मेरी श्रृंखला ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ के बारे में लोगों को गलतफहमी है। यह चिट्ठी किसी को दुख पहुंचाने के लिये नहीं लिखी गयी थी। यह चिट्ठी यही बताती है। There is misconception about my series ‘Jyotis, Hasrekha vidya, Aur tone tutke’; It was not written to hurt anyone. This post explains the same. meri shrankhla ‘jyotish, hasrekha vidya, aur tone totke’ ke bare mein logon ko galatphahmee hai. yeh shrkhla kisee ko dukh phunchane ke liye nheen likhee gayee thee; yeh chitthi isee ko btatee hai 
Posts Tagged "विज्ञान"
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| फिल्म ‘इंडिपेंडेन्स डे’ से |
‘उन्मुक्त जी, कौन है वह व्यक्ति? क्या चिट्ठकार है? ज्लदी बताइये, उसे बधाई तो दे दें।’
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| चित्र इंस्टिट्यूट ऑफ एडवान्सड स्टडीज़ की वेबसाइट से |
कोर्ट गर्डल का जन्म २८ अप्रैल १९०६ में , बर्नो चेक रिपब्लिक (Czech Republic) में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ायी वियान ऑस्ट्रिया में पूरी की पर बाद में इंस्टिट्यूट ऑफ एडवान्सड स्टडीज़, प्रिंक्सटन चले गये। वहीं उनकी मृत्यु १४ जनवरी १९७८ में हो गयी।
‘उन्मुक्त जी आपका शीर्षक तो है “तू डाल डाल, मैं पात पात” हम तो समझे कि यहां कुछ छकने, छकाने की बात होगी। लेकिन आप तो चालू हो गये तर्क शास्त्री कोर्ट गर्डल की बात करने। मालुम नहीं पहला चित्र क्या है, लगता है कि कहीं लड़ाई हो रही है।
हमें तो आप “द ऐबसेन्ट माइंडेड प्रोफेसर” फिल्म की याद दिला रहे हैं। आपको याद है वह फिल्म। आप शीर्षक कुछ देते हैं, लिखने कुछ और लग जाते हैं।’
मुझे ‘द ऐबसेन्ट माइंडेड प्रोफेसर’ फिल्म की बहुत अच्छी तरह से याद है। यह १९६१ में बनी वॉल्ट डिज़नी की लोकप्रिय फिल्मों में से एक है। इसे मैंने चौथी या पांचवी कक्षा में पढ़ते समय देखा था।
कौन भूल सकता है उस प्रोफेसर को, जिसने भूल से, उड़ते रबर (flying rubber) (flubber) (फ्लबर) का आविष्कार कर लिया था। इसी रोमांच में वह अपनी शादी की तारीख भूल गया। बस, गुस्से में, उसकी मंगेतर ने शादी तोड़ दी और वह किसी अन्य से दोस्ती का दिखावा करने लगी। फिल्म में, फल्बर के साथ प्रोफेसर के रोमांचकारी किस्से और अपने प्यार को वापस पाने की कहानी है। कितनी प्यारी फिल्म थी, आज भी याद है।
यह फिल्म, सैमुएल टेलर की विज्ञान कहानी ‘अ सिचुऐशन ऑफ ग्रैविटी’ (A Situation of Gravity by Samuel W Taylor) नामक कहानी के ऊपर बनी है। इसके बाद १९६३ में वॉल्ट डिज़नी ने इसकी ऊत्तर कथा फिल्म ‘सन ऑफ फल्बर’ (Son of Flubber) बनायी। यह श्याम-श्वेत फिल्में थीं। कुछ साल पहले, ‘ऐबसेन्ट माइंडेड प्रोफेसर’ को नये सिरे से रंगीन फिल्म फल्बर नाम से बनाया गया। मुझे याद है यह सब।
मैं बहुत कुछ हूं, मेरे चिट्ठियां इसकी गवाह हैं पर मैं भुलक्कड़ नहीं हूं। यह शीर्षक है, मेरी नयी श्रंखला का जो मैं साइबर अपराधों और कंप्यूटर हैकर के बारे में लिख रहा हूं। मैंने जानबूझ कर यह शीर्षक दिया है और ‘इंडिपेंडेन्स डे’ फिल्म का चित्र लगाया है।
‘उन्मुक्त जी, अब समझ में आया कि आपने इस श्रंखला का नाम “तू डाल डाल, मैं पात पात” क्यों रखा। चोर-सिपाही के खेल में, अक्सर चोर सिपाही से एक कदम आगे रहते हैं। कंप्यूटर हैकर भी, कंप्यूटर विशेषज्ञयों से आगे रहते हैं। इसलिये आपने इस श्रंखला का यह नाम रखा है। है न सही?’
‘क्या खाक सही फरमाया उन्मुक्त जी―पैर कब्र में जा रहे हैं लेकिन मज़ाक करने की आदत नहीं गयी। कोर्ट गर्डल या इस इस चित्र का, इस विषय से क्या समबंध। हमें बेवकूफ न बनाइये।’
अगली बार हम बात करेंगे कि कोर्ट गर्डल क्यों प्रसिद्ध हैं, उनके बारे में कुछ चर्चा, और
मुझे यह श्रृंखला लिखने का विचार कैसे आया।
इस चिट्ठी में बीबीसी पर बेहतरीन विज्ञान श्रृंखला वंडरस् औफ द सोलर सिस्टम के बारे में और उससे पैदा हुऐ विवाद के बारे में चर्चा है।
is citthi mein bbc per chal rahee behtreen shrnkhala Wonders of the Solar System aur us per huai vivaad kee charchha hai.
This post talks about excellent BBC science series Wonders of the Solar System and controversy generated by it.
देखें।
पाश्चात्य देशों में, डार्विन के विकासवाद का विरोध हुआ। अमेरिका में यह अब भी जारी है। हिन्दुओं में यह विरोध नहीं हुआ। ऐसा क्यों है?
मुझे लगता है कि हिन्दूओं में सृष्टि रचना के बारे में कई विचारधारायें हैं। इनके बारे में, मैंने अपनी चिट्ठियों में लिखा है। इन कहानियों में, एक में तो सृजनवाद है पर किसी और में नहीं – शायद यही कारण हो कि हिन्दुओं में डार्विन के विकासवाद का विरोध नही हुआ। इस बारे में जब मैंने विस्तार से जानना चाहा तो कुछ यह पता चला।
मेरे पिता के अनुसार, पतञ्जलि का योग दर्शन कुछ और नहीं पर डार्विन का विकासवाद है। विकिपीडिया में कुछ भी कुछ इस तरह के भी विचार हैं कि स्वामी विवेकानन्द ने, पतञ्जलि के योगसूत्र पर लिखते हुऐ कहा है कि अद्वैत वेदान्त का विकासवाद, डार्विन के विकासवाद के सिद्धान्त के अनुरूप है। भारतीय दर्शन या पतञ्जलि का योग दर्शन मैंने नहीं पढ़ा है। इसे पढ़ने का प्रयत्न किया। लेकिन मुझे यह मुश्किल लगा। मुझे अच्छा लगेगा यदि दीपक भारतीय जी, या कोई अन्य चिट्टाकार बन्धु इसकी आसान शब्दों में व्याख्या कर, लिखे।
एक अन्य विचारधारा के अनुसार, सृजनवाद पढ़ाना और डार्विन का विरोध – ईसायित से जुड़ गया है। इसका विरोध ईसायित का समर्थन समझा जाने लगा। इसलिये और धर्मों में, डार्विन के विकासवाद का विरोध नहीं के बराबर हुआ।
अरविन्द मिश्र जी ने मेरा ध्यान, जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ (The Discovery of India published by Oxford University Press) पर दिलाया। इसके पेज ११६ पर नेहरू जी लिखते हैं,
‘Nevertheless the Old Indians, unlike the other ancient nations, had vast conceptions of time and space. They thought in a big way. Even their mythology deals with ages of hundreds of millions of years. To them the vast periods of modern geology or the astronomical distances of the stars would not have come as surprise. Because of this background, Darwin’s and other similar theories could not create in India the turmoil and inner conflict which they produced in Europe. The popular mind in Europe was used to a time scale which did not go beyond a few thousand years.’
प्राचीन भारतीय, अन्य देशों की तरह से नहीं थे। उन्हें दूरी एवं यगान्तर का ज्ञान था। वे बड़ी तरह से सोचते थे। हमारे पुराण खरबों साल की बात करते हैं। हमें भूगर्भशास्त्र में लम्बे समय के कालचक्र या तारों की दूरी से, कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यही कारण है कि डार्विन के या इस तरह के अन्य सिद्धान्त ने उस तरह की मुश्किल नहीं खड़ी की, जैसा युरोप में हुआ। युरोप के लोगों के दिमाग में, इतने बड़े समय का विचार ही नहीं था। वे केवल कुछ हज़ार साल के बारे में सोचते थे।
इस श्रंखला की तीन चिट्ठियां हिन्दूओं में सृष्टि रचना के बारे में यहां, यहां, और यहां लिखी हैं। इन चिट्ठियों और इस चिट्ठी पर अशोक पाण्डेय जी, दीपक भारतीय जी, ने इस तरफ इशारा किया है।
कुछ समय पहले यात्रा करते समय एक ज्ञानी जन से मुलाकात हुई। उनसे इस विषय पर चर्चा होने लगी। उन्होंने बताया कि पुराणों में भगवान के २४ अवतारों का वर्णन है। इसमें भगवान विष्णु के १० अवतार मुख्य हैं यह दस कुछ इस तरह से हैं
- मत्स्य (मछली) पानी में रहने वाले जीव;
- कच्छप kchchhp (कछुआ) उभयचर जन्तुओं की उत्पत्ति;
- वाराह Varaah (सुअर) – जमीन के जानवरों की उत्पत्ति;
- नृसिंह Narasingh – आधे मानव;
- वामन – बौने मानव;
- परशुराम – पूर्ण विकसित मानव;
- राम Rama – मानव, शस्त्रों के साथ;
- कृष्ण – मानव, संगीत के साथ;
- गौतम बुद्ध Budhha – शांति और करुणा का प्रतीक;
- कल्कि Kalki – शायद यह ८४ हज़ार साल बाद आना है। इसी के साथ कलियुग की समाप्ति है और एक चक्र पूरा होगा।
यह वही क्रम है जो डार्विन के विकासवाद में, जीवों की उत्पत्ति का क्रम है। उन सज्जन के मुताबिक डार्विन के विकासवाद का विरोध इसी कारण नहीं हुआ क्योंकि इसे हमारे पुराणों में, इसे पहले से ही बताया गया है।
इन दस अवतारों में तीसरे के बारे में कछ बहस है। कुछ का कहना है कि वाराह अवतार तीसरा न होकर पहला है। जो इसे पहला अवतार कहते हैं वे इसे पृथ्वी की रचना से जोड़ते हैं न कि जमीन के जानवरों की उत्पत्ति से।
कुछ दिन पहले, मैंने साइंटिफिक अमेरिकन के नवंबर २००९ के अंक में ‘Rethinking “Hobbits”: What They Mean for Human Evolution‘ नामक एक लेख पढ़ा।
‘उन्मुक्त जी, क्या इस लेख का संबन्ध, भगवान विष्णु के १० अवतारों से है?’
शायद, मेरे भाई, मेरी बहना इतनी जल्दी में क्यों रहते हैं। कुछ तो इंतज़ार करिये।
सन २००४ में, इंडोनीशिया के लॅसर सुन्दा द्वीप समूह के फलॉरस् द्वीप की, लिएंग बुआ गुफा में कुछ अस्थि पंजर मिले थे। साइंटिफिक अमेरिकन का उक्त लेख, उन्हीं के बारे में था। इस अस्थिपंजर को, इस गुफा के नाम पर, एलबी१ (LB1) का नाम दिया गया। यह अस्थिपंजर, हजारों साल पहले के लुप्त मानव के हैं। चूंकि यह फलॉरस् द्वीप पर मिलें हैं। इसलिये इनका वैज्ञानिक नाम होमो फ्लॉरेसिएन्सिस रखा गया। लेकिन इनका लोकप्रिय नाम, यह नहीं है। इन्हें जेआरआर टोकियन के लोकप्रिय उपन्यासों के मानव, हॉबिट के नाम से जाना जाता है। क्या आपको मालुम है कि ऐसा क्यों है?
टोकियन ने, हॉबिटों के बारे में चर्चा, सबसे पहले बच्चों के लिये लिखे उपन्यास ‘द हॉबिट’ में की थी। इसके बाद इनकी चर्चा, लॉर्ड ऑफ रिंगस् की तीन पुस्तकों (Triolgy) में की। यह ऐसी सभ्यता है, जिसमें बौने (तीन से चार फीट के बीच) रहा करते हैं। इन बौनो को, उन्होंने हॉबिट (Hobbit) कहा। इंडोनीशिया में मिले होमो फ्लॉरेसिएन्सिस के अस्थिपंजर यह बताते हैं कि यह भी बौने थे और उनकी लम्बाई तीन से चार फीट के बीच थी। इसलिये इनका लोकप्रिय नाम हॉबिट है। क्या यह आपको किसी और की याद दिलाते हैं?
क्या आपको इनका संबन्ध हिन्दू धर्म से लगता है? क्या भगवान विष्णु का चौथा अवतार होमो फ्लॉरेसिएन्सिस से प्रेरित था? क्या भगवान के विष्णु के अवतार, डार्विन के विकासवाद को नहीं बताते हैं? मैं कह नहीं सकता, कुछ उलझन में फंस गया हूं।
चलते चलते, एक दिन मित्र मंडली के साथ डार्विन पर चर्चा हो रही थी। मेरे शायर दोस्त ने, अकबर इलाहाबादी का यह शेर सुनाया,
हज़रते डार्विन, हकीकत से बहुत दूर थे।
हम न मानेंगे, हमारे मूरिसान [पूर्वज] लंगूर थे।
यह श्रंखला तो पहले समाप्त हो गयी थी यह तो केवल पुनः लेख था। कोशिश करता हूं कि किसी नयी श्रृंखला के साथ मुलाकात करूं। लेकिन समय आभाव के कारण कुछ मुश्किल लग रहा है।
क्या आपने कभी विकासवाद क्यों सही है और सृजनवाद गलत इस बात को रैप नृत्य के साथ देखा है। नहीं न तो यहां इसका मजा लें।
डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल – व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।। मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है।। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी।। विकासवाद पढ़ाना मना करना, मज़हबी निष्पक्षता का प्रतीक नहीं।। सृजनवाद धार्मिक मत है विज्ञान नहीं है।। ‘इंटेलिजेन्ट डिज़ाईन’ – सृजनवादियों का नया पैंतरा।। यू हैव किल्ड गॉड, सर।। हम न मानेंगे, हमारे मूरिसान लंगूर थे।।
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। Hindi Podcast, हिन्दी पॉडकास्ट,
यह चिट्ठी सालों पुराने पानी संचय करने के तरीके को बता रही है। यह आज भी प्रसांगिक है।
yeh chitthi puraane paani sanchay karne ke treeke ko bataa rahee hai. yeh aaj bhee prasangik hai.
This post talks about old method of harvesting water that is still relevant today 
यह चिट्ठी ‘सृष्टि दर्शन: समुद्र मथंन से – विकसित होता ब्रह्माण्ड’ और ‘हमारा जाना ब्रह्माण्ड’ नामक प्रलेखी फिल्म के बारे में बता रही है।
yh chitthi ‘Visions of the Cosmos: From the Milky Ocean to an Evolving Universe’ aur ‘The Known Universe’ naamak documentary ke baare mein bataa rahee hai.
This post talks about exhibition ‘Visions of the Cosmos: From the Milky Ocean to an Evolving Universe’ and documentary film ‘The Known Universe’.
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न्यायालय से पटखनी खाने के बाद भी कट्टरवादियों ने हार नही मानी। वे किसी तरह से ऎसे कानून बनाने पर जोर दे रहे हैं जिससे कि लगे कि डार्विन का विकासवाद का सिद्वान्त गलत है। अमेरिका के ऎलाबामा (Alabama), फ्लोरिडा (Florida), मिशिगन (Michigan), मिसूरी (Missouri), और साउथ कैरोलाइना ( South Carolina) राज्यों में इस तरह के कानून लाये गये पर वे पास नहीं हो पाये और २००८ में मृत हो गये पर जून २००८ में, लूज़िआना राज्य में ‘साइन्स एजूकेशन ऐक्ट’ (Science Education Act) पारित किया गया है। यह पुन: विद्यार्थियों में सृजनवाद पढ़ाने के रास्ते खोल सकता है। इस अधिनियम की सारे वैज्ञानिकों ने निन्दा की है। अफसोस की बात यह है कि इसे भारतीय मूल के बॉबी ज़िन्दल ने हरी झंडी दी है।
डार्विन के जीवन पर इस साल एक नयी फिल्म ‘क्रिएशन’ (Creation) नाम से बनी है। इसमें डार्विन और उसकी पत्नी ऐमा की भूमिका, पॉल बेटॅनी और जेनिफर कॉनेली ने निभायी है जो कि वास्तविक जीवन में भी पति और पत्नी हैं। यह फिल्म अमेरीका में नहीं दिखायी जा रही है। वहां पर कोई भी फिल्म वितरक इसे वितरण के लिये नहीं लेना चाहता है। उन्हें डर है कि सृजनवादी इसके खिलाफ धरना देगें, प्रदर्शन करेंगे। इस फिल्म में एक जगह एक थॉमस हेनरी हक्सले डार्विन से कहता है
‘All mighty can no longer claim to have authored every species under a week.
You have killed God, Sir’
लोग, डार्विन के सिद्धांत को इसी तरह से समझते हैं। इसलिये, यदि आप कट्टरवादी हैं तो आपको उसका सिद्धांत, यह फिल्म विवादास्पद लगेगी। इस चिट्ठी का शीर्षक मैंने इसी डायलॉग से लिया है। इस फिल्म का ट्रेलर देखिये – आपको पसन्द आयेगा। मैंने जिस डायलॉग की चर्चा की है वह भी इसमें है।
चर्च आफ इंग्लैंन्ड ने, डार्विन के प्रति किये गये अन्याय पर माफ़ी मांग ली। उनका कहना है कि डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत उनके मज़हब के विरूद्ध नहीं है। वे प्रयत्नशील है कि किसी तरह यह लड़ाई समाप्त हो पर कट्टरवादी कहीं भी हो, किसी भी धर्म के हों, जब वे हाथ से बाहर निकल जाते है तो किसी की भी नहीं सुनते हैं। क्या वे तर्क को, सबूतों को, विज्ञान को समझेंगे या फिर क्ट्टरवादिता, विज्ञान पर विजय प्राप्त कर लेगी? क्या क्रिएशन फिल्म अमेरिका में प्रदर्शित हो पाएगी? लगता नहीं कि ऐसा हो पायेगा
‘उन्मुक्त जी यह आप कैसे कह सकते हैं?’
मैं तो यह ब्रिटिश काउंसिल (British Council) की प्रार्थना पर इप्सॉस मोरी (Ipsos MORI) के द्वारा डार्विन के ऊपर किये गये सर्वे के कारण कहता हूं। इसका डाटा आप यहां से डाउनलोड कर सकते हैं। इसका कुछ अंश मैं यहां प्रदर्शित कर रहा हूं।
| १ | २ | ३ | ४ |
| देश | विकासवाद वैज्ञानिक तथ्य हैं हां/ नहीं | विकासवाद और ईश्वर - दोनो सम्भव | विकासवाद अन्य सिद्धान्तों के साथ |
| अर्जेनटीना | ४४/ ७ | ६२ | २३/ ६५ |
| चीन | ५५/ ७ | ३९ | १९/ ४२ |
| मिस्र | ८/ १९ | ४५ | १८/ १ |
| इंगलैंड | ५१/ ७ | ५४ | २१/ ५४ |
| भारतवर्ष | ३८/ २ | ८५ | ३७/ ४० |
| मेक्सिको | ५२/ ९ | ६५ | २८/ ५६ |
| रूस | ३९/ ८ | ५४ | १०/ ५३ |
| द. अफ्रीका | ८/ ४ | ५४ | ११/ २९ |
| स्पेन | ३९/ ५ | ४६ | ३४/ ३१ |
| अमेरिका | ३३/ २४ | ५३ | २१/ ५१ |
यह चार्ट प्रतिश्त में है। इससे पता चलता है कि यद्यपि ‘विकासवाद के लिये वैज्ञानिक तथ्य हैं’ (कॉलम १) का प्रतिशत ‘विकासवाद के लिये वैज्ञानिक तथ्य नहीं हैं’ से केवल मिस्त्र (Egypt) को छोड़ कर बाकी देशों में ज्यादा है फिर भी ‘ईश्वर एवं विकासवाद पर एक साथ विश्वास किया जा सकता है’ (कॉलम २) से कम है और ‘विकासवाद व अन्य सिद्धान्त पढ़ाये जाने चाहिये’ (कॉलम ३) का प्रतिशत ‘केवल विकासवाद पढ़ाया जाना चाहिये’ के प्रतिशत से, स्पेन को छोड़, सब देशों में अधिक है।
कहावत है कि झूट, होता है, फिर सफेद झूट , फिर सांख्यिकी – आंकड़े अक्सर गलत बताते हैं। ईश्वर करे कि यह सही हो
ऐसे खबर है कि भारतीय और चीनी विद्यार्थियों को सृजनवाद भा रहा है। विश्वास नहीं, तो अन्तरजाल पर घूम रहा कार्टून देखिये।
आज दिवाली है – विजय का त्योहार: ज्ञान की अज्ञानता पर, धर्म की अधर्म पर, रोशनी की अंधकार पर – इसी पर्व पावन पर यह श्रंखला इस आशा के साथ समाप्त होती है कि विज्ञान की धार्मिक कट्टरता पर विजय होगी। आपको दीपवली शुभ हो।
मैं बहुत जल्दी आपको दो नयी श्रंखला में ले चलूंगा। पहली में हम बात करेंगे एक ऐसे उपन्यास और उससे जुड़ी कहानियों के बारे में है जो न केवल २०वीं शताब्दी के उत्कृष्ट अमेरिकन साहित्य में गिना जाना जाता है पर, मेरी बिटिया रानी के अनुसार, जिसे अमेरिका के कॉलेज जाने वाले प्रत्येक विद्यार्थी ने कम से कम एक बार पढ़ा है और दूसरी में, मैं आपको देव भूमि हिमाचल की यात्रा में ले चलूंगा।
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मज़हबी कट्टरवादियों ने १९८९ में एक पुस्तक प्रकाशित की। इसका नाम ‘ऑफ पांडास् एण्ड पीपल’ है। इसमें सिद्वान्त तो सृजनवाद का ही है पर सृजनवाद की जगह ‘इंटेलिजेन्ट डिज़ाईन’ (Intelligent Design) शब्द का प्रयोग किया गया है। इन लोगों ने स्कूलों को निम्न तरह की यह नीति निर्णय लेने के लिए बाध्य किया,‘The Pennsylvania Academic Standards require students to learn about Darwin’s Theory of Evolution and Case eventually to take a standardized test of which evolution is a part.Because Darwin’s Theory is a theory, it continues to be tested as new evidence is discovered. The Theory is not a fact. Gaps in the Theory exist for which there is no evidence. A theory is defined as a well-tested explanation that unifies a broad range of observations.Intelligent Design is an explanation of the origin of life that differs from Darwin’s view. The reference book, Of Pandas and People, is available for students who might be interested in gaining an understanding of what Intelligent Design actually involves.With respect to any theory, students are encouraged to keep an open mind. The school leaves the discussion of the Origins of Life to individual students and their families. As a Standards-driven district, class instruction focuses upon preparing students to achieve proficiency on Standards-based assessments.’
‘स्कूल में डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत पढ़ाया जा सकता है। लेकिन शिक्षक उसको पढ़ाने के पहले विद्यार्थियों को बतायें कि यह केवल सिद्धांत है और इस सिद्धांत का कोई तथ्य नहीं है।
इंटेलीजेंट डिज़ाइन सिद्धांत भी प्राणियों की उत्पत्ति के बारे में बताता है और यह डार्विन के विकासवाद से भिन्न है। इस बारे में ‘ऑफ पांडास एण्ड पीपल’ नामक पुस्तक विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध है जो इस सिद्वान्त के बारे में बताती है।
विद्यार्थियों से कहा जाता है कि वे अपने मस्तिष्क को खुला रखे। इस बारे में, विद्यालय विद्यार्थियों को उनके एवं परिवार के विवेक पर छोड़ते है।’
यह नीति बहुत सारे स्कूलों में लागू कर दी गयी। कुछ अभिभावकों ने इस नीति निर्णय को न्यायालय के समक्ष चुनौती दी। 
अमेरिका के पेन्सिलवेनिया राज्य के परीक्षण न्यायालय ने, टैमी किट्ज़मिलर बनाम डोवर एरिया स्कूल डिस्ट्रिक्ट मुकदमें में, दिनांक २० दिसम्बर,२००५ को अपना फैसला देते हुऐ घोषणा की,
‘A declaratory judgement is issued in favour of Plaintiff … that Defendant’s [School's] policy violates the First Amendment of the Constitution of the United States and Article 1& 3 of the Constitution of the Commonwealth of Pennsylvania.… Defendants are permanently enjoined from maintaining ID Policy in any school within Dover Area District.’यह नीति अमेरिका के प्रथम संशोधन का उल्लघंन करती है, और असंवैधानिक है।
विपक्ष पक्ष को आदेशित किया जाता है कि वे इस नीति को डोवेर क्षेत्र के किसी भी स्कूल में लागू न करें।
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लूज़िआना (Louisiana) राज्य ने, बैलेन्सड ट्रीटमेन्ट फॉर क्रिएशन-साइंस एण्ड इवोल्यूशन- साइंस ऐक्ट (Balanced Treatment for Creation-Science and Evolution-Science in Public School Instruction Act) नामक कानून बनाया। मोटे तौर पर यह कहता था कि,
‘डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को स्कूलों में न पढ़ाया जाए। यदि स्कूलों में डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को पढ़ाया जाता है तो सृजनवाद का सिद्धांत भी पढ़ाया जायेगा।’
इस कानून को डोनाल्ड एग्वीलार्ड (Donald Aguillard) नामक शिक्षक ने चुनौती दी। यह कानून न केवल लूज़िआना के सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा, पर अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक करार दिया गया। अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय में, न्यायालय के मित्र के रूप में, एग्वीलार्ड के समर्थन में ७२ नोबल पुरस्कार विजेताओं ने, राज्य सरकार की १७ विज्ञान परिषदों और ७ अन्य विज्ञान संगठनों ने, अपने विचार रखे कि क्रिएशन-साइंस धार्मिक मत है।
अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने एडवार्ड बनाम एगिलार्ड (Edwards V Aguillard) (482 US 578 96 L Ed 2d 510) ने १९ जून,१९८७ को अपना निर्णय देते हुए कहा कि,
‘The Louisiana Creationism Act advances a religious doctrine by requiring either the banishment of the theory of evolution from public School classrooms or the presentation of a religious viewpoint that rejects evolution in its entirety.The Act violates the Establishment Clause of the First Amendment because it seeks to employ the symbolic and financial support of government to achieve a religious purpose.’लूज़िआना ‘सृजनवाद कानून’ एक मज़हबी सिद्धांत को यह कहकर आगे बढ़ाता है कि, विकासवाद के सिद्धांत को न पढ़ाया जाए और यदि पढ़ाया जाए तो मज़हबी दृष्टिकोण भी बताया जाए जो कि विकासवाद को नकाराता है।
यह कानून पहले संशोधन का इसलिए उल्लंघन करता है क्योंकि यह एक तरह से मज़हब के लिए सरकारी सहायता उपलब्ध कराने की चेष्टा करता है।
मज़हबी कट्टरवादियों ने हार नहीं मानी। उन्होनें अपना पैंतरा बदल दिया। अब उन्होंने क्या रास्ता अपनाया यह अगली बार।
डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल – व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।। मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है।। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी।। विकासवाद पढ़ाना मना करना, मज़हबी निष्पक्षता का प्रतीक नहीं।। सृजनवाद धार्मिक मत है विज्ञान नहीं है।।
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मंकी ट्रायल का फैसला लगभग चालिस साल तक लागू रहा। अमेरिका के कई राज्यों में, डार्विन के विकासवाद सिद्धांत को पढ़ाने से मना करने वाले कानून चलते रहे। ऐरकेनसाज़ (Arkansas) भी अमेरिका का राज्य है। इसमें भी इस तरह का कानून था।
सूसन एपर्सन, लिटिल रॉक (पुलास्की कॉउंटी) के सेन्ट्रल हाई स्कूल {Central High School in Little Rock (Pulaski County)} में जीव विज्ञान की अध्यापिका थीं। उन्होंने डार्विन के विकासवाद सिद्धांत को पढ़ाने से मना करने वाले कानून को चुनौती दी।
अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को सर्वसम्मति से एपर्सन बनाम ऎरकेनसाज़ (Epperson V Arkansas: 393 US 97: 21 LEd 2d 228) में गैरकानूनी ठहराया। न्यायालय ने दिनांक १२ नवम्बर, १९६८ के फैसले में कहा,
‘Arkansas’ law cannot be defended as an act of religious neutrality. Arkansas did not seek to excise from the curricula of its schools and universities all discussion of the origin of man. The law’s effort was confined to an attempt to blot out a particular theory because of its supposed conflict with the Biblical account, literally read. Plainly, the law is contrary to the mandate of the First, and is violation of the Fourteenth, Amendment to the Constitution.’ऐरकेनसाज़ राज्य के कानून का बचाव, यह कह कर नहीं किया जा सकता है कि यह मज़हब निष्पक्षता का प्रतीक है। यह कानून अपने राज्य में प्राणियों के उत्पत्ति के बारे में पढ़ाने के लिए नहीं मना करता है। यह कानून उस सिद्धांत को पढ़ाने के लिए मना करता है जो बाईबिल के विरूद्ध है। यह न केवल पहले पर चौदहवें संशोधन के अन्दर असंवैधानिक है।
इस मुकदमें के निर्णय के साथ, अमेरीकी न्यायालय ने अपने ऊपर लगे धब्बे को साफ किया। लेकिन अमेरिका में इस ईसाई धर्म के अनुयायी लोगों ने, अपनी बात को कानूनी जामा पहनाने का दूसरा रास्ता अपनाया। क्या था यह रास्ता क्या उसमें सफलता मिली - अगली बार, हम लोग उसी की चर्चा करेंगे।
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल – व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।। मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है।। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी।। विकासवाद पढ़ाना मना करना, मज़हबी निष्पक्षता का प्रतीक नहीं।।
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