रंखला की अगली कड़ी में जब हम मिलेंगे तब बात करेंगे ऑस्ट्रेलिया से आयी दो महिलाओं की और महिला सशक्तिकरण के एक और रूप की।

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा

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We met a Sikh and an English couple at  Taj Garden Retreat at Kumarakom. This post talks about them and different shade of women empowerment. This post talks about one of them. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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पुरुष बच्चों को देखे – महिलाएं मौज मस्ती करें

ताज गार्डन रिट्रीट कुमाराकॉम में महिला सशक्तिकरण के कई रुप देखने को मिले। इस चिट्ठी में उनमें से एक रूप की चर्चा है।


सुबह के समय अप्रवाही जल से कुमाराकॉम का दृश्य
ताज गार्डन रिट्रीट होटल पहुंचते ही हमारा स्वागत नारियल की माला पहनाकर किया गया। एक ताजा नारियल, जल पीने के लिए दिया गया। उस समय वहां तीन युवतियां भी आयी। वे भी वहीं ठहरी हुई थीं। हमें देखकर उन्होंने कहा कि हमारा ऐसा स्वागत क्यों नहीं हुआ। स्वागत कक्ष में बैठी युवती कुछ परेशानी में पड़ गयी। मैने उसके बचाव में कहा,

‘हम दोपहर को आये हैं, गर्मी है- इसलिये हमारा इस तरह से स्वागत हुआ है।’

उसमें से एक युवती ने कहा,

‘हम भी कल दोपहर को आयें थे फिर भी हमारा इस तरह से स्वागत नहीं हुआ।’

मैंने बात टालने के लिये कहा,

‘अरे, मुझे यह मालूम होता तो कोई और बहाना बनाता।‘

वे मतलब समझ गयी। इस बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।


इन महिलाओं को जब पता चला कि हम उत्तर भारत से हैं तो उनमें से एक बोली,

‘क्या आप सक्सेना है। मेरे पति भी सक्सेना है, और वहीं से है। लगता है कि सक्सेना लोग वहीं पाये जाते हैं।‘

मैंने कहा,

‘सक्सेना, कायस्थ होते हैं और उत्तर भारत में शायद ज्यादा तादाद में हैं इसलिये आपको ऐसा लगता है पर मैं सक्सेना नहीं हूं।‘



यह तीनों अपने तीस के या फिर चालीस के दशक में थी। इनसे बात करने पर पता चला कि यह बम्बई से आयी हैं और विज्ञापन कम्पनी में काम करती हैं।

इन तीनों के साथ इनका परिवार नहीं था। वे अपने पतियों और परिवार को छोड़कर सहेलियों के साथ मस्ती मारने आयी थीं। मुझे यह बात कुछ अजीब लगी।

परिवार के बारे में पूछने पर बताया बच्चों के स्कूल हैं, पति काम पर हैं और बच्चों की देखभाल भी कर रहे हैं। इस कारण उनके परिवार उनके साथ नहीं आ सके।

यह महिलायें ज्यादा समय अपने कॉटेज़ में रहती थीं। मैं भी वहां की शान्ति और सुन्दरता में इतना व्यस्त रहा कि इनके चित्र नहीं खींच पाया। इसलिये पोस्ट नहीं कर पा रहा हूं।

होटेल में श्यनकक्ष के अन्दर


महिला सशक्तिकरण का यह रूप भी देखा – पुरुष काम के साथ बच्चों को देखे और महिलाएं अपनी सहेलियों के साथ मस्ती करें :-)

मैं आज तक, कभी भी अपने परिवार को छोड़कर, मौज मस्ती मारने नहीं गया। जब भी गया मेरा परिवार मेरे साथ रहा। ऐसे मौकों पर, जब तक मेरी मां जीवित रहीं, वे भी हमारे साथ रहती थीं। मेरे विचार से, ऐसे मौकों पर अगली पीढ़ी को साथ रखना चाहिये। इससे न केवल, वे बहुत कुछ सीखते हैं पर परिवार में संबन्ध भी प्रगाढ़ होते हैं।

लेकिन, यह भी सच है कि कभी-कभी, केवल मित्रों के साथ मस्ती मारने का अलग मज़ा है।

अगली बार मुलाकात करेंगे एक अंग्रेज दंपत्ति से और देखेंगे महिला सशक्तिकरण का एक दूसरा रूप।

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा

क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे – महिलाएं मौज मस्ती करें।

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यात्रा विवरण और महिला अधिकार पर लेख चिट्ठे पर अन्य चिट्ठियां


About this post in Hindi-Roman and English

hum log kumarakom mein taj garden retreat hotel mein tthahre the. vhan mahilasashktikarn ke kai roop dekhne ko mile. is chitthi mein, uske ek roop kee charcha hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.


We had stayed in Taj Garden Retreat at Kumarakom. We saw different shades of women empowerment. This post talks about one of them. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
Kumarakom, Taj Garden Retreat, कुमाराकॉम, कानून, सूचना , , ,

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