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	<title>उन्मुक्त - Unmukt &#187; Inspiration</title>
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	<description>हिन्दी चिट्ठाकार उन्मुक्त की चिट्ठियाँ -</description>
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		<title>हमने जानी है रिश्तों में रमती खुशबू</title>
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		<pubDate>Sat, 18 Apr 2009 09:35:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
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		<description><![CDATA[This post is about relationship, about friendship, about happiness that they bring. 
yeh chittthi rishton ke baare mein hai, mitrataa ke baare mein hai, unse niklti khushboo ke baare mein hai.<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&#38;blog=230997&#38;post=247&#38;subd=unmukth&#38;ref=&#38;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;">&nbsp;</p>
<p style="text-align:center;"><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/04/relationship.html"><em><img class="alignright" title="Unmukt" src="http://bp2.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RkkV8q-B5kI/AAAAAAAAAE8/Nm9pcBjxl58/s200/Unmukt.jpg" alt="" width="80" height="200" /></em></a><em>यह चिट्ठी रिश्तों के बारे में है,  उनसे निकलती खुशबू, जीवन के भावात्मक पहलू दर्द, प्रेम, मित्रता के बारे में है। </em></p>
<p style="text-align:center;"><em>यह मेरे &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/">उन्मुक्त</a>&#8216; चिट्ठे पर कई कड़ियों में प्रकाशित हो चुकी है। इसका कुछ भाग मेरी पत्नी शुभा ने अपने चिट्ठे &#8216;<a href="http://munnekimaa.blogspot.com/">मुन्ने के बापू</a>&#8216; पर लिखा है। उसके कहने पर, उन चिट्ठियों को भी यहां जोड़ रहा हूं।  यह लेख इन सारी कड़ियों को सम्पादित कर, प्रकाशित किया जा रहा हूं। यदि आप इसे कड़ियों में पढ़ना चाहते हैं तो नीचे चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।</em></p>
<p><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/04/relationship.html"> भूमिका</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/percy-bysshe-shelley.html">सबसे प्रिय गीत, प्रिय क्षण &#8211; दर्द की यादें हैं। sweetest songs are those that tell of saddest thought</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/love-has-no-conditions.html">कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/love-story.html">प्यार में अफसोस नहीं</a> ।।  <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/roman-holiday.html">रोमन हॉलीडे &#8211;  पत्रकारिता</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/unending-love-rabindra-nath-tagore.html">अनन्त प्रेम</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/05/mother.html">अम्मां &#8211; बचपन की यादों में</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/everything-you-always-wanted-to-know.html">यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/father-emergency.html">करो वही, जिस पर विश्वास हो</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/father.html">जो करना है वह अपने बल बूते पर करो</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/mother-deathbed.html">अम्मां &#8211; अन्तिम समय पर</a>।। <a href="http://munnekimaa.blogspot.com/2008/04/i-love-you.html">मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी</a>।। <a href="http://munnekimaa.blogspot.com/2009/01/surprise-birthday-party-present.html">पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें बनाने से बेहतर है</a>।। <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/07/love-is-faith-can-not-be-bound.html">प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर  रिशतों की दुहाई न दो</a>।। निष्कर्ष &#8211; <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/08/love-can-not-be-expressed-it-can-only.html">प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो</a>।। पुनः लेख &#8211; <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2009/03/blog-post_23.html">जीना इसी का नाम है</a>।।<span id="more-247"></span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">सबसे प्रिय गीत, प्रिय क्षण &#8211; दर्द की यादें हैं<br />
</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;"> रिश्ते अक्सर दर्द दे जाते हैं। क्या इनमें दर्द ही होता है? क्या यही है रिश्तों में  रमती खुशबू? क्या यही है रिश्तों का अंजाम। क्या यही  है जीवन का निचोड़, या फिर कुछ और।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इसमें शक नहीं कि  दर्द  और मिठास में अनोखा रिश्ता है और इसे सबसे अच्छी तरह से व्यक्त करती है यह पंक्ति,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;Our sweetest songs are those that tell of saddest thought&#8217;</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हमारे सबसे प्रिय गीत, प्रिय क्षण वह हैं जो सबसे दर्द भरे हैं।</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="size-full wp-image-277 alignright" title="percy_bysshe_shelley_by_curran_18191" src="http://unmukth.files.wordpress.com/2009/04/percy_bysshe_shelley_by_curran_18191.jpg?w=107&#038;h=138" alt="percy_bysshe_shelley_by_curran_18191" width="107" height="138" />यह पंक्तियां अंग्रेजी कवि शेली (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Percy_Bysshe_Shelley">Percy Bysshe Shelley</a>) कि कविता &#8216;To a Skylark</span><span style="font-size:medium;">&#8216;  से ली गयी हैं।</span></p>
<p style="text-align:right;"><em>शैली का चित्र <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/File%3APortrait_of_Percy_Bysshe_Shelley_by_Curran,_1819.jpg">विकिपीडिया </a>से </em></p>
<p><span style="font-size:medium;">अंग्रेजी साहित्य में पांच प्रसिद्घ रूमानी कवि हुए हैं, पर्सी बिश शैली उनमें से एक हैं, बाकी चार हैं &#8211; वर्डस्वर्थ (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/William_Wordsworth">William Wordsworth</a>), कोलरिज (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Samuel_Taylor_Coleridge">Samuel Taylor Coleridge</a>), बाइरन (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/George_Gordon_Byron,_6th_Baron_Byron">Lord Byron</a>) और कीटस् (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/John_Keats">John Keats</a>) हैं। </span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शैली एक उपदेशक थे और अपनी कविता के द्वारा समाज सुधार करना चाहते थे। उनकी मृत्यु ३० साल की कम उम्र में हो गयी इसलिए कहना मुश्किल है कि यदि वे जीवित रहते तो यह सम्भव होता या नहीं।  यह भी अपने में एक प्रश्न है कि कविता के द्वारा ऐसा कार्य संभव है या नहीं। मेरे विचार ऐसा कार्य केवल कर्मों से सम्भव है न कि कविता से।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शैली का जन्म ४ अगस्त १७९२ में हुआ था। इन्होंने अपना  स्कूली जीवन ईटन कॉलेज (<a href="http://www.etoncollege.com/">Eton College</a>) में व्यतीत किया और उच्च शिक्षा के लिए आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रवेश किया। १९११ में, उन्होंने  &#8216;The necessity of Atheism&#8217; नाम से एक पर्चा प्रकाशित किया जिसके कारण  उन्हें  आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से निष्कासित कर  दिया गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से निष्कासित किये जाने के बाद ही, उन्नीस साल की उम्र में शैली का प्रेम १६ साल की हैरियट बेस्टब्रुक (Hariatte Bestbrook) से हुआ जिसके साथ उन्होंने शादी रचायी।  शैली भावनात्मक व्यक्ति थे और बहुत जल्द ही उनका प्रेम एक दूसरी १६ साल की लड़की मैरी गाडविन (Mary Shelley) के साथ चलने लगा; वे उसके साथ १८१४ में यूरोप भाग गये। १८१६ में जब वे वापस इंगलैंड आये तो शैली की पहली पत्नी हैरियट की मृत्यु,  दुर्घटना के कारण हो गयी। शैली ने मैरी  से शादी कर ली। वे पुन: १८१८ में यूरोप गये वहां बाइरन के साथ रहे और इन दोनों के कहने पर मैरी ने फ्रैंकेस्टाइन (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Frankenstein">Frankenstein: or, The Modern Prometheus</a>) नामक उपन्यास १८१८ में लिखा <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/01/favourite-sci-fi-writer.html">यह उपन्यास</a> विज्ञान की कल्पित कहानियों में  सबसे ज्यादा जाना-माना उपन्यास है। ८ जुलाई १९२२ में जब शैली ३० साल के भी नहीं हुये थे, इटली के पास  समुद्र में,  नाव डूब जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गयी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शैली  और मैरी दोनों ही शाकाहारी होने की वकालत करते थे और उन्होंने इस बारे में कई लेख भी लिखे जिसमें कि प्रमुख है, &#8216;A Vindication of Natural Diet&#8217; और &#8216;On the Vegetable System of Diet&#8217;.</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शैली की कवितायें अंग्रेजी साहित्य की धरोहर है इनकी एक कविता &#8216;<a href="http://www.keats-shelley-house.org/poem_shelley_1.php">To a Skylark</a>&#8216; है। <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Skylark">स्काईलार्क</a> एक छोटी सी चिड़िया है जिसकी आवाज मधुर होती है। यह ऊंचे आकाश में उड़ना पसन्द करती है। यदि आप इस चिड़िया की आवाज सुनना चाहें या फिर इसके बारे में जानना चाहें तो बीबीसी रडियो पर <a href="http://www.bbc.co.uk/radio4/science/rams/nature_20060605.ram">यहां</a> सुन सकते हैं।</span><a href="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RjdHe6-B5fI/AAAAAAAAAEU/EoAmKp5bhnQ/s200/skylark.jpg"><img class="alignright" title="skylark bird" src="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RjdHe6-B5fI/AAAAAAAAAEU/EoAmKp5bhnQ/s200/skylark.jpg" alt="" width="140" height="93" /></a></p>
<p style="text-align:right;"><em>यह चित्र <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Main_Page">वीकिपीडिया</a> से<br />
</em></p>
<p><span style="font-size:medium;">&#8216;To a Skylark&#8217; कविता के पहले भाग में, शैली इस चिड़िया के बारे में बात करते हैं और दूसरे भाग में, उससे प्रेरित होकर अपनी भावनायें बताते हैं। उपर उद्धरित पंक्ति,  जिस छन्द से ली गयी हैं वह इस प्रकार है,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;We look before and after,<br />
And pine for what is not:<br />
Our sincerest laughter<br />
With some pain is fraught;<br />
Our sweetest songs are those that tell of saddest thought.&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">यह छन्द बताता है कि हम, भावनात्मक स्तर पर,  सबसे ज्यादा  बीते हुऐ पलों से जुड़े होते हैं। यह पल ही हमारे लिये बहुमूल्य हैं। वे ही हमारे जीवन के सबसे सुनहरे पल हैं। वे बीते हुऐ हैं &#8211; वापस नहीं आ सकते। इसी लिये उनके लिये हम सबसे ज्यादा दुखी होते हैं। यही कारण है दर्द और मिठास के अनोखे रिश्ते का।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शैली की कविता की उद्धरित पंक्ति  &#8211; कुछ उदास, कुछ मायूस, कुछ निराश, कुछ नकारात्मक  सी है। यह तो बन्धन के कारण ही होता है &#8211; पर प्यार तो अपने हर रंग में, बन्धन रहित है।  फिर यह क्यों?  प्यार है क्या?  क्या यह एक खामोशी है, या खामोशी के रुके हुऐ अफसाने, या केवल एक एहसास, या फिर कुछ और?</span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">प्यार में अफसोस नहीं</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">एक अभिनेता की पत्नी की तबियत ठीक नहीं रहती थी। पत्नी के डाक्टर ने अभिनेता से मिलने की इच्छा जाहिर की। जब अभिनेता,  डाक्टर से मिला तो उसने बताया कि उसकी पत्नी को  कैंसर है और  छ: महीने के अन्दर ही उसकी मृत्यु हो जायेगी।  अभिनेता ने  अपने काम से छुट्टी ली और वह अपनी पत्नी से यह बिना बताये कि उसकी मृत्यु होने वाली है, उन जगहों पर ले गया जहाँ उसकी पत्नी हमेशा जाना चाहती थी। उसकी पत्नी की मृत्यु ६ महीने के अन्दर ही हो गयी। इसके बाद यह सवाल उठा कि कौन अच्छा अभिनेता था: वह पति जिसने अपनी पत्नी के साथ आखिरी छ: महीने उस की पसन्द की जगह, उसे बिना यह बताये गुजारे कि उसकी ज्लद ही  मृत्यु होने वाली है या फिर  वह पत्नी, जो यह जानते हुए कि वह छ:  महीने बाद नहीं रहेगी सारी  जगह गयी और अपने पति को नहीं मालुम होने दिया कि उसे अपनी मृत्यु के बारे में मालुम  है। यह मेरी </span><span style="font-size:medium;">प्रिय प्रेम कहानियों में  से एक है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस कहानी को एक दूसरे रूप में, एरिक सीगल (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Erich_Segal">Erich Segal</a>) ने प्रेम कहानी (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Story_(novel)">Love Story</a>) नामक पुस्तक में लिखा है। यह पुस्तक १९७० में छपी थी। यह ऑलिवर बैरेट और जेनी कैविलरी की प्रेम कहानी है। ऑलिवर अमीर है, बेहतरीन खिलाड़ी है, और हावर्ड में पढ़ता है। जैनी गरीब है, संगीत प्रेमी है, और  रेडक्लिफ में पढ़ती थी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह कहानी कुछ इस तरह से शुरू होती है।</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;What can you say about a twenty-five-year-old girl who died ?</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">That she was beautiful. And brilliant. That she loved Mozart and Bach. And the Beatles. And me. Once, when she specifically lumped me with those musical types, I asked her what the order was, and she replied, smiling, “Alphabetical.” At the time I smiled too. But now I sit and wonder whether she was listing me by my first name&#8211; in which case I would trail Mozart &#8211; or by my last name, in which case I would edge in there between Bach and the Beatles. Either way I don&#8217;t come first, which for some stupid reason bothers hell out of me, having grown up with the notion that I always had to be number one. Family heritage, don&#8217;t you know?&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">जेनी की भी मृत्यु ६ महीने के अन्दर कैंसर से हो जाती है। इस पुस्तक का अन्त इस प्रकार होता है कि ऑलिवर का पिता जब अस्पताल में पहुंचता है तो जेनी की मृत्यु हो चुकी होती है।</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">“Oliver,” said my father urgently, “I want to help.” “Jenny&#8217;s dead,” I told him. “I&#8217;m sorry,” I told him. “I&#8217;m sorry,” he said in a stunned whisper.</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">Not knowing why, I repeated what I had long ago learned from the beautiful girl now dead.</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">“Love means not ever having to say you&#8217;re sorry.”</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">And then I did what I had never done in his presence, much less in his arms. I cried.</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इस कहानी के दूसरी अन्तिम पंक्ति है,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;Love means not ever having to say you&#8217;re sorry.&#8217;</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार में कभी अफसोस करना नहीं होता।<br />
</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Love Story" src="http://bp3.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RkSTPK-B5hI/AAAAAAAAAEk/vSQ3_iDy8lc/s200/Love+story.jpg" alt="" width="106" />यह पंक्ति प्यार का एक अर्थ बताती है  और प्यार के संदर्भ में, सबसे ज्यादा उद्धरित पंक्ति है।  इस कहानी पर, इसी नाम से <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Love_Story_(1970_film)">एक पिक्चर भी बनी</a> है जिसे ऑर्थर हिलर ने निर्देशित किया है और मुख्य भूमिका रायन ओ&#8217;नील एवं एली मैक्ग्रॉ ने निभायी है। यह पंक्ति पिक्चरों के डायलॉगो में, दस सबसे लोकप्रिय डायलॉग में से एक है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह पुस्तक उस समय प्रकाशित हुई जब मैं विश्वविद्यालय  में पढ़ता था। विश्वविद्यालय के जीवन में लड़कियां भी साथ पढ़ती थीं। वह उम्र ही अलग थी, वह समय भी अलग था। किशोरावस्था में पैर रखते समय, लड़कियों का साथ पढ़ना, अलग अनुभूति ही था।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सीगल की लिखी पुस्तक &#8216;प्रेम कहानी&#8217; और उस पर बनी फिल्म मुझे  बहुत पसन्द आयी।  यह पुस्तक पढ़ने और पिक्चर देखने योग्य है। मैंने यह पुस्तक भी बहुतों को उपहार में दी। इस चिट्ठी को लिखने से पहले मैंने इसे फिर पढ़ा। मुझे यह उतनी ही अच्छी लगी जितनी कि ३५ साल पहले लगी थी। यदि आपने नहीं पढ़ी हो तो जरूर पढ़ कर देखिये।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">लोग कहते हैं कि खून का रिश्ता ही सच्चा रिश्ता होता है पर यह सच नहीं। मित्रता का रिश्ता अक्सर उससे ज्यादा मजबूत होता है। आइये बात करते हैं एक और रूमानी फिल्म की और उसके कलाकारों के बीच मित्रता के रिश्ते की।</span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">रोमन हॉलीडे</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने बचपन में एक अंग्रेजी  की रुमानी फिल्म देखी थी। वह फिल्म, एक पत्रकार और एक राजकुमारी की प्रेम कहानी है। इस फिल्म ने, रुमानी फिल्मों में नये आयाम स्थापित किये। यह पत्रकारिता की मर्यादाओं के भी आयाम स्थापित करती है। यह फिल्म उन कलाकारो के द्वारा अभनीत की गयी है जो कि न केवल अंग्रेजी फिल्मों में बेहतरीन कलाकार हो कर उभरे पर जिनहोंने अपने वास्तविक जीवन में भी मित्रता, सम्मान का एक अनोखा रिश्ता कायम किया। जी हां, मैं बात कर रहा हूं &#8216;रोमन हॉलीडे&#8217; (Roman Holiday) की।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Roman holiday" src="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/Rld-6z4l8DI/AAAAAAAAAFs/YkFK9EfkK-M/s200/Roman+Holiday.jpg" alt="" width="120" />कहा जाता है कि यह फिल्म, राजकुमारी मार्ग्रेट  के रोम यात्रा में घटी घटनाओं से प्रेरित है। इस कहानी में एक देश की राजकुमारी  रोम  जाती  है।  उसे  वहाँ अपने देश के प्रतिनिधि  की तरह बर्ताव  करना है।  वहाँ वह  अपने देश के राजदूत  के साथ टिकती है। उसे राजकुमारी की तरह बर्ताव करना बहुत मुश्किल लगता है वह इस तरह के  जीवन से ऊब चुकी है और  साधारण व्यक्ति की तरह जीना  चाहती है। इस कारण,  वह उन्मादी (hysterial) हो जाती है तब डाक्टर उसे नींद का इंजेक्शन लगा देता है। इसके  पहले वह इंजेक्शन कारगर हो,  वह खिड़की से निकल कर, भाग जाती है। सड़क पर,  उसकी मुलाकात एक अमेरिकी पत्रकार से होती है। राजकुमारी,  इंजेक्शन के कारण,  रास्ते में ही सोने लगती है।  इस पर पत्रकार, राजकुमारी को  अपने घर ले जाता है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">अगले दिन उस राजकुमारी को  पत्रकार सम्मेलन में भाग लेना था जिसमें इस पत्रकार को भी  जाना था।  उसमें जाने के लिये जब वह दफ्तर  पहुँचता  है तो उसका सम्पादक बताता  है कि राजकुमारी की बीमारी के कारण पत्रकार सम्मेलन स्थगित कर दिया गया है।  सम्पादक,   पत्रकार को राजकुमारी का  चित्र दिखाता है तब उसे पता चलता है कि राजकुमारी वही लड़की है जो उसके घर में  है। वह सम्पादक से पूछता है कि यदि वह राजकुमारी की कुछ खास चित्र उसे दे दे तो उसे क्या मिलेगा।  संपादक उसे बहुत पैसा देने की बात कहता है।  वह वापस अपने घर आता है और अपने एक मित्र को लेकर  राजकुमारी के साथ घूमने जाता है।  वे लोग साधारण व्यक्ति की तरह सैर सपाटा करते  हैं और मौज मस्ती करते हैं।<br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पत्रकार के मित्र के पास एक लाइटर है जो कि एक कैमरा है। उससे वह राजकुमारी की फोटो  लेता रहता  है। वे लोग  रात को समुद्र तट  पर पार्टी में  जाते है।  यहां पर राजकुमारी के देश की खुफिया पुलिस, जो उसे ढूढ़ रही होती है, पहचान लेती है और उसे वापस ले जाना चाहती  है। पत्रकार और राजकुमारी, वहां से भाग जाते हैं।  जब राजकुमारी वापस लौट रही होती है तो उसे  लगता है कि उसका अपने देश के प्रति भी कर्तव्य है </span><span style="font-size:medium;">और उसे वापस जाना चाहिए। वह वापस चली जाती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Audrey Hepburn princess" src="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RleAiz4l8GI/AAAAAAAAAGE/6ouDcCEhUBY/s200/Audrey.jpg" alt="" width="159" /></span><span style="font-size:medium;">अगले दिन, राजकुमारी पत्रकार सम्मेलन को सम्बोधित करती है जिसमें वह उनके जवाब भी देती है। यह अमेरिकी पत्रकार और उसका मित्र भी उस प्रेस कान्फ्रेंस में होते हैं। उसका मित्र,  राजकुमारी का  चित्र, उसी लाइटर से  लेता है तब राजकुमारी को पता चलता है कि यह लोग पिछले दिन भी उसकी फोटो ले रहे थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान, राजकुमारी से सवाल पूछा जाता है,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;आप देशों की दोस्ती के बारे में क्या सोचती हैं?&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">राजकुमारी जवाब देती है,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;मेरा उस पर उतना ही विश्वास है जितना विश्वास मुझे दो व्यक्तियों के संबंध में है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इस पर अमेरिकी पत्रकार कहता  है,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;राजकुमारी आपका विश्वास गलत साबित नहीं होगा।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">राजकुमारी कहती है कि उसे यह सुनकर प्रसन्नता हुई।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">जब वह पत्रकार सम्मेलन समाप्त होता है तो राजकुमारी  सबसे हाथ मिलाती है।   अमेरिकी पत्रकार राजकुमारी को एक खास तोहफ़ा देता है जिसमें उनके द्वारा खींचे हुये  सारे चित्र  और निगेटिव रहते  है । इसे राजकुमारी मुस्कराहट के साथ स्वीकार करती है और धीरे-धीरे  वहां चली जाती है जहां से शायद यह लोग फिर कभी नहीं मिल पाये।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस फिल्म में मुख्य भूमिका ऑड्री हेपबर्न और ग्रेगरी पेक ने निभायी है और इसका निर्देशन वाइलर ने किया है। यह आड्री हेपबर्न की पहली अमेरिकन पिक्चर थी और उन्हें इस पिक्चर में सबसे अच्छे कलाकार ऑस्कर पुरस्कार भी मिला। यह दोनो मेरे प्रिय कलाकार रहे हैं। इनका अभिनय लाजावाब था।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">अंग्रेजी पिक्चरों में, अक्सर, शब्दों के उच्चारण समझने में मुश्किल होती थी।  आड्री हेपबर्न तो ब्रिटानी कलाकारा थी उनका उच्चारण आसानी से समझ में आता है पर ग्रेगरी पेक अमेरिकन थे फिर भी उनका उच्चारण एकदम स्पष्ट था। इस कारण से इनकी फिल्में ज्यादा समझ में आती थीं। यह  एक प्रेम कहानी है जो कि रिश्तों के बीच आदर  और सम्मान की सीमा भी बताती है। यह अच्छी फिल्म है और सपरिवार देखने  योग्य है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं नहीं जानता कि यह वास्तविक जीवन में होता है कि नहीं। यह तो एक फिल्म थी पर मेरे विचार में यह पत्रकारिता की मर्यादा को ठीक तरह से परिभाषित करती है  और मित्रता का सही अर्थ भी बताती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">देखें इन दोनो कलाकारों का वास्तविक जीवन भी मित्रता की मिसाल था। आईये इन दोनो के बारे में कुछ और जाने।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="font-size:medium;"><strong>अनन्त प्रेम</strong><br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="My Fair lady" src="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RoYpz0wiNRI/AAAAAAAAAGs/9uTpF_zw5rA/s200/My+Fair+lady.jpg" alt="" width="86" /></span><span style="font-size:medium;">आड्री हेपबर्न (४/५/१९२९ – २०/१/१९९३) की सगाई १९५० में, जेम्स हेन्सन के साथ हुई,</span><span style="font-size:medium;"> तारीख भी तय हो गयी पर दोनों को लगा कि उनके कैरियर उन्हें अलग रखेंगे इसलिये शादी नहीं की। आड्री हेपबर्न की पहली शादी १९५४ में मेल फेरर, कलाकार, से हुई। यह १४ साल चली। उनके लड़के के अनुसार यह ज्यादा खिंची। तलाक लेने से पहले यह दोनो अलग हो गये थे। उस समय आड्री हेपबर्न एक मनोचिकित्सक एन्ड्रिया डॉटी के यहां जाने लगी। बाद में उसी से १९६९ में शादी कर ली। यह शादी भी १३ साल तक चली।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">रोमन हॉलीडे १९५३ में बनी थी। आड्री हेपबर्न इसे अपनी सबसे बेहतरीन फिल्म मानती थीं क्योंकि इस फिल्म ने उन्हें सितारा बनाया था। मैंने उनकी सारी फिल्में देखीं  और रोमन हॉलीडे के अतिरिक्त जो फिल्में पसन्द आयीं वह हैं,  &#8216;शराड&#8217;, &#8216;माई फेयर लेडी&#8217;, &#8216;वार एण्ड पीस&#8217;, &#8216;हाउ टू स्टील मिलियन&#8217;, &#8216;वेट अन्टिल डार्क&#8217;।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Audry Hepburn stamp" src="http://bp1.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RoYsa0wiNYI/AAAAAAAAAHk/nBHMfhyfG-k/s200/Audrey+Hepburn+stamp.jpg" alt="" width="103" />२००३ में, आड्री हेपबर्न के सम्मान में , अमेरीका ने एक स्टैम्प भी निकाला।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">ग्रेगरी पेक (५/४/१९१६ – १२/६/२००३), रोमन हॉलीडे के बनते समय (१९५३),  हॉलीवुड में बेहतरीन कलाकार के रूप में नाम कमा चुके थे हालांकि उन्हें सबसे अच्छे कलाकार के लिये ऑस्कर पुरस्कार, १९६२ में &#8216;हाउ टू किल ए मॉकिंग बर्ड&#8217; के लिये मिला। यह पुरस्कार, आड्री हेपबर्न को  ऑस्कर पुरस्कार के मिलने के बाद था।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">ग्रेगरी पेक ने भी अपने जीवन में दो शादियां की। १९४३ में गेटा कुकोनेन और १९५५ में विरोनीक पसानी के साथ।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने ग्रेगरी पेक की लगभग सारी फिल्में देखीं हैं। रोमन हॉलीडे के अतिरिक्त , &#8216;मोबी डिक&#8217;, &#8216;हाउ टू किल ए मॉकिंग बर्ड&#8217;, &#8216;द गन्स ऑफ नेवरॉन&#8217;, और &#8216;मैकेन्नाज़ गोल्ड&#8217; उनकी बेहतरीन और देखने योग्य फिल्में हैं।<img class="alignright" title="Guns of Navron" src="http://bp3.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RoYqzUwiNUI/AAAAAAAAAHE/ktecXNUsR6Y/s200/Guns+of+Navarone.jpg" alt="" width="97" /></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">रोमन हॉलीडे, में वे और आड्री हेपबर्न ने पहली बार साथ काम किया। इन दोनों के बीच, इस फिल्म के दौरान हुई मित्रता जीवन पर्यन्त चली।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">रोमन हॉलीडे फिल्म बनते समय उसके विज्ञापन देने की बात चली। इस फिल्म के निर्माताओं ने उसमें ग्रेगरी पेक को ज्यादा स्थान दिया जाने की पेशकश की। उस समय ग्रेगरी पेक हॉलीवुड में स्थापित कलाकार थे पर ऑड्री हेपबर्न की यह पहली हॉलीवुड फिल्म थी। यह ग्रेगरी पेक का बड़प्पन था कि उन्होने कहा कि  आड्री हेपबर्न ने इस फिल्म में बहुत अच्छा काम किया है उसे आस्कर पुरस्कार मिलेगा। उसे मेरे बराबर स्थान दिया जाय।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">ऑड्री हेपबर्न की मृत्यु के बाद, ग्रेगरी पेक ने नम आंखों के साथ ने रवीन्द्र नाथ टैगोर की &#8216;द अनइन्डिंग लव&#8217; (The Unending Love) कविता सुनायी।</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;I seem to have loved you in numberless forms, numberless times&#8230;</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">In life after life, in age after age, forever.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">My spellbound heart has made and remade the necklace of songs,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">That you take as a gift, wear round your neck in your many forms,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">In life after life, in age after age, forever.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">Whenever I hear old chronicles of love, it&#8217;s age old pain,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">It&#8217;s ancient tale of being apart or together.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">As I stare on and on into the past, in the end you emerge,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">Clad in the light of a pole-star, piercing the darkness of time.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">You become an image of what is remembered forever.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">You and I have floated here on the stream that brings from the fount.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">At the heart of time, love of one for another.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">We have played along side millions of lovers,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">Shared in the same shy sweetness of meeting,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">the distressful tears of farewell,</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">Old love but in shapes that renew and renew forever.&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">यह आड्री हेपबर्न को सबसे प्रिय कविता थी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">आड्री हेपबर्न और गेगरी पेक बेहतरीन कलाकार, बहुत अच्छे मित्र, फिर भी कभी रूमानी तौर से नहीं जुड़े। रोमन हॉलीडे फिल्म में प्रेम के साथ सम्मान की सीमा थी तो वास्तविक जीवन में मित्रता के साथ उसकी लक्षमण रेखा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">रिश्तों में सबसे पवित्र रिश्ता है मां का &#8211; कुछ बाते मेरी मां के बारे में।</span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">अम्मां बचपन की यादों में</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">बसंत पंचमी १९३९ &#8211; मेरी मां, पिता की  शादी। मां , उस समय ११वीं कक्षा की छात्रा थीं और पिता उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। १९४० में, पिता ने अपनी उच्च शिक्षा पूरी की और मां ने  इण्टरमीडिएट पास किया। पिता तो, बाबा के कस्बे में, वापस आकर व्यवसाय में लग गये पर मां  उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए शहर चली गयीं। वे अगले चार वर्ष छात्रावास में रह कर उन्होने स्नातक और कानून की शिक्षा पूरी की। १९४४ में, वे  अपने विश्वविद्यालय की पहली महिला विधि स्नातक बनीं।   उनकी उच्च शिक्षा पूरी हो जाने के बाद ही, हम भाई-बहन इस दुनिया में आए। १९५० में,  मेरे पिता, इस कस्बे में,  व्यवसाय की बढ़ोत्तरी के लिये  आये।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पिता चाहते थे कि हमारा लालन-पालन एक सामान्य भारतीय के अनुसार हो। वह इतना पैसा जरूर कमाते थे कि हमें हिन्दुस्तान के किसी भी स्कूल में  आराम से पढ़ने भेज सकते थे पर उन्होंने  हम सब को वहीं पढ़ने भेजा जहाँ हिन्दुस्तान के बच्चे सामान्यत: पढ़ते हैं।  हमने अपनी पढ़ाई एक साधारण से स्कूल में पूरी की।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पिता हिन्दी के  समर्थक थे। हम भाई बहन हिन्दी मीडियम स्कूल में गये। घर में अंग्रेजी में बात करना मना था। मेरे पड़ोस के सारे बच्चे कस्बे के अंग्रेजी मीडियम विद्यालयों में और कई कस्बे के बाहर हिन्दुस्तान के सबसे अच्छे पब्लिक विद्यालयों में पढ़ते थे। वे सब अंग्रेजी में ही बात करते थे। यह हमें कभी, कभी शर्मिंदा भी करता था। मां हमेशा हमें दिलासा देती,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;ये लोग अपने स्कूल पर गर्व करते हैं पर तुम्हारा स्कूल तुम पर।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मां की अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। वे अंग्रेजी के महत्व को समझती भी थीं। वे हमें बीबीसी सुनने के लिये प्रेरित करती। प्रतिदिन शाम को, हम सब भाई-बहनों को उन्हें अंग्रेजी की कोई न कोई कहानी या तो रीडर्स डाइजेस्ट से या फिर  अखबार पढ़ कर सुनाना पड़ता था। वे हमारा उच्चारण ठीक करती और अर्थ समझाती थीं। किसकी बारी पड़ेगी यह तो हम लोग यह खेल से ही निकालते थे,</span></p>
<p style="text-align:center;"><em><span style="font-size:medium;">अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बोल,</span></em></p>
<p style="text-align:center;"><em><span style="font-size:medium;">अस्सी नब्बे पूरे  सौ।</span></em></p>
<p style="text-align:center;"><em><span style="font-size:medium;">सौ में लगा धागा,</span></em></p>
<p style="text-align:center;"><em><span style="font-size:medium;">चोर निकल भागा।</span></em></p>
<p><span style="font-size:medium;">बस जिस पर भागा आया उसे ही पढ़नी पड़ती थी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">एक बार मैंने  मां से पूंछा कि तुम इतनी पढ़ी-लिखी हो, तुमने वकालत  या  कोई और काम क्यों नहीं किया।  उनका जवाब था कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;मैं घर की सबसे बड़ी बहूं हूं।  तुम्हारे बाबा के कस्बे से तुम्हारे चाचा,  बुआ,  उनके लड़के,  लड़कियां सब यहीं पढ़ने आए। वे सब हमारे साथ ही रहे, यदि मैं कुछ काम करती तो उनका ख्याल, तुम लोगों का ख्याल  कैसे रख पाती।  पैसे तो तुम्हारे पिता, हम सबके लिए कमा ही लेते हैं बस इसलिए घर के बाहर जाना ठीक नहीं समझा।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने उन्हें हमेशा सफेद रंग की साड़ी पहने हुए देखा। उनके सफेद रंग की साड़ी पहनने के कारण, गोवा में चर्च के अन्दर, क्रॉस के ऊपर सफेद कपड़े को देख कर, <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/04/church.html">उनकी याद आ गयी</a>। </span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने मां को कभी सिंदूर लगाये नहीं देखा। एक बार हम ट्रेन में सफर कर रहे थे। एक महिला ने मां से पूछा कि क्या वे विधवा हैं? मां मुस्करायीं और हमारी ओर इशारा कर बोली, </span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;इनके पिता को सफेद रंग पसन्द है, बस इसलिये, मैंने इसे अपना लिया। शादी के बाद, जब भी सिंदूर लगाया तो सर में दर्द हो गया &#8211; शायद कुछ मिलावट हो। इनके पिता ने सिंदूर लगाने के लिए मना कर दिया। बस इसलिये सिंदूर नहीं लगाती।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"> उस महिला ने मां से माफी मांगी पर ट्रेन पर हमारी उनसे अच्छी मित्रता हो गयी। मुझे भी, होली के रंगों से, एलर्जी हो जाती है। शायद, यह मैंने उन्हीं से पाया है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">बहन और मां के बीच में पिक्चर देखने का एक अजीब  रिश्ता  था। वे दोनों हर हिन्दी पिक्चर को पहले दिन, पहले प्रदर्शन पर जाया  करती थीं और  पिता के घर वापस  पहुँचने के पहले वापस।  मैं समझता हूं  कि मेरी  बहन ने स्कूल वा विश्वविद्यालय से भागकर जितनी फिल्में देखी हैं वह किसी और लड़की ने नहीं देखी होंगीं। जब मेरी बहन ने पढ़ाना शुरू किया तब उसका स्कूल शनिवार को आधे दिन का  होता था। तब वे दोनों  पहले दिन को छोड़कर  शनिवार को  पहला शो  देखने लगी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हमें हिन्दी पिक्चर देखने की अनुमति नहीं थी। हम केवल अंग्रेजी पिक्चर ही देख सकते थे।    बहन की शादी, मेरे विश्विद्यालय के जीवन के अन्तिम चरण पर हुई। उसके बाद, मेरी मां को पिक्चर देखने के लिए साथी  मिलना बन्द हो गया तब मैंने उनके साथ हिन्दी  पिक्चर देखना शुरू किया। कुछ दिनों के बाद मेरे दोस्त भी हमारे गुट में शामिल हो गये। टिकट और कोकाकोला के पैसे तो मेरी मां ही देती थी।  शादी  के बाद मेरी अपनी पत्नी के  साथ अनलिखी शर्त थी, </span></p>
<blockquote><p><em><span style="font-size:medium;">हिन्दी पिक्चर में मेरी मां भी  साथ चलेंगी। </span></em></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">वे जब तक जीवित रहीं ऎसा ही रहा। ऐसे हम जब भी कस्बे के बाहर गये, वे हमारे साथ ही गयीं।<br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मां की सबसे बड़ी खासियत  यह थी कि वे छोटी-छोटी बातों से जीवन को भरपूर जीना जानती थीं, दशहरे की झांकी हो या कोई मेला हो, वह हमेशा उसमें जाने में उत्साहित रहती थीं और हम लोगों को भी वहां ले जाती थीं। वहां पर चाट खाना, कचौड़ी खाना उनको प्रिय था और हमें भी। मुझे यह अब भी प्रिय है पर मुन्ने की मां को नहीं। बस जब वह नहीं होती है तब ही इसका आनन्द उठाता हूं <img src='http://s2.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /><br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरी मां एक गरीब परिवार से थीं और वह कहती थीं कि उनके घर एक बार ही खाना बनता था।  वे हर का,  खास तौर से गरीब रिश्तेदारों का ख्याल ज्यादा ही रखती थीं। उनका कहना था कि जो जीवन में बहुत नहीं कर पाया उसका बहुत ख्याल रखना चाहिए क्योंकि वह शायद हिचक के कारण कुछ न कह पाये।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने  मां को  पिता से कभी बात करते नहीं देखा पर उनके कुछ न कहने पर वह मेरे पिता के मन की हर इच्छा जान जाती थीं। वे पिता की हर बात नहीं  मानती थीं कई बार वे  हमारा साथ देती थीं पर जिसे वे मानती थी वह उनके न बताये भी जान जाती थीं जैसे कि वे उनका मन पढ़ लेती हों।  मैं अक्सर सोचता हूं कि  मुन्ने की मां क्यों नहीं मेरे मन की  बात समझ पाती। वह मुझसे कहती है,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;तुम्हारे  मन में जो है  वह मुझे बताते क्यों नहीं। मुझे कैसे मालुम चले कि तुम क्या चाहते हो।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">लगता है कि मेरी मां किसी और मिट्टी की बनी थीं। वह मेरे पिता के बिना बोले ही उनका मन जान जाती थीं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सेक्स का विषय हर जगह वर्जित है। हांलाकि कि बीबीसी के मुताबिक बहुत कुछ बदल रहा है। सीबीएससी में यौन शिक्षा को पाठ्य-क्रम में रखा गया है। हांलाकि इसे कई राज्य सरकारों ने रखने से मना कर दिया। मैं यौन शिक्षा का पक्षधर हूं पर यह किस तरह से हो इसमें जरूर संशय है। आइये कुछ बात करते हैं मेरे परिवार में किस तरह से हुई।</span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">परिवार में यौन शिक्षा</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह चिट्ठी रिश्तों के बारे में है। इस चिट्ठी में यौन शिक्षा के ऊपर बात करना &#8211;  कुछ अजीब लग रहा है न आपको। चलिये मैं पहले यह स्पष्ट कर दूं कि यह इस चिट्ठी के अन्दर क्यों है? </span><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="hands-tehlka" src="http://unmukts.files.wordpress.com/2008/09/hands-tehlka.jpg?w=136&#038;h=187&%23038;h=156" alt="" width="136" height="156" /></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा छेड़छाड़ भीड़-भाड़  की जगह होती है पर यौन उत्पीड़न  सगे संबन्धी या</span><span style="font-size:medium;"> जान पहचान व्यक्ति के द्वारा ही ज्यादा होता है। कुछ समय पहले, मैंने इसका उल्लेख &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2008/09/20/sex-family/">उफ, क्या मैं कभी चैन से सो सकूंगी</a>&#8216; चिट्ठी में  किया है। पारिवारिक रिश्तों के अन्दर,  यौन शिक्षा किस तरह से हो,  एक नाजुक  पर महत्वपूर्ण विषय है। इसीलिये मैं इसे  इस चिट्ठी में रख रहा हूं। </span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं नहीं जानता कि इस विषय को बताने का क्या सबसे अच्छा तरीका है पर मैं वह तरीका अवश्य जानता हूं जैसा कि हमारे परिवार में हुआ। मैंने यह विषय कैसे अपनी आने वाली पीढ़ी को बताया। मुझे, अक्सर स्कूल, विद्यालय, विश्व विद्यालय में जाना पड़ता है। बच्चों से मुकालात होती है। अक्सर,  मेरे पास बच्चे यह पूछने के लिये आते हैं कि वे क्या कैरियर चुने, कहां जायें।  कभी कभी, मैं उनसे इस विषय पर भी बात करता हूं। मैं, क्या उन्हें बताता हूं, यहां कुछ उसी के बारे में।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे  बचपन का एक बहुत अच्छा मित्र, टोरंटो इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापक रहा।  कुछ समय पहले उसकी मृत्यु हो गयी। बचपन में ही उसके पिता का देहान्त हो चुका था। भाई, बहनो की भी शादी के बाद, वह और उसकी मां हमारे ही कस्बे में रहते थे। अक्सर उसकी मां उसके भाई या बहनो के पास रहने चली जाती थी। उस समय उसका घर खाली रहता था। उस समय, उसके घर,  काफी धमाचौकड़ी रहती थी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह १९६० का दशक था। हेर संगीत नाटक का मंचन हो चुका था। मैंने, इसका जिक्र &#8216;<a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/12/31/superstition/">ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और  टोने-टुटके</a>&#8216; श्रंखला की <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/hair-musical.html">इस कड़ी</a> में किया है।  हिप्पी आंदोलन अपने चरम सीमा पर था। इस धमाचौकड़ी में, अक्सर लड़कियों भी शामिल रहती थीं।  कभी कभी चरस और गांजा भी चलता था।  मैं खेल में ज्यादा रुचि रखता था। मुझे जिला, विश्वविद्यालय एवं अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य मिला।  इसी कारण इस तरीके की धमाचौकड़ी में शामिल नहीं रहता था।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">एक बार मेरे मित्र को कुछ ब्लू फिल्में मिल गयीं।  एक दूसरे मित्र ने प्रोजेक्टर का इंतजाम कर दिया। उन लोगों ने फिल्म को भी देख लिया। यह सोचा गया कि उसे फिर देखा जायगा पर सवाल था कि ब्लू फिल्म कहां रखी जाय। कोई भी उसे रखने को तैयार नहीं था।  मैं ही ऐसा था जो कि इस धमाचौकड़ी मे शामिल नहीं था। इसलिये मेरे पास ही रखना सबसे सुरक्षित समझा गया या यह समझ लीजये कि मुझे उन ब्लू फिल्मों को रखने में कोई हिचक नहीं थी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं ने यह ब्लू फिल्में अपने कपड़े की अलमारी में रख दी।  एक दिन  मेरे कपड़े लगाते समय मां को ब्लू फिल्में मिल गयीं। उनके पूछने पर मैंने सारा किस्सा बताया और यह भी बताया कि  मैंने कोई भी ब्लू फिल्म नहीं देखी है। मां पूछा कि मुझे सेक्स के बारे में कितना ज्ञान है। मेरा जवाब था थोड़ा बहुत। उन्होने कहा कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;ब्लू फिल्मों मे बहुत कुछ नामुमकिन बात होती है और अधिकतर जो भी होता है वह ठीक नहीं। तुम्हें मालुम होना चाहिये कि क्या ठीक नहीं  है। इसलिये इसे, तुम्हें देख लेना चाहिये पर उसके पहले सेक्स का अच्छा ज्ञान भी होना चाहिये।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="everything you always wanted to know about sex" src="http://bp3.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RmSx-rDvfJI/AAAAAAAAAGM/B4r7eggjZvM/s200/everything+you+always+wanted+to+know+about+sex-1.jpg" alt="" width="126" />हम लोग किताबों की दुकान पर गये और वहां से एक पुस्तक   Everything you always wanted to know about sex but were afraid to ask by David Reuben खरीद कर लाये। यह पीले रंग की पुस्तक है इसलिये यह पीली पुस्तक के नाम से भी मशहूर हुई।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सेक्स के सम्बन्ध में उत्तेजना  चित्र देख कर या उसके वर्णन से होती है। इस पुस्तक में कोई भी चित्र नहीं हैं। इसमें सारा वर्णन प्रश्न और उत्तर के रूप में है।  इसे पढ़ कर कोई उत्तेजना नहीं होती है।  इस पुस्तक में कुछ सूचना समलैंगिक रिश्तों और सेक्स परिवर्तन के बारे में है। यह इस तरह के विषयों को नकारती है। इसी लिये कुछ लोग इस पुस्तक पर विवाद करते हैं।  यह दोनो विषय विवादस्पद हैं। मैंने इनके बारे में  &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/06/trans-gendered.html">Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री</a>&#8216;,  &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2006/06/04/mirror-mirror/">आईने, आईने यह तो बता &#8211; दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन</a>&#8216;, &#8216;<a href="http://unmukts.wordpress.com/2006/10/11/how-to-inform-mother/">मां को दिल की बात कैसे बतायें</a>&#8216;, और &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/blog-post_31.html">मां को दिल की बात कैसे पता चली</a>&#8216; नाम से लिखा है। यदि आप इस पुस्तक में इस विषय की सूचना को छोड़ दें तो बाकी सूचना के बारे में कोई विवाद नहीं है और लगभग सही है। मेरे विचार से यह एक अच्छी पुस्तक है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने,  इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ब्लू फिल्म देखना जरूरी नहीं समझा। ब्लू फिल्म न देखने के निर्णय में, कई अन्य बातों ने भी महत्वपूर्ण रोल निभाया। मां ने,</span></p>
<ul>
<li><span style="font-size:medium;">मुझे न तो उन  फिल्मों को रखने के कारण डांटा, न ही देखने के लिये मना किया, जिसकी मनाही हो उसी के बारे में उत्सुकता ज्यादा रहती है;</span></li>
<li><span style="font-size:medium;">हमेशा हमें, बाहर के खेल पर, पढ़ाई से भी ज्यादा ध्यान देने के लिये प्रोत्साहित  करती थीं।  उस समय  पढ़ाई का वैसा बोझ नहीं था जैसा कि आजकल होता है।</span></li>
</ul>
<p><span style="font-size:medium;">मां का प्रिय वाक्य थे,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;पढ़ाई बन्द करो और बाहर जा कर खेलो।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">यदि हम रात को देर तक पढ़ते थे तो हमेशा कहती थीं,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;चलो,  सोने जाओ। बहुत रात तक पढ़ना ठीक नहीं।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">परीक्षा के दिनो में तो हमारे कमरे की बत्ती बहुत ज्लद ही बन्द कर दी जाती थी। वे कहती थीं,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;परीक्षा के समय दिमाग एकदम तरोताजा रहना चाहिये।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने अपने बेटे को, जब स्कूल में ही था तब यह पुस्तक पढ़ने के लिये दी। वह बारवीं के बाद आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने चला गया और होस्टल में ही रहा। मैं समझता हूं कि उन्हें इस पुस्तक के पढ़ने के कारण मदद मिली।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">देश के कुछ महाविद्यालयों में, पास-ऑउट करने वाले छात्रों की एक पत्रिका निकाली जाती है। आई.आई.टी. कानपुर में भी ऐसा होता है।  यह पत्रिका विद्यार्थी ही निकालते हैं इसमें उनके साथी ही उन्हीं के बारे में लिखते हैं।  मैं एक बार उनकी इस पत्रिका को पढ़ने लगा तो उन्होने मना किया,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;पापा, तुम मत पढ़ो। इसे पढ़ कर तुम्हे   अच्छा नहीं लगेगा।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने कहा,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;मैं भी अपने विद्यार्थी जीवन में इन सब से गुजर चुका हूं इसलिये कोई बात नहीं।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उनकी पत्रिका में बहुत सारी बातें स्पष्ट रूप से लिखी थीं। हमारे समय में भी उस तरह की बातें होती थी पर इतना स्पष्ट रूप से नहीं लिखा जाता था।  मैंने School Reunion चिट्ठी लिखते समय लिखा था कि  मेरे बेटा आई.आई.टी.  कानपुर की  पत्रिका में दी गयी पहली दो सूची में नहीं हैं  पर विद्यार्थियों की इस पत्रिका में उनके बारे में यह अवश्य लिखा है कि वह  सबसे साथ सुथरा बच्चा है। हो सकता है यह उसके संस्कारों के कारण हो पर मेरे विचार से यह उनके  इस पुस्तक को पढ़ने और यौन शिक्षा को अच्छी तरह से समझने के कारण भी है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे विचार में, परिवार के अन्दर, आने वाली पीढ़ी को  अच्छी किताबें बताना, मुक्त पर स्वस्थ यौन चर्चा करना, एक अच्छी बात है। अन्यथा, नयी पीढ़ी को गलत सूचना मिल सकती है और वे गलतफहमी के शिकार हो सकते हैं।</span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">करो वही, जिस पर विश्वास हो</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">कई दशक पहले, जून १९७५ में आपातकाल की घोषणा हुई थी। उस समय, मैं कश्मीर में था। लोग पकड़े जाने लगे। मुझे लगा कि मुझे कस्बे पहुंचना चाहिये। मेरे पिता पकड़े जा सकते हैं और मां अकेले ही रह जांयगी। यही हुआ भी। मेरे कस्बे पहुंचते पता चला कि पिता  को झूठे केस में डी.आई.आर. में बन्द किया गया। उन पर इल्जाम लगाया गया कि वे यह भाषण दे रहे थे कि जेल तोड़ दो, बैंक लूट लो। यह एकदम झूट था। उस समय देश की पुलिस और कार्यपालिका से सरकारी तौर पर जितना झूट बुलवाया गया उतना तो कभी नहीं, यहां तक अंग्रेजों के राज्य में भी नहीं। डी.आई.आर. में मेरे पिता की  जनामत हो गयी पर वे जेल से बाहर नहीं आ पाये। उन्हें मीसा में पकड़ लिया गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह समय हमारे लिये मुश्किल का समय था। समझ में नहीं आता था कि पिता कब छूटेंगे।  इस बीच, मित्रों, नातेदारों ने मुंह मोड़ लिया था। लोग देख कर कतराते थे। उनको डर लगता था कि कहीं उन्हें ही न पकड़ लिया जाय। मां यह समझती थीं। उन्होंने खुद ही ऐसे रिश्तेदारों और मित्रों को घर से आने के लिये मना कर दिया ताकि उन्हें शर्मिंदगी न उठानी पड़े। मुझे ऐसे लोगो से गुस्सा आता था। मैंने बहुत दिनो तक अपने घर कर बाहर पोस्टर लगा रखा था,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;अन्दर संभल कर आना, यहां डिटेंशन ऑर्डर रद्दी की टोकड़ी पर पड़े मिलते हैं।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इस मुश्किल समय पर कइयों ने हमारा साथ भी दिया। उन्हें भूलना मुश्किल है और उन्हें भी जो उस समय डर गये थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">दो साल (१९७५-७७), मैंने न कोई पिक्चर देखी, न ही आइसक्रीम खायी, न ही कोई दावत दी, न ही किसी दावत पर गये। पैसे ही नहीं रहते थे। उस समय भी लोग,  अक्सर हमसे पैसे मांगने आते थे। उन्हें भी मना नहीं किया जा सकता था वे भी मुश्किल में थे, उनके प्रिय जन भी जेल में थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">आपातकाल के समय, कई लोग माफी मांग कर जेल से बाहर आ गये पर पिता ने नहीं मांगी। उनका कहना था,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;मैंने कोई गलत काम नहीं किया। मैं क्यों माफी मांगू। माफी तो सरकार को मागनी चाहिये।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">वे  लगभग दो साल तक जेल में रहे। १९७७ के चुनाव के बाद पुरानी सत्तारूढ़ पार्टी, चुनाव हार गयी  तभी वे छूट पाये।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मां से संबन्धित आपतकाल की एक घटना मुझे  आज भी अच्छी तरह से याद है।  वे  हमेशा कहती थीं,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;करो वही, जिस पर विश्वास हो। दिखावे के लिये कुछ करने की कोई जरूरत नहीं।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">वे न इसे कहती थीं पर इसे अमल भी करती थीं। नि:संदेह, ढ़कोसलों का उनके जीवन पर कोई स्थान नहीं था।</span></p>
<div style="border-top:7px solid #5c8a64;border-bottom:7px solid #5c8a64;font-size:12pt;font-weight:bold;line-height:100%;padding-bottom:7px;padding-top:7px;width:375px;text-align:center;margin:10px;">शिव आराधना &#8230; से कोई नहीं छूटेगा</div>
<p><span style="font-size:medium;">आपतकाल के दौरान, जब मेरे पिता जेल में थे तो हमारे शुभचिन्तक हमारे घर आये।  उन्होंने मेरी मां से अकेले में बात करने को कहा। बाद में मैंने मां से पूछा कि वे क्यों आये थे और क्या चाहते थे। मां ने बताया,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;वे कह रहे थे कि यदि मैं मंदिर में शिव भगवान की  आराधना करूंगी, तो तुम्हारे पिता छूट सकेंगे।&#8217; </span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मां ने यह नहीं किया।  वे आर्यसमाजी थीं और इस तरह के कर्मकाण्ड (ritual) पर उनका विश्वास नहीं था। उनका कहना था कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;शिव अराधना केवल मन की शान्ति के लिये है। उससे कोई नहीं छूटेगा। लोग तो छूटेंगे न्यायालाय से या फिर जनता के द्वारा।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उच्च न्यायालय ने तो हमारा साथ दिया पर सर्वोच्च न्यायालय ने हमें शर्मिन्दा किया। </span><span style="font-size:medium;">सीरवाई एक</span><span style="font-size:medium;"> प्रसिद्ध न्यायविद रहे हैं। वे बहुत साल तक महाराष्ट्र राज्य के महाधिवक्ता रहे और उनकी भारतीय संविधान पर लिखी पुस्तक अद्वतीय है। इस पुस्तक  (Constitution of India: Appendix Part I The Judiciary Of India) में वे कहते हैं कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">‘The High Courts reached their finest hour during the emergency; that brave and courageous judgements were delivered; &#8230;  the High Courts had kept the doors ajar which the Supreme Court barred and bolted’.</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">आपातकाल का समय,  उच्च न्यालयों के लिये  सुनहरा समय था। उस समय  उन्होने हिम्मत और बहादुरी से फैसले दिये। उन्होने स्तंत्रता के दरवाजों को खुला रखा पर सर्वोच्च न्यायालय ने उसे बन्द कर दिया।</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">आपातकाल के बाद, वे सब हमारे पास पुन: आने लगे जिन्होंने हमसे मुंह मोड़ लिया था।   मां, पिता ने उन्हें स्वीकार कर लिया, हमने भी। सरकार ने पिता को राजदूत बनाकर विदेश भेजने की बात की पर उन्होने मना कर दिया। वे अपने सिद्घान्त के पक्के थे। आपातकाल के समय न माफी मांगी और न ही बाद में कोई पद लिया। उनका कहना था,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;मैंने किसी पद के लिये </span><span style="font-size:medium;">समाज सेवा</span><span style="font-size:medium;"> नहीं की।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मुझे अच्छा लगता है, गर्व भी होता है कि मेरी मां, मेरे पिता ऐसे थे।  जिन्होंने हमेशा वह किया जो उन्हें ठीक लगता था &#8211; दुनिया के दिखावे के लिये नहीं।</span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">जो करना है वह अपने बल बूते पर करो</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे पिता हमेशा अपने व्यवसाय या फिर समाजिक सेवा में व्यस्त रहते थे। उनके पास हमारे या मां के लिये कभी समय नहीं होता था। हमें, इसका हमेशा मलाल रहा।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं अक्सर अपने मित्रों को पिता के साथ मौज करते देखता था, जलन भी होती थी। यह सारी कमी मां ही ने पूरी की। पिता यदि चाहते तो बहुत पद मिल सकते थे हमारे लिये बहुत कुछ कर सकते थे पर कभी   किया नहीं। सबके पिता करते थे इसीलिये हमें अपने पिता समझ में नहीं आते थे।  उनका कहना था,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;जो करना है वह अपने बल बूते पर करो। यही जीवन सार्थक जीवन है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">आज, जीवन के तीन चौथाई बसन्त देख लेने के बाद, अब पिता समझ में आने लगे हैं, उनके सिद्धान्त भी समझने लगा हूं, उन पर गर्व भी होने लगा है।<br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे विचार में, पिता की कही बातों के साथ, यह भी आवश्यक है कि हम आने वाली पीढ़ी के साथ समय व्यतीत करें। हमारे बच्चे ही हमारे सबसे बड़ी सम्पदा हैं। पिता के सिद्धन्तो के कारण हम उस स्कूल में गये जहां एक साधरण हिंदुस्तानी जाता है। शायद यही कारण हो कि  मैंने अपने मुन्ने का दाखिला देहरादून में, हिन्दुस्तान के एक सबसे जाने माने बोर्डिंग स्कूल में करवा दिया। दाखिले के समय उस स्कूल के प्रधानाचार्य (या शायद उप- प्रधानाचार्य) ने कहा,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;हमारा स्कूल हिन्दुस्तान का सबसे अच्छा स्कूल उन बच्चों के लिये है जिनके माता पिता के पास बच्चों के लिये समय नहीं है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मुझे अपना जीवन याद आया। मैंने मुन्ने को वहां नहीं भेजा। मैं नहीं चाहता था कि मेरा बेटा कभी सोचे कि हमारे पास उसके लिये समय नहीं था। </span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2006/08/01/fynman/">रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन</a> (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Richard_Feynman">Richard Philips Feynman</a>) भौतिक शास्त्र में नोबल पुरुस्कार विजेता थे। वे </span><span style="font-size:medium;">पिछली शताब्दी के दूसरे भाग के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक रहें हैं। </span><span style="font-size:medium;">उनकी गोद ली हुई पुत्री ने उनके पत्रों को सजों कर, </span><span style="font-size:medium;"> &#8216;</span><span style="font-size:medium;">Don&#8217;t you have time to think</span><span style="font-size:medium;">&#8216; पुस्तक लिखी है। </span><span style="font-size:medium;"> मैंने, इस पुस्तक के बारे में </span><span style="font-size:medium;">&#8216;<a href="http://unmukth.wordpress.com/2007/11/21/dont-you-have-time-to-think-michelle-feynman/">क्या आपके पास सोचने का समय नहीं है?</a></span><span style="font-size:medium;">&#8216;</span><span style="font-size:medium;"> नाम से </span><span style="font-size:medium;">श्रंखला लिखी </span><span style="font-size:medium;">है। अपने मुन्ने के साथ बिताये कुछ पलों का जिक्र </span><span style="font-size:medium;">मैंने इस </span><span style="font-size:medium;">श्रंखला की &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/10/dont-you-have-time-to-think.html">पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा</a>&#8216; </span><span style="font-size:medium;">चिट्ठी </span><span style="font-size:medium;">में किया है। </span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">अम्मा &#8211; अन्तिम समय पर</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे पिता  अपने काम में व्यस्त रहते थे या फिर समाज सेवा में। उनके पास,  हमारे या मां के  लिये समय नहीं रहता था।  इसलिए मां को जहां भी जाना होता था,  वे  हमारे साथ ही जाती थीं।  यह रवैया हमारी शादी के बाद भी चला।  मेरी पत्नी ने भी इसे सहर्ष स्वीकार किया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मां दूसरों के मन की बात समझती थीं और उसे  पूरा करने का भरसक प्रयत्न करती थीं। १९८० के दशक में उन्हें दिल की बीमारी हो गयी, अक्सर डाक्टर उन्हें देखने आया करते थे। मेरी सास ने कई साल अमेरिकी विश्विद्यालयों में पढ़ाया है। मेरी शादी के बाद जब वे सबसे पहले पढ़ाने के लिये गयीं तो <a href="http://www.blogger.com/profile/15090591980327578036">मुन्ने की मां</a>, मेरी मां की बीमारी के कारण उन्हें दिल्ली तक  छोड़ने नहीं जा पा रही थी। उसने मुझे कहा कि मैं दिल्ली जाकर उन्हें छोड़ आऊं। मैंने दिल्ली जाने का प्रोग्राम भी बना लिया।  शाम को उसने फोन करके  बताया कि अम्मा  की तबियत खराब है और मैं घर आ जाऊं।  उसने डाक्टर को भी बुला लिया था। जब तक मैं घर पहुँचा, डाक्टर साहब मां  को देख चुके थे और जाने लगे। चलते-चलते जब मैं डाक्टर साहब को उनकी कार तक छोड़ने गया तो उन्होंने मुझसे कहा कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;अम्मा की तबियत ठीक है और तुम दिल्ली जा सकते हो।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने कहा कि मैं इस बारे में सोचूंगा।  मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था और  दिल्ली नहीं गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मां  की तबियत अगले दिन बहुत अच्छी हो गयी। मुझे लगा कि मैंने बेकार ही दिल्ली प्रोग्राम रद्द किया। इसके अगले दिन ही, मां ने सुबह  चाय बनायी। अखबार  पढ़ते-पढ़ते, चाय की चुस्की लेते,  उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वे वहां चली गयी जहां से कोई वापस नहीं आता। वे अन्त तक सारे काम स्वयं करती रहीं। उन्हें न कभी किसी सहारे की जरूरत पड़ी, न ही उन्होंने किसी का सहारा लिया, न ही वे ऐसा जीवन पसन्द करती थीं। शायद भगवान भी, जिससे ज्यादा प्यार करता है &#8211; उसे इसी तरह की जिन्दगी, इसी तरह की मौत देता है। हे ईश्वर, मुझे भी इसी तरह की मौत देना।</span></p>
<div style="border-top:7px solid #5c8a64;border-bottom:7px solid #5c8a64;font-size:12pt;font-weight:bold;line-height:100%;padding-bottom:7px;padding-top:7px;width:375px;text-align:center;margin:10px;">अम्मां ने डाक्टर साहब को अपनी तबियत के बारे में न बताने कि कसम दी थी</div>
<p><span style="font-size:medium;">कुछ दिनों बाद,  बातचीत के दौरान मैंने मुन्ने की मां से कहा कि,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;अच्छा हुआ कि मैं दिल्ली नहीं गया और चला जाता तो मैं कभी अपने आपको माफ नहीं कर पाता पर  मेरी समझ में नहीं  आया कि डाक्टर साहब ने यह कैसे कह दिया  कि मैं दिल्ली जा सकता हूं जबकि अम्मां की तबियत ठीक नहीं थी।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उसने जवाब दिया,<br />
</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;">&#8216;<span style="font-size:medium;">जब तुम नहीं थे तो अम्मा ने डाक्टर साहब से कहा था कि, तुम दिल्ली जाना चाहते हो,  प्रोग्राम बना है और टिकट भी आ गया है, इसलिए डाक्टर साहब तुमसे कह दें कि उनकी तबियत एकदम ठीक है और यह न कहें कि कुछ  टेस्ट करवाने  हैं।   जो भी टेस्ट करवाना है वे अगले दिन आकर लिख देंगे। वे उसकी फीस अलग से दे देंगी। उन्होंने मुझे और डाक्टर सहब को तुम्हें यह न बताने कि    कसम भी  दिलवा दी थी।  इसलिए मैंने तुम्हे नहीं बताया और डाक्टर साहब ने तुम्हे दिल्ली जाने को कह दिया।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मुझे लगा कि वह मरते समय भी, इस बात का ख्याल रखती थी कि हम क्या चाहते हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हो सकता है कि आज के समय में बेटे और बेटियों का मां से रिश्ता  मदर-डे पर एक कार्ड देना ही रह गया हो पर मैं नहीं समझता कि मां का अपने बेटे और बेटियों से रिश्ता कार्ड तक है। यह कहीं  ज्यादा गहरा, कहीं ज्यादा सच्चा  है। मैं नहीं समझता कि इसे आंकने के लिये कोई नपना है, न कभी कोई नपना बनाया जा सकेगा।</span></p>
<div style="border-top:7px solid #5c8a64;border-bottom:7px solid #5c8a64;font-size:12pt;padding-bottom:7px;padding-top:7px;width:375px;text-align:center;margin:10px;">अगले दो शीर्षक &#8216;<em>मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी</em>&#8216; और &#8216;<em>रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें बनाने से बेहतर है</em>&#8216; के अन्दर लिखी सामग्री मेरे पत्नी शुभा के चिट्ठे &#8216;<a href="http://munnekimaa.blogspot.com/">मुन्ने के बापू</a>&#8216; से है और उसी द्वारा लिखी गयी है। उसी के कहने पर उसे यहां जोड़ा जा रहा है।</div>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने का एक तरीका यह भी</span></strong><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Munne ki Maa" src="http://bp0.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RkkWHK-B5lI/AAAAAAAAAFE/XEcq3ni6U1k/s200/Munne+Ki+maa.jpg" alt="" width="52" height="200" /></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">अधिकतर भारतीय पति पत्नी को आपसी स्नेह  प्रगट करना बहुत मुश्किल है क्या इस पर बदलाव आयेगा?</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">उन्मुक्त  ने भी, आज तक मुझसे,  स्नेह प्रगट करने वाले  शब्द  नहीं कहे हैं, मुझे इनका  <a href="http://munnekimaa.blogspot.com/2006/04/blog-post_30.html">इंतजार है</a> पर हमारे जीवन में कुछ ऐसा अवश्य हुआ है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह मेरा जन्मदिन हमेशा याद रखते हैं पर लगभग दो दशक पहले मेरे जन्मदिन पर एक बार मुझसे कुछ नहीं कहा। मुझे लगा कि यह मेरा जन्मदिन भूल गये हैं। मैंने भी इन्हे याद नहीं दिलाया पर बुरा जरूर लगा। उस दिन शाम को हमारे मित्र की बिटिया के जन्मदिन की पार्टी एक रेस्ट्राँ में थी। उस समय इनकी एक मीटिंग थी इसलिये ये वहां नहीं जा सकते थे। इन्होने मुझसे जाने के लिये और एक उपहार देने के लिये कहा। मुझे बहुत गुस्सा आया &#8211; मेरा तो जन्म दिन भी याद नहीं और दूसरे के लिये उपहार।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं और हमारा बेटा शाम को रेस्ट्राँ में गये। थोड़ी देर बाद मुझे लगा कि हमारे मित्र और रेस्ट्रां मालिक मेरे बारे में बात कर रहे हैं। वे मेरी तरफ देख रहे थे और कुछ इशारा सा कर रहे थे। मुझे कुछ अजीब सा लगा। इसके बाद रेस्ट्रां मालिक, फूलों का एक सुन्दर सा गुलदस्ता लाया। मैं समझती रही कि यह तो उस लड़की के लिये होगा जिसका जन्मदिन है पर उसने वह मुझे भेंट किया और कहा कि कोई सज्जन इसे मुझे देने के लिये कह गये थे। मैंने उससे उस सज्जन का नाम पूछा तो उसने कहा कि वह उस व्यक्ति को शक्ल से पहचानता है पर नाम नहीं मालुम। गुलदस्ते के साथ लगे कार्ड में लिखा था</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;क्या बताने की जरूरत है कि यह किसकी तरफ से है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">हमारे मित्र ने बताया कि वह रेस्ट्राँ मालिक, मुझे गुलदस्ता देने में डर रहा था कि कहीं मैं बुरा न मान जाऊं। वह हमारे मित्र से इसी बारे में पूछ रहा था। रेस्ट्राँ मालिक को वास्तव में इनका नाम नहीं मालुम था पर जब उसने हमारे मित्र को गुलदस्ता देने वाले का हुलिया बताया तो मित्र ने उसे अश्वस्त किया कि वह व्यक्ति कोई और नहीं पर मेरे पति ही हैं, वे <a href="http://munnekimaa.blogspot.com/2006/11/blog-post_28.html">इसी तरह के काम करते हैं</a>। गुलदस्ता देने में कोई हर्ज नहीं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शायद रिशतों में यह भी महत्वपूर्ण है कि जीवन  में कुछ न कुछ अप्रत्याशित होते रहना चाहिये।</span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें बनाने से बेहतर है<img class="alignright" title="Munne ki Maa" src="http://bp0.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RkkWHK-B5lI/AAAAAAAAAFE/XEcq3ni6U1k/s200/Munne+Ki+maa.jpg" alt="" width="52" height="200" /></span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">वर्ष २००८ में, उन्मुक्त  फिर से मेरा जन्मदिन फिर भूल गये थे। यह एक बिमारी जूझ कर उठे थे &#8230; मौत के करीब से गुजरे थे। मुझे यही लगा कि यह उसी उलझन में भूल गये। यह समय इन सब बातों को याद दिलाने का नहीं है। मैं भी भूल गयी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मेरे घर के पास एक स्वामी जी योग सिखाते हैं। शाम को वे महिलाओं को अलग से सिखाते हैं। मैं अपनी सखियों के साथ वहां पैदल जाती हूं। उस दिन शाम को लौटते समय, मेरे घर के सामने कई कारें खड़ी थीं। मेरी सखी ने मुझसे कहा,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;क्या तुम्हारे यहां कोई दावत है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="alignleft size-full wp-image-239" title="birthday-cake" src="http://unmukth.files.wordpress.com/2009/04/birthday-cake.png?w=139&#038;h=139" alt="birthday-cake" width="139" height="139" /></span><span style="font-size:medium;">मैंने कहा नहीं, पर लगता है कि कुछ लोग मिलने आयें हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">अन्दर पोर्टिको में एकदम नयी बिना नम्बर की कार खड़ी थी। उसमें रिबन लगा था। मुझे लगा कि हमारा कोई मित्र अपनी नयी कार दिखाने आया है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">अन्दर ड्रॉइंग रूम में मेरे परिवार के सदस्य, मेरे मित्र थे, एक केक था जिसमें लिखा था जन्मदिन मुबारक और मुझे बाहर नयी कार, मेरे जन्ददिन पर इनकी तरफ से उपहार।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">कार मारुति की ए-स्टार है जो कि ११ नवम्बर को निकली थी। यह उसका सबसे अच्छा और सबसे मंहगा (चार लाख दस हज़ार रुपये) वाला मॉडेल है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="aligncenter" title="Maruti star A" src="http://unmukth.files.wordpress.com/2009/04/marutistar-a.jpg?w=218&#038;h=129" alt="" width="218" height="129" /></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह हमारे कस्बे में बिकने वाली इस तरह की पहली कार है। इस कार को, न तो मैंने न ही इन्होंने, इसे चलाया या देखा था। उसके बारे में इन्होंने बिमारी के दौरान नर्सिंग होम के कमरे में टीवी में देखा था और हमारे मित्र से इसे चुपचाप ऑर्डर देने के लिये कहा था। सबके चले जाने के बाद, मैंने इनसे पूछा,</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;इस समय इतना मंहगा उपहार क्यों? हमें इस समय न केवल पैसों की जरूरत है पर तुम्हें अपने स्वास्थ और समय का भी ध्यान रखना है। तुमने व्यर्थ में ही इस अप्रत्याशित मंहगे उपहार को खरीदा और दावत इन्तजाम करने में समय जाया किया। यह समय इसके लिये नहीं है।&#8217;</span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इनका जवाब था।</span></p>
<blockquote>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">&#8216;हमने ३० साल साथ साथ गुजार लिये हैं। इतने समय बाद <span style="font-size:medium;">रिश्तों में बासीपन आ जाता है। ऐसे में यदि पुराने रिश्तों में नयापान न लाया जाय तो नये रिश्ते कायम हो सकते हैं। पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें कायम होने से बेहतर है।&#8217;</span></span></p>
</blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">महत्वपूर्ण है </span><span style="font-size:medium;">रिश्तों में नयापन लाना, देखना कि वे टूटें नहीं।</span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर  रिशतों की दुहाई न दो<img class="alignright" title="Unmukt" src="http://bp2.blogger.com/_VD9tZkRYrQ0/RkkV8q-B5kI/AAAAAAAAAE8/Nm9pcBjxl58/s200/Unmukt.jpg" alt="" width="80" height="200" /></span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह कोई बीस साल पहले की बात है, पहली बार, मुन्ने की मां लम्बे समय के लिये विदेश जा रही थी। मुन्ने को कुछ गर्व था तो कुछ दुख कि मां इतने लम्बे समय के लिये छोड़ कर जा रही है। एक दिन उसने मुझसे पूछा, क्या मां हमें प्यार नहीं करती। मैंने कहा नहीं वह हम सबसे बहुत प्यार करती है पर तुम ऐसा क्यों सोचते हो। उसने पूछा,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;यदि वह हमसे प्यार करती है तो इतने दिन तक हमें क्यों छोड़ कर जा रही है। हमें कुछ मुश्किल होगी तो कौन बतायेगा।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैं  उसे कैसे बताऊं ।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हमने बैठ कर कई मुद्दों पर बात की। मैंने कहा, मैं तो रहूंगा, तुम्हें कोई मुश्किल नहीं होगी। उन्होने पूछा,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;क्या तुम्हारे पास समय है&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने कहा कि जब मां थी तो वह समय निकालती थी, जब तक वह नहीं है, तब मैं निकालूंगा। उनको यह बताने का प्रयत्न किया,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;प्यार तो विश्वास है, यह लोगों को बांधता नहीं पर उन्हें अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता देता है जो  उनके जीवन में महत्वपूर्ण है। रिश्तों का बांध कर रखना ठीक नहीं।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैं नहीं जानता कि मुन्ना कितना समझ पाया पर यह सच है कि उसने अपनी मां का विदेश जाना, स्वीकार कर लिया। उसके पीछे, वह बहुत खुश भी रहा। मैं नहीं जानता कि वह इसलिये की उसे </span><span style="font-size:medium;">मेरी बात समझ में आयी या इस लिये कि उसकी मां तो आर्मी की जनरल साहिबा हैं और मैं &#8211; शायद भावना में हर पल को जीने वाला। मुन्ने को इतनी छूट कभी नहीं मिली &#8211; इस समय भी नहीं,  जब वह अपना बसेरा, सात समुन्दर पार, बहुत दूर, बसाने चला गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">पिछले साल हम सब, मेरा बेटा, बिटिया रानी (मेरी बहूरानी) साथ थे। मैंने पूछा,</span><span style="font-size:medium;"><img class="alignright" title="Munna and Parri" src="http://unmukts.files.wordpress.com/2009/02/munna-pari.jpg?w=164&#038;h=262&%23038;h=140" alt="" width="164" height="140" /></span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उनका जवाब था,</span></p>
<blockquote><p>&#8216;<span style="font-size:medium;">पापाऽऽ!! यह कैसा सवाल है।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">मैंने बहुत सीरियस हो  कर पूछा तुम लोग  बहुत दूर,  सात समुंदर पार चले गये हो बस इसलिये जानना चाहा। वह, मेरी सीरियस मुद्रा देखकर समझ गया। उसने मुस्कराते हुऐ, जवाब दिया,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;पापा, हमें तुम्हारी बीस साल पहले की बात आज भी याद है।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">वह मुझसे कहता है कि मैं भी वहीं उसके पास आ जाऊं  पर मैं जानता हूं कि मेरा जीना यहां ही है और मेरी मौत भी यहीं होगी।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार तो है बस विश्वास, इसे बांध कर  रिशतों की दुहाई न दो। यदि बांध कर रोका तो यही होगा, जैसा यहां हुआ <img src='http://s2.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /> </span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">खामोशी फिल्म १९६९ में आयी। इसका निर्देशन असित सेन ने किया है। इसमें राजेश खन्ना और वहीदा </span><span style="font-size:medium;">रहमान ने मुख्य भूमिका निभायी थी।  कहानी इस प्रकार है कि राजेश खन्ना एक असफल प्रेम प्रसंग के कारण अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। पागलखाने में राधा नाम की एक नर्स हैं जिसका किरदार वहीदा रहमान ने निभाया है। डाक्टर, वहीदा रहमान को राजेश खन्ना के साथ प्रेम का नाटक करने को कहते हैं। राजेश खन्ना तो ठीक हो जाते हैं पर वहीदा रहमान अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है क्योंकि इसके पहले धर्मेन्द्र के साथ प्रेम का नाटक करते-करते वह सच में उससे प्रेम करने लगती है और बार-बार प्रेम का नाटक नहीं कर सकती।<br />
</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">खामोशी की सहृदय नर्स राधा के किरदार में वहीदा का अभिनव अद्वितीय है इसको उनकी जैसी संवेदनशील कलाकारा ही अभिनीत कर सकती थीं कोई और नहीं। हांलाकि मुझे इस फिल्म की कहानी में कोई दम या सत्यता नहीं लगती।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस फिल्म में गुलजार का लिखा एक गीत है जिसे लता मंगेशकर ने गाया है। यह गाना मेरे प्रिय गानो में से एक है। इसके बोल इस प्रकार हैं:</span><span style="font-size:medium;"><img class="alignright size-full wp-image-280" title="khamoshi" src="http://unmukth.files.wordpress.com/2009/04/khamoshi.jpg?w=205&#038;h=234" alt="khamoshi" width="205" height="234" /></span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हाँथ से छू के इसे रिश्तों का इल्जाम न दो।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार कोई भूल नहीं, प्यार आवाज नहीं,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">एक खामोशी है, सुनती है कहा करती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">न ये झुकती है न रूकती है न ठहरी है कहीं,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">नूर की बूंद है सदियों से बहा करती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मुस्कराहट से खिली रहती है आँखों में कहीं,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">और पलकों के उजाले से झुकी रहती है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">होंठ कुछ कहते नहीं काँपते ओठों से मगर,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इसमें खामोशी के अफसाने रूके रहते हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">इस गाने को, विडियो में भी सुन सकते हैं।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2009/04/18/relationship/"><img src="http://img.youtube.com/vi/0XVRP5EUJck/2.jpg" alt="" /></a></span></p>
<p><span style="font-size:medium;">जहां तक मैं समझता हूं, यही है इस चिट्ठी का सरांश, यही है। इस जमाने की रमती खुशबू, यही है &#8211; रिश्तों की महकती खुशबू। रिश्ते तो हैं विश्वास, इसे बांध कर  मत रखो &#8211;  प्रेम तो अपने हर रंग में, बन्धन रहित है।</span></p>
<p style="text-align:center;"><strong><span style="font-size:medium;">पुनःलेख &#8211; जीना इसी का नाम है</span></strong></p>
<p><span style="font-size:medium;">यह श्रंखला मुझे, मेरे बचपन के जीवन की यादों में, मेरे उन्मुक्त दिनों के बीच ले गयी। वे दिन ही मेरे जीवन के सबसे सुखद दिन थे, चिन्ता रहित थे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस श्रंखला को लिखते समय, एक शादी के समय, हम सब भाई, बहन, हमारे बेटे, बेटियां, बहुरानियां, दामाद सब साथ थे। हमने अपनी मां के साथ के, अपने बचपन के दिनों को फिर से जिया। उन चिट्ठियों को पढ़ने के बाद हम सब की आंखें नम थीं। हांलाकि हमारी आने वाली पीढ़ी उसे उतना नहीं समझ पायी जितना हम चाहते थे। समय बदल गया, समीकरण बदल गये, समाज का ढांचा बदल गया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">हम सब ने अपने सुखद दिनो की याद की, उनमें पुनः जिया। इस तरह की अनुभूति जीवन में प्रसन्नता एवं उत्साह भरता है और जीवन में कुछ नया करने को न केवल प्रेरित करता है पर इसकी हिम्मत भी देता है। इस श्रंखला ने वह सब न केवल मेरे साथ पर हमारे परिवार के साथ किया।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">इस श्रंखला कि एक चिट्ठी शैली (Percy Bysshe Shelley) कि कविता &#8216;To a Skylark&#8217; की एक पंक्ति &#8216;Our sweetest songs are those that tell of saddest thought&#8217; है। इस कविता आप <a href="http://www.keats-shelley-house.org/poem_shelley_1.php">यहां</a> पढ़ सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">मैं अंग्रेजी या हिन्दी साहित्य का कभी भी विद्यार्थी नहीं रहा। कुछ थोड़ा बहुत अपने आप ही पढ़ा है। शैली को भी तभी पढ़ा था। जब मैं इस विषय पर लिखने की सोचने लगा तो मैंने अपने एक मित्र उसकी पत्नी से फोन कर शैली की उस पंक्ति का मतलब समझाने को कहा। वे दोनो अंग्रेजी विषय पढ़ाते हैं। तीन दिन बाद मिलना तय हुआ। हम लोग रात में देर तक शैली और रुमानी कवियों के बारे में बात करते रहे।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">कुछ देर बाद मेरे मित्र की पत्नी ने मुझ धन्यवाद दिया। मझे आश्चर्य हुआ और पूछा,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;तुम मुझे क्यों धन्यवाद दे रही हो? धन्यवाद तो, मुझे तुम लोगों को देना चाहिये।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;">उसने कहा,</span></p>
<blockquote><p><span style="font-size:medium;">&#8216;हम दोनो अंग्रेजी पढ़ाते हैं। पढ़ाना, हमारे लिय उस दैनिक कार्य की तरह है जैसे दाल रोटी खाना, बस और कुछ नहीं। तुम्हारे द्वारा, शैली की उस पंक्ति का अर्थ पूछने पर, अन्य अध्यापकों और विद्यार्थियों के बीच इस विषय पर चर्चा हुई और एक अच्छी बहस हुई कि उस पंक्ति का क्या अर्थ है। हमने तुम्हारे सवाल के जवाब पाने के लिये कई सुनहरे पल बहस में गुजारे। यह सब इसलिये हुआ कि तुम्हें शैली के बारे में उतनी उत्सुकता है। यह धन्यवाद, हमें सुनहरे पल वापस देने के लिये है।&#8217;</span></p></blockquote>
<p><span style="font-size:medium;"><img class="size-full wp-image-269 alignright" title="Anari" src="http://unmukth.files.wordpress.com/2009/04/anari.jpg?w=108&#038;h=148" alt="Anari" width="108" height="148" /></span><span style="font-size:medium;">मुझे <a href="http://unmukth.wordpress.com/2008/10/19/goa-india/">गोवा यात्रा</a> से हवाई जहाज पर लौटते समय, विमान परिचारिका की कही बात, &#8216;<a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/04/goa.html">अंकल तो बच्चे हैं</a>&#8216;, याद आ गयी। जीवन में जिज्ञासू बनना, उत्सुक रहना, कुतूहल जताना तो बच्चों का काम है।</span></p>
<p><span style="font-size:medium;">शायद जिंदादिली ही उत्सुकता का दूसरा नाम है और यही है, जीवन, जीने का दर्शन।</span></p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:medium;">जीवन को दुसरे रूप में देखने की बात तो अनाड़ी फिल्म का यह गाना भी बताता है।  यह गाना मुकेश ने गाया है और इसे राज कपूर पर फिल्माया गया है। इसका भी आनन्द लीजिये।</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="font-size:medium;"><span style="text-align:center; display: block;"><a href="http://unmukth.wordpress.com/2009/04/18/relationship/"><img src="http://img.youtube.com/vi/awelkdyDTBc/2.jpg" alt="" /></a></span><br />
</span></p>
<p style="text-align:center;">सांकेतिक शब्द</p>
<p style="text-align:left;"><span style="font-size:small;"><a href="http://technorati.com/tag/Culture">culture</a>, <a href="http://wordpress.com/tag/life/">Life</a>, </span><span style="font-size:small;"><a href="http://technorati.com/tag/Life">life</a>, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%B6%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%80">जीवन शैली</a>, <a href="http://samaj.chitthajagat.in/">समाज</a>, कैसे जियें, जीवन, दर्शन, </span><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/search/label/%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%A8">दर्शन</a>, <span style="font-size:small;">जी भर कर जियो, </span><br />
<a href="http://vijyan.chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE">धर्म</a>, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;amp;amp;amp;TagText=%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE">धर्म- अध्यात्म</a>,</p>
<div><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sex_education">Sex education</a>,  <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AF%E0%A5%8C%E0%A4%A8%20%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">यौन शिक्षा</a>,</div>
<div>film, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Film">film</a>, film review, फिल्म, फिल्म समीक्षा, <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE%20%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">फिल्म समीक्षा</a>,  <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%9F%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A4%A8">फिल्म टेलिविज़न</a>,</div>
<p><span style="font-size:small;"> </span>book, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book">book</a>, <a href="http://technorati.com/tag/books">books</a>, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=Books">Books</a>,  <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Book_review">book review</a>, book review, Hindi, kitaab, pustak, <a href="http://chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE">किताबखाना</a>, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%80%20%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE">किताबी दुनिया</a>,  <a href="http://chitthajagat.in/?shrenee=%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%82">किताबें</a>, किताबें, <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80%3A%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95">पुस्तक</a>, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, <a href="http://blogvani.com/Default.aspx?mode=tag&amp;TagText=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE">समीक्षा</a>,</p>
<br />Posted in दर्शन Tagged: Family, Inspiration, Life, Relationship <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/unmukth.wordpress.com/247/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/unmukth.wordpress.com/247/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/unmukth.wordpress.com/247/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/unmukth.wordpress.com/247/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/unmukth.wordpress.com/247/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/unmukth.wordpress.com/247/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/unmukth.wordpress.com/247/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/unmukth.wordpress.com/247/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/unmukth.wordpress.com/247/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/unmukth.wordpress.com/247/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/unmukth.wordpress.com/247/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/unmukth.wordpress.com/247/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/unmukth.wordpress.com/247/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/unmukth.wordpress.com/247/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=unmukth.wordpress.com&amp;blog=230997&amp;post=247&amp;subd=unmukth&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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