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आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते
इस चिट्ठी में महिला सश्क्तिकरण और  परी से बातें।

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। महिलाओं को इसलिए काम करना चाहिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके।

हिमाचाल यात्रा के दौरान हम चायल भी गये। वहां महाराजा और पटियाला यादुवेन्द्र सिंह का महल था। १९७२ में, इसे हिमाचल सरकार के पर्यटन विभाग ने खरीद लिया। इसमें अब एक प्रीमियम हैरीटेज़ होटल बना दिया है। हम लोग इस होटेल को देखने गये। इसके बारे में विस्तार से, इस यात्रा विवरण के दौरान बात करेंगे। लेकिन, आज उस होटल में हुई एक घटना के बारे में।

लेकिन, यह आज क्यों? यह तो आपको अन्त में ही बात चलेगा।

होटल की मुख्य इमारत को के सामने एक बहुत बड़ा सा लॉन है। यह कोई फुटबॉल के मैदान के बराबर होगा। हम लोग, इस लॉन पर चल कर होटेल के अन्दर गये। लॉन पर बहुत से लोग वहां के नजारे एवं समा का आनन्द ले रहे थे। वहीं लॉन मेरी मुलाकात, एक परिवार से हुई। उनके साथ एक प्यारी सी युवती थी। उसके बाल बहुत लम्बे थे। मैंने परिवार के सदस्य से, उससे सवाल पूछने की अनुमति ली। उन्होंने कहा,

‘आपकी ही बेटी है, जरूर पूछिए।’

मैंने पूछा,

‘बिटिया तुम्हारे बाल असली हैं या नकली।’

उसके बगल में शायद उसके बड़े भाई या पिता होंगे उन्होंने कहा,

‘आप इसके बाल क्यों नहीं खींच कर देखते?’

मैंने कहा कि किसी अनजान युवती के बाल खींचने पर तो मुश्किल में फंसा जा सकता है। मैंने उस युवती से कुछ देर बात की। उसने अपना नाम साहेबा बताया और कहा,

‘मेरी मां के बाल तो इससे दुगने लम्बे थे।’

हांलाकि उस समय उसकी मां ने अपने बाल छोटे कर लिऐ थे

मैंने साहेबा से कहा,

‘दुनिया की हर शैम्पू कम्पनी, तुम्हें मॉडल के रूप में लेना चाहेंगी। तुम क्यों नहीं किसी शैम्पू कम्पनी के लिए मॉडलेंग करती हो?’

उसने इसका जवाब नहीं दिया। वह चुप रही। उनमें से एक वृद्ध सज्जन भी थे। उन्होंने इस सवाल का जवाब दिया,

‘इसे पैसे की आवश्यकता नहीं है। इसलिए इसे काम करने की जरूरत नहीं।’

पुरूष समाज में अक्सर इस तरह की बात कर, महिलाओं को काम करने से रोका जाता है। मेरे विचार से, यह दकियानूसी विचार है। महिलाओं को काम करने की बात इसलिए नहीं होती कि उन्हें पैसों की जरूरत है। लेकिन महिलाओं को इसलिए काम करना चाहिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। उनमें आत्म सम्मान आये। वे अपने मन मुताबिक, अपनी क्षमता के अनुसार, अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें।

हमें भी पैसों की जरूरत नहीं। भगवान ने हमें सब दिया। लेकिन फिर भी मेरी पत्नी शुभा पढ़ाती है।

मैने वृद्ध सज्जन को जीवन का यह दर्शन समझाने का प्रयत्न किया, लेकिन मैं नहीं कह सकता कि वे इसे वह समझ पाये अथवा नहीं। हांलाकि साहेबा कुछ मुस्कराई, कुछ लाचार सी लगी – शायद वह मेरी बात समझ पायी या फिर वह अपने परिवार को मुझसे बेहतर समझती थी।

‘उन्मुक्त जी, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस तो कल था। महिला सशक्तिकरण के बारे में आप, आज क्यों लिख रहे हैं? यह तो कल ही लिखना था।’

महिला सशक्तिकरण के बारे में, मैंने विस्तार से कड़ियों में, २००७ में इसी चिट्ठे पर लिखा था। इसे मैंने संकलित कर एक जगह आज की दुर्गा – महिला सशक्तिकरण नाम से अपने लेख चिट्ठे पर डाला है। इसकी पहली कड़ी में मैंने बताया था कि यह ८ मार्च को क्यों मनाया जाता है। इसे बाद में मेरी पत्नी शुभा ने, इसे चुरा कर अपने चिट्ठे की चिट्ठी ‘महिला दिवस ८ मार्च को क्यों मनाया जाता है?‘ पर डाल दिया :-)

‘उन्मुक्त जी, फिर आपने आज का ही दिन क्यों चुना?’


वह इसलिऐ कि आज, हमारे जीवन में तो नहीं, पर किसी अन्य के ‘जीवन में आयी एक नन्ही परी‘। मालुम नहीं कि वह ‘अब भी परेशान है या खोई है अपने सपनो में‘। वह भी शोध  कर रही है। हम सब को अच्छा लगेगा कि वह नाम कमाये और अपने साथ हमें भी गौरवान्तित करे।

चायल पैलेस बहुत सुन्दर जगह है। यहां कई फिल्मों की शूटिंग भी हुई है जिसमें थ्री इडियट भी है। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल का यह विज्ञापन भी वहीं फिल्माया गया है। इसे देखिये और इस लॉन एवं इस पैलेस को देखें।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा

वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी।। आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते।।

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yeh post ee-paaati shrnkhla kee kari hai. yeh nayee peedhee ko smjhne, unse dooree kum karne, aur unhein jeevan ke moolyon smjhaane ka praytna hai. mahilaaon ko kaam is liye karna cahiye ki ve apne pairon mein kharee ho saken. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is part of e-paati (e-mail) series and is an attempt to understand the new generation, bridge the between gap and to inculcate right values in them. Women should work so that they may stand on their legs. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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culture, Family, Inspiration, life, Life, Relationship, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन, दर्शन, जी भर कर जियो,

अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी
इस चिट्ठी में पिंजौर के भीमा देवी मन्दिर एवं उसके संग्रहालय के बारे में चर्चा है।

पिंजौर में लोगों ने बताया,

‘पांडवों ने अज्ञात वास इसी जगह पर बिताया था।  वे प्रतिदिन दिन एक बावड़ी खोदते थे ताकि ऐसा न हो कि उनके दुश्मन पुरानी खोदी हुई बावड़ी में जहर लगा दें। यहां पर ३६० बावड़ियां हैं।’

मैंने पूछा,

‘यदि पांडव उस समय के अज्ञात वास में थे तब  उन्हें ३६५ बावड़ी खोदनी चाहिए थी न कि ३६०’

उसने कहा,

‘पहले  ३६० दिन का एक साल माना जाता था।’

मेरे विचार से या तो अज्ञात वास की बात नहीं होनी चाहिए या फिर बावड़ी खोदने का यह कारण गलत है। क्योंकि यदि कौरव वहां पर जहर मिला सकते थे तब पाण्डवों को भी पकड़ सकते थे।

पिंजौर के मुगल उद्यान के बगल में, एक पुराना आम का बड़ा पेड़ था। उस जगह पर, स्थानीय लोग पर आधुनिक मूर्तियां रखकर, इसे भीमा देवी के नाम से पूजते थे। दुर्गा सप्तशती में, भीमा देवी को दुर्गा का ही रूप होने का उल्लेख है। १९७२ में, यह आम का पेड़ अंधड़, तूफान में  जड़ से उखड़ गया। उसके नीचे बहुत सी मूर्तियां मिली। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी और यहां पर खुदाई का कार्य किया गया।

यहां पर मिले अवशेषों से, इस जगह ‘शक्ति’ अथवा दुर्गा मंदिर होने की पुष्टि नहीं होती हैं। कुछ किंवदन्तियों के अनुसार पिंजौर का प्रांचीन नाम भीम नगर भी था। लगता है कि भीम नगर नाम के कारण ही इस मंदिर को भीमा देवी का मंदिर कहा जाने लगा होगा।

जहां आम का पेड़ था वहां पर निकले पुराने मंदिर के अवशेष

मंदिर अवशेषों से लगता है कि यह एक भव्य मंदिर समूह रहा होगा। मुख्य मंदिर के शिखर का गठन तत्कालीन उत्तर भारत के मंदिर निर्माण शैली के अनुसार ही कई छोटे शिखर को मिलाकर तैयार किया गया था। जिसके ऊपर आमलक और कलश स्थापित थे। मंदिर की बाह्य दीवारें पूर्णतः देवी देवताओं एवं उप-देवताओं की मूर्तियों सहित अनेक सामाजिक दृश्यों सुसज्जित रही हैं। हिन्दू देवतावाद में आठों दिशाओं की रक्षा के लिए आठ अलग-अलग उप-देवताओं की मान्यता है जिन्हें सम्मिलित रूप से अष्ट-दिग्पाल कहा जाता है। इसलिए लगता है कि यहाँ से प्राप्त इन्द्र (पर्व), अग्नि (दक्षिण -पूर्व), वायु (उत्तर -पश्चिम), वरूण  (पश्चिम), ईशान (उत्तर-पूर्व) आदि दिग्पालों की प्रतिमाएं मंदिर की बाहरी दीवार पर उनसे संबंधित दिशाओं में लगायी गई होंगी। देवताओं में शिव-पार्वती, विष्णु, गणेश, कार्तिकेय आदि देवताओं के विभिन्न रूपों में प्रतिमाएं भी यहां से प्राप्त हुई हैं।

भीमा देवी मंदिर से प्राप्त मंदिर अवशेष एवं मूर्तियों के समूह में वृहद शिवलिंग और प्रवेश द्वारा के ऊपर ललाट बिम्ब में स्थापित की जाने वाली चैत्य झरोखे में अंकित त्रिमूर्ति शिवशीर्ष से इस बात की संभावना है कि यह मुख्य रूप से शिव मंदिर रहा हो।

यहां संग्रहालय में रखी एक मूर्ति

मंदिर के अवशेषों के कुछ शिलालेख में,  राजा रामदेव का उल्लेख मिलता है इससे लगता है। कि इस मंदिर समूह का निर्माण रामदेव के समय में हुआ होगा। इन अभिलेखों में उल्लिखित राजा रामदेव संभवत: इस पहाड़ी क्षेत्र का वही रामदेव है जिसने १०१४ ई० में महमूद गजनवी आक्रमण के दौरान सतलुज से भाग कर रोपड़ में काफी डटकर मुकाबला किया था। इस आधार पर १०१४ ई० की तिथि पूर्णत: भीमा देवी मंदिर के अवशेषों से मिलती है।

इस समय यहां पर संग्रहालय बना दिया गया है। 


इस श्रृंखला की अगली कड़ी में हम लोग शिमला में इंस्टिटयूट आफ एडवांस्ड् स्टडीज़ देखने चलेंगे।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा

वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी

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समय के साथ बदलना ही जीवन है
इस चिट्ठी में,  ‘हू मूव्ड माई चीज़’ नामक पुस्तक के साथ, पिंजौर के मुगल (यादुवेन्द्र सिंह) उद्यान  की चर्चा है।

कुछ समय पहले डा. सपेंसर जॉनसन के द्वारा लिखित ‘हू मूव्ड माई चीज़’ (Who moved my cheese) नामक पुस्तक आयी थी। यह प्रसिद्ध पुस्तक है। इसका कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।  

इस पुस्तक में  चार चूहों के द्वारा एक मैनेजमेंट के सिद्घान्त को बताया गया है। यह इस प्रकार है कि चूहों को पनीर मिल जाती है। कुछ उसी में तृप्त हो जाते हैं। उनका जीवन, पनीर के समाप्त होते ही, हो जाता है। लेकिन वहीं कुछ चूहों को लगता है कि उनकी पनीर समाप्त हो रही है। वे नई पनीर को ढूंढने के लिए निकल पड़ते हैं। वे नयी पनीर ढूंढ लेते हैं और जीवन में सफल होते हैं। समय के साथ बदलना ही जीवन है।

आप यह सोच रहे होंगे कि इस पुस्तक  का पिंजौर के मुगल उद्यान से क्या सम्बन्ध है। चलिये, मुगल उद्यान में चल कर देखते हैं कि वहां क्या हो रहा है।

पिंजौर का मुगल उद्यान

पिंजौर में, हम लोग हरियाणा पर्यटन का विभाग बजरीगर मोटेल में ठहरे थे। यह उद्यान के बगल में है। शाम के समय  उद्यान को देखने के लिए गये। यह अच्छा है पर शायद उतना सुन्दर नहीं जितना इसके बारे में कहा जाता है। लेकिन अंधेरा होते होते वहां पर सब बत्तियां जल गयी और फव्वारे भी चलने लगे जिससे कि उसकी सुन्दरता बढ़ गयी।

उद्यान के अन्दर मेरी मुलाकात एक सुरेश कुमार से हुई। वे एक छोटा सा स्टॉल लगाये हुये थे और उस स्टॉल में वे कैमरा और कैमरे की रील बेच रहे थे। उनके पास कोडेक के कैमरे थे जो उसे किराये पर देते थे। इसे लेने के लिए ६०० रूपये की जमानत  देनी पड़ती थी और एक घंटे का किराया वे ७० रूपया लेते थे। उसने बताया वे ठेके  पर कार्य करते हैं। इसके लिऐ, ठेकेदार ने  दो साल के अनुबंध के लिए २ लाख चालीस हजार रुपये दिये हैं। मैंने पूछा,

‘क्या इतनी आमदनी हो जायेगी।’

उसने कहा कि नहीं। फिर उसने मुझे वह कापी दिखायी जिसमें लोगों के द्वारा दिये गये पैसे   को लिखता था। किसी दिन १०० तो किसी दिन २०० और अधिकतम शायद ५०० रू० थे। उसका कहना था, 

‘यह बहुत घाटे में चल रही है। इसका कारण मोबाइल फोन में लगे कैमरे हैं। लोग कैमरे और रील से फोटो न लेकर अब मोबाइल फोन से ही फोटो ले रहे हैं।’

यह बात मुझे देखने में भी मिली क्योंकि अधिकतर लोग अपने मोबाइल से ही फोटो ले रहे थे। किसी भी तकनीक के पुराने होते ही उससे संबन्धित व्यापार भी समाप्त हो जाते हैं। रील फोटो ग्राफी का व्यापार समाप्त हो चुका है। यदि आप नयी तकनीक पर नहीं जाते हैं तब भगवान ही आपका मालिक है। मेडिकल के भी क्षेत्र में इसी तरह से बहुत सारी तकनीक समाप्त हो रही हैं, या समाप्त हो गयी हैं।

मेरा एक मित्र डाक्टर है उसके पास एक ऐक्सरे मशीन थी। इसमें ऐक्सरे,  पुरानी तकनीक से लिया जाता था। इस समय जितने भी ऐक्सरे होते हैं वह डिजिटल होते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि उसे बड़ा या छोटा किया जा सकता है या ई-मेल के द्वारा कहीं भेज कर राय मांगी जा सकती है। मैंने अपने मित्र से कई बार कहा कि यदि वह डिजिटल ऐक्सरे नहीं लेता है तो उसका व्यापार चौपट हो जायेगा। उसने मेरी बात नहीं मानी और इस समय उसका व्यापार समाप्त हो गया है।

मेरे एक और जान पहचान के व्यक्ति की चश्मे की दुकान थी। समय के साथ उसने बदलाव किया। पहले कन्टैक्ट लेंस भी बेचने शुरू किये। कुछ सालों पहले उन्हें लगा कि कन्टैक्ट लैंस का व्यापार समाप्त हो रहा है। इस समय लोग न तो चश्मा लगाना चाहते हैं और न ही कन्टैक्ट लेंस लगाना चाहते हैं पर वे एक लेज़र के द्वारा आंख की पुतलियों का आपरेशन करा लेते हैं और उसके पश्चात आपको आंख के चश्मे से छूट मिल जाती है। उसने इस तकनीक से आपरेशन के लिए मशीन ले ली। कुछ समय पहले तक यह केवल पढ़ने वाले चश्मे से निजात पा सकते थे। लेकिन इस समय बाइफोक्ल चश्मे वालों को भी  चश्मों से छुटकारा मिल सकता है।

यह आगे देखने वाला व्यक्ति है। उसने दिल्ली में, मेडिकल पर्यटन नाम की बात शुरू कर रखी है। देश विदेश से लोग आते हैं। दोपहर तक आपरेशन करवाते है। इसमें ऑपरेशन के बाद मरीज को तुरन्त छोड़ा जा सकता है। क्योंकि ऑपरेशन बाद बहुत सावधानी की जरूरत नहीं होती है। उसने एक जगह ले रखी है जहां वह लोगो को टिकाता है। उसके बाद ऑपरेशन होता है। उसके बाद मरीजों को आगरा, राजस्थान की तीन दिन की यात्रा में भेजता है। लोग लौट कर अपने  देश चले जाते हैं। बहुत से सैलानी इसी तरह से आ रहे हैं। बाहर से आये व्यक्तियों अपने देश में ऑपरेशन कराने में जितना पैसा लगता है वह यहां ऑपरेशन और घूमने के बाद खर्च किये गये पैसों से अधिक है। इसलिए लोग भारत आ रहे हैं। उसका धंधा अच्छा रहा है।

यह सच है कि यदि आप तकनीक के साथ नहीं बदलेंगे, तो वह आपको बदल देगी, आपका व्यापार समाप्त हो जायेगा।

अगली चिट्ठी में भीमा देवी के मन्दिर एवं संग्रहालय के बारे में।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा

वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। समय के साथ बदलना ही जीवन है।।

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पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया
हिमाचल यात्रा के दौरान, हम लोग सबसे पहले पिंजौर रुके। इस चिट्ठी में, कुछ सूचना पिंजौर के बारे में।

पिंजौर, चंडीगढ़ से लगभग २० किलोमीटर शिमला के रास्ते पर है। यह हरयाणा राज्य में है। हम लोग,  दोपहर को, पिंजौर पहुंचे।


पिंजौर की सबसे प्रसिद्ध जगह वहां का उद्यान – सूर्यास्त के समय

पिंजौर का सम्बन्ध महाभारत से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि पाडंवों ने अपने अज्ञातवास का अंतिम एक वर्ष यहीं व्यतीत किया था और उसी आधार पर इसका नाम पंचपुर पड़ा। इस समय  पंचपुर का अपभ्रंश होकर यह इस समय पिंजौर हो गया।

हरियाणा पुरात्तव एवं संग्रहालय विभाग द्वारा छपी प्रचार पुस्तक में बताया गया है कि पृथ्वी राज के शिलालेख (११६७ ईसवी – विक्रमी संवत १२२४) में भी इस स्थल का उल्लेख ‘पंचपुर’ के नाम से हुआ है।

तस्मात्पंचपुरा धिपाय विभुना दत्ता…….(८)
दग्ध पंचपुरं हता:प्रतिमढ़ा ……………..(११)

इस क्षेत्र में एक लाख वर्ष पूर्व प्रयोग किये गये पत्थरों के औजार भी मिले हैं। जो इस क्षेत्र की प्राचीनतम ऐतिहासिक सम्पदा के प्रमाण हैं।

पिंजौर क्षेत्र में बहुतायत में फैले हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों एवं मंदिर अवशेष मिले हैं। इससे लगता है कि प्राचीन समय (१३वीं शताब्दी तक) में ही पिंजौर एक अन्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थल के रूप में विकसित हो चुका था। यह इतिहासकार अलबरूनी (१०३० ई०) के विवरण से भी पता चलता है।

पिंजौर से प्राप्त अवशेषों का समृद्व संग्रह पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, हरियाणा के अतिरिक्त, म्यूज़ियम एण्ड आर्ट गैलरी, चण्डीगढ़, एवं प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तव विभाग, कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरूक्षेत्र में भी है।

 

हिमाचल यात्रा के दौरान एक चित्र

१३वीं शताब्दी के मध्य में मूर्तिभंजक विदेशी आक्रमणकारियों के कोपभाजन के परिणामस्वरूप इन मन्दिरों की तोड़फोड़ का दौर प्रारम्भ हुआ। 

मिन्हज-पस- सराज नामक तत्कालीन इतिहासकार ने “तदकाते नासिरी” नामक ग्रंथ में उल्लेख किया है कि इल्तुतमिश के पुत्र नसीरूद्दीन महमूद ने १२५४ ईस्वी में इस स्थान को सिरमौर के राजा से छीनकर अनेक मंदिर एवं बावड़ियों को तोड़ा। इसके बाद पिंजौर ने १३९९ ई० मे तैमूर एवं १५०७ ई० में चंगेज खां के आक्रमणों को झेला।

औरंगजेब के शासनकाल के दौरान उसका चचेरा भाई  फदई खां यहां का गवर्नर हुआ। १६६१ ई० में, उसने यहां मुगल उद्यान बनाने के लिए अनेक मन्दिरों एवं बावड़ियों को तोड़ा। इनके मन्दिरों के अवशेष, आज भी इस उद्यान  की दिवालों पर मिलते  हैं।  

यह उद्यान,  यहां की सबसे प्रसिद्घ जगह है। महाराजा यादुवेन्द्र सिंह पटियाला के सबसे आखरी राजा थे। यह उद्यान, अब उन्हीं के नाम से जाना जाता है। इस उद्यान के बगल में हरियाणा पर्यटन का विभाग बजरीगर मोटेल है। हम लोग इसी  में ठहरे थे।

यहां पर घूमने के लिये, इस उद्यान के अतिरिक्त भीमा देवी का मंदिर एवं संग्रहालय है।  

अगली बार, इस उद्यान, और ‘हू मूव्ड माई चीज़’ (Who moved my cheese) नामक पुस्तक एवं समय के साथ बदलने के बारे में।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा

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यह तो धोखा देने की बात हुई
हिमाचल यात्रा में, पवन हमारे टैक्सी चालक थे। इस चिट्ठी में, कुछ उनके बारे में और कुछ दिल्ली एवं केरल टैक्सी सेवा के तुलना है।


हिमाचल यात्रा के लिये, हमने ईनोवा टैक्सी  ली थी क्योंकि सामान कुछ ज़्यादा था। पवन, हमारे टैक्सी चालक, के पिता सेना में नौकरी करते थे। अब, वे सेवानिवृत्त हो गये हैं। उनके दो भाई हैं, बड़े भाई स्कूल में पढ़ाते हैं और छोटा भाई पढ़ रहा है। पवन जी को एक बेटा एक बेटी है। जिनकी उम्र छः और चार साल है।

केरल यात्रा में प्रवीण हमारे साथ थे। उनका भी स्वभाव अच्छा था। वे काफी बातूनी थे।

पवन का स्वभाव अच्छा था। लेकिन वे उल्टे थे। कम बात करते थे। यह टैक्सी उनकी नहीं थी। वे केवल चालक के रूप में कार्यरत थे। 

हमारे टैक्सी चालक – पवन, रोहतांग पास पर। 
क्या आपको वह किसी फिल्म हीरो से कम लग रहे हैं :-)  

इस टैक्सी में टैक्सी का नम्बर न होकर प्राइवेट नम्बर था। मैंने पवन से पूछा,

‘इस गाड़ी’ में प्राइवेट नम्बर क्यों है? क्या ये टैक्सी की तरह रजिस्टर्ड नहीं है?  इसका बीमा टैक्सी की तरह है या नहीं?’

मैंने उसे बताया कि यदि इस गाड़ी का बीमा टैक्सी की तरह नहीं है तो दुर्घटना हो जाने पर हम सब मुश्किल में पड़ सकते हैं। हमारे परिवार वालों को  बीमा कम्पनी से पैसा नहीं मिल पायेगा। यह सुनने के बाद उसने कहा,

‘इस गाड़ी का बीमा टैक्सी की तरह है और यह वैसे ही रजिस्टर्ड है। इसका नंबर टैक्सी का नम्बर है। लेकिन उसके मालिक ने इसमें एक प्राइवेट गाड़ी की तरह नम्बर पेन्ट किया है। यह इसलिए किया है ताकि लगे कि यह प्राइवेट गाड़ी है। चूंकि हम लोग कई राज्यों में जा रहे हैं इसलिये यदि ऐसा नहीं करते तो सब जगह टैक्स देना पड़ता।’

मैंने कहा,

‘यह तो धोखा देने की बात हुई। यह बात गलत है। आपको कोई घाटा नहीं होता क्योंकि टैक्स तो हमको देना पड़ता। आपके मालिक को इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी अपने मालिक से कहियेगा कि हमें यह बात पसन्द नहीं आयी।’

उसने कहा कि इस बात को जरूर अपने मालिक से कहेगा और अगली बार ऐसा नहीं होगा। मालूम नहीं कि उसने कहा कि नहीं। यदि कहा तो क्या उसने माना।

मुझे केरल यात्रा के दौरान भी टैक्सी का अनुभव रहा। वहां हमारे टैक्सी चालक प्रवीण ज़्यादा साफ सुथरे रहते थे। केरल में लोग पेशेवर हैं। वहां की गाड़ी भी टैक्सी की तरह रजिस्टर्ड थी। इस गाड़ी को भी उसी तरह से होना चाहिए था।

हम लोग सबसे पहले पिंजौर रुके। अगली चिट्ठी में उसी के बारे में।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा

वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।।

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Pawan was our taxi driver in the Himachal trip. This post is about him and compares Delhi taxi service with Kerala taxi service. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
सांकेतिक शब्द
। हिमाचल, Himachal,Taxi service,
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Hindi, हिन्दी,
वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी
आइये चलते हैं देवभूमि, हिमाचल की यात्रा पर।

हम टैक्सी पर, सुबह दिल्ली से, हिमाचल की यात्रा के लिये निकले।

मेरा भाई चण्डीगढ़ में रहता था। मैं अक्सर उसके पास जाता था। तब हम लोग करनाल में, ओएसिस में रुक कर, चाय या काफ़ी लेते थे। यहां पर आप पेट्रोल ले सकते है। अच्छी दुकानें और रेस्टरूम हैं। वहां आप, खा, पी एवं सामान खरीद सकते हैं।  

इस बार भी, हम लोग जाते समय, वहां पर गये और कॉफी पी। वहां, रेस्टरूम का भी प्रयोग किया। लेकिन वह उतना अच्छा नहीं लगा, जितना की पहले लगता था। कुछ  चीजें टूटी सी लगी पर बाथरुम साफ था। 

चलते समय मैंने अपने टैक्सी चालक  से पूछा,

‘क्या तुम्हारे पास  भजन या पुराने गानो की सीडी है?’

उसने नकारात्मक में जवाब दिया। लेकिन उसके पास कुछ पंजाबी गानों की सीडी थी जो हमारी समझ के बाहर थी।

हिमाचल यात्रा के दौरान एक दृश्य

ओसिस मार्केट में सीडी की भी दुकान है। हम उस पर गये। मैंने दुकान मालिक से पूछा कि क्या उसके पास हिन्दी के कुछ पुराने गाने होगें। उसने कहा देख लीजिए। उस समय, मैं चश्मा नहीं लगाये हुए था। इसलिए कुछ पढ़ पाना मुश्किल था। मैंने दुकानवाले से पूछा कि क्या वह पढ़ सकता है। उसने कहा कि वह भी नहीं पढ़ सकता है। मेरे बगल में एक प्यारी सी लड़की खड़ी हुई थी। मैंने उससे कहा,

‘बिटिया रानी,  क्या तुम मेरे लिए हिन्दी के पुराने गानों की सीडी चुन सकती हो?’

उसने कहा,

‘अवश्य अंकल।’ 

उसने एक पुराने गानों की हिन्दी की सीडी पसंद करके मुझको दी। 

वह युवती सफेद रंग का, चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी। जिसमें सुन्दर नक्काशी थी। मैंने पूछा,

‘क्या तुम कहीं घूमने जा रही हो?’

उसने हामी भरी। 

मैंने उससे  पूछा कि वह एकदम सफेद पोशाक क्यों पहने है क्योंकि वह आसानी से गंदी हो सकती है। यह पूछने पर वह शर्मा गयी। लगता था कि उसकी नई-नई शादी हुई थी या शादी की बात चल रही थी। इसलिए वह सौम्य कपड़े पहनना चाहती थी लेकिन चमकीले भी।

हमारे टैक्सी चालक के अनुसार करनाल में हवेली, ओसिस से बेहतर जगह है।  हिमालय यात्रा से  दिल्ली वापस लौटते समय,हम लोग ओसिस कॉम्प्लेक्स में न जाकर हवेली कॉम्प्लेक्स में गये। 

मुझे हवेली कॉम्प्लेक्स बेहतर जगह लगी। शायद इसलिये कि यह ओसिस के बाद बनी  और नयी  है।  यहां  भी स्नैक्स और कॉफी वगैरह मिलती है। हवेली कॉम्प्लेक्स में सबसे अच्छी बात  यह लगी कि इसमें एक जगह खाना भी मिलता है। आप अलग खाना आर्डर भी कर सकते हैं या थाली। थाली १२५ रू० से लेकर १७५ रू० तक की है। आपको जो थाली पसन्द हो वह आर्डर करें। यहां पर हमने खाना खाया। यह अच्छा था। यहां का बाथरुम साफ था। आप जायें तो यहीं पर रुक कर चाय या खाना खायें।

इस यात्रा में पवन हमारे टैक्सी चालक थे। अगली चिट्ठी में कुछ उनके बारे में और कुछ टिप्पणी और दिल्ली एवं केरल टैक्सी सेवा की तुलना।

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा

वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।।

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yeh chitthi dev bhumi himachal yatra kee phlee kari hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is about about my trip to Dev-Bhumi Himachal. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
सांकेतिक शब्द
। हिमाचल, Himachal,
पसन्द करें – कौन सी मछली खायेंगे
इस चिट्ठी में कोवलम अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र तट की चर्चा है।

त्रिवेन्दम में हम केटीडीसी के होटेल में ठहरे थे। इस होटल के सामने के समुद्र तट  का नाम ‘समुद्र’ था। यह बहुत सुन्दर है पर हमारे टैक्सी चालक प्रवीन के अनुसार,

‘समुद्र तट बहुत जल्दी गहरा हो जाता है और बहुत लहरें आती हैं। इसमें यदि आप अच्छा तैरना नहीं जानते हैं तो नहीं नहा सकते हैं। कोवलम समुद्र तट में पानी जल्दी गहरा नहीं होता है। इसलिए इसमें आप बहुत दूर तक नहाने जा सकते हैं और यदि आपको बहुत अच्छा तैरना नहीं भी आता है तो  भी आप नहा सकतें है। इसमें लहरें भी बहुत ऊँची- ऊँची नहीं आती हैं। इसलिये अधिकतर विदेशी कोवलम समुद्र तट पर जाते हैं। इसे अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र तट भी कहा जाता है। आपको वह तट भी देखना चाहिए।’

हम लोगों ने पहले सोचा था कि कन्याकुमारी से लौटते समय हम लोग कोवलम तट पर भी जायेगें। लेकिन लौटते-लौटते अंधेरा हो गया। इसलिये वहां नहीं जा पाये।

त्रिवेन्डम में काम समाप्त करने के बाद, हम कोवलम समुद्र तट पर गये। हांलाकि, जब हम वहां पहुंचे तब सूरज डूब चुका था पर यह हमारा आखिरी दिन था। हमारे पास इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं था।


कोवलम अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र तट के बारे में, हम लोगों ने कई तरह की बाते सुन रखीं थी पर हमें वैसा कोई दृश्य देखने को नहीं मिला। शायद वहां पहुंचते सूर्यास्त हो चुका था और अन्धेरा शुरू हो गया था।


हम जब कोवलम तट पर पहुंचे तब वहां अंधेरा हो चुका था। इस  कारण समुद्र तट के कोई चित्र नहीं खींच पाये। ऊपर के दोनो चित्र, विकिपीडिया कि सौजन्य से, कोवलम समुद्र तट के हैं।

मेरे बेटे को शर्ट पसन्द है। उसका कहना है कि हम जहां जायें वहां से उसके लिये शर्ट ले आया करें। समुद्र तट पर बहुत सी दुकाने थीं जहां पर शर्ट  मिल रही थीं। हम लोग एक दुकान पर गये वहां पर एक साधारण सी महिला बैठी थी पर जब हमने उससे बात शुरू की तब वह  शुद्घ उच्चारण में अंग्रेजी बोलने  लगी। यहां पर दुनिया भर से, विदेशी आते हैं इसलिये यहां के लोग कई भाषा सीख लेते हैं। मैंने कई दुकानदारों को अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच और स्पैनिश भाषा बोलते सुना।

कोवलम समुद्र तट के किनारे खाने की जगहें थी। हर खाने की जगह की टेबल से समुद्र दिखायी देता था। आप खाना भी खायें और समुद्र का आनन्द भी लें।  

वहां पर बहुत सारे रेस्तरां भी थे। उनके सामने, मछलियां भी रखी रहती थी। आप पसन्द कर लें। वही बना दी जायेगी। मैं स्वयं मछली खाता हूं पर मालूम नहीं क्यों, इस तरह से मछली पसन्द कर, खाने का मन ही नहीं किया।

कोवलम तट का चक्कर लगाने के बाद हम वापस आ गये। हम खाना खा कर, जल्दी सो गये। हमें अगले दिन सुबह ही हवाई जहाज पकड़ना था। इसी के साथ केरल – ईश्वर की भूमि – यात्रा विवरण समाप्त होता है अब हम चलेंगे, देव भूमि हिमाचल की यात्रा पर।

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा
 क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे – महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।। पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं।। कुमाराकॉम पक्षीशाला में।। क्या खांयेगे – बीफ बिरयानी, बीफ आमलेट या बीफ कटलेट।। आखिरकार, हमें प्राइवेट और सरकारी होटल में अन्तर समझ में आया।। भारत में समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं न की निजी।। रात के खाने पर, सिलविया गुस्से में थी।। मुझे, केवल कुमारी कन्या ही मार सके।। आपका प्रेम है कि आपने मुझे अपना मान लिया।। आप,  टाइम पत्रिका पढ़ना छोड़ दीजिए।। पति, पत्नी के घर में रहते हैं।। पसन्द करें – कौन सी मछली खायेंगे।।
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यात्रा विवरण पर लेख चिट्ठे पर अन्य चिट्ठियां

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is chitthi mein mein kovalam anterraashtriya samudra tat kee charchaa hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post talks about International Kovalam beach. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
सांकेतिक शब्द
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पति, पत्नी के घर में रहते हैं
इस चिट्ठी में त्रिवेन्दम में घूमने की जगहों की चर्चा है।
हम केरल घूमने, इसलिये गये थे क्योंकि मुझे त्रिवेन्द्रम में मुझे कुछ काम था। इस काम के लिये, मैंने यात्रा के आखरी दिन, दोपहर के भोजन के बाद, का समय रखा था। हमारे पास सुबह का समय था। हमने वह समय त्रिवेन्द्रम घूमने का प्रोग्राम बनाया। हम लोग सबसे पहले वहाँ के राजा के महल  गये। वहां हमने एक गाइड लिया। उसने बताया,

‘केरल राज्य तीन राज्यों को मिलाकर बना  है। इसकी स्थापना १९५६ में हुई थी। त्रिवेन्द्रम पहले त्रावणकोर राज्य (Travancore State) में था। यहाँ पर राजा का लड़का तो नहीं, पर उस  की बहन का लड़का राजा बनता था।’

महल में बाहर की तरफ उन्नीसवीं शताब्दी की बनी एक खास घड़ी, जिसमें घन्टे के पूरे होने पर उतनी बार ऊपर के बकरों सिर, एक दूसरे से टक्कर मारते हैं।
 
मेरे पूछने पर कि  ऎसा क्यों होता था, तब उसका जवाब था,

’यह इसलिये होता था क्योंकि ट्रावनकोर राज्य मातृ प्रधान राज्य था। यदि परिवार में लड़की नहीं है तो लड़की गोद ले ली जाती थी।’

इसने मुझे शिलॉग में खसी लोगों की याद दिलायी। वह भी मातृ प्रधान समाज है। वहां पर पुरूष अपनी पत्नी का सर नाम रख लेतें हैं और उसी के घर रहने चले जाते  हैं। गाइड के मुताबिक,

‘यहां पुरुष शादी के बाद महिलाओं का सर नेम तो नहीं रखते पर अधिकतर पति, पत्नियों के साथ उनके घर में रहते हैं और यह गलत नहीं समझा जाता है।’

हमारे तरफ तो ऎसे लोगों को घर जमाई कहा जाता है और अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है।
महल को देखते समय गाइड ने यह बताया,

‘इस महल को हजार आदमियों ने मिलकर चार साल में बनाया था। लेकिन राजा इसमे सात महीने ही रह पाये। क्योंकि उनकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद राजा के परिवार वालों ने इस महल को छोड़ दिया। उन्हे लगा कि यह महल अपशकुन है। इसलिए उसके बाद इस महल में कोई नहीं रहा।’

राजा के महल के बगल में ही एक भगवान विष्णु का मंदिर है। इस मंदिर में कोई कोट, पैंट पहनकर नहीं जाया जा सकता है और महिलायें सलवार, कुर्ता पहनकर नहीं जा सकती हैं। इसे देखने जाने के लिए आपको ऊपर के कपड़े उतारने पड़ेगें  और एक धोती पहनकर जाना होगा। महिलायें सलवार, कुर्ता के ऊपर धोती पहन सकती है। 
मुन्ने की मां मंदिर को भीतर से देखने नहीं गयी पर मुझे लगा कि इसे अन्दर से देखना चाहिए।  फिर मुश्किल पड़ी धोती पहनने की। वहां पर धोती  किराये पर भी मिल रही थी पर मैने वहीं पर एक केरल में पहनी जाने वाली शर्ट और धोती  खरीदी। उसे ही पहन कर अन्दर गया।
मन्दिर, अन्दर से बहुत भव्य है। इसमें एक जगह सारी महिलायें भजन गा रही थीं। इसमें, भगवान विष्णु की, शेषनाग की शैय्या पर लेटे हुए मूर्ति है। इस मूर्ति को  एक बार में नहीं देखा जा सकता है। इसके लिऐ कई दरवाजे हैं। 
मैं इस मूर्ति के किसी भाग को नहीं देख पाया क्योंकि वहाँ पर भीड़ थी और मुझे लगा कि यदि में लाइन में खड़ा होऊँगा तो शायद सब समय यहीं पर चला जायेगा। मैंने महल में ही उस मूर्ति का छोटा सा मॉडल  देख लिया था। त्रिवेन्द्रम में एक ताराघर (Planetarium) और चिड़ियाघर (Zoo) भी है। मैं इन्हें भी देखना चाहता था।

मंदिर देखने के बाद, हम लोग ताराघर देखने गये। वहां पता चला कि  केवल एक प्रदर्शन अंग्रेजी में है और बाकी सब मलयालम में हैं। अंग्रेजी का प्रदर्शन बारह बजे था लेकिन वह तभी चलेगा जब कि कम से कम चालीस व्यक्ति देखने के लिए आये। हम लोगों को लगा कि यहां इन्तजार करने से अच्छा है कि हम चिड़िया घर देख लें।
चिड़ियाघर में तरह तरह के जानवर देखने को मिले। मैंने वहां पर जानवरों की तसवीर इस चिट्ठी में प्रकाशित की हैं। चिड़ियाघर में एक बात अजीब लगी। वहां पेड़ों पर बहुत से चमगादड़ लटके थे। हम लोग भोजने के समय वापस आ गये। मुझे अपना काम भी करना था

मुझे काम के बाद, वहां के लोगों ने यादगार के रूप में राजा रवी वर्मा का एक चित्र यादगार के लिये भेंट किया। वे अप्रैल २९,१८४८ में जन्में त्रावणकोर राज्य के चित्रकार थे। उनकी मृत्यु अक्टूबर २, १९०६ में हो गयी।
साड़ी पहने मराठी महिला का चित्र, जो मुझे भेंट में मिला 
रवी वर्मा, महाभारत एवं रामायण की घटनाओं और पारंपरिक परिधान साड़ी पहने भारतीय महिलाओं के सुन्दर चित्र बनाने के लिये जाने जाते हैं। उनके चित्र, भारतीय परम्परा और युरोपीय कला के एकीकरण के, सबसे अच्छे उदाहरण भी हैं। उन्हें १८७३ में वियाना चित्रकला प्रदर्शनी में प्रथम पुरुस्कार भी मिला। उनके अन्य चित्र आप यहां देख सकते हैं।
यदि आप त्रिवेन्दम जायें, तो यह तो हो नहीं सकता कि आप कोवलम समुद्र तट न जांये। अगली बार वहीं चलेंगे।  
कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा
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आप, टाइम पत्रिका पढ़ना छोड़ दीजिए
केरल यात्रा के दौरान, हमने आयुवेर्दिक मालिश का भी अनुभव लिया। इस चिट्ठी में उसी की चर्चा है।

केरल में, तरह-तरह की आयुवेर्दिक मालिश होती है। मैं इसके पहले  तीन बार केरल जा चुका हूं। लेकिन कभी भी मालिश नहीं करवायी थी। मुझे लगा कि इसका भी अनुभव लेना अच्छा रहेगा। 

कन्या कुमारी से लौटते समय हमारा टैक्सी चालक प्रवीन हमें ऐसी जगह ले गया इसका नाम प्रकृति था। वहां पर पहुंचने पर हमारी मुलाकात एक विदेशी जोड़े से हुई। वे इसराइल से आये थे। मैंने उनसे जब मालिश के बारे में पूछा  तो उन्होंने कहा कि उन्हे इसमें बहुत आनन्द आया और हमें भी करवाना चाहिये। 

मैंने टाइम पत्रिका मे पढ़ा था कि इस्रायल में सापों से मालिश होती है। मैंने उनसे पूछा,


‘क्या आपने कभी सापों से मालिश करवायी है?’

उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने सापों की मालिश के बारे में कहां पढ़ा है। मैंने उनसे टाइम पत्रिका के लेख के बारे में जिक्र किया। इस पर उसने मुस्करा कर कहा,

‘मुझे नहीं मालुम कि इस्रायल में कहीं पर सापों से मालिश होती है। आप मेरी बात मानिये,  टाइम पत्रिका पढ़ना छोड़ दीजिए।’

 क्या आप भी सापों से चम्पी कराना चाहेंगे हिम्मत हो तो पहले यह विडियो देख लीजिये।


तेल  मालिश करवाने में एक घण्टे का समय लगा और इसका उन्होंने छ: सौ रुपया लिया। मेरी मालिश करने वाले लड़के का नाम जैकब था। उसने बताया,

‘मैंने मालिश करने की ट्रेनिंग केरल सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कॉलेज से ली है। इसमें बारहवीं पास करने के बाद, डेढ़ साल का कोर्स करना पड़ता है। उसी के बाद आप मालिश कर सकते हैं।’


उसने बताया कि उसने जयपुर और जालंधर मे भी काम किया है। मैंने पूछा कि क्या वहाँ भी केरल की तरह आयुर्वेदिक मालिश होती है। उसने कहा वहां, केरल के लोग ही आयुर्वेदिक मालिश करते हैं।  वह वहां, कई महीनों रहा पर वह केरल का है इसलिये त्रिवेन्द्रम वापस  आ गया है। यह जगह उसकी नहीं थी पर वह उस व्यक्ति के यहां वेतन पर काम करता था, जिसने  सारी सुविधाऐं दे रखी थी।

वहां महिलाओं के लिये भी मालिश करवाने की सुविधा थी। महिलाओं को मालिश करने के लिए कोई  महिला ही रहती है। मुन्ने की मां ने भी मालिश  करवायी। लेकिन उसे मालिश करवाने के बाद, कुछ प्रतिक्रिया हो गयी। उसका बदन लाल हो गया और छाले पड़ गये। इससे मुझे लगा, कि शायद वहाँ पर हर व्यक्ति को मालिश करवाना ठीक नहीं है।

दूसरी बात यह भी लगी कि शायद और सफाई होती तो ठीक रहता। मालिश एक बेंच पर हो रही थी। इस पर एक चादर बिछा था। वह साफ नहीं था। मैंने जैकब से इसके बारे में कहा, तो उसने बताया कि उसने अभी चादर बदली है। लेकिन यह काम मेरे सामने नहीं हुआ था और यह शायद सच नहीं था।da16 Pictures, Images and Photos

 एक अन्य तरह की मालिश – गर्म पत्थरों से

मालिश शुरू करने से पहले जैकब ने मुझे अपने कपड़े उतारने के लिए कहा और एक छोटा सा कपड़ा नीचे व्यक्तिगत भाग पर  बांधने के लिए दिया। जिसने  मुझे  बपचन में फैंटम की पढ़ी हुई कॉमिक्स में  हबशियों की कपड़ों की याद आ गयी।

इस मालिश में उन्होनें काफी तेल डाला।  जब मैं अपने कस्बे में कभी मालिश करवाता हूं तो उसमें इतना तेल नही पड़ता। हाँ यह बात जरूर है कि उनके मालिश करने का तरीका कुछ भिन्न था और उन्होंने पूरे बदन में  तेल लगाया और बदन  के हर भाग में  मालिश की थी।

मुझे इस मालिश के लिये छ: सौ रूपया ज्यादा लगा यदि कोई मुझसे कहता कि तुम फिर वहाँ जाकर मालिश करा लो तो मैं उतना पैसा खर्च करना ठीक न समझता। हांलॉकि अगली बार केरल जाऊँ और मेरे पास समय हो और पैसे की  चिन्ता न हो तो मै शायद इसे पुन: कराने की सोचूं।

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लगता है कि बैटमैन और रॉबिन भी मालिश प्रेमी हैं। 
मैं बैटमैन और रॉबिन कॉमिक्स का प्रेमी हूं पर मालिश का नहीं।

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा

 क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे – महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।। पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं।। कुमाराकॉम पक्षीशाला में।। क्या खांयेगे – बीफ बिरयानी, बीफ आमलेट या बीफ कटलेट।। आखिरकार, हमें प्राइवेट और सरकारी होटल में अन्तर समझ में आया।। भारत में समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं न की निजी।। रात के खाने पर, सिलविया गुस्से में थी।। मुझे, केवल कुमारी कन्या ही मार सके।। आपका प्रेम है कि आपने मुझे अपना मान लिया।। आप,  टाइम पत्रिका पढ़ना छोड़ दीजिए।।

पहला और तीसरा चित्र फ्लिकर के केरल टूरिस्म के पेज से है और वे क्रीएटिव कॉमनस् २.० लाइसेंस के अन्दर है। अन्तिम दो फोटोबकेट से हैं।
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keral mein ayurvedic maalish hoti hai. is citthi mein usee kee charchaa hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.


This post talks about ayurvedic massage in Kerala.  It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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आपका प्रेम है कि आपने मुझे अपना मान लिया
इस चिट्ठी में कन्याकुमारी में घूमने की जगहों का वर्णन है।

कहा जाता है जिस चट्टान पर एक टांग से खड़े होकर  कुमारी कन्या ने अपनी पूजा की,  वहां पर उसका एक निशान बना हुआ है। स्वामी विवेकानंद उस निशान को देखने के लिए वहां गये जिससे  उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी  चट्टान पर  विवेकानंद रॉक मेमोरियल बना हुआ है। यह जगह देखने लायक है। 

विवेकानन्द रॉक मेमोरियल के बगल की चटटान पर एक बहुत ऊंची सी मूर्ती सन्त थिरूवलुवर की भी है इसे तमिलनाडू सरकार द्वारा बनवायी गयी है।  विवेकानंद रॉक मेमोरियल देखने जाने के लिए स्टीमर से जाना पड़ता है। यह स्टीमर पहले आपको विवेकानन्द रॉक मेमोरियल पर छोड़ता है। इसके बाद यह सन्त थिरूवलुवल की चट्टान पर छोड़ता है फिर वापस लाता है। यह चक्कर लगाता रहता है कोई चाहे तो वहां रूक कर उसके अगले चक्कर में चढ़े या बैठा रहे।

विवेकानन्द रॉक मेमोरियल पहुंचते  समय तक काफी धूप हो गयी थी। वहां हमे जूते उतारने पड़े। इस कारण वहां चलने में मुश्किल हुयी, पैर में छाले से पड़ने लगे। विवेकानन्द रॉक मेमोरियल के बाद जब वह हमें सन्त थिरूवलुवर मूर्ति की  चट्टान पर  ले जाने लगा तो हम लोग वहां नहीं उतरे। क्योंकि यहां पर भी जूते उतारने थे।  हमें लगा कि अब नंगे पैर न चल पायेंगे। हमने इस मूर्ति को दूर से ही देखा। 


गांधी जी की अस्थियां विसर्जित होने के लिए कन्या कुमारी इसलिये लाई गयीं थी क्योंकि वहां पर  तीन समुद्रों, अरेबियन सागर, हिन्द महासागर, और बंगाल की खाड़ी-का संगम है। वहां  जिस जगह पर उनका अस्थि कलश रखा गया था वहां पर  गांधी मेमोरियल मंडपम बना है।


यह मंडपम जमीन से ८९ फिट ऊंचा है।  यह इसलिए है क्योंकि महात्मा गांधी भी ८९ साल तक जीवित रहे।

इस मंडपम की खास बात यह है कि इसका दरवाजा मंदिर जैसा है। अंदर की ओर, यह एक मस्जिद की तरह  बना हुआ है तथा ऊपर की तरफ,  यह  चर्च की स्टाइल में है।  महात्मा गांधी सब धर्मो का समावेश चाहते थे। इसलिये इसे इस तरह का बनाया गया है कि उनके दर्शन को ठीक प्रकार से दिखा सके।

जहां पर मंडपम में, उनका अस्थि कलश रखा गया था वहां पर  स्तंभ सा बना हुआ है।  इसके ऊपर एक छेद है वह छेद इस तरह से बनाया गया कि दो अक्टूबर के दिन, १२ बजे सूरज की रोशनी उसी स्तम्भ पर गिरती है लेकिन किसी अन्य दिन सूरज की रोशनी अंदर नहीं आती है। बरसात का पानी भी, इस छेद से  अंदर नहीं आ पाता है।  

गांधी मेमोरियल मंडपम देखते देखते दोपहर हो गयी, भोजन का समय हो रहा था। गर्मी भी बहुत बढ़ गयी थी और हम लोग थक गये थे। मैने प्रवीन से किसी साफ सुथरी शाकाहारी भोजन मिलने की जगह ले चलने को कहा।  प्रवीन हमें एक गुजराती भोजनालय में ले गया। 

भोजनालय में हमें लोग गुजराती समझ बैठे और गुजराती में बात करने लगे। मैंने उनसे माफी मांगी और कहा कि मुझे गुजराती नहीं आती है। उन्होंने आश्चर्य से पूछा,

‘क्या आप गुजराती नहीं हैं?’

मैंने कहा नहीं, यह तो आपका प्रेम है कि आपने मुझे अपना मान लिया। इसके बाद हमने हिन्दी में बात की। मुझे इसी तरह का अनुभव, कश्मीर यात्रा के दौरान गुलमर्ग मे भी हुआ

भोजनालय बहुत साफ था। वहां पर गुजराती तरह का भोजन मिल रहा था। ६० रू० में एक थाली और  आप जितना चाहें उतना खा सकते थे। खाना भी बहुत स्वादिष्ट था। 
 

उस दिन एक खास तरह की स्वीटडिश,  पूरणपोली बनी थी जिसे लेने के लिए २० रू० और देने पड़ते थे। मैंने ये नाम कभी नहीं सुना था इसलिए सोचा कि इसे भी चख कर देखना चाहिए। संजय जी ने मुझे बताया,

‘यह एक प्रकार का “स्टफ्ड” पराठा है। भीगी चने की दाल को पीस कर सेका जाता है, कुछ कुछ हलवे जैसी प्रक्रिया होती है। फिर इस मीठे “पेस्ट” जिसे पूरण कहा जाता है, गेहूँ के गुंदे आटे की लोईयों में भर कर बेला जाता है फिर पराठे की तरह सेका जाता है। जो तैयार मीठा भरवाँ पराठा तैयार हुआ वह पुरणपोली कहलाता है। यह मुझे यह खास पसन्द नहीं है।’

मुझे तो यह खाने में मीठी लगी इसलिये इसे न खा सका।

कन्याकुमारी में देवी कुमारी का मंदिर, कामराज मेमोरियल कुमारी हाल आफ हिस्ट्री, लेडी ऑफ रैनसम (Lady of Ransom)  भी देखने की जगहें हैं। खाना खाने के बाद, इसमें से कुछ जगह तो हमने देखी और कुछ जगह नहीं जा पाये और वापस त्रिवेन्द्रम आ गये। 

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा

 क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे – महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।। पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं।। कुमाराकॉम पक्षीशाला में।। क्या खांयेगे – बीफ बिरयानी, बीफ आमलेट या बीफ कटलेट।। आखिरकार, हमें प्राइवेट और सरकारी होटल में अन्तर समझ में आया।। भारत में समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं न की निजी।। रात के खाने पर, सिलविया गुस्से में थी।। मुझे, केवल कुमारी कन्या ही मार सके।। आपका प्रेम है कि आपने मुझे अपना मान लिया।।

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